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जीवन को ऊँचा उठायें, समाज एवं राष्टट्र के वातावरण-पर्यावरण को श्रेष्ठ बनायें
श्रावणी पर्व

युगऋषि ने पर्वों की प्रेरणा में लिखा है कि श्रावणी पर्व परब्रह्म द्वारा अपने संकल्प (एकोऽहं बहुस्याम्) से सृष्टि-सृजन के प्रसंग का प्रतीक है। परमात्मा की तरह उसके राजकुमार मनुष्य में भी संकल्प के अनुरूप सृष्टि करने की क्ष्मता है। संकल्प के अनुसार कार्य होने का सिद्धांत सर्वमान्य है। यदि कर्म अच्छे करने हैं तो श्रेष्ठ संकल्पों से अंतःकरण को बाँधकर रखना ही होगा। श्रावणी पर्व साधकों को श्रेष्ठ संकल्पों, व्रतों से बाँधने का पर्व है।

बंधन दो तरह के ः- भारतीय संस्कृति के अनुसार बंधन मुक्ति, जीवन मुक्ति को परम पुरुषार्थ की श्रेणी में रखा गया है। लेकिन जीवन को श्रेष्ठ बनाने के लिए भी व्रतबंध (यज्ञोपवीत) रक्षाबंधन आदि को संकल्पपूर्वक धारण भी किया जाता है। एक पुरुषार्थ है बन्धनों से बचना तो दूसरा पुरुषार्थ है व्रतों के बंधनों से बाँधना। दोनों में अंतर क्या है? उदाहरणों से समझें-

एक व्यक्ति जो तैर सकता था, उसके हाथ-पैर बाँध कर पानी में फैंक दिया गया। एक व्यक्ति जो तैरना नहीं जानता, उसकी कमर में रस्सी बाँध कर उसका सहारा देकर उसे तैरना सिखा दिया गया। एक व्यक्ति के शरीर में पत्थर बाँधकर किसी ने उसे कुए में गिरा दिया। दूसरे व्यक्ति ने उसे रस्सी से बाँधकर बाहर निकाल लिया। एक प्रकार के बंधन विनाश का कारण बनते हैं तो दूसरे प्रकार के बंधन विकास का। इसीलिए मृत्युंजय मंत्र में प्रार्थना की गयी है ः-

‘बंधनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात’ अर्थात-् 
हे प्रभु! हमें मृत्युबंधनों से मुक्त कर दें, अमृत बंधनों से मुक्त न करें। 
मनुष्य हीन प्रवृत्तियों से बँधकर पतन के गर्त में गिरता है और श्रेष्ठ प्रवृत्तियों के बंधन में बँधकर उत्कर्ष का अधिकारी बनता है। 

अँधेरे से बचना है तो प्रकाश की व्यवस्था बनानी ही होगी। गंदगी से बचना है तो स्वच्छता का अभ्यास बनाना ही होगा। कुसंस्कारों से बचना है तो सुसंस्कारों को संकल्पपूर्वक जाग्रत् करना ही होगा। युगऋषि का वाक्य है- 

‘‘मनुष्य जन्म मिलना तो सहज है, किंतु मनुष्यता का विकास तो बहुत श्रमसाध्य है।’’ 

स्वयं को श्रेष्ठ मनुष्य बनाना श्रेष्ठ पुरुषार्थ है। श्रावणी पर्व इसी पुरुषार्थ की प्रेरणा और उसके अनुसार अवसर लेकर आता है। 

द्विज, अर्थात् दुबारा जन्म
भारतीय संस्कृति में मनुष्य की काया मिलने पर उसमें मानवोचित गुण, कर्म, स्वभाव के विकास को बहुत महत्त्व दिया गया है। उसे द्विज-दूसरे जन्म की संज्ञा दी गयी है। मानवीय काया मिली तो एक जन्म हो गया, लेकिन जब मानव काया में मानवोचित श्रेष्ठ गुण, कर्म, स्वभाव के विकास का पुरुषार्थ संकल्पपूर्वक किया जाता है तब उसे दूसरा जन्म मिला या द्विजत्व का संस्कार मिला, ऐसा कहा जाता है। इसीलिए कहा भी गया है कि - जन्म से तो सभी मनुष्य शूद्र (श्रमनिष्ठ) होते हैं, संस्कार द्वारा वे द्विज (श्रेष्ठ गुण, कर्म, स्वभाव वाले) बनते हैं।

