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अपने कर्तव्यों को समझें, संकल्पों को पैना करें, आन्दोलनों को गति दें।

युगऋषि ने कहा था कि मुझे सूक्ष्म से कारण सत्ता में प्रवेश करने दो, फिर देखना युग निर्माण जगह-जगह से फूट-फूट कर निकलेगा। हम विभूतिवानों के दिल-दिमाग को झकझोरेंगे और उन्हें नवसृजन के कार्यों में लगने को बाध्य करेंगे। सन् 2000 के बाद राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय स्तरों पर संतों, समाजसेवियों, प्रशासकों आदि की वाणी से जो स्वर उभर रहे हैं, जिस प्रकार की क्रान्तिकारी घटनाएँ घट रही हैं, उन्हें देखकर लगता है कि ऋषि चेतना अपना प्रभाव किस गहराई के साथ फैला रही है। इस स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से भी जो स्वर उभरे, जो संदेश प्रसारित हुए, वे भी इसी सत्य की पुष्टि करते दिखते हैं।

यह आलेख लिखने का उद्देश्य किसी व्यक्ति अथवा वर्ग विशेष का समर्थन करना नहीं, बल्कि यह है कि हम दिव्य चेतन प्रवाह की दिशा और महत्ता को समझें तथा नवसृजन के लिए उभरती हर गतिविधि को अपने सहयोग से पुष्ट और प्रभावशाली बनायें। इसी उद्देश्य से उक्त संदेश के महत्वपूर्ण बिन्दुओं को युग निर्माण के दिव्य प्रवाह के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया जा रहा है।

शासक नहीं, सेवक
प्रधानमंत्री जी ने कहा कि मैं यहाँ आपके सामने प्रधानमंत्री नहीं, प्रधान सेवक के रूप में प्रस्तुत हुआ हूँ। स्वयं प्रशासक, स्वामी मानकर कार्य करने से अपना अहंकार बढ़ता है तथा जन-साधारण के साथ एकात्मकता की जगह वर्गभेद का भाव पनपता है। ‘‘मैं प्रशासक हूँ।’’ और ‘‘मुझे सेवक के रूप में प्रशासन का कार्य सौंपा गया है।’’ इन भावों के परिणामों में जमीन-आसमान जितना अंतर होता है, भले ही कार्य वही रहता है।

भगवान कृष्ण भी स्वयं को सेवक ही कहते थे। उन्होंने गीता में कहा है, ‘‘जो जिस भाव से मुझे नमन करता है, मैं उसी रूप में उसकी सेवा कर देता हूँ।’’ युगऋषि ने भी शक्तिपीठों की स्थापना के क्रम में अध्यात्म के क्षेत्र में मण्डलेश्वर-महामण्डलेश्वरों के स्तर के कार्य सम्पादित करने को कहा है, लेकिन साथ ही यह स्पष्ट किया है कि वे पीठों को मंडलाधीश नहीं, मण्डल सेवकों के रूप में विकसित करना चाहते हैं।

जनप्रतिनिधियों को, लोकसेवी संगठनों के संचालक आदि को स्वयं को जन-सेवक मानकर ही अपने विशेष कर्तव्यों को पूरा करना चाहिए। प्रमुख सेवकों को सामान्य सेवकों से अधिक तत्पर, जागरूक और अधिक श्रमशील होना चाहिए।

युगऋिष का कथन है कि सामान्य रूप से कर्मचारियों को प्रतिदिन त्त् घण्टे श्रम करने का नियम है। स्वयंसेवकों को उनसे अधिक 10 घण्टे, तथा मालिकों, प्रधान सेवकों को और भी अधिक 12 घण्टे जागरूकतापूर्वक श्रम करना चाहिए। इसी भाव को व्यक्त करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, ‘‘आप लोग 12 घण्टे कार्य करेंगे तो मैं 13 घण्टे करूँगा। आप 14 घण्टे करेंगे तो मैं 15 घण्टे करूँगा।’’ यह भाव सभी प्रमुखों में होना चाहिए। जिनकी गतिविधियाँ इस भाव से संचालित हैं, वे सभी सराहनीय, अभिनन्दनीय हैं। प्रशासनिक सेवाओं एवं लोकसेवी संगठनों में लगे हुए सभी प्रमुख व्यक्तियों को इसी आदर्श को चरितार्थ करके अधिक श्रेय, सम्मान और संतोष के पात्र बनना चाहिए।

