मन की प्रचंड शक्ति 
अनगढ़ मनुष्य एवं नरपशु को नर-नारायण बना देने की क्षमता अगर किसी में है तो वह मन में है। उत्थान और पतन इसी पर निर्भर करता है। मन शक्तियों का पुञ्ज है। महामानवों के गढ़ने अथवा नर-पिशाचों को पैदा करने की सामर्थ्य मन में है। उसी ने ईसा, बुद्ध, कंस, सिकन्दर, नेपोलियन, हिटलर, मुसोलिनी पैदा किए। इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ मन के ही उत्थान-पतन की कहानियाँ हैं।

विचारणा उसकी अभिव्यक्ति है। यों तो उथले विचार अस्त-व्यस्त मन में उठते रहते  हैं और कुछ विशेष महत्त्वपूर्ण कार्य नहीं कर पाते। सूर्य की बिखरी किरणों के समान मनुष्य के सामान्य विचार पीने-खाने के सामान्य प्रयोजन ही पूरे कर पाते हैं। लेकिन वे निग्रहीत होकर दिशा विशेष में नियोजित किये जायें तो असाधारण सामर्थ्य प्राप्त कर लेते हैं, जैसे कि आतशी शीशे पर पड़ी सूर्य की किरणें निग्रहीत होकर  ध्वंसक हो जाती हैं, चमत्कारी प्रभाव दिखाती हैं। 
बिखराव कोई महत्त्वपूर्ण कार्य नहीं करने देता और उससे मन की शक्तियाँ ही नष्ट होती रहती हैं। एकाग्रता के अभाव में मन की प्रचण्ड शक्ति प्रभावहीन हो जाती है। वैज्ञानिक, विचारक, मनीषी मन की एकाग्रता की ही परिणति हैं। मन जब ऊर्ध्वगामी बनता है तो मनुष्य महात्मा, सन्त, देवात्मा बनता है। निम्रगामी होने पर नर से नरपशु और नर-पिशाच बन जाता है।

 नयन और नियमन
संकल्प-विकल्प पर ही मनुष्य के उत्थान-पतन का क्रम निर्भर करता है। संकल्प की असीम सामर्थ्य को जानते हुए ही शास्त्रों में अनेकों स्थान पर उसकी स्तुति की गई है। शिवत्व से युक्त संकल्प की कामना की गई है। ऋषियों ने प्रार्थना की है-मन का संकल्प शिव हो, रौद्र न हो, विधायक हो-विनाशक न हो। रचनात्मक श्रेष्ठ कार्यों की सत्प्रेरणाएँ शिवत्व से भरे-पूरे संकल्प ही जागरूक रहते हैं।
शास्त्रों में मन की दो प्रकार की शक्तियों का उल्लेख मिलता है। एक नयन और नियमन। एक मन्त्र में वर्णन है।
सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्,
नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिनऽइव।
हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं,
   तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु॥
मन्त्र में सारथी की उपमा मन से तथा इन्द्रियों की घोड़े से दी गई है। ‘अश्व’ तथा ‘बाजी’ शब्द घोड़े के लिए प्रयुक्त होता है। किन्तु इन दोनों में भी अन्तर है। अश्व उस घोड़े को कहते हैं जो धीरे-धीरे दौड़ता है। ‘बाजी’ तीव्र गति से चलने वाले घोड़े को कहते हैं। यदि उसे रोका न जाय तो दुर्घटना कर बैठेगा। सुयोग्य सारथी प्रथम प्रकार के घोड़े को चाबुक मारकर सही मार्ग पर आगे बढ़ने को बाध्य करता है। किन्तु ‘बाजी’ को सदा लगाम खींचकर गलत मार्ग पर जाने से रोकता है। एक का ‘नयन’ करता है और दूसरे का ‘नियमन’। 
मन में भी दोनों प्रकार की शक्तियाँ विद्यमान हैं। मन की शिथिलता को सक्रियता में बदलने तथा उसे उद्धत आचरण से बचाये रखने से ही वह समर्थ बनता है।
शरीर एवं इन्द्रियाँ तो आयु के साथ क्षीण हो जाते हैं। पर मन आयु के बन्धनों से परे होता है, सदा युवा बना रहता है, वह कभी बूढ़ा नहीं होता। उसकी गति से तीव्र चलने वाली किसी भी वस्तु का अब तक पता नहीं लग सका है। उसकी शक्ति जिस भी दिशा में बढ़ जाय, उसी दिशा में क्रान्ति ला सकती है। ‘गीता’ कहती है ‘योयच्छ्रद्धः स एव सः’ मनुष्य श्रद्धा का पुञ्ज है। संकल्प का खजाना है। संकल्पों में शिवत्व का समावेश हो, इसकी प्रार्थना बार-बार की गई है। 
इच्छा शक्ति के अनेकानेक चमत्कार देखने को मिलते हैं। यह मानसिक शुद्धि, पवित्रता एवं एकाग्रता पर आधारित है। जिसका मन जितना पवित्र और शुद्ध होगा उसके संकल्प उतने ही बलवान एवं प्रभावशाली होंगे। सन्त महात्माओं के शाप-वरदान की चमत्कारी घटनाएँ उनके मन की पवित्रता एवं एकाग्रता के ही परिणाम हैं। इस तथ्य को अनुभव करते हुए विश्व के सभी धर्म शास्त्रों ने मन को पवित्र बनाने पर जोर दिया है।

