विचारों से ही बनता है व्यक्तित्व

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परम पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य (पुस्तक ‘सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति’ से संकलित-संपादित)

सुख-दुःख विचारों की छाया

संसार मनुष्य के विचारों की ही छाया है। इसमें दिखाई देने वाली विभिन्नताएँ, विचित्रताएँ हमारे विचारों का ही प्रतिबिम्ब हैं।   किसी के लिए यह संसार स्वर्ग है तो किसी के लिए नरक। किसी के लिए संसार अशान्ति, क्लेश, पीड़ा आदि का आगार है, तो किसी के लिए सुख-सुविधा सम्पन्न उपवन। एक-सी परिस्थितियों में, एक-सी सुख-सुविधा, समृद्धि से युक्त दो व्यक्तियों में भी अपने विचारों की भिन्नता के कारण असाधारण अन्तर पड़ जाता है। एक जीवन में प्रतिक्षण सुख-सुविधा, प्रसन्नता, खुशी, शान्ति, सन्तोष का अनुभव करता है तो दूसरा पीड़ा, क्रोध, क्लेशमय जीवन बिताता है। इतना ही नहीं कई व्यक्ति कठिनाई का अभावग्रस्त जीवन बिताते हुए भी प्रसन्न रहते हैं, तो कई समृद्ध होकर भी जीवन को नारकीय यंत्रणा समझते हैं।

विचार सर्वोपरि शक्ति है

विचारों में अपार शक्ति है। जो सदैव कर्म की प्रेरणा देती है। वह अच्छे कार्यों में लग जाय तो अच्छे और बुरे मार्ग की ओर प्रवृत्त हो जाय तो बुरे परिणाम प्राप्त होते हैं। मनुष्य के विचार एक तरह की सजीव तरंगें हैं जो जीवन संसार और यहाँ के पदार्थों को प्रेरणा देती रहती हैं। इन सजीव विचारों का जब केन्द्रीकरण हो जाता है तो एक प्रचण्ड शक्ति का उद्भव होता है।

स्वामी विवेकानन्द ने विचारों की इस शक्ति का उल्लेख करते हुए बताया है- ‘‘कोई व्यक्ति भले ही किसी गुफा में जाकर विचार करे और विचार करते-करते ही वह मर भी जाय, तो वे विचार कुछ समय उपरान्त गुफा की दीवारों का विच्छेद कर बाहर निकल पडें़गे, और सर्वत्र फैल जायेंगे। वे विचार तब सबको प्रभावित करेंगे।’’

मनुष्य जैसे विचार करता है, उनकी सूक्ष्म तरंगें विश्वाकाश में फैल जाती है। सम स्वभाव के पदार्थ एक दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं, इस नियम के अनुसार उन विचारों के अनुकूल दूसरे विचार आकर्षित होते हैं और व्यक्ति को वैसे ही प्रेरणा देते हैं । एक ही तरह के विचार घनीभूत होते रहने पर प्रचण्ड शक्ति धारण कर लेते हैं और मनुष्य के जीवन में जादू की तरह प्रभाव डालते हैं।

संसार की प्रायः सभी शक्तियाँ जड़ होती हैं, विचार-शक्ति, चेतन-शक्ति है। उदाहरण के लिए धन अथवा जनशक्ति ले लीजिये। अपार धन हो, किन्तु समुचित प्रयोग करने वाला कोई विचारवान् व्यक्ति न हो तो उस धनराशि से कोई भी काम नहीं किया जा सकता। जन शक्ति और सैनिक-शक्ति अपने आप में कुछ भी नहीं हैं । जब कोई विचारवान् नेता अथवा नायक उसका ठीक से नियन्त्रण और अनुशासन कर उसे उचित दिशा में लगाता है, तभी वह कुछ उपयोगी हो पाती है अन्यथा वह सारी शक्ति निरर्थक रहती है। शासन, प्रशासन और व्यावसायिक सारे काम एक मात्र विचार द्वारा ही नियन्त्रित और संचालित होते हैं। भौतिक क्षेत्र में ही नहीं, उससे आगे बढ़कर आत्मिक क्षेत्र में भी एक विचार-शक्ति ही ऐसी है जो काम आती है, कोई अन्य शारीरिक या साम्पत्तिक शक्ति काम नहीं आती। इस प्रकार जीवन तथा जीवन के हर क्षेत्र में केवल विचार-शक्ति का ही साम्राज्य रहता है।

दो धाराएँ-सृजन और ध्वंस

विचारों में सृजनात्मक और ध्वंसात्मक दोनों प्रकार की अपूर्व, सर्वोपरि और अनन्त शक्ति होती है। जो इस रहस्य को जान जाता है, वह मानो जीवन के एक गहरे रहस्य को प्राप्त कर लेता है। विचारणाओं का चयन करना स्थूल मनुष्य की सबसे बड़ी बुद्धिमानी है। उनकी पहचान के साथ जिसको उसके प्रयोग की विधि विदित हो जाती है, वह संसार का कोई भी अभीष्ट सरलतापूर्वक पा सकता है।

