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आज हम जिधर दृष्टिपात करते हैं, उधर ही भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, कर्त्तव्यहीनता, दुर्व्यसन, फैशन परस्ती और असंयम का नग्र-नृत्य दृष्टिगोचर हो रहा है। मानव दानव बना हुआ है। उसके सोचने-विचारने के दृष्टिकोण बदल रहे हैं। वह अनेक विकृतियों और भ्रांतियों का शिकार हो रहा है। इनका मूल कारण सामाजिक विकृतियाँ ही हैं। न परम्पराएँ सही हैं और न रीति-रिवाजों में ही शुद्धता और मौलिकता रही है। 

आज की परिस्थितियों को बदलने और मनुष्यों में सद्प्र्रवृत्तियों के प्रादुर्भाव के लिए सामाजिक संस्कारों पर ध्यान देना होगा। जैसी सामाजिक संस्कारों की त्रिवेणी प्राचीन काल में बही थी, वैसी ही सुसंस्कारों की भागीरथी वर्तमान काल में प्रवाहित करनी पड़ेगी। 

हम तो आमोद-प्रमोद और आनन्द मंगल मनाते चलें और हमारे आसपास का समाज दुःख के आँसुओं से भीगता रहे, तो हमारी हँसी-खुशी एक सामाजिक अपराध है। 


व्यक्तित्व का साँचा है समाज
मनुष्य ने आज जितनी भी प्रगति की है, उसका सम्पूर्ण श्रेय समाज को है। सृष्टि के अन्य प्राणी तो जन्म से ही स्वावलम्बी हो जाते हैं, परंतु बिचारा मनुष्य तो बहुत अधिक समय तक पराश्रयी और परावलम्बी रहता है। वह कच्चा शरीर, कच्ची बुद्धि लेकर जन्म लेता है और समाज का रस पी-पीकर बड़ा होता है। माँ उसे दूध पिलाती है। पिता उसे कपड़े पहनाता है। घर पर भाइयों और बहिनों से वह आदतें सीखता है, अध्यापक और गुरुजन उसे शिक्षा देकर सुसंस्कारवान बनाते हैं। पुस्तकें उसकी प्रतिभा को प्रखर करती हैं। 

ऐसी अनेकानेक आवश्यकताओं की पूर्ति का दायित्व जब समाज उठाता है, तभी मनुष्य कुछ स्वतंत्र चिंतन, श्रेष्ठ कर्म अथवा आविष्कार और अन्वेषण करने में समर्थ हो पाता है। बिना समाज के एक पग भी आगे बढ़ना कठिन-सा है। 

मनुष्य का स्वभाव है कि वह अनुकरण से अधिक सीखता है। एक-दूसरे के आचरण को धीरे-धीरे जीवन में ढालता चलता है। इसीलिए जब आज हम मनुष्य को अनैतिक अपराध करते देखते हैं तो उस पर न खीजकर सम्पूर्ण समाज को दोष देने लगते हैं। 
संसार के सभी महापुरुष ईसा, बुद्ध , गाँधी, दयानंद, मार्टिन लूथर तथा ज्ञानेश्वर ने अपना जीवन समाज सुधार में लगाया और यह माना कि समाज सुधार से ही मानव सुधार संभव है। अकेले मनुष्य के भले बन जाने से पूरा मानव समाज नहीं बदल सकता। मनुष्य के तौर-तरीके, आचार-विचार, हाव-भाव और व्यवहार में परिवर्तन करने के लिए समाज को परिष्कृत करना होगा। 


अपनी सोच बदलनी ही होगी
मनुष्य यदि अपनी स्थिति पर खेद करते रहने के बजाय उसके कारणों पर विचार करे तो पता चलेगा कि हमने जो विचार और कार्य-पद्धति अपना रखी है, वह ही ठीक नहीं है और इसलिए इस उन्नति और विकास से वंचित बने हुए हैं। हम सोचते यह हैं कि संसार की सारी सम्पदा, सारा वैभव और सारे सुख-साधन हमें ही प्राप्त हो जायें। हमें हास-विलास और आमोद-प्रमोद की परिस्थितियाँ मिलें, हम समाज में सबसे अधिक धनवान और शक्तिशाली बनें, समाज में हमारी पूजा-प्रतिष्ठा हो। 