जो कार्य जितना महत्त्वपूर्ण होता है, उसे पूरा करने में उतनी ही सावधानी बरतनी पड़ती है। कहावत है ‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी’। मनुष्य को सच्चा मनुष्य बनाये रखना बहुत महत्त्वपूर्ण कार्य है। इसीलिए इस दिशा में ऋषियों-मनीषियों ने विशेष सावधानी बरतने का विधान बनाया है। अन्य संस्कार जीवन में एक बार करके ही काम चल जाता है, किंतु द्विजत्व के संस्कार को हर वर्ष दोहराया जाता है। बंदूक खरीदने पर उसका लायसेंस बनवाया जाता है, किंतु उसके रख-रखाव में कहीं असावधानी न हो, इसलिए हर साल लायसेंस का नवीनीकरण कराना पड़ता है। इसी तरह द्विजत्व का संस्कार लेने वाले को हर वर्ष श्रावणी पर्व पर उसका नवीनीकरण करने-कराने का विधान बनाया गया है। 

चूक न होने दें
आज के समय में जो तमाम विडम्बनाएँ, परेशानियाँ विशाल रूप ले रही हैं, उनके पीछे मनुष्य की एक ही चूक मुख्य रूप से है कि मनुष्य शरीरधारी को ही मनुष्य मान लिया गया, उसके अंदर मानवीय सत्प्रवृत्तियों, संवेदनाओं को विकसित करने की बात भुला दी गयी। इसीलिए यदि विवेक की दृष्टि से देखा जाय तो मनुष्य की काया में अनगढ़ पशु और भयानक पिशाच बड़ी संख्या में घूमते दिखाई देते हैं। 
भारतीय ऋषियों ने इस तथ्य को समझा और मनुष्य के चिंतन, चरित्र एवं व्यवहार को श्रेष्ठतर बनाने के लिए व्यवस्था बनाई। मनुष्य को द्विजत्व में दीक्षित करने तथा उस प्रक्रिया को हर वर्ष अधिक कारगर बनाने की रूपरेखा बनाई। श्रावणी पर्व इसी महान परिपाटी का एक अंग है। उसे पूरी गरिमा के साथ सार्थक किया जाना चाहिए। 

संसार की बनावट ही कुछ ऐसी है कि इसमें गुणों के साथ दोष भी पनपने लगते हैं। चाहे जितना अच्छा खेत हो, उसमें खरपतवार तो उगते ही हैं। उनकी निराई न की जाये तो फसल का नुकसान तो होगा ही। अच्छी से अच्छी मशीन में भी चलते-चलते खराबी आने लगती है, उसे समय पर ओवरहॉलिंग करके ठीक न किया जाय तो कभी भी नुकसान हो सकता है। इसी तरह मानव जीवन में भी विकारों की घुसपैठ होती रहती है। यदि उन्हें ठीक करने के प्रयास संजीदगी से न किए जायें तो जीवन में भटकाव आने लगता है। 

इसी का एक और भी पक्ष है। यदि सावधानी बरती गयी और जीवन का स्तर गिरा नहीं, तब भी कार्यों के बढ़ते स्तर के हिसाब से कुशलता और क्षमता का विकास होना भी तो जरूरी है। मनुष्य प्रगतिशील स्वभाव का है। विकसित होते कार्यों और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप यदि कार्य करने वालों की संख्या और गुणवत्ता न बढ़े, तब भी तो प्रगति का क्रम रुक जाता है। 

जीवन में गिरावट न आये और प्रगतिचक्र के अनुसार क्षमता विकसित होती रहे, इन दोनों ही दृष्टियों से सावधानी बरतनी पड़ती है। आजकल इसीलिए टैक्रोलॉजी को ‘अपडेट’ अर्थात् समय की माँग के अनुरूप सटीक बनाये रखा जाता है। जीवन की टैक्रोलॉजी को भी इसी प्रकार सटीक बनाये रखने के लिए ऋषियों ने श्रावणी पर्व का विधान बनाया है। हर साधक को चाहिए कि वह जीवन-परिष्कार की साधना में कहीं चूक न होने दें, उसे समय की माँग के अनुसार सटीक बनाये रखने के प्रयास पूरी निष्ठा से करे। 


चिन्ह पूजा नहीं, प्राणवान प्रयास
श्रावणी पर्व पर कर्मकाण्ड दोहरा लेने की चिह्नपूजा भर नहीं की जानी चाहिए, उसके उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्राणवान प्रयास किये जाने चाहिए। ऋषियों ने जिस प्रक्रिया के साथ जो उद्देश्य जोड़े हैं, उन्हें समझाते हुए उस दिशा में अपनी कमियों को पूरा करने अथवा पहले से बेहतर स्तर बनाने के लिए समयानुकूल सुनिश्चित प्रयास किए जाने चाहिए। श्रावणी पर्व के विभिन्न कर्मकाण्डों पर इसी लिहाज से उद्देश्यपूर्ण दृष्टि डालनी चाहिए।