सहगमन-श्रेय वितरण
प्रधानमंत्री ने राष्ट्रोत्कर्ष के लिए, सहगमन-संगतिकरण के लिए ऋग्वेद के मंत्र ‘‘संगच्छध्वम्, संवदध्वम्, संवोमनासि जानताम’’ को आदर्श वाक्य के रूप में प्रस्तुत किया। भारतीय संस्कृति ने इसी आदर्श के आधार पर विश्व परिवार के भाव को साकार कर दिखाया था। इसी आधार पर विभिन्न विशेषज्ञ तथा विभिन्न वर्गों के विभूतिवान एकजुट होकर राष्ट्र और विश्व को प्रगति के साथ सुख-शान्ति के लक्ष्य तक पहुँचा सकते हैं। ऐसा करना आज की एक अनिवार्य आवश्यकता भी है।

‘संगच्छध्वम्’ (एक साथ आगे बढ़ना) अकेले संभव नहीं है। उसके लिए ‘संवदध्वम्’ तथा ‘संवो मनासि जानताम’ अर्थात् वाणी और मन की, कामनाओं-विचारों की समानता भी जरूरी है। सहगमन के हमारे प्रयास इसीलिए सार्थक और फलित नहीं होने पाते कि उनके साथ वचन और मन की समानता की साधना की उपेक्षा हो जाती है। राष्ट्र की सभी धाराओं से जुड़े विभिन्न वर्गों के प्रतिभा सम्पन्नों को चाहिए कि सामूहिक चिन्तन तथा सामूहिक उपासना के माध्यम से वाणी, विचारों और मनोभावों की समानता की साधना करें।

सहगमन के लिए युगऋषि का एक आवश्यक सूत्र ‘सलाह लें, सम्मान दें’ भी है। स्वयं जानकार होते हुए भी सभी सम्बद्ध व्यक्तियों अथवा वर्गों से सलाह-परामर्श लेने से उन्हें लगता है कि अमुक योजना अथवा कार्य में हमारी भी सहभागिता है। इससे कार्य के प्रति अपनत्व का भाव बढ़ता है और पूरे मन से अपनी सामर्थ्य लगा देने की प्रवृत्ति बढ़ती है। इसी प्रकार कार्य का श्रेय सभी को देने से भी परस्पर अपनत्व और कार्य को अधिक तत्परता से और प्रसन्नतापूर्वक करने का उत्साह उभरता है।

उक्त सूत्र के अनुसार प्रधानमंत्री जी ने राष्ट्रोत्थान के लिए पूर्वजों, स्वतंत्रता सैनिकों बलिदानियों से लेकर, सभी सरकारों, प्रधानमंत्रियों, विभिन्न दलों के प्रमुखों सहित भारत की आम जनता के प्रयासों को श्रेय देते हुए उनके प्रति आभार व्यक्त किया। संसद में सभी दलों के सांसदों, नेताओं से लेकर विभिन्न विभागों के परस्पर विचार-विनिमय को बढ़ावा देते हुए उनके सार्थक प्रयासों के लिए उनको श्रेय देने का प्रयास किया। ‘सलाह लो, सम्मान दो।’ के इस सूत्र को व्यवहार में लाने वाले हर प्रभावशाली व्यक्ति की सफलता और प्रतिष्ठा बढ़ना सुनिश्चित है। प्रत्येक संगठन के प्रमुख व्यक्तियों को आत्मसमीक्षा करनी चाहिए कि हम उक्त सूत्र को अपने स्वभाव में कितने अंशों में शामिल कर सकते हैं? जैसे-जैसे इसका प्रतिशत बढ़ेगा, वैसे-वैसे सहगमन और सार्थक प्रगति के नये-नये आयाम विकसित होंगे ही।

