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योगेश्वर हमें युगधर्म के निर्वाह का कौशल दें

योगेश्वर से
हे वासुदेव! आप सूक्ष्म रूप में सब में बसे हैं और आपने ही सबको अपने विराट रूप में आवास दे रखा है। आपसे क्या छिपा है? हमारी भावनाएँ, कामनाएँ सब आप जानते हैँ। फिर भी हम अपने मन की बात, अपने हृदय के भाव आपके सामने बच्चों जैसी टूटी-फूटी भाषा में रख रहे हैं। हमारी समझ में यह बात आ गयी है कि आपने हमें, हमारी काया का स्वतंत्र प्रभार सौंप दिया है। भले ही सबकुछ आपका ही है, किंतु चूँकि आप ने हमें सौंप दिया है, इसलिए आप उसमें तब तक हस्तक्षेप नहीं करेंगे, जब तक हम आपसे आग्रह नहीं करेंगे। 

इसलिए हम आपसे सच्चे मन से, विनम्र भाव से अर्जुन की तरह यह निवेदन करते हैं कि आप हमें श्रेयपथ पर, हमारे लिए परम कल्याणकारी मार्ग पर हमें बलपूर्वक आगे बढ़ाते रहें। जीवन यात्रा पूरी करने के लिए आपने हमें पर्याप्त पुरुषार्थ दिया है, तमाम विभूतियाँ दी हैं। किंतु हम न तो उन्हें समझ पाते हैं, न विकसित और नियोजित करने की कुशलता बरत पाते हैं। आपके द्वारा दी गयी तमाम विभूतियों का भंडार साथ में होते हुए भी अपनी मोहबुद्धि के कारण दीन-हीन जैसा जीवन बिताते रहते हैं। 

आपका वह कथन, वह अनुशासन हमारी समझ में आ गया है जिसमें आपने कहा है कि ‘‘जो साधक अनन्य चिंतन से मेरी उपासना करते हैं, उनके योगक्षेम का वहन मैं करता हूँ।’’ अधिकांश लोगों से यह भूल हो जाती है कि वे आपको स्वयं से भिन्न मानकर आपको रिझाने, प्रसन्न करने के भाव से उपासना के तमाम कर्मकाण्ड करते रहते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि आप तो वासुदेव हैं, सदा साथ हैं, इसलिए अपने अनगढ़ अहंकार से ही जीवन का संचालन करते रहते हैं। यदि यह अनन्य चिंतन बना रहे कि आप तो साथ हैं ही, इसलिए यदि अपने अनगढ़ अहं को पीछे करके आपको, प्रज्ञेश्वर को आगे कर दें तो फिर योग-क्षेम तो सधा-सधाया ही है, तो जीवन के सारे कुयोगों का निवारण हो जाये और सारे सुयोग बन जायें। हे प्रभु! यह कल्याणकारी चिंतन हमारे अंदर सतत बना रहे। 

हे योगेश्वर! आपको यह संबोधन ऋषियों-मनीषियों ने बड़े विवेकपूर्वक दिया है। देहधारी के रूप में आपके अवतरण से लेकर काया परित्याग तक तमाम विसंगतियों ने आपको घेरे रखा, किंतु आपने योगेश्वर के रूप में अपने कर्म-कौशल से उन भीषण कुयोगों के बीच से आदर्शनिष्ठ जीवन के सुयोग को निरंतर बनाये रखा। जिन स्नेहियों ने आपके निर्देशों का पालन सच्चे मन से किया, उन ग्वाल-बालों से लेकर पाण्डवों तक को अपने कुयोगों से उठाकर सुयोगों से जोड़कर उबार लिया। 

आज की परिस्थितियाँ भी उसी तरह विषम हैं। उस समय जिस प्रकार मायावी असुरों ने ऐसा विकट तंत्र बना लिया था कि भोलेभाले नर-नारियों से लेकर साधन और ज्ञान सम्पन्नों तक में त्राहि-त्राहि के वेदना भरे स्वर उभर रहे थे। आज आसुरी रणनीति बदल गयी है। कायाधारी असुरों की जगह आसुरी प्रवृत्तियों ने मिल-जुलकर ऐसा कुचक्र रच दिया है कि सत्प्रवृत्तियों को उभरने, पनपने, सक्रिय होने के लिए अवसर ही न मिले। ऐसे समय में हमें आपका योगेश्वर स्वरूप ही बचा सकता है। 

