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प्राणवान साधना
युगऋषि का एक प्रवचन, जो पुस्तिका के रूप में भी छप चुका है ‘‘साधना में प्राण आ जाये तो कमाल हो जाये’’ अधिकांश परिजनों ने पढ़ा-सुना होगा। उसका सार-संक्षेप यही है कि साधना क्रम में क्रिया, विचारणा और भावना का संतुलित समन्वय हो जाये तो साधना प्राणवान हो जाती है। उपासना क्रम में मंत्र जप एक क्रिया है। प्रत्येक नाम या मंत्र के साथ कोई श्रेष्ठ अवधारण-मान्यता जुड़ी रहती है। ‘शिव’ के साथ कल्याणकारी प्रवाह से जुड़ने की धारणा बननी चाहिए। दुर्गा जप के साथ अनीति निवारक शक्ति के सान्निध्य की धारणा करनी चाहिए। गायत्री मंत्र जप के साथ ऋतंभरा प्रज्ञा के बोध की धारणा बननी चाहिए। जप की क्रिया के साथ विचारपरक अवधारण न जुड़े तो जप तो एक स्थूल क्रिया भर रह जायेगी।
धारणा बन जाने से क्रिया और विचार का समन्वय हो जाता है। अब उसके साथ भावना को जोड़ने के लिए ध्यान का प्रयोग किया जाता है। इष्ट से प्रेम-स्नेह, आत्मीयता का बोध होने पर ध्यान बनता है। जब तक इष्ट के प्रति स्नेह-आत्मीयता का भाव न जुड़े, ध्यान से स्थिरता आ ही नहीं सकती। जहाँ स्नेह-अपनत्व की अनुभूति होती है, वहाँ मन रम जाता है। हृदय में हर्ष-उमंग की हिलोरें उठने लगती हैं। क्रिया और विचारणा-धारणा के साथ ध्यान का संयोग होते ही उपासना-साधना का संयोग होते ही उपासना-साधना प्राणवान हो जाती है।

ध्यान का सहज प्रवाह
परमात्मा ने मनुष्य को ध्यान की क्षमता स्वाभाविक रूप से दी है। छोटा अबोध बच्चा भी अपने आप में ध्यान मग्न हो जाता है तो अचानक कोई आहट होने पर चौंक जाता है। यह चौंकना उसकी ध्यान टूटने की प्रतिक्रिया भर होती है। सामान्य जीवन में किसी भी कार्य को ठीक प्रकार से करने के लिए उसे ध्यान के साथ ही करना पड़ता है। संगीतज्ञ संगीत पर, खिलाड़ी खेलने पर और वैज्ञानिक शोध कार्य पर ध्यान केन्द्रित न कर पाये तो उनकी वांछित प्रगति संभव नहीं होती। चलने या कोई वाहन चलाने में भी ध्यान चूका तो दुर्घटना कभी भी घट सकती है। कहने का सारांश यही है कि ध्यान की क्षमता मनुष्य के पास सहज है और ध्यान के स्तर के अनुरूप ही लौकिक एवं आध्यात्मिक प्रयोगों में सफलता का, प्रगति का स्तर बनता-बिगड़ता रहता है।
इष्ट प्रयोजन में ध्यान सहज लग जाता है। इष्ट का अर्थ है अति प्रिय। अपनी अंतरंग चाह के अनुरूप खिलाड़ी, संगीतकार एवं वैज्ञानिक अपने प्रिय विषय में ध्यानपूर्वक प्रवृत्त हो जाते हैं। उनकी अपनी-अपनी धरणाएँ होती हैं, जैसे- ‘‘मैं खिलाड़ी हूँ, संगीतकार हूँ, वैज्ञानिक हूँ। मुझे अपने कार्य में यह बात सिद्ध करनी है।’’
