img


युगऋषि से

हे युगऋषि! आप युग परिवर्तन के दिव्य योजना को साकार करने के लिए काया मे अवतरित हुए। आपने मनुष्यों को पुनः अमृत पुत्र कहकर बुलाया, अपने निर्मल स्नेह से उन्हें अपना बनाया और युगधर्म अपनाने का पाठ पढ़ाया। सारे विश्व को विनाशकारी सम्भावना से बचाकर उज्ज्वल भविष्य के लक्ष्य तक पहुँचाने के लिए आपने ऋषि भूमि- भारत भूमि से अपने अभियान को प्रारंभ किया। ऋषियों ने ही कभी इस भूमि पर विश्व संस्कृति को स्वरूप देकर सारे विश्व में प्रसारित किया था। आपने भी उसी ऋषि परम्परा को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठाया और उस दिव्य अभियान को चलाया।

हमेशा ईश्वरीय योजनाएँ ऋषितंत्र के माध्यम से ही लागू की जाती रही हैं। ऋषियों को दृष्टा कहा जाता रहा है। यह दृष्टि उनके पास ही होती है कि वे परमात्मा के अव्यक्त सर्वव्यापी रूप को भी देख समझ सकें तथा उनके व्यक्त विश्वरूप को भी समझ सकें। इसी दिव्य दृष्टि के कारण वे सूक्ष्म-सर्वव्यापी परमात्मा की ‘उपासना’ और विश्वरूप परमात्मा की ‘आराधना-सेवा’ में अपने जीवन को लगाते रहे। इसीलिए विश्व की उल्लेखनीय सेवा करते हुए भी उनका भाव ‘तेरा तुझको सौंपने’ का ही रहा। 

हे ऋषिवर! आपने भी जीवनभर यही किया और यही सिखाया। आपने युग की आवश्यकता को समझा और उसकी पूर्ति के लिए विभिन्न ऋषियों की चेतना को अपने जीवन में जागृत किया। भगीरथ, वशिष्ठ, विश्वामित्र, व्यास, परशुराम, याज्ञवल्क्य, चरक, कणाद, पंतजलि आदि की परम्पराओं को युगानुरूप स्वरूप दे दिया। हम सबको उसे आगे बढ़ाते रहने, विकसित करते रहने का पाठ पढ़ाया। आपके दिव्य प्रभाव से हमें भी वह पथ भाया। किन्तु कार्य रूच जाये और कर पाने में तो बहुत अन्तर है। कर पाने के लिए अपनी सामर्थ्य को पूरी तरह होमते रहने और कुशलता को बढ़ाते रहने की उमंग को बराबर जागृत और जीवन्त बनाये रखना पड़ता है।

आपकी कृपा से यह बात तो समझ मे आ गयी कि भगवान के काम में मनुष्य की सामर्थ्य का बहुत महत्त्व नहीं है। महत्त्व तो पूरी भावना से अपनी शक्ति सामर्थ्य को प्रभु कार्य में लगा देने का है। भगवान एक इसी आधार पर अति बलशाली हनुमान की ही तरह जरा-सी गिलहरी को भी अपना प्रेमपात्र बना लेते हैं। यह समझते हुए भी अपनी सामर्थ्य को प्रभु कार्य में लगा देने की हमारी उमंग न जाने क्यों धीरे-धीरे क्षीण, निर्जीव होने लगती है।

हे वेद मूर्ति! आपने दिव्य ज्ञान के अमृत को अपने जीवन में साकार किया। उस अमृत ने प्रभुकार्य में अपनी सभी तरह की सामर्थ्य को लगाते रहने की आपकी उमंग को कभी क्षीण-दुर्बल नहीं होने दिया। उसमें दिनोंदिन और अधिक निखार आता चला गया। जो मिला वह दाता के कार्यहित लगाते रहे तो अगले चरण में और अधिक मिलता रहा।
हे गुरुवर! उस दिव्य ज्ञानामृत के कुछ घूँट हमें भी पिला दें। आपने तो असाधारण कार्यों को हाथ में लिया और पूरा किया। हमें तो बहुत नगण्य से कार्य सौंपे गये हैं। उन्हें पूरा करने योग्य विवेक-दृष्टि और अक्षय उमंग तो हमें प्राप्त होती रहे। हम आपके साथ जुड़कर भी युगधर्म की साधना में पिछड-बिछड न पायें।

ज्ञानामृत के प्रभाव से आपने स्नेह और करुणा से प्रेरित होकर लोकमंगल के लिए  पुरुषार्थ किया। स्नेह और करुणा का प्रवाह बढ़ता गया और आपकी उमंगें भी बढ़ती चली गयीं। एक के बाद एक कार्य पूरे होते चले गये। लेकिन उस ज्ञानामृत की कमी के कारण हमारी दृष्टि तो लक्ष्य से भटक जाती है। हम तो दिव्य स्नेह और करुणा की जगह अपने अहं, यश, सुख को लक्ष्य करके कार्य करने लगते हैं। उनमें कमी आते ही हमारी उमंग क्षीण होने लगती है ।

