प्रतिभाओं की खोज, सम्मान और सुनियोजन का अभियान चले

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प्रतिभा एक दिव्य विभूति

प्रतिभा व्यक्तित्व की उस विशेषता का नाम है, जिसमें चिंतन को कर्त्तृत्व में बदलने की सूझबूझ योजनाओं को कार्यान्वित करने का साहस जुड़ा होता है। प्रतिभा संपन्न व्यक्ति आत्मविश्वास के धनी होते हैं। उन्हें खतरे उठाने में मजा आता है। सूझबूझ और हिम्मत की धनी प्रतिभावान एक बार जिस बात का निश्चय कर लेते हैं, जो ठान लेते हैं, उसके लिए जोश और होश को मिलाकर ऐसी चाल चलते हैं कि साधनों का अभाव और प्रतिकूलताओं का प्रभाव उनका कुछ बिगाड़ नहीं पाता। सफलता के लिए उन्हें उतावली नहीं  होती। वे उसके लिए पूरे जन्मभर प्रयत्न करते हुए अगले जन्म में सफलता मिलने तक के लिए भी तैयार रहते हैं। धैर्य, विवेक और साहस, इन तीन को जिन्होंने साथ ले लिया वे कठिन से कठिन मार्ग पर चल सकते हैं और अपने अद्भुत शौर्य से साथियों को चकित कर सकते हैं। प्रतिभा का यही स्वरूप है।

प्रतिभा की इस प्रवृत्ति को क्षत्रिय मनोवृत्ति कह सकते हैं। शूरवीर योद्धा यह जानते हुए भी कि लड़ाई के मोर्चे पर जान गँवानी पड़ सकती है, सदा मौत के साथ अठखेलियाँ करते रहते हैं, आँख मिचौनी खेलते रहते हैं। जीवन और मरण, सफलता और असफलता उन्हें खेल में हुई हारजीत से अधिक प्रभावित नहीं करती, क्योंकि शौर्य और साहस के प्रदर्शन का अपना एक अनोखा ही आनंद है।

ऐसे प्रतिभावन व्यक्तियों को सांसारिक प्रवृत्ति में, परमार्थ प्रयोजन में, संघर्ष-विद्रोह में, सृजन और संगठन में सदा महत्त्वपूर्ण स्थान पर पाया जाता है। वे बहुधा अकेले ही सूर्य, चंद्रमा की तरह चल पड़ते हैं। परिस्थितियाँ अनुकूल हैं या नहीं, यह नहीं देखते वरन यह जानते हैं कि चल पड़ने पर परिस्थितियों और गतिविधियों का किसी प्रकार तालमेल बैठ जाता है और कोई विधि-व्यवस्था ऐसी जरूर बैठ जाती है, जिसके आधार पर निर्वाह से लेकर लम्बी यात्रा तक के लिए सभी उपकरण अपने ढंग से अपने समय पर जुटते चले जाते हैं।

इन्हीं प्रतिभावानों को दूसरे शब्दों में मनस्वी या तेजस्वी कह सकते हैं। वे भला या बुरा; जो भी रास्ता अपनाते हैं, उसमें कुछ चमत्कार उत्पन्न करते हैं। ठग या डाकू का धंधा अपना लें तो भी चोटी की करतूतें कर दिखाते हैं और परमार्थ की दिशा में चल पड़ें तो इतिहास पर अपने चरण चिह्नों की अमिट छाप छोड़ते हैं। महापुरुषों में से प्रत्येक में अपने-अपने ढंग की योग्यता और रुचि की भिन्नता हो सकती है, पर प्रतिभा की पूँजी सबके पास रही होती है। उसके बिना तो बुझे दीपक की तरह सुयोग्य और सम्पन्न व्यक्ति भी निरीह, निस्तेज होकर एक कोने में पड़ा सड़ता रहता है।


मलाई बनकर तैरती हैं प्रतिभाएँ

दूध के कढ़ाई में उबलते ही उसका विश्लेषण आरंभ हो जाता है। घी वाला अंश मलाई बनकर ऊपर तैरने लगता है और खनिज पदार्थों वाला भाग नीचे पेंदे में जमा होकर जलने लगता है। समय की चुनौती सामने आने पर प्रतिभाएँ उछलकर ऊपर आ जाती हैं और क्षुद्रता का कूड़ा-करकट डरकर पेंदे में जा छुपता है। महाकाल उसकी दुर्गति बना दे यह बात दूसरी है, पर अपनी ओर से उनका प्रयास यही होता है कि किसी सुरक्षित तली में मुँह छिपाकर अपनी जान बचायें।

ऐतिहासिक भूमिका में आमंत्रण

युग परिवर्तन का इतिहास पिछली स्मृतियों के घटनाक्रम को पीछे छोड़कर विश्व का, मानव जाति का एक नया कायाकल्प सम्पन्न करने वाला और हर प्रकार से अनोखा होगा। इस रंगमंच पर प्रतिभाएँ ही अभिनय करेंगी। कायर तो कल्पना के धनी और बातों के मर्द होते हैं। इनका उपयोग आरंभिक भीड़भाड़ भरे प्रचार प्रयोजन तक ही सीमित रहता है। महत्त्वपूर्ण भूमिकाएँ तो दुःस्साहसी ही सम्पन्न करते हैं। यह ईश्वर प्रदत्त प्रतिभा अनुदान जिस किसी के पास जितनी भी मात्रा में हो, उसे छिपा-बचा कर न रखें। युग की यही पुकार है कि उसे तत्काल विश्वमानव के चरणों में भावभरी श्रद्धांजलि के रूप में प्रस्तुत करें।