जातिवंश सब एक समान - समाज और राष्ट्र के विकास में वर्गभेद की विषैली मान्यता भारी अवरोध खड़े कर देती है। सम्प्रदायों, जातियों, क्षेत्रों के नाम पर, अमीर-गरीब के नाम पर समाज टुकड़ों-टुकड़ों में बँट जाता है। प्रतिभाएँ, विशेषताएँ सभी में हैं, राष्ट्र सभी का है, हित-अहित सभी के परस्पर जुड़े हुए हैं। स्वतंत्रता संग्राम में, सेना में, उत्पादक श्रम में सभी वर्गों के व्यक्तियों का योगदान रहा है। एकजुट होकर कर्म करने में सभी का भला है। किन्तु वर्गभेदजनित द्वेषभाव सहयोग में तो बाधक बनता ही है, बहुत बार तो सहयोगियों को दुश्मन भी बना देता है। इस जहर से बचने, इस बुराई को दूर करने के लिए प्रधानमंत्री की अपील समयानुकूल है। 
नर और नारी एक समान - समाज में नर और नारी का अनुपात बिगड़ने के विषय पर भी ध्यान आकर्षित किया गया। कन्याभ्रूण हत्या के कारण यह अनुपात बिगड़ा है। इसके पीछे यह भ्रान्त धारणा काम करती है कि माता-पिता के लिए बेटी की अपेक्षा बेटे अधिक उपयोगी होते हैं। इस भ्रान्ति का निवारण करते हुए प्रधानमंत्री ने बताया कि हमने ऐसे परिवार भी देखे हैं, जिनके चार-पाँच बेटे समर्थ हैं किन्तु माता-पिता वृद्धाश्रम में जीवन काट रहे हैं। इसके विपरीत एक मात्र बेटी ने माता-पिता की देखरेख करने के लिए विवाह ही नहीं किया और निरन्तर सेवा की। इसी के साथ उन्होंने कॉमनवैल्थ खेलों का जिक्र करते हुए यह तथ्य बताया कि उसमें जीते गये म्ब् पदकों में से ख्- पदक बेटियों ने जीते हैं और राष्ट्र की प्रतिष्ठा बढ़ाई है।
माता-पिताओं को उक्त तथ्य समझने चाहिए और बेटे-बेटियों के बीच भेद का व्यवहार बन्द करना चाहिए। इसी प्रसंग में नारियों के यौन उत्पीड़न का हवाला देते हुए प्रधानमंत्री जी ने कहा कि उत्पीड़न करने वाले युवक भी किसी माता-पिता की संतान ही हैं। माता-पिता बेटियों पर तो नियंत्रण रखते हैं, किंतु बेटों को स्वच्छंद छोड़ देते हैं। बेटियों की तरह उनके भी समय तथा कार्यों का हिसाब पूछा जाय तो अधिकांश युवकों को उच्छृंखल होने से रोका जा सकता है। बेटियों को शालीनता सिखाने की तरह ही बेटों को भी वह शिक्षण दिया जाना चाहिए। 
उक्त सभी अपीलें युग निर्माण सत्संकल्प के १६वें सूत्र ‘‘राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता के प्रति निष्ठावान रहेंगे। जाति, लिंग, भाषा, प्रांत, सम्प्रदाय आदि के कारण परस्पर कोई भेदभाव न बरतेंगे।’’ के अनुरूप है। यदि इस सूत्र के अनुसार सभी नागरिक अपनी मान्यताओं और अभ्यासों को ठीक कर लें तो राष्ट्र के समग्र विकास के अनेक मार्ग प्रशस्त हो जायें। 