हे ऋषिवर! हमें भी वह ज्ञान-दृष्टि प्रदान करें कि दिव्य लक्ष्य कभी दृष्टि से ओझल न होने पाये। आपने साधना से सिद्धि की बात कही वह ध्यान में रहे, साधनों से सिद्धि के भ्रम में हम भटक न जायें। आपने पवित्र प्रेम के नाते बिना रुके चलते रहने का पाठ पढ़ाया, हम विकृत प्रेम के मोह में पड़कर भटक न जायें।

हे तपोनिष्ठ! आपको अपने अभियान के लिए कभी संसाधनों की कमी नहीं पड़ी, क्योंकि आपने ‘तप साधना’ के कल्पवृक्ष को विकसित कर लिया। विकसित कल्पवृक्ष की छाया में बैठने वाले की श्रेष्ठ इच्छाएँ, आवश्यकताएँ पूरी होती ही हैं। ये तप की क्षमता बीज रूप में हमारे भीतर भी है, किन्तु हम तपोनिष्ठ न होकर सुविधानिष्ठ होने लगते हैं। तप का बीज विकसित होकर कल्पवृक्ष बन नहीं पाता और हम अपने अंदर सामर्थ्य और बाहर साधनों की कभी ही महसूस करते रहते हैं।

हे गुरुवर! आपने तो अपनी तपनिष्ठा से नये मार्ग बना दिए, हममें इतना तप करने की रुचि तो पैदा कर ही दें कि हम आपके बनाये, सुझाये मार्ग पर चलकर जीवन को सार्थक बना लें। कल्पवृक्ष के सान्निध्य में आकर भी दैवी संपदा के अभाव में कंगाल न रह जायें।

हे स्नेहमूर्ति! आपने अपने अंदर दिव्य प्रेम का, आत्मीयता का पारस जगा लिया। जो भी आपके पास आया वह छोटा-बड़ा, धनी-निर्धन, सुगढ़-अनगढ़; आपकी आत्मीयता को छूते ही आपका अपना हो गया। अप्रियता की कुरूपता समाप्त होती गयी, प्रियता-अपनत्व की सोने जैसी चमक उभरती रही।

हे प्रभु! हमें भी वह पारस जैसा निर्मल प्रेम दें, जिसके प्रभाव से पराये भी अपने हो जाते हैं। इतना न हो सके तो अपनों को, जिन्हें आपसे स्नेह हो गया है, उनके साथ अपनेपन का निर्वाह तो कर ही लें।

हे युगाचार्य! ऋषियों ने जीवन के सूत्र भाषण से ही नहीं, अपने आचरण से भी सिखाये। इसलिए वे आचार्य भी कहलाये। आपने इस युग में पुनः ‘चरित्र से शिक्षण’ की आचार्यों की परिपाटी को जीवन्त किया। इसीलिए आप युगाचार्य बन गये।

आपमें दिव्य सामर्थ्य रही, इसलिए आप युगाचार्य की बड़ी भूमिका सँभाल सके। हमारी सामर्थ्य कम है, इसलिए युग की एक छोटी-सी इकाई, अपने आसपास के क्षेत्र को वाणी से दिशा देने के साथ ही अपने आचरण से भी प्रेरणा देने योग्य तो हमें बना ही दें।

उज्ज्वल भविष्य के लिए ऋषि तंत्र की पुनः स्थापना के क्रम में हम आपके विनम्र सहयोगी बनना चाहते हैं। हमारी विनय पर ध्यान दें तथा हमें आचरण से भी लोकशिक्षण करने की थोडी-सी क्षमता विकसित करने योग्य बना दें। हमें भी आपकी तरह पूरे विश्वास से यह उद्घोष कर सकें-

 ‘हम बदल रहे हैं-युग बदल कर रहेगा।’


Write Your Comments Here:


img

गृहे- गृहे गायत्री यज्ञ - उपासना अभियान

इन दिनों देशभर में नौ वर्षीय मातृशक्ति श्रद्धांजली महापुरश्चरण के अन्तर्गत गृहे-गृहे गायत्री यज्ञों का अभियान तेज गति से चलाया जा रहा है। इसी श्रृंखला के अंतर्गत इस वर्ष परम पूज्य गुरुदेव की पुण्य तिथि 02 जून 2019 को विश्वव्यापी ‘.....

img

भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा का रजत जयंती वर्ष

नई पीढ़ी को संस्कृतिनिष्ठ-व्यसनमुक्त बनाने हेतु ठोस प्रयास होंसोद्देश्य प्रारंभ और प्रगतिभारतीय संस्कृति को दुनियाँ भर के श्रेष्ठ विचारकों ने अति पुरातन और महान माना है। ऋषियों की दृष्टि हमेशा से विश्व बंधुत्व की रही है। इसी लिए इस संस्कृति.....

img

नवरात्र पर्व पर, नव दुर्गा शक्ति की नौ धाराओं का मर्म समझें, उन्हें साधें

साधना अनुष्ठान की लकीर भर न पीटें, शक्ति साधना के उच्चतर सोपान चढ़ेंपरंपरागत क्रमशारदीय नवरात्र पर्व इस वर्ष कैलेंडर के अनुसार दिनांक १० अक्टूबर से १८ अक्टूबर तक चलेगा। युग निर्माण परिवार से जुड़े अधिकांश परिजन इन दिनों गायत्री जप-तप.....