न केवल इस प्रकार सोचते ही हैं, बल्कि उसके अनुरूप अपने आचरण का भी व्यवहार करते हैं। व्यापार में अधिक से अधिक मुनाफा कमाना चाहते हैं। नौकरियों में दूसरों को पीछे धकेलकर आगे बढ़ जाना चाहते हैं। सार्वजनिक स्थानों पर दूसरों की चिंता नहीं रखते। हमारे ये स्वार्थपरक विचार और कार्य ही हमारी उन्नति एवं प्रगति में बाधक बने हुए हैं। 

समाज से अलग हटकर जितनी देर तक हम अपने को एक अलग इकाई मानकर अपनी उन्नति और विकास के लिए सोचते और कार्य करते रहेंगे, हमें निराश ही रहना पड़ेगा। जब तक हमारा जीवन के प्रति दृष्टिकोण और कार्यपद्धति समष्टिगत न होकर व्यक्तिगत रहेगी, हमें अपनी स्थिति पर इसी प्रकार खेद करते रहने पर विवश होना पड़ेगा। 

हमारा जीवन समाज का दिया हुआ है। वह हमारी व्यक्तिगत सम्पत्ति नहीं है, समाज की एक धरोहर है।  इसका उपयोग समाज के कल्याण और उसके हित के लिए ही होना चाहिए। इस तथ्य को तब ही चरितार्थ किया जा सकता है, जब हम यह आधार लेकर चलें कि हमारा जीवन अपने व्यक्तिगत रूप में भले ही कुछ कष्टपूर्ण क्यों न हो, पर दूसरों की सुविधा ही हमारी सुख-सुविधा है और दूसरों का दुःख-क्लेश, हमारा दुःख-क्लेश है। यह परमार्थ भाव बड़ा आकर्षक होता है। इतना आकर्षक कि समाज की शक्ति और विकास मूलक सद्भावनायें आपसे आप खिंचती चली आती हैं। पूरा समाज उसका अपना परिवार बन जाता है, कुटुम्ब के रूप में बदल जाता है। ऐसी बड़ी उपलब्धि मनुष्य को किस ऊँचाई पर नहीं पहुँचा सकती?


इतने क्रूर न बनें
हम जियें। खूब हँसी-खुशी और आनन्दपूर्वक जियें, यह ठीक भी है और इसका हमें अधिकार भी है। तथापि हमें अपनी हँसी-खुशी में दूसरों को भी भाग देना चाहिए। हम तो आमोद-प्रमोद और आनन्द मंगल मनाते चलें और हमारे आसपास का समाज दुःख के आँसुओं से भीगता रहे, तो हमारी हँसी-खुशी एक सामाजिक अपराध है। हमें अपने व्यक्तिगत आमोद-प्रमोद में इस सीमा तक नहीं डूबा रहना चाहिए कि आसपास का क्रंदन ही सुनाई न दे। आसपास के क्रंदन के बीच भी जो उपेक्षा भाव से खुशियाँ मनाता रहता है, उसे तो क्रूर और अकरुण व्यक्ति मानना होगा। ऐसे समाज के विरोधी व्यक्ति को समझ लेना चाहिए कि उसकी यह क्रूर पाशविक वृत्ति शीघ्र ही उसकी सारी हँसी-खुशी छीन लेगी। हँसी-खुशी तो उसी की स्थायी और सुरक्षित रह पाती है, जो अपने साथ दूसरों को भी उसमें भागीदार बनाकर मंगल मनाया करता है। 


