साहित्य विस्तार - विचार विस्तार क्यों? कैसे? साधना इतनी सशक्त बने कि युग विचार विस्तार के सभी मोर्चे सध सकें

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इतना समर्थ कोई नहीं जो सब कुछ सँभाल ले, इतना असमर्थ कोई नहीं जो कुछ न कर सके
हमारा भी स्तर बढ़े 

युगऋषि ने अपने कार्य का स्तर बढ़ा दिया है, इसी अनुपात में हमारा स्तर भी बढ़ना जरूरी है। क्रान्तिधर्मी साहित्य में द्रष्टा ने अपनी गहरी दृष्टि से स्थिति को देखते हुए कुछ इस प्रकार के तथ्य स्पष्ट किए हैं :- 

‘‘सृजन साधकों ने ज्ञानयोग, भक्तियोग और कर्मयोग की साधनाएँ तो कीं, किन्तु यह भूल गये कि उन्हें इतना संगठित भी होना है कि युगक्रान्ति के लिए हर दरवाजा खटखटाते रह  सकें और जो सहमत हों उन्हें संगठन में शामिल कर नवसृजन आन्दोलन में लगाते रह सकें |"
योग का अर्थ है जुड़ना। योग का सर्वश्रेष्ठ स्तर स्रष्टा- परमात्म सत्ता के साथ जुड़ना। युग निर्माण योजना ईश्वरीय योजना है। उसके साथ किसी भी रूप में जुड़ना और अन्य व्यक्तियों को जोड़ना ‘योग’ की युग साधना ही है। 

ज्ञानयोग है ज्ञान के माध्यम से जुड़ना। विचार क्रान्ति उसी का व्यापक रूप है। हम विचार के माध्यम से युगऋषि, ईश्वरीय अभियान से जुड़ गये तो निश्चित रूप से ज्ञानयोग की साधना से जुड़ गये। क्रमशः इस योग साधना का स्तर बढ़े तो सद्विचारों को जीवन में साधने से लेकर अन्य व्यक्तियों को सद्विचार- युग विचार से जोड़ने की क्षमता बढ़ने लगती है। 

भक्तियोग है श्रद्धा- भक्ति के माध्यम से जुड़ना। परम सत्ता से सघन स्नेह- आत्मीयता के नाते उनके निर्देशों- अनुशासनों के पालन में आनन्द का अनुभव करना। नैतिक क्रान्ति इसी का व्यापक रूप है। हम श्रद्धा- भावना पूर्वक युगऋषि, युगसत्ता के अनुशासन- अनुबन्धों के पालन में रस लेते हैं तो निश्चित रूप से भक्ति योग की महत्त्वपूर्ण युग साधना में हम शामिल हो गये। जैसे- जैसे इस साधना का स्तर बढ़ता है, वैसे- वैसे अपने अन्दर भाव परिष्कार करने और सम्पर्क क्षेत्र के व्यक्तियों में श्रेष्ठ भावों का संचार करने की क्षमता बढ़ने लगती है। 

कर्मयोग है कर्म के माध्यम से जुड़ना। इस साधना से हमारे कर्म ईश्वरार्थ होने लगते हैं। स्वयं के कर्त्तापन का अहं समाप्त होने लगता है तो कर्म- भोग न रहकर कर्मयोग बन जाते हैं। जो साधक संसार में सत्प्रवृत्तियों के पुण्य प्रसार के लिए अपन समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का एक अंश नियमित रूप से लगा रहे हैं, वे निश्चित रूप से युग की कर्मयोग साधना के भागीदार बन गये हैं। इस साधना का स्तर बढ़ने से स्वयं के कर्म को परिष्कृत और प्रखर बनाने के साथ ही सम्पर्क वालों को भी कर्मयोग साधना में जोड़ते रहने की क्षमता बढ़ती जाती है। 

सभी सृजन साधक इन साधनाओं से किसी रूप में जुड़े तो हैं, किन्तु इतना भर पर्याप्त नहीं है। समय की माँग के अनुरूप लक्ष्य सिद्धि में समर्थ स्तर बढ़ता रहे, यह भी तो जरूरी है। हमारी उक्त साधनाओं का स्तर बढ़े तो हमारा व्यक्तित्व और संगठन इतना समर्थ बने कि हम हर घर तक युग निमंत्रण पहुँचाते रहने और सहमतों को नव सृजन अभियान के अंग बनाते रहने के लिए सभी मोर्चे गरिमापूर्ण ढंग से सभालते रह सकें। इसीलिए संगठन को समर्थ बनाने की साधना पर इन दिनों विशेष बल दिया जा रहा है। इसके सत्परिणाम भी क्रमशः उभरने लगे हैं। 

विचार विस्तार क्यों? कैसे? 