हमें राष्ट्र की ठोस और सर्वतोमुखी प्रगति यदि सचमुच अपेक्षित हो और सच्चे मन से इसके लिए काम करना हो तो उसके लिए कटिबद्ध होना चाहिए और बौद्धिक, नैतिक एवं सामाजिक क्रांति का समग्र अनुष्ठान करना चाहिए। उसी प्रक्रिया का नाम युग निर्माण योजना है।

रेलगाड़ी की कतार में इंजन कौन सा है? यह आसानी से जाना जा सकता है। प्रतिभाएँ हर क्षेत्र में आगे रहती हैं और उन पर उत्तरदायित्वों का बोझ लदा होता है। ऐसे लोग पूर्ण जिम्मेदारियों में व्यस्त रहते हुए भी थोड़ा-सा ध्यान किसी ओर मोड़ दें तो उस दिशा में उतना कर सकते हैं, जितना सामान्य मनुष्य चिरकाल तक घिस-घिसकर करते रहने पर भी नहीं कर पाते। समय की महानतम समस्याओं में मूर्धन्य प्रश्न मनुष्य का भावनात्मक नवनिर्माण है। इसके लिए चल रहे प्रचंड अभियान में उनका योगदान रहना ही चाहिए।

अग्रगमन की असाधारण क्षमता

हमें हर क्षेत्र में विद्यमान प्रतिभाओं पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। प्रतिभाओं को हमें सादर आमंत्रित करना चाहिए और उनकी विभूति के साथ व्यक्तित्व को भी सम्मानित करना चाहिए। भले ही वे आज इस प्रयोजन में रुचि न ले सकें, पर कल यदि उनमें तनिक भी अभिरुचि पैदा की जा सकी तो असाधारण कार्य सम्पन्न होगा। नारद पचासों व्यक्तियों को उपदेश देते थे, पर जब वाल्मीकि के भीतर भरी असाधारण प्रतिभा को देखा तो वे उसके पीछे ही पड़ गये। स्वयं जोखिम उठाकर भी उसे बदलकर छोड़ा। शक्ति का प्रवाह जो दूसरी तरफ मुड़ा तो उधर भी चमत्कार कर दिखाया। डाकू था तो पहले नम्बर का, संत बना तो पहले नंबर का। प्रतिभाएँ सदा पहले नम्बर पर रहती हैं। सूरदास, तुलसीदास अपने पूर्व अध्याय में कामुकता में अग्रणी थे, संत बने तो भी अग्रणी रहे। अंगुलिमाल डाकू और अंबपाली वेश्या जब हेय थे तब उस क्षेत्र में भी प्रसिद्ध थे और पलटे तो बुद्ध के शिष्यों में अग्रिम मोर्चा सँभाल रहे थे।

युगनिर्माण का विशिष्ट अभियान

हमें प्रतिभाओं तक नवनिर्माण मिशन की रूपरेखा, कार्य पद्धति और संभावना पहुँचानी चाहिए। उनके पास किसी सहयोग की योजना का उद्देश्य लेकर नहीं, वरन मात्र अभियान का स्वरूप समझाने के लिए सम्पर्क बनाना चाहिए। यदि उनका झुकाव इस ओर मोड़ा जा सकता तो उनका परामर्श और चिंतन ही प्रयोजन की पूर्ति में बहुत सहायक सिद्ध हो सकता है।

प्रतिभाएँ सभी क्षेत्रों में मौजूद हैं। साहित्य, कला, व्यवसाय, चिकित्सा, विज्ञान, अध्यापन, संगठन, निर्माण जैसे कार्यों में वे अपनी तत्परता के कारण बहुत कुछ कर रहीं होंगी। कई बार यश और श्रेय लेने के झंझट में शक्ति का अनावश्यक अपव्यय देखकर निस्पृह व्यक्ति पीछे रहकर काम करना पसंद करते हैं और आगे दूसरों को रखते हैं। गाँधी जी काँग्रेस को चलाते थे पर उसके पदाधिकारी कभी नहीं रहे। अन्य क्षेत्रों में भी ऐसे लोग होते हैं। हमें पद से नहीं, गुण से मतलब है। इसलिए जहाँ भी प्रतिभा पड़ी हो, वहाँ से उसका रुख अपनी ओर भी मोड़ने का प्रयास किया जाना चाहिए और यदि उनका थोड़ा रुझान दिखाई पड़े तो उन्हें प्रस्तुत शत सूत्री कार्यक्रमों में से किसी हद तक अपनाने के लिए सहमत करना चाहिए।

प्रतिभा से रहित कोई व्यक्ति नहीं, प्रत्येक में उसका न्यूनाधिक अंश होता है, उसे टटोलना और बढ़ाना चाहिए। अपने इस प्रतिभा तत्व का एक बड़ा अंश नवनिर्माण अभियान को अग्रगामी बनाने में लगाने का प्रयास करना चाहिए। जिस लगन, सूझबूझ, मनोयोग और तत्परता के साथ प्रतिभाएँ अपने लाभदायक कार्यों में निरत रहती हैं, उसी तत्परता से लोकमंगल के इस सुव्यवस्थित और सुनियोजित आन्दोलन को सफल बनाने में उनकी भागीदारी हो तो युग परिवर्तन की संभावनाएँ साकार होते देर नहीं लगेगी।

वाङ्मय : 66/2.136 से संकलित-संपादित


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