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प्रकृति ने हर प्राणी को वह स्वाभाविक क्षमता और बुद्धि दी है जिसके आधार पर वह निरोग, दीर्घ जीवन प्राप्त कर सके। उस क्षमता और बुद्धि का प्रकृति के नियमों के अनुकूल उपयोग करने वाले सभी प्राणी निरोग पाये जाते हैं। वन्य प्रदेशों में स्वछन्द विचरण करने वाले पशु-पक्षियों को देखते हैं तो उनमें से कोई भी रोगी नहीं दीखता।  केवल एक मूर्ख जानवर, मनुष्य ही है जो प्रकृति की अवज्ञा करके अपना आहार-विहार कृत्रिमता से करता है और उस अवज्ञा के फलस्वरूप ही तरह-तरह के रोगों का संकट भोगता है।

यदि हम निरोग रहना चाहते हैं तो उसका एक ही उपाय है कि अपनी शरीर की बनावट के अनुरूप आहार-विहार अपनायें और प्रकृति ने जिस ढंग से रहने का संकेत दिया है, उसी का अनुसरण करें। यह प्रयोजन कृत्रिम दवा-दारू और तथाकथित डिब्बे में बंद पौष्टिक आहारों से पूरा नहीं हो सकता। प्रकृति माता की शरण ही एक मात्र वह उपाय है, जिससे वर्तमान रुग्णता और दुर्बलता से छुटकारा पाया जा सकता है और भविष्य के लिए हँसता-खेलता दीर्घ-जीवन प्राप्त किया जा सकता है।

जीभ बताती है उपयुक्त आहार :

    हमारे लिए क्या भोजन उपयुक्त है, उसके लिए किसी दूसरे से पूछताछ करने की या पुस्तकें पढ़ने की जरूरत नहीं है। मुख के दरवाजे पर बैठा हुआ जिह्वा रूपी डॉक्टर किसी भी वस्तु की परीक्षा करके यह बतला सकता है कि अपने लिए क्या ग्राह्य और क्या अग्राह्य है। जो वस्तुएँ बिना जलाये-भूने, बिना मसाले-मिठाई मिलाये अपने मूल रूप में हमें रुचिकर, स्वादिष्ट लगें, समझना चाहिए कि वही हमारा प्राकृतिक शुद्ध भोजन है।

इस दृष्टि से फल हमारा सर्वोत्तम भोजन है। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि हमारी रुचि उधर से हटती जा रही है अन्यथा फलों की कृषि की जाने लगे ता ेअन्न की तुलना में सस्ते भी पड़े और पैसा भी अधिक मिले। मँहगे फल खरीद सकना संभव न हो तो हर ऋतु में  उस समय की शारीरिक स्थिति के लिए पूर्णतया उपयुक्त सस्ते ऋतु फल भी मिलते हैं, जो कम लाभदायक नहीं होते। अपने मौसम में आम, जामुन, बेर, अमरूद, शहतूत आदि खूब पैदा होते हैं और सस्ते भी मिलते हैं। केला, पपीता महँगे नहीं पड़ते। शाक-वर्ग में उगने वाले कितने ही सस्ते फल सहज ही पाये जा सकते हैं। खरबूज, तरबूज, ककड़ी, खीरा, टमाटर का अपनी ऋतुओं में बाहुल्य रहता है।

कच्चे अन्न पकने में तो कुछ समय लगाते हैं पर जीवन तत्व उनमें भी कम नहीं रहते। मक्का, मटर, चने, ज्वार, बाजरा आदि पकने, सूखने से पहले हरी स्थिति में स्वादिष्ट भी रहते हैं और प्रकृति के अनुकूल भी। गेहूँ, चना, मूँग आदि सुपाच्य अन्न सूखे ही लेने हों तो उन्हें पानी में अंकुरित करके खाया जा सकता है। उबालने की नौबत आये तो सुपाच्य शाक अथवा चावल आदि उबाले जा सकते हैं। दलिया भी कामचलाऊ हो सकता है।

    आहार को जितना अधिक जलाया जायेगा और उसमें मिर्च, मसाले, तेल, घी आदि मिलाये जायेंगे, उतना ही वह अहितकर और निस्तत्व होता चला जाएगा। आज जीभ को चटोरी बनाकर उसकी आदत बिगाड़ी जाती है और उस बिगड़ी आदत को ही जायका कहकर उदरस्थ किया जाता है। जो स्वाभाविक रूप में जैसा हो, वही उसका असली स्वाद है और कौन-सा स्वाद उपयुक्त है, इसे बिना बिगड़ी हुई जीभ सहज ही बता सकती है।

मिर्च खाते ही जीभ जलती है, नमक खाते ही उलटी आती है। हींग, लौंग, हल्दी आदि खाकर कोई देखे तो जीभ सहज ही बतायेगी कि यह जंजाल अपने लिए सर्वथा अग्राह्य है। पर चतुर कहलाने वाले मनुष्य ने जीभ को धीरे-धीरे अवांछनीय चीजों का अभ्यस्त बना दिया और वह नशेबाज की तरह कड़ुई और विषैली, नशीली चीजों की भाँति चिकनाई और मसालों से भरे, जलाने और भूनने से निस्तत्व किये गये पकवान, मिष्ठानों को स्वादिष्ट मानकर धोखा खाती रहती है। यह आहार उसके पचाने में अनुपयुक्त होते हैं और शरीर को शक्ति देने की अपेक्षा उलटे उसकी संचित शक्ति खाते रहते हैं। ऐसी दशा में पोषणविहीन और जीवन तत्वों से रहित अप्राकृतिक भोजन करने वाला व्यक्ति बीमारी के चंगुल में फँसता चला जाये तो आश्चर्य क्या है? माँस, मदिरा, तम्बाकू जैसे अभक्ष्य पदार्थ स्वास्थ्य की बर्बादी के अतिरिक्त रत्ती भर भी लाभ नहीं दे सकते।