प्रश्र उठता है कि जब हमें ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग तीनों की साधना करनी है तो पहले विचार विस्तार- विचार क्रान्ति को ही क्यों प्राथमिकता दी जानी है? 

ध्यान रहे ज्ञानयोग विचार प्रधान है, भक्ति योग भाव प्रधान है तथा कर्मयोग पुरुषार्थ प्रधान है। विचार की स्थिति भावना और पुरुषार्थ के बीच में है। विचारों में भावों को छूने, उन्हें अभिव्यक्ति देने की क्षमता होती है। साथ ही पुरुषार्थ को प्रामाणिक दिशा और प्रभावी पैनापन विचार ही दे सकते हैं। इसलिए विचार विस्तार- विचार क्रान्ति को माध्यम बनाकर भाव परिष्कार और कर्मकाण्ड के अभियान को गति देना सबसे युक्तिसंगत लगता है। 

विचार विस्तार के तीन प्रचलित माध्यम हैं १. सत्संग (प्रवचन या परिचर्चा द्वारा) २. कला- संगीत (दृश्य- श्रव्य माध्यमों के द्वारा) तथा ३. साहित्य स्वाध्याय द्वारा। हमें विचार विस्तार के लिए इन तीनों माध्यमों का समुचित उपयोग करना होगा। अपने संगठन में ऐसे व्यक्तियों को जोड़ना और तैयार करना होगा, जो अपने- अपने ढंग से सभी माध्यमों को जीवन्त गति प्रदान करते रह सकें। 

सत्साहित्य उक्त तीनों में अपना महत्व रखता है। सत्संगी भी श्रेष्ठ साहित्य का अध्ययन- मनन करके ही प्रवचन- परिचर्चा के क्रम चलाते हैं। कलाकार भी किसी साहित्य से ही विचारों को चुनकर उन्हें संगीत- अभिनय या दृश्य- श्रव्य माध्यमों से जन- जन तक पहुँचाते हैं। सत्संग के लिए प्रभावशाली व्यक्तित्व और कुशल वक्ता जरूरी होते हैं तो कला संगीत के लिए गायन- अभिनय आदि में निपुण कलाकारों की जरूरत पड़ती है। यह दोनों स्तर के व्यक्ति जन साधारण की सुविधा के अनुसार हर जगह, हर व्यक्ति की सुविधा के समय पर उपलब्ध नहीं हो पाते। सत्साहित्य हर जगह उपलब्ध भी हो सकता है तथा प्रत्येक व्यक्ति अपनी सुविधा के समय में उसका स्वाध्याय करके विचारों का समुचित लाभ उठा सकता है। 

साहित्य विस्तार 
  
युगऋषि के अनुग्रह से अपने संगठन के पास अनुपम विचार साहित्य उपलब्ध है। उसमें पुस्तकें और पत्रिकाएँ दोनों का समावेश है। हमें उनके माध्यम से युग विचार जन- जन तक पहुँचाने के अपने अभियान को पहले से और अधिक प्रखर और प्रभावशाली बनाना होगा। 

युग विचार विस्तार के अन्तर्गत युग साहित्य विस्तार के लिए हमें तीन मोर्चों पर कार्य करना होगा। वे हैं १. साहित्य की उपलब्धता। २. जन- जन तक उसको पहुँचाने की व्यवस्था, तथा ३. साक्षरों के लिए नियमित स्वाध्याय कराने तथा निरक्षरों को पढ़कर सुनाने का तंत्र विकसित करना। तीनों धाराओं में अभी बहुत कुछ करना है। कुछ बिन्दु क्रमशः प्रस्तुत किए जा रहे हैं : 
क्. उपलब्धता : इसके अन्तर्गत १. संकलन, सम्पादन तथा अनुवाद, तथा २. मुद्रण प्रकाशन के कार्य आते हैं। 

मूल साहित्य : युगऋषि का साहित्य मूलतः हिन्दी भाषा में है। उनके द्वारा लिखी हजारों पुस्तकों में से मुश्किल से आधी पुस्तकें ही उपलब्ध हैं। समय तथा क्षेत्र की आवश्यकता के अनुसार साहित्य का चयन, संकलन, सम्पादन तथा प्रकाशन की व्यवस्था को बनाने में बहुत से प्रतिभा सम्पन्नों को बहुत तत्परता एवं परस्पर सहयोगपूर्वक प्रयास करने होंगे। 

