• ईश्वर त्यागने वाले को देता है और निरंतर झोली पसारने वाले भिखमंगे की ओर से मुँह फेर लेता है। हम भिखमंगे नहीं, प्रेमी बनें। 
- परम पूज्य गुरुदेव
चाह नहीं, उत्सर्ग
  • प्रेमी को सदा देना ही देना पड़ता है। यदि हम सच्चे भक्त हों तो उससे कोई भौतिक उपलब्धि की कामना न रखें, वरन यह देखें कि वह हमसे क्या माँगता और क्या चाहता है? उसी की पूर्ति में लग पड़ें तो उस त्याग की तुलना से असंख्य गुना प्रेमोपहार हमें प्राप्त होगा। देने से मिलता है, यह अनादि सिद्धांत हर आस्तिक को सीखना चाहिए। गाँधी, बुद्ध आदि ने जितना त्याग किया उसकी तुलना में बहुत अधिक उन्हें मिला। ईश्वर त्यागने वाले को देता है और निरंतर झोली पसारने वाले भिखमंगे की ओर से मुँह फेर लेता है। हम भिखमंगे नहीं, प्रेमी बनें। 
सतयुग का आधार आस्तिकता 
  • जिस सतयुग को, धर्मराज्य या रामराज्य को लाने की हम कामना करते हैं, वह ईश्वर भक्ति के द्वारा, आस्तिकता की प्रतिष्ठापना के द्वारा ही संभव है। जेल, पुलिस, कचहरी एवं कानून से दुष्प्रवृत्तियाँ नहीं रुक सकतीं। मनुष्य के भीतर रहने वाली असुरता प्रतिबंधों, जीवन दण्डों से बच निकलने के अनेकों मार्ग ढूँढ़ लेती है। दण्डित होने पर और भी अधिक ढीठ एवं निर्लज्ज बन जाता है। स्थिर उपाय तो यही है कि हर मनुष्य दूसरों में परमेश्वर की झाँकी करके उसके साथ सद्व्यवहार करना सीखे और उस सर्वज्ञ की निष्पक्ष न्यायशीलता का स्मरण रखते हुए हर बुरे काम से बचे। व्यापक सदाचरण की आधारशिला आस्तिकता ही हो सकती है और उसी आधार पर मानव जाति की हर समस्या को सुलझाया जा सकना सम्भव होगा। 


भक्त में है भगवान
आस्तिकता का अर्थ है ईश्वर को मानना। मानने का अर्थ है उसका अनुयायी होना। अनुयायी होने का तात्पर्य है उसके विचार, निर्देश एवं आदर्श के अनुसार चलना। जो अपने को आस्तिक मानता है उसे यह भी मानना होगा कि वह परम प्रभु परमात्मा का अनुयायी है, उसका प्रतिनिधि है। उनका ऐसा प्रतिबिम्ब है जिसको देखकर परमात्मा के स्वरूप तथा उसके गुण-विशेषताओं का आभास पाया जा सकता है। 

भगवान संग है तो भय कैसा?
संसार में ऐसा शक्तिशाली दुष्ट कौन हो सकता है, जो सर्वशक्तिमान परमात्मा से रक्षित किसी आस्तिक का बाल भी बाँका कर सके। अखण्ड विश्वास के साथ जब कोई आस्तिक भूत-भविष्य, वर्तमान के साथ अपना संपूर्ण जीवन परमात्मा अथवा उसके उद्देश्योंं  को सौंप देता है, तब उसे अपनी जीवन के प्रति किसी प्रकार की चिंता करने की आवश्यकता नहीं रहती। परमात्मा उसके जीवन का सारा दायित्व खुशी-खुशी अपने ऊपर ले लेता है। 

आस्तिक भावना एक ऐसी अक्षय एवं अमोघ शक्ति है, जिसके सहारे मनुष्य भयानक से भयानक संकटसागर को सहज ही पार कर जाता है। संसार में किसी समय भी कोई संकट आ सकता है और ऐसी स्थिति भी हो सकती है कि उस समय उससे बचने अथवा उबरने का कोई साधन न हो, संसार के सारे मित्रों, प्रेमियों, हितैषियों ने साथ छोड़ दिया हो, मनुष्य हर तरह से निरुपाय एवं असहाय बन गया हो। ऐसी भयानक स्थिति के अवसर पर उस निरुपाय एवं असहाय मनुष्य की आस्तिकता बहुत बड़ी सहायता बन जाती है। सब ओर से निराश होकर आस्तिक व्यक्ति ईश्वर का सहारा पकड़ लेता है, उसे अपना सबसे बड़ा सहायक एवं साथी समझ लेता है। 

सर्वशक्तिमान् परमात्मा का अंचल पकड़ते ही उसमें आत्मबल, आत्मविश्वास तथा उत्साहपूर्ण आशा का संचार होने लगता है। प्रकाश पाते ही अंधकार दूर हो जाता है। मनुष्य में संकट सहने अथवा उसको दूर कर सकने का साहस आ जाता है। 

ईश्वर में अखण्ड विश्वास रखने वाला सच्चा आस्तिक जीवन में कभी हानि नहीं मानता। एक तो उसे यह विश्वास रहता है कि परमात्मा जो भी सुख, दुःख, अनुग्रह किया करता है उसमें मनुष्य का कल्याण ही निहित रहता है। इसलिए वह किसी हर्ष-उल्लास अथवा कष्ट-क्लेश से प्रभावित नहीं होता। दूसरे परमात्मा के प्रति आस्थावान होने से उसमें संकट सहने की शक्ति बनी रहती है। आस्तिक व्यक्ति परमात्मा का नाम लेकर संकट सहना क्या, उसका नाम लेकर जहर पी जाते और सूली पर चढ़ जाते हैं। मीरा, प्रहलाद, ईसा और मंसूर ऐसे ही आस्तिक थे। 