‘बहुजन हिताय’ जीवन ही श्रेयस्कर
भारतीय संस्कृति और धर्म में सामूहिक मेले, त्यौहार, पर्व और पारिवारिक उत्सव मिल-जुलकर मनाने का नियम है। नीतिकारों ने व्यक्तिगत, एकाकी आनन्दोपभोग को अनुचित कहा है। इस सामूहिक आनन्दोपभोग के पीछे एक बड़ा कल्याणकारी मन्तव्य सन्निहित है। वह यह कि इससे समाज में संगठन, सद्भावना, शक्ति और पारस्परिक प्रेम की वृद्धि होती है। लोगों में बंधुत्व की भावना का विकास होता है। समाज को पीछे ढकेलने वाली ईर्ष्या-द्वेष और स्वार्थ की विकृतियों का हतोत्साहन होता है। समाज में अमन-चैन और सुख-शांति के वातावरण की स्थिति उत्पन्न होती है। 

इस प्रकार जिस दिन हमारे प्रयत्नों और प्रवृत्तियों का आधार ‘बहुजन हिताय’ की भावना में बहने लग जायेगा, हमें अपनी प्रगति एवं विकास के लिए विचलित न होना होगा, समाज स्वयं ही हमें हाथों-हाथ ऊपर उठा लेगा। हमें सहयोग और सहायता की कमी न रहेगी। हम स्वयं एकाकी नहीं रह जायेंगे और हमारे प्रश्न और हमारी समस्याएँ पूरे समाज की बन जायेंगी और पूरा समाज उन्हें हल करने में हमारा साथ देने लगेगा।

वाङ्मय खंड-६४ ‘राष्ट्र समर्थ और सशक्त कैसे बने?’, पृष्ठ-५.११-५.१३ से संकलित, संपादित



दोषी व्यक्ति ही नहीं, समाज भी है
चोरी और अनैतिकता के अपराध में पकड़ा एक व्यक्ति जाता है और सजा का भागीदार भी वही होता है, परंतु क्या आप इसमें उस व्यक्ति का ही एकमात्र दोष मानते हैं? चोरी और अनैतिकता की प्रवृत्ति क्या उस व्यक्ति की है? क्या समाज का उसमें कोई अनुदान नहीं? मानवीय दृष्टि से देखा जाय तो चोर में चोरी की प्रवृत्ति का प्रादुर्भाव समाज से ही हुआ है।

मनुष्य अनुकरण प्र्रिय है। जैसा देखेगा और सुनेगा, वैसा ही करने लगेगा। बालकों की समुचित शिक्षा-दीक्षा न होना, उन्हें नैतिक ढाँचे में न ढालना आदि दोष व्यक्तिमात्र के नहीं हो सकते, समाज ही का तो दोष है। आज झूठ बोलकर, समाज को धोखा देकर धनपति बन जाने पर भी उसका समाज में सम्मान होता है। वहीं दूसरी ओर सज्जन और ईमानदार व्यक्ति के पेट भरने की यथोचित व्यवस्था भी नहीं होती। इस प्रकार के अनेक कारण कम बुद्धि वाले लोगों में अनैतिकता की बातें भर देते हैं। 

जिस व्यक्ति को बाल्यकाल से ही तीखे-चटपटे, बासी तथा गरिष्ठ खाद्य पदार्थ खाने को मिलें हैं और परिणाम स्वरूप उसका स्वास्थ्य, उसका मन विकृत हो रहा है तो इसमें व्यक्ति का क्या दोष? यह सारा दोष उसके निर्माण करने वाले समाज का ही है, जिसने अपनी प्रारंभिक पाठशाला में उस बालक की शिक्षा-दीक्षा का प्रबंध किया। 

जिन घरों में बीड़ी और शराब पी जाती हो तथा जिनमें चोरी, जुआ, छल-फरेबी द्वारा धन का उपार्जन किया जाता हो, उस घर के बालकों में उपर्युक्त दुर्व्यसन एवं अवगुण ही आयेंगे। उन घरों के बालकों को कोई सदाचारी देखना चाहे तो कभी संभव नहीं हो सकता। 

इन तथ्यों पर गौर करें तो समझा जा सकता है कि समाज को सुधारना ही व्यक्ति को सुधारना है।


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