भारतीय भाषाओं के क्षेत्र में अभी बहुत कुछ किया जाना है। यह ठीक है कि देश की प्रमुख प्रान्तीय भाषाओं में युग साहित्य का प्रवेश हो गया है, किंतु शेष काम बहुत बड़ा है। प्रान्तीय भाषाओं में हिंदी, गुजराती, मराठी, ओडिया, बंगला, असमिया, तेलुगु, तमिल, कन्नड़, मलयालम आदि भाषाओं में अभी बहुत कम साहित्य उपलब्ध है। क्षेत्र की आवश्यकताओं के अनुरूप साहित्य का चयन, संकलन, सम्पादन, प्रकाशन करने के लिए सभी जगह अधिक संख्या में अधिक कुशल प्रतिभावानों की जरूरत है। अंग्रेजी और उर्दू भाषाएँ देश के लगभग  सभी प्रांतों में बोली जाती हैं। इनके लिए भी चयन, संकलन, सम्पादन के साथ ही मुद्रण- प्रकाशन के तंत्र को बहुत समर्थ बनाने की जरूरत है। अंग्रेजी चूँकि देश के साथ विश्व के अनेक देशों में बोली- पढ़ी जाती है, इसलिए इसके लिए तो बहुत मँजे हुए अनुवादकों तथा हर क्षेत्र की आवश्यकता के अनुरूप साहित्य के चयन- सम्पादन के लिए समर्पित प्रतिभाओं  की आवश्यकता है। कुछ नैष्ठिकों को इस दिशा में नये उत्साह से सक्रिय होना होगा। 

उर्दृू में युग साहित्य की स्थिति बहुत कमजोर है, जबकि उसकी जरूरत बहुत ज्यादा है। उर्दू भाषा का उपयोग अधिकतर इस्लाम सम्प्रदाय के अनुयायी करते हैं। यों तो इस्लाम सबकी शान्ति, सलामती और भाईचारे को बल देता है, किंतु प्रत्यक्ष में स्थिति कुछ और है। इनमें उदारता- सहृदयता के स्थान पर पिछड़ापन और रूढ़िवादी कट्टरता के जो दोष पनप गये हैं, उनका उपचार युग साहित्य से बखूबी हो सकता है। देश के नैष्ठिक उर्दूभाषी नागरिकों को प्रगति की, उज्ज्वल भविष्य की धारा में लाने के लिए उर्दू साहित्य की उपलब्धता को बढ़ाना ही होगा। 

अन्य क्षेत्रीय भाषाएँ : हिंदी भाषी प्रांतों में राजस्थान, हिमाचल, हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, अरुणाचल प्रदेश आदि को गिना जाता है। राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी, भोजपुरी, बुंदेलखंडी, गढ़वाली भाषाएँ देवनागरी (हिंदी) लिपि में ही लिखी जाती हैं। किंतु क्या ग्रामीण क्षेत्र के लोग हिंदी की इन विभिन्न धाराओं को समझ पाते हैं? इनके अलावा वनवासी, आदिवासी लोगों की अनेक भाषाएँ हैं। वे हिंदी को भी नहीं समझ पाते। उन्हें अपनी सांस्कृतिक गरिमा का बोध कराने के लिए; उन्हें कुरीतियों- अंध विश्वासों से उबारकर प्रगति की धारा में लाने के लिए; उन्हें स्वास्थ्य, स्वच्छता, स्वावलम्बन की शिक्षा देने के लिए उन तक भी तो युग विचार पहुँचाने की जरूरत है। 

इसके लिए देवनागरी (हिंदी लिपि) में क्षेत्रीय भाषाओं में प्रकाशित किया जाना बहुत उपयोगी सिद्ध हो सकता है। यदि एक पढ़ा- लिखा व्यक्ति उनकी भाषा में साहित्य पढ़कर सुना दे, तो बड़ी संख्या में व्यक्ति सद्विचारों का लाभ उठा सकते हैं। इसके लिए उस क्षेत्र के हिंदी पढ़े- लिखे समझदार व्यक्ति प्रयास करें तो पिछड़े वर्गों को आगे लाने की दिशा में बड़ा कार्य हो सकता है। 
विदेशी भाषाओं में : अंग्रेजी के अलावा स्वाहिली, रूसी और स्पेनिश में ही थोड़ा- सा कार्य हो सका है। इनमें बहुत विस्तार किया ही जाना है। साथ ही चीनी, फ्रैंच, जर्मन, जापानी, अरबी, फारसी जैसी बहुप्रचलित भाषाओं में भी युगसाहित्य का विस्तार किया जाना है। उक्त भाषाओं में युग साहित्य की उपलब्धता के लिए कुछ नैष्ठिकों को संकल्पपूर्वक लगना- लगाना होगा। 
विविध भाषाओं में साहित्य उपलब्ध कराने के साथ ही उनको जन- जन तक पहुँचाने वाले विस्तार तंत्र को भी समर्थ- सशक्त बनाना होगा। 