आध्यात्मिक प्रयोजनों में साधक की धारणा यह होनी चाहिए कि मैं परमात्मा का अंश हूँ। मुझे अपने चिंतन, चरित्र एवं व्यवहार को गुण-कर्म एवं स्वभाव से यह सिद्ध करना है। जप, पूजन, यज्ञादि कर्म अपने उसी चैतन्य स्वरूप को विकसित करने के लिए, उसको निखारने के लिए कर रहा हूँ। जो भी कर्मकाण्ड कर रहा हूँ, उनकी सार्थकता इसी में है कि मेरे व्यक्तित्व में मेरे इष्ट का प्रभाव, प्रकाश बढ़ा अथवा नहीं। यह धारणा पुष्ट होते ही हम उस रास्ते पर अभी कहाँ स्थित हैं और अगले चरण में किस स्तर तक पहुँचना है, यह चिंतन स्वतः उभरने लगता है। प्रिय के, इष्ट के निकट पहुँचने अथवा उसके अनुरूप बनने की योगबुद्धि साधक उसके लिए आवश्यक तप साधना में सहज प्रवृत्त कराने लगती है। योगबुद्धि के, इष्टप्रेम के नाते तप साधना के चरण फिर कष्टकारक नहीं लगते। इष्ट-लक्ष्य के निकट पहुँचने की अनुभूति का रस कठोर दिखने वाली तप साधना को भी सरस बना देता है। इसी प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए श्रीराम चरित मानस में, पार्वती जी के तप प्रसंग में संत तुलसीदास ने ठीक ही लिखा है-
नित नव चरण उपज अनुरागा,
बिसरी देह तपहि मन लागा।

पार्वती जी ने कठोर तप किया, किंतु तप के हर चरण की पूर्ति के साथ अपने शिष्यत्व की निकटता का बोध होता रहता है। अपने प्रिय इष्ट शिव के निकट यह तप पहुँचा रहा है, इस कारण उन्हें तप भी उतना प्रिय लगने लगा कि देह ही विसरने लगी। देहबुद्धि रहते देह के सुख हावी रहते हैं तथा आत्मबुद्धि जागते ही आत्मसुख प्रधान हो जाता है। धारणा और ध्यान की परिपक्वता साधक को इसी प्रकार लौकिक सुखों से ऊपर उठाकर पारलौकिक आनंद में स्थापित कर देती है। उपासना क्रम में इनका स्तर बढ़ता रहता है और फिर वह जीवन साधना में फलित होने लगता है।

युगऋषि के निर्देशों को साधें
युगऋषि ने अनेक प्रकार के ध्यान अपनी वाणी से कराये हैं। ये वास्तव में बड़े अद्भुत और प्रभावशाली हैं, फिर भी उनके प्रभाव अधिकांश साधकों के जीवन में दिखाई नहीं देते। इनका कारण क्या है?
अधिकांश साधकगण उनके ध्यान को भी एक कर्मकाण्ड मानकर उनके ध्यान निर्देशों को सुनते भर रहते हैं। कोई प्रशिक्षक (कोच) यदि खिलाड़ियों को अभ्यास के सूत्र समझाये, खिलाड़ी उन्हें रिकॉर्ड करके सुनते रहें तो क्या उनके खेल का स्तर ऊँचा हो जायेगा? बात तो तब बनेगी, जबकि खिलाड़ी उन निर्देशों को सुनें-समझें, आत्मसात करें तथा उसके अनुरूप अपने कौशल और अभ्यासों को ढालें। ध्यान के साधकों को भी यही विधान, रीतिनीति अपनानी होगी। युगऋषि के ध्यान निर्देशों को सुनें, समझें और क्रमशः एक-एक चरण का अभ्यास करें। जो पूरी तत्परता से, ईमानदारी से अभ्यास करते हैं, उन्हें गुरु के शक्ति प्रवाह के अनुदान भी मिलते हैं। आध्यात्मिक प्रगति में गुरु के अनुदानों की विशेष भूमिका होती है, किंतु वे मिलते उन्हीं को हैं, जो अपना पूरा मनोयोग और पुरुषार्थ लगाकर अभ्यास क्रम बनाते रहते हैं।
युगऋषि ने अनेक प्रकार के ध्यान कराये हैं, जैसे तीनों शरीरों का, पंच कोशों का, षट्चक्र एवं कुण्डलिनी का, ज्योति अवधारणा का, रस वर्षण आदि। उन सबके प्रारंभ में उन्होंने ध्यान धारणा में प्रवेश के सूत्रों को स्पष्ट किया हैं। वे है क्रमशः
