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क्या ईश्वर पक्षपाती है?
एक मन, एक देवता और एक ही उपासना पद्धति अपनाते हुए भी उपासना के परिणामों में भारी अंतर दिखाई पड़ता है। एक की उपासना चमत्कारी प्रभाव उत्पन्न करती है, जबकि दूसरे की निष्प्राण मालूम पड़ती है और कोई विभिन्न प्रयोजन पूरा नहीं कर पाती। यह स्थिति स्वभावतः मन को असमंजस में डालती है। उसी प्रक्रिया का अवलम्बन करने से एक को लाभ, एक को हानि, ऐसा क्यों? एक को सिद्धि, दूसरे के हाथ निराशा; यह किसलिए? कैसे? वही देवता, वही मंत्र, वही विधि एक की फलित, एक की निष्फल; इसका क्या कारण है? यदि भगवान या देवता और उसकी उपासना अंधविश्वास है तो फिर इससे कितने ही लाभान्वित क्यों होते हैं? यदि सत्य है तो उससे कितनों को ही निराश क्यों होना पड़ता है? जल हर किसी की प्यास बुझाता है, सूरज हर किसी को गर्मी-रोशनी देता है, फिर देवता और उनके उपासना क्रम में परस्पर विरोधी प्रतिक्रियाएँ क्यों?

इस उलझन पर अनेक दृष्टियों से विचार करने के उपरांत इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि देवता या मंत्रों में जितनी अलौकिकता दृष्टिगोचर होती है, उनसे लाभान्वित हो सकने की पात्रता साधक में होना नितांत आवश्यक है। मंत्र उपासनात्मक कर्मकाण्डों की लकीर पीट लेना  इस संदर्भ में अपर्याप्त है। तेज धार की तलवार में सिर काटने की क्षमता है, इसमें संदेह नहीं, पर वह क्षमता सही सिद्ध हो इसके लिए चलाने वाले का भुजबल, साहस एवं कौशल भी आवश्यक है। घृत सेवन का लाभ वही उठा सकता है, जिसकी पाचन क्रिया ठीक हो। देवता और मंत्रों का लाभ वे उठा पाते हैं, जिन्होंने व्यक्तित्व को भीतर और बाहर से, आचार-विचार से परिष्कृत बनाने की साधना कर ली है। 

अतः पहले ‘आत्म-उपासना, फिर देव उपासना’ की शिक्षा ब्रह्मविद्या के विद्यार्थियों को दी जाती रही है। लोग उतावली में मंत्र और देवता के, भगवान और भक्त के पीछे पड़ जाते हैं। इससे पहले आत्मशोधन की आवश्यकता पर ध्यान ही नहीं देते। फलतः उन्हें निराश ही होना पड़ता है। 

अध्यात्म विज्ञान का समुचित लाभ लेने के लिए साधक का अंतःकरण एवं व्यक्तित्व जितना निर्मल होगा उतनी ही उपासना उसकी सफल होगी। धुले कपड़े पर रंग आसानी से चढ़ता है, मैले पर नहीं। स्वच्छ व्यक्तित्व सम्पन्न साधक किसी भी पूजा-उपासना का लाभ सहज ही प्राप्त कर सकता है। 

परमात्मा की न्याय व्यवस्था
भगवान और देवता कहाँ हैं? किस स्थिति में हैं? उनकी शक्ति कितनी है? इस तथ्य का सही निष्कर्ष यह है कि दिव्य चेतनसत्ता निखिल विश्व ब्रह्माण्ड में व्याप्त है और पग-पग पर उनके समक्ष जो अणुगति जैसी व्यस्तता के कार्य प्रस्तुत हैं, उन्हें पूरा करने में संलग्र है। उनके समक्ष असंंख्य कोटि प्राणियों की, जड़-चेतन की बहुमुखी गतिविधियों को सँभालने का विशालकाय कार्य पड़ा है, सो वे उसी में लगी रहती हैं। एक व्यवस्थित नियम और क्रम उन्हें इन ग्रह-नक्षत्रों की तरह कार्य में संलग्र रखता है। व्यक्तिगत संपर्क में घनिष्ठता रखना और किसी की भावनाओं के उतार-चढ़ाव की बातों पर बहुत ध्यान देना, उनके लिए समग्र रूप से संभव नहीं। 

वे ऐसा करती तो हैं पर अपने एक अंश प्रतिनिधि के द्वारा। दिव्य सत्ताओं ने हर मनुष्य के भीतर उसके स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीरों में अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनंदमय कोश जैसे आवरणों में अपना एक-एक अंश स्थापित किया हुआ है और यह अंश-प्रतिनिधि ही उस व्यक्ति की इकाई को सँभालता है। शाप-वरदान आदि की व्यवस्था इसी प्रतिनिधि द्वारा संपन्न होती है। 

प्रसन्नता व प्रभाव का विधान
व्यक्ति की अपनी निष्ठा, श्रद्धा, भावना के अनुरूप यह देव अंश समर्थ बनते हैं और दुर्बल रहते हैं। एक साधक की निष्ठा में गहनता और व्यक्तित्व में प्रखरता हो तो उसका देवता समुचित पोषण पाकर अत्यंत समर्थ दृष्टिगोचर होगा और साधक की आज्ञाजनक सहायता करेगा। दूसरा साधक आत्मिक विशेषताओं से रहित हो तो उसके अंतःकरण में अवस्थित देव अंश पोषण के अभाव में भूखा, नंगा, रोगी, दुर्बल बनकर एक कोने में कराह रहा होगा। पूजा भी नकली दवा की तरह भावना रहित होने से उस देवता को परिपुष्ट न बना सकेगी और वह विधिपूर्वक मंत्रजप आदि करते हुए भी समुचित लाभ न उठा सकेगा। 