खुली-ताजी हवा का सेवन करें :

स्वच्छ आहार की तरह स्वच्छ जलवायु भी निरोगिता के लिए आवश्यक है। सड़ा-गला, विषैला भोजन हानिकारक होने की बात सभी जानते हैं, पर यह भूल जाते हैं कि वायु, जो अन्न से भी अधिक

 आवश्यक है, स्वच्छ मिलनी आवश्यक है। सीलन भरे, बिना खिड़की के, तरह-तरह की चीजों से भरे मकानों में गंदी हवा ही रहती है। गली-कूचों में, भेड़ियों की माँद की तरह गंदे मकानों में रहने वालों की अपेक्षा खुली हवा में पेड़ों के नीचे रहने वाले अधिक निरोग रह सकते हैं। धूल, धुएँ, सीलन, सड़न से भरा हुआ वातावरण धन कमाने के लिए भले ही उपयुक्त हो, स्वास्थ्य को दिन-दिन गलाता जायेगा। मुँह ढककर खिड़की, दरवाजे बन्द कर सोने की आदत साँस के द्वारा शरीर में विषैले तत्वों के प्रवेश का खुला निमन्त्रण है। ऐसा करने वाले निरोग कैसे रह सकते हैं?

घातक होते हैं तंग कपड़े :

साँस केवल एक नाक और मुँह से ही नहीं, चमड़ी से भी ली और छोडी जाती है। यदि चमड़ी पर हवा बाहर न निकलने वाला कोई मजबूत लेप चढ़ा दिया जाये, तो आदमी थोड़ी ही देर में बेहोश हो सकता और मर सकता है। कसे हुए कपड़ों की पर्त चढ़ाकर बने-ठने रहने वाले लोग फैशन भले ही बना लेते हों, लेकिन कपड़े का कसाव त्वचा को साँस लेने से रोकता है। बहुत कपड़े पहनना ऐसा ही है जैसे नाक पर पट्टी बाँधना। इससे चमड़ी की शक्ति क्षीण हो जाती है और सर्दी, गर्मी, जुकाम, खाँसी, लू लगने जैसी शिकायत होती रहती है। यह प्रकृति के अमूल्य उपहार-प्राणवायु तथा सर्दी-गर्मी की अवज्ञा करने का ही दुष्परिणाम है, जो हमें बीमारियों के रूप में भुगतना पड़ता है।

पसीने के साथ बहायें बीमारियाँ :

शारीरिक श्रम इतना होना चाहिए कि पसीना बहे और हर अवयव के क्रियाशील रहने की आदत पड़ी रहे। पशु-पक्षी सारे दिन आहार की तालाश में इधर-उधर घूमते हैं और उससे कठोर काम करने की आवश्यकता पूरी कर लेते हैं। मनुष्य आरामतलबी से बैठे रहने के कारण हलके-फुलके काम करने का आदी व आलसी होता जाता है। श्रम न करने में उसके  हाथ-पाँव जैसे बाहरी और आँतें, आमाशय, दिल, गुर्दे जैसे भीतरी अवयव कमजोर होते चले जाते हैं और बीमारियों के शिकार बनते हैं। शरीर को समर्थ, शक्तिशाली और रोग निरोधक शक्ति से पूर्ण रखने की दृष्टि से कठोर शारीरिक श्रम की नितांत आवश्यकता है। बैठे रहने वालों को यह प्रयोजन कई मील टहलने एवं आसन-व्यायाम द्वारा पूरा करना चाहिए। स्मरण रखना चाहिए कि श्रम रहित जीवन न तो निरोग रह सकता है और न दीर्घजीवी बन सकता है।

जीवन तत्त्व की बर्बादी से बचें :

ब्रह्मचर्य के सम्बन्ध में जितनी अधिक सतर्कता बरती जाये, उतना ही उत्तम है। पशुओं तक में इतनी बुद्धि है कि प्रजनन की आवश्यकता पड़ने पर वे चिरकाल बाद एक बार मैथुन करते हैं। मनुष्य ने इस प्रसंग को मनोरंजन या कौतूहल का विषय बनाकर अपने को खोखला करने की मूर्खता को ही अपनाया है। जीवन-तत्व की बेहिसाब बर्बादी करने वाला कितने दिन निरोग और सशक्त रह सकेगा। मानसिक चिन्ताएँ, उद्वेग, आवेश, भय, शोक, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष जैसे मनोविकार भी मन और देह को भीतर ही भीतर घुलाते रहते हैं।

जिन्हें निरोग जीवन जीना हो, उन्हें  ब्रह्मचर्य की ही भाँति मानसिक रूप से संतुलित और संतुष्ट, हँसी-खुशी का जीवन जीने की आदत डालनी चाहिए। प्रयास करें कि दिन में सारे काम निपट जायें और रात सोने के लिए मिल जाये। बहुत रात तक जागना और दिन में सोना स्वास्थ्य का महत्व समझने वाले को तो छोड़ ही देना चाहिए। प्रकृति का अनुसरण करके ही हम निरोग और दीर्घजीवी बन सकते हैं। इस तथ्य को जितनी जल्दी समझ लिया जाये, उतना ही अच्छा है।

वाङ्मय ः 66/6.53 से संकलित-संपादित


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