* ध्यान मुद्रा * दिव्य वातावरण * पात्रता शोधन * इष्ट से एकात्मता का बोध। यदि उक्त प्ररंभिक सूत्रों को हृदयंगम करके अभ्यास का क्रम चलाया जाये तो उपासना तथा जीवन साधना; दोनों के ही उच्चस्तरीय लाभों को प्राप्त किया जा सकता है। यहाँ उनके ही कुछ व्यावहारिक क्रमों पर चर्चा की जा रही हैं।
ध्यान मुद्रा
हमें जो काम करना होता है, उसके लिए उसके अनुरूप मुद्रा में आना पड़ता है। पढ़ने की मुद्रा, दौड़ने की मुद्रा, विश्राम की मुद्रा, आक्रमण या आत्मरक्षण की मुद्रा। इसी तरह जप एवं ध्यान के लिए भी उसके अनुरूप मुद्रा में आना जरूरी होता है।
    शरीर को ऐसी मुद्रा में स्थापित करना होता है, जिसे सहज क्रम से ध्यान की अवधि तक बनाये रखने में कठिनाई न हो। इसी के साथ यह भी ध्यान रखना पड़ता है कि काया को शान्त करने के क्रम में कहीं तंद्रा में न चले जायें। बाहर शान्ति के साथ अन्दर जागरूकता बनी रहे। ध्यान प्रयोग के क्रम में काया में जो ऊर्जा का संचार हो, उसमें कोई व्यवधान न आये। काया शान्त रहे और मन, बुद्धि, चित्त भी अपने संस्कारों के उपयोग के भाव में न रहे, सबको इष्ट के प्राण प्रवाह में विसर्जित करने के भाव में रहे। इस प्रकार यदि बाहर-अन्दर ध्यान मुद्रा बन जाये तो आगे का क्रम सहज सधता रह सकता है।
दिव्य वातावरण
सामान्य अवस्था में साधक सांसारिक वातावरण को ही अनुभव करता रहता है। किन्तु यह जो दृश्य वातावरण है, इसके पीछे कण-कण में व्याप्त परमात्म चेतना का प्रवाह ही सबका आधार है। रेडियो या टेलीविजन पर भले ही स्थूल दृश्य एवं शब्द उभरते हैं, किन्तु वास्तव में उनके पीछे सूक्ष्म प्रसारण ही सक्रिय होते हैं। हम सृष्टि की लौकिकता से प्रभावित होकर सृष्टा की अलौकिकता को भूलने लगते हैं। इसीलिए उससे संपर्क नहीं बना पाते।
    युगऋषि ने ध्यान प्रयोग चूँकि शान्तिकुञ्ज में कराये, इसलिए उन्होंने शान्तिकुञ्ज की दिव्यता की ओर ध्यान आकर्षित किया। साधक चाहें तो भावनात्मक रूप से स्वयं को शान्तिकुञ्ज में स्थित होने का भाव कर सकते हैं अथवा जहाँ वे हैं, वहीं सूर्यदेव से, हिमालय से, गुरु या इष्ट के प्रतीकों से दिव्य प्रवाह प्रकट होकर सर्वत्र व्याप्त होने का भावबोध कर सकते हैं। आवश्यक यह है कि साधक अपने को परमात्मसत्ता, ऋषिसत्ता, गुरुसत्ता के दिव्य प्रवाह से घिरा हुआ अनुभव करें। जैसे जल में तैरती मछली के चारों ओर जल, हवा में उड़ते पक्षी के सभी ओर वायु होती है, इसी तरह ध्यान साधक को अपने चारों ओर दिव्य ऊर्जामय, दिव्य प्रकाशमय, दिव्य भाव सम्पन्न वातावरण का बोध करना चाहिए। यह भाव करना चाहिए कि इस दिव्य वातावरण में इष्ट की दिव्य गोद में बैठे हम उस दिव्यता को अपने स्थूल, सूक्ष्म व्यक्तित्व में भली प्रकार से संचारित होने देने के लिए जप-ध्यान आदि कर रहे हैं। 
पात्रता शोधन
इष्ट और गुरु के अनुग्रह से जो दिव्य प्रवाह हमारे चारों ओर लहरा रहा है, उसे हमें अपने व्यक्तित्व के कण-कण में समाहित करना है। इसके लिए स्वयं को खाली और ग्रहणशील बनाना है।