ख्. जन- जन तक साहित्य विस्तार : इसके लिए किये जाने योग्य कार्य कुछ इस प्रकार हैं :- 
हर क्षेत्र में पर्याप्त संख्या में युगसाहित्य विस्तार पटल स्थापित हों। 

छोटे- बड़े पुस्तक मेलों के माध्यम से जन- जन को युग साहित्य के प्रति आकर्षित किया जाय। 
उदार वृत्ति के सम्पन्न व्यक्तियों के सहयोग से आधे मूल्य पर (ब्रह्मभोज) साहित्य उपलब्ध कराया जाय। 

ज्ञानरथों के माध्यम से चल विक्रय केन्द्र तथा चल पुस्तकालयों को सक्रिय किया जाय। 
विभिन्न शिक्षण संस्थानों में युग साहित्य की स्थापना तथा छात्र- छात्राओं को प्रेरित करके युग साहित्य पढ़ाने की व्यवस्था बनाई जाय। 

घरेलू ज्ञान मंदिरों तथा झोला पुस्तकालयों को प्राणवान बनाया जाय। उनके माध्यम से हर मोहल्ले में निःशुल्क युग साहित्य पढ़ाने का क्रम चल पड़े। 

विभिन्न मेलों- प्रदर्शनियों में युग साहित्य के स्टॉल लगाये जायें। 
मिशन से प्रभावित होटलवालों, चिकित्सकों, व्यापारियों को इसके लिए प्रेरित किया जाय कि वे अपने ग्राहकों को सत्साहित्य पढ़ाने और भेंट करने का क्रम अपनाएँ। इससे उन्हें स्वार्थ और परमार्थ सधने का दोहरा लाभ मिलेगा। 

उक्त प्रकार के प्रयत्नों से जन- जन तक साहित्य पहुँच तो जायेगा, किंतु यदि पढ़ाने- सुनाने में उसका उपयोग नहीं हुआ तो विचार क्रांति का उद्देश्य कैसे पूरा होगा? इसके लिए भी प्रयास करने- कराने होंगे। 

फ्. स्वाध्याय परम्परा :- पुस्तकों- पत्रिकाओं के स्वाध्याय के लिए व्यक्तियों को प्रेरित करना होगा। युगऋषि कहते रहें हैं कि हम पुस्तक विक्रेता नहीं हैं कि केवल अपना माल खपा  कर निश्चिंत हो जायें। पढ़े- लिखों को स्वाध्याय की प्रेरणा दी जाय। जगह- जगह स्वाध्याय मण्डल बनाये जायें। निरक्षरों को एकत्रित करके पढ़कर सुनाने- समझाने की व्यवस्था बनायी जाये। झोला पुस्तकालयों, घरेलू ज्ञान मंदिरों के संचालकों के नैष्ठिक प्रयास इस उद्देश्य की पूर्ति कर सकते हैं। 

अन्य क्रम 

युग विचार विस्तार के लिए युग साहित्य के साथ- साथ प्रवचन, सत्संग, कथा, कीर्तन तथा संगीत कलामंच (दृश्य- श्रव्य माध्यमों) आदि का भी प्रभावी तंत्र विकसित किया जाना जरूरी है। जिनकी वाणी खुली है, ऐसे भावनाशीलों, शिक्षकों, प्रोफेसरों, वकीलों आदि को युग प्रवक्ता के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। युगऋषि के साहित्य को पढ़कर प्रवचन तैयार करना कठिन नहीं है। विभिन्न शिक्षण संस्थानों, अन्य संगठनों, कॉर्पोरेट सेक्टर आदि में प्रवचन, सेमीनार, वर्कशॉप आदि के द्वारा प्रबुद्धों तक युग विचार पहुँचाया जाना जरूरी है। 

इसी प्रकार संगीतज्ञों, कलाकारों को जन- जन में सत्प्रवृत्तियाँ जगाने के लिए तैयार किया जाना बड़ा उपयोगी है। आज विज्ञान ने अनेक तकनीकी सुविधाएँ प्रदान कर दी हैं। स्लाइड शो, प्रदर्शनी, पावर पॉइंट प्रेजेण्टेशन, नुक्कड़ नाटक, सद्वाक्य लेखन आदि के माध्यम से युगविचारों को जन- जन तक पहुँचाने के अनेक तंत्र विकसित किये- कराये जा सकते हैं। 

इस वर्ष इस ओर विशेष ध्यान दिया जाय। संकल्प उभारे जायें तो छोटे- बड़े सभी इस दिशा में कुछ न कुछ उल्लेखनीय योगदान दे सकते हैं, श्रेय कमा सकते हैं।


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