जिस तरह के हमारे विचार होंगे उसी तरह की हमारी सारी क्रियायें होंगी और तदनुकूल ही उनका अच्छा-बुरा परिणाम हमें भुगतना पड़ेगा। विचारों के पश्चात ही हमारे मन में किसी वस्तु या परिस्थिति की चाह उत्पन्न होती है और तब हम उस दिशा में प्रयत्न करने लगते हैं। जितनी हम सच्चे दिल से चाह करते हैं, जिसकी प्राप्ति के लिये अन्तःकरण से अभिलाषा करते हैं, उस पर यदि दृढ़ निश्चय के साथ कार्य किया जाय, तो इष्ट वस्तु की प्राप्ति अवश्यम्भावी है। जिस आदर्श को हमने सच्चे हृदय से अपनाया है, यदि उस पर मनसा-वाचा-कर्मणा से चलने को हम कटिबद्ध हैं, तो हमारी सफलता निःसन्देह है।

परिवर्तन का प्रथम सोपान

जब हम विचार द्वारा किसी वस्तु या परिस्थिति का चित्र मन पर अंकित कर दृढ़ता पूर्वक उसके लिये प्रयत्न करते हैं तो उसके साथ हमारा संबंध जुड़ना आरम्भ हो जाता है। यदि हम चाहते हैं कि हम दीर्घ काल तक नवयुवा बने रहें, तो हमें चाहिये कि हम सदा अपने मन को यौवन के सुखद विचारों के आनन्द-सागर में लहराते रहें। यदि हम चाहते हैं कि हम सदा सुन्दर बने रहें, हमारे मुख-मण्डल पर सौंदर्य का दिव्य प्रकाश हमेशा झलका करे, तो हमें चाहिए कि हम अपनी आत्मा को सौन्दर्य के सुमधुर सरोवर में नित्य स्नान कराते रहें।

यदि आपको संसार में महापुरुष बनकर यश प्राप्त करना है तो आप जिस महापुरुष के सदृश होने की अभिलाषा रखते हैं, उसका आदर्श सदा अपने सामने रखें। आप अपने मन में यह दृढ़ विश्वास जमा लें कि आपमें अपने आदर्श की पूर्णता और कार्य सम्पादन शक्ति पर्याप्त मात्रा में मौजूद है। आप अपने मन से सब प्रकार की हीन भावना को हटा दें और मन में कभी निर्बलता, न्यूनता, असमर्थता और असफलता के विचारों को न आने दें। आप अपने आदर्श की पूर्ति हेतु मन, वचन, कर्म से पूरी दृढ़ता से प्रयत्न करें और विश्वास रखें कि आपके प्रयत्न अंततः सफल होकर रहेंगे।

कुँए में मुँह करके आवाज देने पर वैसी ही प्रतिध्वनि उत्पन्न होती है। संसार भी इस कुँए की आवाज की तरह ही है। मनुष्य जैसा सोचता है, विचारता है, वैसी ही प्रतिक्रिया वातावरण में होती है। मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही उसके आसपास का वातावरण बन जाता है। मनुष्य के विचार शक्तिशाली चुम्बक की तरह हैं, जो अपने समानधर्मी विचारों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। एक ही तरह के विचारों के घनीभूत होने पर वैसी ही क्रिया होती है और वैसे ही स्थूल परिणाम प्राप्त होते हैं।

जहाँ चाह, वहाँ राह

विचार की प्रचण्ड शक्ति असीम, अमर्यादित अणुशक्ति से भी प्रबल है। विचार जब घनीभूत होकर संकल्प का रूप धारण कर लेते हैं तो स्वयं प्रकृति अपने नियमों का व्यतिरेक करके भी उसको मार्ग देती है। इतना ही नहीं, उसके अनुकूल बन जाती है।  मनुष्य जिस तरह के विचारों को प्रश्रय देता है, उसके वैसे ही आदर्श, हाव-भाव, रहन-सहन ही नहीं, शरीर में तेज, मुद्रा आदि भी वैसे ही बन जाते हैं। जहाँ सद्विचार की प्रचुरता होगी, वहाँ वैसा ही वातावरण बन जायेगा। ऋषियों के अंहिसा, सत्य, प्रेम, न्याय के विचारों से प्रभावित क्षेत्र में हिंसक पशु भी अपनी हिंसा छोड़कर अहिंसक पशुओं के साथ विचरण करते थे।

जहाँ घृणा, द्वेष, क्रोध आदि से संबंधित विचारों का निवास होगा, वहाँ नारकीय परिस्थितियों का निर्माण होना स्वाभाविक है। मनुष्य में यदि इस तरह के विचार घर कर जायें कि मैं अभागा हूँ, दुःखी हूँ, दीन-हीन हूँ, उसका अपकर्ष कोई भी शक्ति रोक नहीं सकेगी। वह सदैव दीन-हीन परिस्थितियों में ही पड़ा रहेगा। इसके विपरीत मनुष्य में सामर्थ्य, उत्साह, आत्म-विश्वास, गौरवयुक्त विचार होंगे, तो प्रगति-उन्नति स्वयं ही अपना द्वार खोल देगी। सद्विवारों की सृजनात्मक शक्ति का उपयोग ही व्यक्ति को सर्वतोमुखी सफलता प्रदान करता है।


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