भाव करें कि हे गुरुदेव! हम आपके निर्देशन में इस दिव्य प्रवाह को आत्मसात करने के लिए बैठे हैं। हमारे अंदर यह भली प्रकार स्थापित हो सके, इस हेतु हमें भीतर से खाली होने में सहयोग दें। गुरु हमारे सबसे बड़े हितैषी हैं, जो कुछ करेंगे, हमारे हित के लिए, कल्याण के लिए ही करेंगे। इसलिए सब कुछ उन्हें सौंपकर भीतर से खाली होने का प्रयास करें। वासना, तृष्णा, अहंता, उद्विग्रता सब उन्हें सौंप दें।
अपनी सारी कामनाएँ उनके सामने रख दें, अपने अंदर के भले-बुरे विचार उनके सामने उड़ेल दें। जिनसे मोह है, जिनसे द्रोह है, उन सभी को भी उन्हें सौंप दें। निवेदन करें कि अब जो आपके अनुसार हमारे लिए हितकर हो, उस प्रवाह को हमारे अंदर प्रवाहित करने की कृपा करें। हम अपने श्वास-प्रश्वास जप के माध्यम से उसे अपने व्यक्तित्व के कण-कण तक ले जाने का प्रयास कर रहे हैं। हम जब ध्यान से बाहर निकलेंगे तो नये व्यक्तित्व के साथ निकलें, ऐसी कृपा करें।
समर्पण-एकात्मता
उसके बाद स्वयं को उस दिव्य प्रवाह में डूबा हुआ अनुभव करें। उस दिव्य प्राण प्रवाह में समर्पण, विसर्जन, विलय का भाव करें। जैसे समिधा और हवन सामग्री जब यज्ञ के लिए समर्पित होती है, तो किसी आम प्रयोजन में उसे नहीं लगाया जाता। भाव करें कि हमारे व्यक्त्तिव की सारी विशेषताएँ इष्ट के लिए, उनके द्वारा सौंपे गये दिव्य कार्यों के लिए है।
फिर जब समिधा या सामग्री हवन कुण्ड में विसर्जित कर दी जाती है तो उसका रूपांतरण शुरू हो जाता है। भाव करें कि हमारे व्यक्तित्व पर जो संसार का प्रभाव था, वह समाप्त हो रहा है तथा वह सब इष्ट के अनुरूप आदर्श रूप में परिवर्तित हो रहा है।
यहीं से विलय का क्रम शुरू हो जाता है। समिधा या हवन सामग्री अग्रिरूप हो जाती है, और यज्ञ की ज्वालाओं में, यज्ञकुण्ड से उमड़ने वाली ऊर्जा को समिधा एवं सामग्री के गुण मिल जाते हैं। एकत्व-अद्वैत्व का बोध होने लगता है।
ध्यान से वापसी
इस अवस्था में स्वयं को जितनी देर तक रख सकें, रखें। जब समापन करना हो तो भाव करें कि गुरुकृपा-ईश अनुग्रह से हमें यह दिव्य लाभ प्राप्त हुआ। अब हम इस दिव्यता को अपने चिंतन, चरित्र एवं व्यवहार में स्थापित करने के लिए पुनः अपने स्थूल अस्तित्व में वापस होते हैं। प्रार्थना करें-हे परमात्मा! हे गुरुवर!! हमने जो प्रकाश का बोध किया है वह कायम रहे, हम पुनः अज्ञान के अंधेरे में न भटकें। (तमसोमाऽज्योतिर्गमय) हे प्रभो! हमने जिस सत तत्व का अनुभव किया है, वह अब हमें असत से प्रभावित न होने दे। (असतो मा सद्गमय) हे स्वामी! हमने जिस आनंद का बोध किया है, वह हमें नश्वर पदार्थों के आकर्षणों में न फँसने दे। (मृत्योर्माऽमृतंगमय) इस प्रकार प्रार्थना करके ओंकार ध्वनि या किसी वंदना का भाव करते हुए सहज स्थिति में आयें।
उपासना काल में जो दिव्यता अनुभव की है, उसे जीवन के सहज क्रम में भी बनाये रखने का प्रयास करें। इससे जीवन साधना प्रखर बनती है और कर्म स्वयं में आराधना वाले लगते हैं।


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