उपासना सर्वोत्तम अवलम्बन
मन के बिखराव से चंचलता को रोकने के लिए दृढ़ अवलम्बन की आवश्यकता पड़ती है। इसके बिखराव से कमजोरी आती है। मन की अधिकांश शक्ति लोभ, मोह के भौतिक आकर्षणों में यों ही नष्ट होती रहती है। विषयों के साथ जुड़कर उसकी चंचलता और भी बढ़ जाती है, एकाग्रता का लक्ष्य पूरा हो सकना तो दूर की बात है।
ऋषियों ने इस तथ्य को समझा। मन को नियंत्रित, दृढ़ एवं एकाग्र बनाने पर जोर दिया। साधनात्मक उपचारों का प्रतिपादन किया। उपासना को सर्वश्रेष्ठ अवलम्बन माना जो एकाग्रता का एकाकी लक्ष्य ही नहीं, उसके सही दिशा में नियोजन का उद्देश्य भी पूरा करती है। मन उस परम सत्ता से जुड़कर ही टिका रह सकता है तथा दृढ़ बन सकता है। 
एकाग्रता प्राप्ति के अन्यान्य माध्यम भी हो सकते हैं। सतत अभ्यास से संकल्प शक्ति भी विकसित हो सकती है। पर उसका नियोजन श्रेष्ठ उद्देश्यों के लिए, सृजन के लिए होगा यह आवश्यक नहीं। संकल्प के मनोबल के धनी नेपोलियन, हिटलर भी थे। पर वे इस शक्ति का सदुपयोग न कर सके। वे ध्वंस पर उतारू हुए और इतिहास में अपने कुकृत्यों का काला पन्ना जोड़ कर गये। इसलिए मनोबल की वृद्धि ही नहीं, सही दिशा में उसका नियोजन भी उतना ही आवश्यक है।
सृजनात्मक प्रयत्न तो आदर्शवादी सिद्धान्तों के अवलम्बन से ही बन पड़ते हैं। इसी कारण उपनिषद् के ऋषि मन की एकाग्रता और मनोबल की अभिवृद्धि ही नहीं, उसके शिवत्व से युक्त होने की भी कामना-प्रार्थना करते हैं। वे इस तथ्य से अवगत हैं कि सृजन में उसका सदुपयोग न हुआ, वह ध्वंस पर उतारू हुआ तो संकट खड़ा जो जायेगा।

नियंत्रण विचारों पर भी हो
महत्त्वपूर्ण पक्ष विचारों का भी है, जो मन में ही उठते रहते हैं और अपने अनुरूप प्रभाव डालते हैं। उन पर नियन्त्रण-नियोजन भी उतना ही आवश्यक है जितना कि एकाग्रता के लिए प्रयत्न। स्वतंत्र-अनियंत्रित छोड़ देने पर तरह-तरह की विकृतियाँ खड़े करते और मन को कमजोर बनाते हैं। प्रसिद्ध सन्त ‘इमर्सन’ ने कहा है - ‘‘विचारों को स्वतंत्रता दीजिए, वे कामनाओं का रूप धारण कर लेंगे। कामनाओं को स्वतंत्र मार्ग दीजिए तो वे कार्य में परिणित हो जायेंगे। यदि वे निकृष्ट हुए तो पतन के कारण हो जायेंगे।’’ 
मन में उठने वाले अनेकानेक विचारों में से अनुपयोगी की काट-छाँट एवं बहिष्कार की व्यवस्था भी बनानी चाहिए अन्यथा वे घास-पात के समान उगेंगे और मन की उर्वरा शक्ति का अवशोषण करके फलेंगे, फूलेंगे तथा मनुष्य के अधःपतन के कारण बनेंगे। उनकी निरन्तर काट-छाँट करते रहना भी उतना ही आवश्यक है जितना कि सद्विचारणा का बीजारोपण करना एवं उन्हें परिपक्व बनाने के लिए प्रयास करना।
मन असीम सामर्थ्यों का स्रोत है। संकल्प शक्ति की अनेकानेक सम्पदाएँ उसके अन्दर छिपी पड़ी है। इन्हें जवान रखा जा सके, सही दिशा में नियोजित करने का प्रयास किया जा सके तो मनुष्य असीम शक्ति का स्वामी बन सकता है। वह विचारक, सन्त, ऋषि, देवात्मा हो सकता है। भौतिक समृद्धियाँ भी इसी  पर अवलम्बित हैं।
‘अपरिमित संभावनाओं का आगार’
वाङ्मय २१/६.४३ से संकलित एवं संपादित


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