आपको जन्म लेते ही माता-पिता की छाया से दूर करने का कुयोग उभरा, किंतु आपने उस कुयोग को अपनी व्यापक आत्मीयता के विस्तार के सुयोग में बदल दिया। आसुरी तत्त्व छल-प्रपंच द्वारा सज्जनों का हक मारने में लगे थे। खुली रणनीति के द्वारा आसुरी कुचक्र को निरस्त करके भले व्यक्तियों को उनके उचित अधिकार दिलाना संभव नहीं रह गया था। तब आपने अपने  अद्भुत योग कौशल से उलटे को उलट कर सीधा कर दिखाया। छलियों को छला, भोलेभाले लोगों को उनका उचित हक दिला दिया। आसुरी तत्त्व जिन चोरी, छल, प्रपंच के माध्यम से जन-जीवन में कुयोग-विसंगतियाँ रच देते थे, उन्हीं के विशिष्ट प्रयोग करके आपने जन-जीवन में सुयोग-सुसंगतियों का संचार कर दिखाया। 

लोग धर्म की व्याख्या स्थूल कर्मों से करते रहे, आपने धर्म को उसके सूक्ष्म प्राण से जोड़कर रखा। परहित सर्वश्रेष्ठ पुण्य-धर्म है और परपीड़ा सबसे भीषण पाप है, इस सूत्र के आधार पर आपने अद्भुत कर्म-कौशल दिखाया। विभिन्न विसंगत कार्यों को भी साधुओं के परित्राण तथा कुकर्मों के विनाश का संसाधन बनाते हुए धर्म की संस्थापना के अपने महान उद्देश्य को सिद्ध करके दिखा दिया। कुयोग के संसाधनों से भी सुयोग रच देने का यह कर्म-कौशल आपके बिना और कौन दिखा सकता था? 

आज भी वैसी ही विसंगतियों का बोलबाला है। युगऋषि ने हमें उलटे को उलट कर सीधा करने के सूत्र सिखाये, समझाये हैं। हम कौशल की कमी के कारण उनका समुचित उपयोग कर नहीं पा रहे हैं। उन्होंने कहा भी है कि इस समय कृष्ण नीति का अनुसरण करके ही उन्मत्त हो रही असुरता को निरस्त, परास्त किया जा सकता है। हम भी ऐसा ही करके अपने जीवनोद्देश्य को सार्थक करना चाहते हैं। किंतु हे प्रभु! हमारे मन न जाने किन-किन आकर्षणों से आकर्षित होकर युगधर्म के परिपालन से डिगने लगते हैं। इसका उपचार भी आप ही कर सकते हैं। 

हे मनमोहन! आपने गीता के १०वें अध्याय में यह स्पष्ट किया है कि आप श्रेष्ठ विभूतियों के रूप में ही सर्वत्र व्याप्त हैं। आप अपने मनमोहन रूप को प्रकट करें। हमारे मनों को इस प्रकार मोह लें कि हम आपके विभूति रूप के अलावा और किसी ओर आकर्षित ही न हों। आपको श्रेष्ठ विभूतियों, आदर्शें के रूप में हम पहचानें। आपके विभूति रूपी पराग का पान करने के लिए हमारा मन भौंरे की तरह एकनिष्ठ होकर लगा रहे। फिर सांसारिक माया का कोई आकर्षण हमारे मन को मोह न सके। 
हे! चितचोर! आज हमारे चित्त को चुरा लीजिए। हमारा अनगढ़ ‘अहं’ स्वयं तो उसे आपको शायद ही सौंपे। मैं आत्मारूप, आपका अंशी आपसे निवेदन करता हूँ कि आप छल से, बल से, हमारे चित्त को संकीर्ण अहं के अधिकार से निकाल लें और अपने सत्-शिव-सुन्दर संस्कार उसमे भर दें। फिर वह शुद्ध चित्त आपके निर्देशों का सहज अनुसरण करने लगेगा। आपने पार्थ का पुरुषार्थ तो हर पुरुष में भर ही दिया है। वह मोह की स्थिति में अपने पुरुषार्थ को भूल कर अटक-भटक जाता है। आप योगेश्वर-नारायण उसे संचालित करें और नर उसके अनुसार अपने पुरुषार्थ को लगा दे तो युगधर्म का पालन सहज ही हो जाये। नर-नारायण के सुसंयोग से जीवन का हर सुयोग सिद्ध हो जाये।


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