विराट ब्रह्म कितना ही महान क्यों न हो, व्यक्ति की इकाई में वह उस प्राणी की परिस्थिति में पड़ा हुआ लगभग उससे थोड़ा ही अच्छा बनकर रह रहा होगा। अंतरात्मा की पुकार निश्चित रूप से ईश्वर की वाणी है। पर वह हर अंतःकरण में समान रूप में प्रबल नहीं होती। सज्जन के मस्तिष्क में मनोविकारों की एक जोक घुस जाये तो भी उसकी अंंतरात्मा प्रबल प्रतिकार के लिए उठेगी और उसे ऐसी बुरी तरह धिक्कारेगी कि पश्चाताप ही नहीं, प्रायश्चित्त किये बिना भी चैन न पड़ेगा। इसके विपरीत दूसरा व्यक्ति जो निरंतर क्रूर कर्म ही करता रहता है, उसकी अंतरात्मा यदाकदा बहुत हल्का सा प्रतिवाद ही करेगी और वह व्यक्ति उसे आसानी से उपेक्षित करता रहेगा। दोनों की अंतरात्मा की प्रकृति एक-सी है। दोनों ही अपना कर्त्तव्य निभाती हैं, पर दोनों की स्थिति सर्वथा भिन्न है। सज्जन ने सत्प्रवृत्तियों को पोषण देकर अपनी अंतरात्मा को निर्मल बनाया है, उसकी प्रबलता कभी शाप-वरदान के चमत्कार भी प्रस्तुत कर सकती है। पर दूसरों ने अपनी आत्मा को निरंतर पददलित करके उसे भूखा रखकर दुर्बल बना रखा है, वह न तो प्रबल प्रतिरोध कर पाता है और न कभी उसके द्वारा ईश्वर की पुकार आदि की जाये तो उसका कुछ प्रतिफल निकल सकता है। 

विराट ब्रह्म सर्वव्यापी, साक्षी, दृष्टा, नियंता, कर्त्ता, सत, चित्, आनंद आदि विभूतियों से सम्पन्न है। देव शक्तियाँ भी अपनी सीमित परिधि के अनुरूप निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त और निर्धारित प्रयोजनों में तत्पर हैं। उन विराट सत्ताओं की उपासना संभव नहीं है। उपासना के लिए प्रत्येक व्यक्ति के भीतर उनका एक छोटा-सा प्रतिनिधि मौजूद है। साधक और तपस्वी अपनी निष्ठा के अनुरूप उसका पोषण करते, समर्थ बनाते और लाभ उठाते हैं। 

एक ग्वाले की गाय स्वस्थ, सुंदर और बहुत दूध देती है, दूसरे की ठीक वैसी ही होने पर भी दुबली, रुग्ण और कम दूध देती है। इसका कारण उन दोनों ग्वालों की गौसेवा में न्यूनाधिकता का होना ही है।  

रामकृष्ण परमहंस की काली ने विवेकानंद को आत्मशक्ति से सम्पन्न बनाकर उन्हें महामानवों की पंक्ति में ला खड़ा किया। दूसरे तांत्रिक, अघोरी, कापालिक, ओझा उसी काली देवी से झाड़-फूँक के छिटपुट प्रयोजन ही पूरे कर पाते हैं। 

द्रौपदी के कृष्ण अलग थे, वे एक पुकार सुनते ही दौड़कर आये। हमारे कृष्ण अलग हैं, वे लगभग लंघन में पड़े रोगी की तरह हैं, पुकार सुनने और सहायता के लिए खड़े होने की सामर्थ्य उनके हाथ-पैरों में है नहीं, फिर वे प्रार्थना का क्या उत्तर दें!
हर किसी के मस्तिष्क में गणेश विद्यमान हैं। जो बुद्धि-विकास की साधना करके अपने गणेश को परिपुष्ट बना लेगा, वह विद्वान बनकर अनेक विभूतियों के वरदान प्राप्त करेगा। जो अपने गणेश की जड़ों में पानी नहीं देगा, उसके मन के विनायक भगवान सूखे-मूर्छित एक कोने में पड़े होंगे। लड्डू, खीर, खिलौने, स्तोत्र पाठ करने पर भी वे कुछ सहायता न कर सकेंगे। बुद्धिमान और विद्वान बन सकना संभव न होगा। 

बालबुद्धि, उतावले और अदूरदर्शी लोग ही उपासना को जादूगरी, बाजीगरी जैसी चीज मानकर चलते हैं। अधिकांश पूजा-उपासना में संलग्र लोगों की मनोभूमि ऐसी ही बच्चों जैसी स्तर की होती है।  वस्तुतः भगवान न इतने भोले हैं, न कोई मंत्र ऐसा है जिसे कुछ बार जप-रटकर मनचाहा लाभ उठाया जा सके। उपासना का एक सर्वांगपूर्ण विज्ञान है। यदि यह तथ्य लोगों ने समझा होता तो अध्यात्म मार्ग में देहरी पर पैर रखते ही पहला प्रयोग अपने अंतरंग में मूर्छित, पददलित, विभुक्षित, मलिन पड़े हुए इष्टदेव को सँभालने-सँजोने का प्रयत्न किया होता। उन्हें समर्थ और बलवान बनाया होता। इस प्रथम प्रयोजन को पूरा करने के बाद मंत्र जप, उपासना, पूजा, स्तोत्र आदि का चमत्कार देखने का दूसरा कदम उठाया गया होता तो निःसंदेह हर साधक को आशाजनक सफलता मिली होती और किसी को भी निराश होने, अविश्वासी बनने या असमंजस में पड़ने का अवसर न आता।
 
वाङ्मय खंड-३, उपासना-समर्पण योग, पृष्ठ ३.४४-४७ से संकलित, संपादित


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