कहाँ हैं लक्ष्मण की मूर्च्छा और राम की वेदना दूर करने वाले हनुमान ?

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त्रेता के अंत में दो महान प्रयोजन सम्पन्न होने थे- एक अवांछनीयता- असुरता का उन्मूलन, दूसरा सतयुग की वापसी वाले उच्च स्तरीय वातावरण का रामराज्य के रूप में स्थापन। उस महान प्रयोजन को, ‘राम की आत्मसत्ता’ और ‘लक्ष्मण आदि की पुरुषार्थ- परायणता’ मिल- जुलकर सम्पन्न करने में एकनिष्ठ भाव से संलग्र थी। दोनों प्रयोजनों का मध्यान्तर  राम- रावण युद्ध के रूप में चल रहा था। इसी बीच एक भयावह दुर्घटना घटित हुई। लक्ष्मण को शक्तिबाण लगा, वे मरे तो नहीं पर मूर्च्छित होकर गिर पड़े।
  
बात आत्मसत्ता और पुरुषार्थ परायणता के समन्वय से बनने वाली थी। लक्ष्मण की मूर्च्छा से उत्पन्न अर्धाङ्ग पक्षाघात जैसी स्थिति से तो उस अभीष्ट उद्देश्य में भारी व्यवधान उत्पन्न होने जा रहा था। राम सर्वसमर्थ होते हुए भी लक्ष्मण के बिना अपने को असहाय अनुभव कर रहे थे। संकट ऐसा था, जिसे अनर्थ से कम नहीं माना जा रहा था। आवश्यकता यह गुहार मचा रही थी कि लक्ष्मण की मूर्च्छा किसी प्रकार दूर हो। इसके लिए संजीवनी बूटी का कहीं से भी, किसी प्रकार भी लाया जाना अनिवार्य हो गया था। उसे हिमालय जाकर लाये कौन? प्रश्न बड़ा जटिल था। 
  
दिव्य वरदान की तरह हनुमान उभरे। उन्होंने असंभव को संभव कर दिखाने का साहस किया, बीड़ा उठाया और चल पड़े समय की माँग पूरी करने के लिए प्राण हथेली पर रखकर। जैसे भी बन पड़ा, संजीवनी बूटी लेकर समय पर वापस लौट आये। वह लक्ष्मण को दी गयी, मूर्छा जगी और संकट टल गया। दोनों भाई मिलकर वह करने में जुट पड़े, जिसके लिए उनका अवतरण हुआ था। 
  
आज का दुर्भाग्य 
  
यह बात हजारों वर्ष पुरानी है, पर उसका एक लघु उदाहरण इन दिनों भी सामने है। युगान्तरीय चेतना का दिव्य आलोक दैवी आकांक्षा की पूर्ति में जुटा है। उस महान प्रयोजन की पूर्ति में प्रज्ञा पुत्रों की सामूहिक संगठित शक्ति निर्धारित क्रिया- कलापों में जुटी, जिसकी तत्परता को लक्ष्मण की प्रतिभा कहा जा सकता है। दोनों की समन्वित शक्ति यदि ठीक तरह काम करने की स्थिति में रही होती तो युग संधि के पिछले दो वर्षों में इतना कार्य सम्पन्न हो चुका होता कि उसे देखते हुए इक्कीसवीं सदी के गंगावतरण में किसी प्रकार के संदेह की गुंजाइश न रह जाती। 
  
पर क्या किया जाय उस दुर्भाग्य का जो लक्ष्मण रूपी परिजनों की संयुक्त शक्ति को, उनकी तत्परता को मूर्च्छना की स्थिति में ले पहुँचा। इसे उस मेघनाद रूपी विग्रह का माया जाल भी कह सकते हैं जो आड़े समय में उदासीनता, उपेक्षा के रूप में आ खड़ा हुआ है। आपत्तिकाल की चुनौती सामने रहते हुए भी व्यामोह उभरे और जिस- तिस बहाने, समर्थों के कन्नी काटने जैसी विडम्बना चल पड़े तो उसे क्या कहा जाय? इसे असुरता का आक्रमण भी कह सकते हैं और उज्ज्वल भविष्य के बीच आड़े आने वाला दुर्भाग्य भी ।। जो हो, लक्ष्मण की साँस तो चल रही है, पर इसका धनुष- बाण इन दिनों वह चमत्कार दिखा नहीं पा रहा है, जिसकी अपेक्षा युगधर्म ने, महाकाल ने की थी। 

हमारी परीक्षा की घड़ी 
वस्तुस्थिति ऐसी है नहीं जिसके लिए किसी को भी, किसी कारण भी बहानेबाजी गढ़कर अपनी भावनात्मक दुर्बलता पर पर्दा डालने की विडम्बना रचनी पड़े। मूर्च्छना इसी रूप में है। लक्ष्मण की विपन्नता, तपस्वी राम को कितनी खल रही है, इसे शब्दों में कैसे व्यक्त किया जाय? समय को यह सब कितना खल रहा है, इसका आकलन जीवन्तों की प्राण चेतना ही  कर सकती है। लिप्साएँ और तृष्णाएँ तो केवल मूक दर्शक भर बने रहने का परामर्श दे सकती हैं। 
  
देखना इतना भर है कि इस आड़े समय में हनुमान की भूमिका कौन निभाये? वह संजीवनी बूटी कहाँ से खोज लाये, जिससे प्रज्ञा पुत्रों की चेतना और तत्परता में नये सिरे से उभार आये। सबसे बड़ी आवश्यकता हनुमान स्तर की उस भाव चेतना की है, जो अभीष्ट पुरुषार्थ की पूर्ति करके बिगड़े काम को बनाने में संलग्र होकर अपनी वरिष्ठता और यशोगाथा को चिरकाल तक चर्चा का विषय बनाये। 
  
देखना यह है कि वैसा परिवर्तन इन दिनों तथ्यतः जीवन में हो सकता है या नहीं ? हनुमान का पौरुष कहीं से हुँकार भरता है या नहीं? समय की कसौटी इन्हीं दिनों खरे- खोटे की परीक्षा करने के लिए हठपूर्वक आ खड़ी हुई है। इसे झुठलाया नहीं जा सकता। 
  
यहाँ यह नहीं कहा जा रहा है कि सभी निष्क्रिय -निर्जीव हो गये हैं। सक्रियता पर्याप्त मात्रा में अभी भी है। अभी तक उसी के बलबूते मिशन की सारी योजनाएँ कार्यान्वित होती चली आयी हैं। कार्य की व्यापकता को देखते हुए अब सक्रियता का अनुपात एवं स्तर बढ़ाने के लिए कहा जा रहा है। विशेषतः यह उद्बोधन हर उस व्यक्ति के लिए है, जो स्वयं को हनुमान व अर्जुन की भूमिका में लाना चाहे। जो पुरानों में नवजीवन संचार करने व नयों को ढूँढ़ निकालने की क्षमता विकसित कर सके। 
  
वाङ्मय ‘सक्ष्मीकरण एवं उज्ज्वल भविष्य- १’, पृष्ठ ६.२७- २९ से संकलित, संपादित


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