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भारत के वैज्ञानिकों ने पहले ही प्रयास में अपना शोध उपग्रह मंगल ग्रह की कक्षा में सफलता पूर्वक स्थापित करके जिस प्रतिभा और प्रतिबद्धता का परिचय दिया है, उसे देश और दुनियाँ ने सराहनीय, अभिनन्दनीय माना है। प्रारम्भ से अब तक की इस यात्रा की गाथा देश के वैज्ञानिकों की प्रतिभा, प्रतिबद्धता, धैर्यपूर्ण साहसिकता, सहकारिता-सादगीयुक्त तपस्या की साक्षी है।

सन् १९६२ में इस अभियान की शुरूआत इन्डियन नेशनल कमेटी फॉर स्पेस रिसर्च के नाम से हुए थी। इसके संस्थापक अध्यक्ष थे डॉ. होमी भाभा। इसके लिए उन्होंने भूमध्य रेखा के निकटवर्ती स्थल केरल प्रान्त के थुंबा गाँव को चुना। गाँव के लोग इस उद्देश्य के लिए स्थान खाली करने को तैयार नहीं थे, उन्हें लगता था कि जाने क्या आफत आयेगी? डॉ. भामा स्वयं गाँव वालों से मिले, उन्हें आत्मीयता पूर्वक महत्त्व समझाया, श्रेय और सम्पन्नता मिलने के सब्जबाग दिखाये और उनको राजी कर लिया। मात्र डेढ़ वर्ग कि.मी. भूमि मिली और उसमें खाली पड़े चर्च में कार्यालय बनाकर कार्य प्रारंभ किया गया। 

सन् १९६३ में थुंबा लॉचिंग सैन्टर तैयार हुआ। विश्व के वैज्ञानिकों ने भी भारतीय वैज्ञानिकों की टोली को प्रोत्साहन दिया, प्रशिक्षण में सहायता की। क्रमशः उसका विकास हुआ और उसने इसरो (इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाज़ेशन) का विराट रूप ले लिया। आज उसकी प्रतिष्ठा सारे विश्व में है, किन्तु बहुत कम लोग उसके लिए की गयी वैज्ञानिकों की एकनिष्ठ साधना से परिचित हैं। साधन बहुत सीमित थे, पग-पग पर बाधाएँ और चुनौतियाँ थीं। साधनों का अभाव था, किन्तु सच्ची लगन वाले प्रतिभाशाली उन बाधाओं को पार करते हुए इस मुकाम तक आ पहुँचे। कुछ तथ्य देखें-
  •  पहला रॉकेट साइकिल के कैरियर पर रखकर लॉचिंग पैड तक पहुँचाया गया था।
  •  सन् १९८२ में पहला उपग्रह बैलगाडी पर रखकर प्रक्षेपण स्थल तब पहुँचाया गया था।
  •  सन् १९९९ में पोखरण में किए गये परमाणु बम के विस्फोट के बाद तमाम देशों ने भारत पर अनेक कठोर प्रतिबन्ध लगा दिए थे। लेकिन वैज्ञानिक साधकों ने हर चुनौती का सामना करते हुए अपनी प्रतिभा और हिम्मत का लोहा सबको मनवा ही लिया।
  •  इसरो के लॉचिंग पैड से ३० अपने तथा ४० विदेशी उपग्रह सफलता पूर्वक अन्तरिक्ष में भेजने के बाद रूह्ररू (मार्श आर्किटर मिशन) को अनेक कीर्तिमानों के साथ सफल बनाया।
  •  पहले ही प्रयास में मंगल मिशन सफल बनाने वाला भारत पहला देश बना।
  •  यह अभियान बहुत किफायती रहा। इस पर केवल ४५० करोड़ रुपये खर्च हुए, जो दूसरे देशों के खर्च का लगभग १० प्रतिशत ही है। हॉलीवुड की फिल्में भी इससे अधिक बजट की बनती हैं। 
  •  वैज्ञानिकों ने लगभग सभी उपकरण देश में ही विकसित किए और सभी तकनकों का उपयोग किया। इसरो का सलाना बजट भी बहुत कम (१.२ अरब डालर) है, जबकि अमेरिका के स्पेस रिसर्च संगठन (नासा) का बजट १०.७, रूस का ७.९, यूरोप का ५.८ तथा चीन का २.५ अरब डॉलर है।
  •  देश में बदलती सरकारों, पनपते भ्रष्टाचारों, अनाचारों के शोरगुल से अप्रभावित, एकनिष्ठ रहकर अपने ढंग से अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण का जो प्रमाण हमारे वैज्ञानिकों ने दिया है, उसका अनुकरण अन्य विभाग और संगठन करें, तो भारत को विश्व का सिरमौर बनते देर न लगे।


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