प्रामाणिकता, कर्त्तव्य परायणता
सत्संकल्प का छठवाँ सूत्र है ‘‘मर्यादाओं को पालेंगे, वर्जनाओं से बचेंगे, नागरिक कर्त्तव्यों का पालन करेंगे और समाजनिष्ठ बनें रहेंगे।’’ प्रकारांतर से इस संदर्भ में भी प्रेरणा उभारी गयीं। उन्होंने कहा, ‘‘पिछले दिनों समाचार छपे कि नयी सरकार आयी तो अधिकारी और कर्मचारीगण कार्यालयों में समय से पहुँचने लगे।’’  ऐसी सहज प्रक्रिया को समाचार का दर्जा देना यह सिद्ध करता है कि हमारी कर्त्तव्यनिष्ठा कितनी गिर चुकी है। कर्त्तव्यपालन का सहज बोध और अभ्यास सभी को होना चाहिए। 
उन्होंने कहा कि आज किसी से उसकी ड्यूटी के अंतर्गत ही कोई काम करने का आग्रह किया जाय तो वह पूछता है ‘‘इसमें मेरा क्या?’’ और यदि उसको कोई अतिरिक्त लाभ न मिले तो कहता है ‘‘मुझे क्या?’’ हम राष्ट्रहित को ही केन्द्र में रखकर अपने कार्यों को प्रामाणिकता के साथ क्यों नहीं कर सकते? हर जागरूक नागरिक को अपने आप से यह प्रश्न करना चाहिए, ‘‘हमने अपने राष्ट्र के हित के लिए क्या किया?’’
हमें अपना राष्ट्रीय चरित्र विकसित करना चाहिए। जनता का कर्त्तव्य केवल जनप्रतिनिधियों को चुनना ही नहीं है। सरकार और प्रशासन के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ना तथा श्रेष्ठ राष्ट्र के सपनों को साकार करना भी हर जागरूक नागरिक का कर्त्तव्य होता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने नागरिक कर्त्तव्यों का पालन प्रामाणिकता से करे तो राष्ट्र का गौरव भी बढ़ेगा और सुख-सम्पदा में भी वृद्धि होगी। 

मेक इन इंडिया, मेड इन इंडिया
उन्होंने कहा कि हमारे राष्ट्र की सामर्थ्य बहुत है। हमारी ६५ प्रतिशत जनसंख्या युवा है। उनमें प्रतिभा भी है और कुछ करने का जज़्बा भी है। आई.टी. क्षेत्र में अपना कौशल बढ़ाकर हमारे नौजवानों ने देश को एक नयी प्रगतिशील पहचान दी है। 
हम विश्व के तमाम कुशल निर्माताओं से कहना चाहते हैं कि आओ और भारत में बनाओ। (कम, मेक इन इंडिया।) हमारे पास साधन हैं, प्रतिभाएँ हैं और उन्हें सुविधाएँ भी उपलब्ध करायी जायेंगी। इलैक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, सैन्य सामग्री आदि सभी क्षेत्रों में यह रीतिनीति अपनाई जा सकती है तथा युवाओं की प्रतिभाओं के उचित उपयोग की व्यवस्था बन सकती है। 
युवा और उद्योग क्षेत्र से जुड़े व्यक्तियों से अपील की गयी कि वे यह देखें कि हमारे देश में किन-किन वस्तुओं का आयात होता है। उनमें से एक-एक आइटम को भारत में प्रामाणिक स्तर से बनाने के प्रयास किए जायें। उन्हें जीरो डिफैक्ट (दोष रहित) और जीरो एफैक्ट (पर्यावरण पर कोई विपरीत प्रभाव न पड़ने वाला) बनाया जाय। फिर शान के साथ दुनिया के सामने उसे रखते हुए कहा जाय ‘मेड इन इंडिया’। इलैक्टॉनिक उपकरणों का निर्माण भारत में करने और उनका लाभ जन सामान्य तक पहुँचाये जाने को उन्होंने ‘डिजिटल इंडिया’ कहा। इससे देश में स्वावलम्बन और सम्पदा की वृद्धि होगी। 