आस्तिकता सदाचार की जननी
आस्तिकता आंतरिक पशुओं-काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह आदि से भी रक्षा करती है। सच्चा आस्तिक प्रत्येक प्राणी को अपना भाई, बहिन ही मानता और तद्नुरूप प्रेम व्यवहार करता है। संपर्क में आने वाला जब प्रत्येक व्यक्ति अपना भाई-बहिन ही है तब सच्चा आस्तिक उनसे कठोर, क्रूर अथवा छल-कपटपूर्ण व्यवहार किस प्रकार कर सकता है? वह तो सबसे प्रेमपूर्ण निश्छल एवं उपयुक्त व्यवहार ही करेगा। 

आस्तिकता सदाचार की जननी है। जो आस्तिक होगा, जो सबमें और सब जगह भगवान की उपस्थिति देखेगा वह कोई दुराचार करने का साहस नहीं करेगा। सदा-सर्वदा ऐसे ही कार्य करने और भावनाएँ रखने का प्रयत्न करेगा, जो सच्चे आस्तिक-ईश्वर के अनुयायी के अनुरूप हों। ईश्वर निर्देश एवं आदर्श, सत्यं, शिवं, सुंदरम के अतिरिक्त कुछ हो ही नहीं सकता। प्रेम, सहानुभूति, सहयोग, सत्य तथा सेवाभाव आस्तिक के विशेष गुण हैं। 

आज संसार में फैला हुआ सारा अनाचार इसी कारण है कि लोग केवल अपने स्वार्थ को देखते हैं, किसी दूसरे की सुख-सुविधा अथवा अधिकार सीमा का ध्यान नहीं रखते। यदि आज आस्तिकता का व्यापक प्रचार हो जाये, लोग ईश्वर को सच्ची भावना से जानने-मानने और उससे डरने लगें तो कल ही सारे अपराधों का अन्त हो जाये और चिरवांछित रामराज्य साकार हो उठे। 


आस्तिकता का स्वरूप
आस्तिक भावना शक्ति रूप में परिपक्व होकर मनुष्य को कृतार्थ कर देती है। अपने को आस्तिक कहते हुए भी जिसमें भगवद्भक्ति का अभाव है, वह झूठा है, उसकी आस्तिकता अविश्वसनीय है। आस्तिकता के माध्यम से जिसके हृदय में भक्ति भावना का उदय हो जाता है, आनन्द मग्न होकर उसका जीवन सफल हो जाता है। भक्ति का उदय होते ही मनुष्य में सुख-शांति, संतोष आदि के ईश्वरीय गुण फूट पड़ते हैं। भक्त के पास अपने प्रियतम परमात्मा के प्रति आंतरिक दुःख, क्षोभ, ईर्ष्या का कोई कारण नहीं रहता। भक्त का दृष्टिकोण उदार तथा व्यापक हो जाता है। उसे संसार में प्रत्येक प्राणी से प्रेम तथा बंधुत्व अनुभव होता है। जन-जन उसका तथा वह जन-जन का होकर लघु से विराट बन जाता है। आठों याम उसका ध्यान प्रभु में ही लगा रहता है। संसार की कोई भी बाधा-व्यथा उसे सता नहीं पाती। वह इसी शरीर में जीवन मुक्त होकर चिदानंद का अधिकारी बन जाता है। यह है आस्तिकता की परिपक्वता का परिणाम। 

[वाङ्मय खंड-३४ ‘भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्त्व’, पृष्ठ २.८-२.११ से संकलित एवं संपादित]


Write Your Comments Here:


img

गृहे- गृहे गायत्री यज्ञ - उपासना अभियान

इन दिनों देशभर में नौ वर्षीय मातृशक्ति श्रद्धांजली महापुरश्चरण के अन्तर्गत गृहे-गृहे गायत्री यज्ञों का अभियान तेज गति से चलाया जा रहा है। इसी श्रृंखला के अंतर्गत इस वर्ष परम पूज्य गुरुदेव की पुण्य तिथि 02 जून 2019 को विश्वव्यापी ‘.....

img

भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा का रजत जयंती वर्ष

नई पीढ़ी को संस्कृतिनिष्ठ-व्यसनमुक्त बनाने हेतु ठोस प्रयास होंसोद्देश्य प्रारंभ और प्रगतिभारतीय संस्कृति को दुनियाँ भर के श्रेष्ठ विचारकों ने अति पुरातन और महान माना है। ऋषियों की दृष्टि हमेशा से विश्व बंधुत्व की रही है। इसी लिए इस संस्कृति.....

img

नवरात्र पर्व पर, नव दुर्गा शक्ति की नौ धाराओं का मर्म समझें, उन्हें साधें

साधना अनुष्ठान की लकीर भर न पीटें, शक्ति साधना के उच्चतर सोपान चढ़ेंपरंपरागत क्रमशारदीय नवरात्र पर्व इस वर्ष कैलेंडर के अनुसार दिनांक १० अक्टूबर से १८ अक्टूबर तक चलेगा। युग निर्माण परिवार से जुड़े अधिकांश परिजन इन दिनों गायत्री जप-तप.....