हेमाद्रि संकल्प - अर्थात् स्वर्णिम जीवन की ओर प्रगति का संकल्प। हेम अर्थात् स्वर्ण, अद्रि अर्थात् पर्वत। स्वर्णिम विभूतियाँ की पहाड़ जैसी संभावनाएँ ईश्वर ने हमारे लिए विनिर्मित कर दी हैं। हमें उन तक पहुँचना या उन्हें धारण करना है। हमारी ही हीन वृत्तियाँ उसमें बाधक होती हैं। वे जाने-अनजाने चुपके से जीवन में घुस पड़ती हैं। हेमाद्रि संकल्प में उन्हें निकाल फेंकने तथा पुनः न आने देने के लिए संकल्प किया जाता है। हर साधक को इसके लिए गहन आत्मसमीक्षा करके अपने अंदर से हीन प्रवृत्तियों के निष्कासन के लिए सुनिश्चित रूपरेखा बनाकर संकल्प लेने चाहिए।

दस स्नान ः- स्नान का उद्देश्य मलीनता को हटाना तथा स्फूर्ति को जगाना होता है। दस स्नान का स्थूल स्वरूप दस पदार्थों का उपयोग करके शरीर के विकारों को दूर करना तथा पोषण को बढ़ाना होता है। उस पर तो ध्यान दिया ही जाना चाहिए, साथ ही उसके सूक्ष्म उद्देश्यों को भी पूरा करने के प्रयास करने चाहिए।

हमारी दस इन्द्रियाँ हैं-पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा पाँच कर्मेन्द्रियाँ। सारे कार्य इन्हीं के माध्यम से होते हैं। ज्ञानेन्द्रियों के पीछे उनकी तन्मात्राएँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) की क्षमताएँ तथा कर्मेन्द्रियों के पीछे उनसे सम्बन्धित पाँच प्राण सक्रिय रहते हैं। उनका शोधन तथा पोषण करना दस स्नानों का सूक्ष्म उद्देश्य होता है। तन्मात्राएँ शुद्ध होने से इन्द्रियों की प्रवृत्तियाँ शुद्ध होती हैं, प्राणों के परिष्कार से कर्मेन्द्रियों की क्षमता बढ़ती है। यह पवित्रता और प्रखरता जीवन को पूर्णता की ओर ले जाने में समर्थ होती है। दस स्नान के साथ इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए संकल्प उभरें  तो बात बन जाये।

शिखा, यज्ञोपवीत ः- शिखा का सिंचन तथा यज्ञोपवीत का परिवर्तन एक स्थूल क्रिया है। उसके पीछे सूक्ष्म उद्देश्य साधक के चिन्तन को श्रेष्ठ और प्रखर तथा चरित्र को शुद्ध और प्रामाणिक बनाना होता है। शिखा-सिंचन के साथ मस्तिष्क को श्रेष्ठ विचारों से सिंचित-ऊर्जित करते रहने की व्यवस्था बनाना तथा यज्ञोपवीत परिवर्तन के साथ समय की माँग के अनुरूप यज्ञीय जीवन अपनाने, जीवन को पहले से अधिक परमार्थ-लोकहित में समर्थ बनाने के संकल्प उभरने चाहिए।

देव, ऋषि पूजन ः- देव पूजन से अपने अंदर दैवी क्षमताओं को विकसित करने तथा ऋषि पूजन के साथ उन क्षमताओं को ऋषियों के अनुकूल श्रेष्ठ प्रयोजनों में लगा देने के संकल्प दृढ़ होने चाहिए।

तर्पण ः- पितरों का तर्पण करना उचित है। तर्पण करके पितरों को तृप्त करने के अपने भावों को उन तक संप्रेषित किया जाता है। यह भी अच्छा है। किन्तु पितरों को सच्चा संतोष तो तभी मिल सकता है जब हम उनके द्वारा स्थापित श्रेष्ठ परम्पराओं का संरक्षण, पोषण करने लगें। अपने पूर्वज सत्पुरुषों की संतुष्टि के लिए पुरुषार्थ के संकल्प इस प्रक्रिया के साथ उभरने चाहिए।

रक्षाबंधन ः- श्रावणी पर्व के इस कर्मकाण्ड के प्रति जनसाधारण में बहुत उत्साह होता है। उसके लिए बड़े जोश और उत्सव का माहौल भी बन जाता है। लेकिन परिस्थितियों की विवेकपूर्ण समीक्षा करने पर लगता है कि रक्षाबन्धन की सार्थकता कम ही होती जा रही है। इसके दो रूप प्रचलित है- 1. भाई-बहन, नर-नारी के बीच, 

2. यजमान और पुरोहित के बीच। दोनों कर्मकाण्ड तो होते दिख रहे हैं, किन्तु उनके साथ जुड़े प्रयोजन पूरे होते नहीं दिख रहे हैं -