पर्यटन और स्वच्छता
भारत में पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देने की अपील भी की गयी। इसका लाभ रिक्शा वाले, पकौड़े बनाने वाले, चाय बेचने वाले जैसे आम लोगों को भी मिलता है। भारत में विविध प्रकार के पर्यटन की अगणित संभावनाएँ हैं। उन्हें खोजा और विकसित किया जा सकता है। किंतु इसमें एक बड़ी बाधा है-फैली हुई गन्दगी। गन्दगी दूर करना, स्वच्छता बढ़ाना बहुत छोटा कार्य लगता है, किंतु यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। युगऋषि के अनुसार भी ‘‘स्वच्छता सभ्यता की पहली शर्त है। ’’
खुले में शौच जाने की कुरीति दूर करने की अपील की गयी। शौचालय न होने से बहन-बेटियों को तकलीफ होते हुए भी अंधेरा होने का इंतजार करना पड़ता है। गाँवों में गंदगी और दुर्गंध तो फैलती ही है। प्रधानमंत्री जी ने कहा- राष्ट्रपिता बापू को स्वच्छता बहुत प्रिय थी। हम २०१९ में उनकी १५०वीं जन्म जयंती मनाने जा रहे हैं। क्या उस समय हम उन्हें ‘स्वच्छ भारत’ की उनकी मनपसंद भेंट नहीं दे सकते? ऐसा हमें करना चाहिए और हम कर भी सकते हैं। 
इसी क्रम में एक योजना उन्होंने तत्काल लागू करने की बात कही। सभी स्कूलों में लड़कों-लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालयों की व्यवस्था बनायी जाये। सांसद निधि, विधायक निधि, उद्योग जगत की वैलफेयर निधि आदि सभी को इस प्रयोजन में लगा दिया जाय तो अगले स्वतंत्रता दिवस तक हम कह सकेंगे कि सभी विद्यालयों में उक्त सुविधा कर दी गयी है। 

गरीबी उन्मूलन
कहा गया कि यदि हम सहकारिता और सद्भावपूर्वक प्रयास करें तो राष्ट्र को सम्पन्न बनाते हुए, संसाधनों को सब तक पहुँचाते हुए गरीबी को दूर कर सकते हैं। सभी सार्क (दक्षेस) देशों की यह समान समस्या है, इसलिए संयुक्त रूप से प्रयास करके हम गरीबी उन्मूलन कर सकते हैं। जब हमारे देश के पास संसाधन नहीं थे और गिने-चुने नेता और क्रांतिकारी ही जाग्रत थे, तब हमने ब्रिटिश सत्ता को हटने के लिए मजबूर कर दिया, तो आज साधनों सहित १२५ करोड़ लोग प्रयास करें तो गरीबी कैसे रह सकती है?
आदर्श ग्राम ः  भारत ग्राम प्रधान देश है। गाँवों को आदर्श ग्राम बनाकर राष्ट्र को आदर्श बना सकते हैं। इसके लिए उन्होंने सांसदों के नाम पर ‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’ की बात कही। पहले हर सांसद अपने क्षेत्र में एक-एक ग्राम चुनकर उसे आदर्श बनायें। इस क्रम से अगले चुनाव २०१९ तक पाँच गाँवों को आदर्श बनाएँ तो हर जिले में एक आदर्श गाँव विकसित हो सकता है। यदि विधायक भी इस दिशा में लग पड़ें तो हर ब्लॉक में एक आदर्श ग्राम हो सकता है। इसका पूरा प्रारूप श्री जयप्रकाश जी की जन्म जयंती ११ अक्टूबर तक तैयार कर दिया जायेगा। आदर्श ग्रामों से प्रेरणा लेकर निकटवर्ती अन्य ग्राम भी उस दिशा में चल पड़ेंगे। युग निर्माण अभियान तो इस दिशा में कार्यरत है ही। अब राष्ट्रीय योजना के साथ जुड़कर उसे और भी अच्छी गति दी जा सकती है। 
वयं राष्ट्रे जागृयाम । ‘‘हम राष्ट्र को जाग्रत और जीवंत बनाये रखेंगे।’’ वेद के इस मंत्र को लेकर युग निर्माण अभियान तो प्रारंभ से ही चल रहा है। अब लाल किले से इसकी संस्तुति हो जाने पर तो इस मंत्र को जन-जन के जीवन में बिठा ही दिया जाना चाहिए। उन्होंने सतर्क सेना के साथ सतर्क नागरिकों की बात कही। इसके अनुसार हर देशप्रेमी भावनाशील को सृजन सैनिक एवं सृजनशिल्पी के रूप में विकसित करने का अभियान चलाना आसान हो गया है। थोड़े प्रयास से देश के हर संगठन और हर क्षेत्र में बड़ी संख्या में सृजन सैनिक तैयार किये जा सकते हैं।


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