1. भाई-बहन - बहन भाई को राखी बाँधती है, इसके पीछे दो भाव होते हैं। एक तो आदर्शनिष्ठ भाई की रक्षा के लिए अपनी सद्भावना, तप-साधना का कवच पहनाना। भाई की सुरक्षा के लिए अपना सूक्ष्म योगदान देना। दूसरा भाई द्वारा बहन की अस्मिता, सम्मान की रक्षा का आश्वासन लेना।

युगऋषि ने कहा है कि वर्तमान परम्परा भले ही भाई-बहन के बीच सीमित रह गई, किन्तु वास्तव में नर-नारी के बीच एक-दूसरे के आदर्शों की रक्षा का भाव इसके साथ जुड़ा हुआ है। किंतु आज की स्थिति क्या है? आदर्शनिष्ठ पुरुषों की अस्मिता-प्रतिष्ठा की सुरक्षा के लिए नारी कहाँ जागरूक है? नारी की अस्मिता और प्रतिष्ठा पर रोज पुरुषवर्ग द्वारा आघात किए जाते रहते हैं। कहाँ रह गयी रक्षाबन्धन के इस उद्देश्य की सार्थकता?

हे परमात्मा। पुरुषों को सद्प्रवृत्ति और शक्ति दें कि वे जन्मदात्री नारी की अस्मिता और प्रतिष्ठा की सुरक्षा करने में समर्थ हों। नारी में वह निर्मल भाव तथा तपशक्ति पुनः जागे कि उसका दिया रक्षा सूत्र बाँधकर पुरुष आदर्शों के पथ में निर्भीक होकर जूझ सके।

2. यजमान-पुरोहित ः- यह रक्षा सूत्र भी दोनों उद्देश्यों से बाँधे जाते रहे हैं। (क) तपस्वी पुरोहित यजमान को आदर्शनिष्ठ जीवन जीने की प्रेरणा देता हुआ उसके लिए अपनी भावना तथा तप-साधना का अंश देकर उसे सुरक्षा देता था। 

(ख) यजमान से यह आश्वासन लिया जाता था कि आदर्शनिष्ठ तपस्वी पुरोहितों को यदि हीन प्रवृत्ति वाले पीड़ित-प्रताड़ित करने का प्रयास करें तो यजमान उन्हें सुरक्षा प्रदान करें। सांस्कृतिक आदर्शों को स्थापित-विकसित करने में दोनों एक-दूसरे के रक्षक-सहयोगी बनें।

आज स्थितियाँ क्या हैं? अधिकांश यजमान और पुरोहित अपने-अपने स्वार्थों की सिद्धि को ही सर्वोपरि मानते हैं। सांस्कृतिक आदर्शों के लिए न किसी का आग्रह है और न आश्वासन। रक्षाबन्धन का यह उद्देश्य भी आज कहाँ पूरा हो रहा है?
हे परमात्मा! हमें ऐसी सद्प्रवृत्ति और शक्ति दें कि यजमान और पुरोहित एक-दूसरे को संरक्षण देते हुए देव संस्कृति के आदर्शों को पुनः जनजीवन में प्रतिष्ठित कर सकें। समाज में फिर दिव्य वातावरण बन जाये।

हरीतिमा संवर्धन ः- श्रावणी पर्व पर हरीतिमा संवर्धन के लिए भी अनुकूल अवसर मिलता है। जंगम जीवों को शुद्ध वायु और उपयुक्त आहार प्रदान करने वाले जड़ जीव-वृक्ष, वनस्पति, पौधे इस मौसम में सहज ही पनपते हैं। वे ही विषपायी शिव की तरह वातावरण के जहर को पीकर हमारे लिए प्राणवायु उपलब्ध कराते हैं। 
प्रचलित सूत्र है, ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ अर्थात् रक्षित होने पर धर्म हमारी रक्षा करता है। इस सूत्र के साथ एक और सूत्र प्रचलित किया जाना चाहिए, ‘वृक्षो रक्षति रक्षितः’ अर्थात् रक्षित होने पर वृक्ष हमारी रक्षा करते हैं। 

भारतीय ऋषि-मनीषी इस तथ्य को समझते थे। वे इसीलिए वनों में प्रकृति के बीच रहना पसंद करते थे। उस परंपरा को समय के अनुरूप स्वरूप देने के लिए श्रावणी पर्व से वृक्ष-वनस्पतियों के रोपण-संवर्धन के लिए व्यक्तिगत और सामूहिक संकल्प किये जाने चाहिए। श्रावणी से दीपावली तक हरीतिमा संवर्धन के ठोस प्रयास किये जायें तो अनेक नये कीर्तिमान बनाये जा सकते हैं। 

सभी नैष्ठिक साधक श्रावणी पर्व को सार्थक ढंग से मनायें और व्यक्तिगत तथा सामाजिक उन्नति के दुर्लभ लाभ पायें, इसके लिए हम सबको यथाशक्ति प्रयास करने ही चाहिए।



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