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आदमी की वास्तविक कीमत है उसका व्यक्तित्व। वजनदार व्यक्तित्व वाले व्यक्ति दुनिया की फिजाँ को बदलते हैं। वे देवताओं को अनुदान बरसाने के लिए मजबूर करते हैं। व्यक्तित्व एक बेशकीमती दौलत है, यह तथ्य आप समझिए। व्यक्तित्व सम्मान दिलाता है, सहयोग प्राप्त कराता है। गाँधी को सम्मान मिला, क्योंकि उनके पास वजनदार व्यक्तित्व था। वजनदारों में बुद्ध को शामिल कीजिए। वे पढ़े-लिखे थे कि नहीं, किंतु वजनदार थे। हजारों सम्राटों ने, दौलतमंदों ने उनके सामने थैलियाँ खाली कर दीं। बुद्ध ने जो माँगा वह उन्होंने दिया। 
    व्यक्तित्व श्रद्धा से बनता है। श्रद्धा, अर्थात् सिद्धान्तों व आदर्शों के प्रति अगाध निष्ठा व विश्वास। आदमी आदर्शों के लिए मजबूत हो जाता है तो व्यक्तित्व ऐसा वजनदार बन जाता है कि देवता तक नियंत्रण में आ जाते हैं। विवेकानन्द ने रामकृष्ण परमहंस की शक्ति पाई क्योंकि स्वयं को वे वजनदार बना सके। भिखारी को दस पैसे मिलते हैंं। कीमत चुकाने वाले को, वजनदार व्यक्तित्व वाले को सिद्ध पुरूष का आशीर्वाद मिलता है।
    यदि आप किसी आशीर्वाद की कामना से, देवी-देवता की सिद्धि की कामना से यहाँ आए हैं तो मैं आपसे कहता हूँ कि आप अपने व्यक्तित्व को विकसित कीजिए, ताकि आप निहाल हो सकें। दैवी कृपा मात्र इसी आधार पर मिल सकती है और इसके लिए माध्यम है-श्रद्धा। श्रद्धा मिट्टी से गुरू बना लेती है। पत्थर से देवता बना देती है। मीरा का गिरधर गोपाल चमत्कारी था। विषधर साँपों की माला, जहर का प्याला उसी ने पी लिया व भक्त को बचा लिया। मूर्ति में चमत्कार आदमी की श्रद्धा से आता है। श्रद्धा ही आदमी के अन्दर से भगवान् पैदा करती है।
    आप चाहते हैं कि आपको कुछ मिले, तो वजन उठाइए। हम आपको मुफ्त नहीं देना चाहते, क्योंकि इससे आपका अहित होगा। वह हम चाहते नहीं। आप हमारा कहना मानें तो हम देने को तैयार हैं। गुरू-शिष्य की परीक्षा एक ही है कि अनुशासन कितना मानते हैं? हम आपके शिष्य हैं, ऐसा कहें और मानें भी। समर्थ ने अपने शिष्य की परीक्षा ली थी व सिंहनी का दूध लाने को कहा था, अपनी आँख की तकलीफ का बहाना करके। सिंहनी कहाँ थी? वह तो हिप्नोटिज्म से एक सिंहनी खड़ी कर दी थी।  शिवाजी का संकल्प दृढ़ था। वे ले आए सिंहनी का दूध व अक्षय तलवार का उपहार गुरू से पा सके। राजा दिलीप की गाय को जब मायावी सिंह ने पकड़ लिया तो उन्होंने स्वयं को सौंप दिया। इस स्तर का समर्पण हो, तो ही गुरू की शक्ति-दैवी अनुदान मिलते हैं। यह आस्थाओं का इम्तिहान है, जो हर गुरू ने अपने शिष्य का लिया है।
    हमारे गुरू ने अनुशासन की कसौटी पर कसकर हमें परखा है तब दिया है। हमारे जीवन की हर उपलब्धि उसी अनुशासन की देन है। वेदों के अनुवाद से लेकर ब्रह्मवर्चस के निर्माण तथा चार हजार शक्तिपीठों को खड़ा करने का काम एक ही बलबूते हुआ। गुरू ने कहा-कर। हमने कहा- ‘‘करिष्ये वचनं तव’’। गुरू श्री कृष्ण के द्वारा गीता सुनाए जाने पर शिष्य अर्जुन ने यही कहा कि सारी गीता सुन ली। अब तो आप कहेंगे, वही करूँगा। अगर आप कुछ पाना चाहते हैं, तो आपको भी वही करना चाहिए।
मुर्गे बनकर हम भी करें
नवप्रभात का उद्घोष

    भगवान का नया अवतार होने जा रहा है। आज की परिस्थितियों के अनुरूप है यह अवतार। जब-जब दुष्टता बढ़ती है, तब-तब देशकाल की परिस्थितियों के अनुरूप भगवान अवतार के रूप में जन्म लेते हैं। आज आस्थाओं में, जन-जन के मन-मन में असुर घुस गया है। इसे विचारों की विकृति कह सकते हैं। एक किश्त आज के अवतार की आज से 2500 वर्ष पूर्व बुद्ध के रूप में, विचारशीलता के रूप में आई थी। वही प्रज्ञा की, विवेक की, विचारों की किश्त अब पुनः आई है। वह है गायत्री मंत्र, ऋतंभरा प्रज्ञा के रूप में।
    यह अवतार जो आ रहा है, विचारों के संशोधन के रूप में दिमागों में ही नहीं, आस्थाओं में भी हलचलें पैदा करेगा। विचार क्रांति के रूप में जो आ रही है, वह युगशक्ति गायत्री है। यह गायत्री हिंदुस्तान मात्र की नहीं, सारे विश्व की है। नये विश्व की माइक्रोफिल्म इसमें छिपी पड़ी है। यदि आपको यह बात समझ में आ गई, तो आप हमारे साथ नवयुग का स्वागत करने में जुट जाएँगे।
    हम अपने लिए एक ही नाम बताते हैं-मुर्गा। मुर्गा वह, जो प्रभात के आगमन का उद्घोष करता है। गायत्री ने हमें फिर मुर्गा बना दिया है। आइए जोर से उद्घोष करें कि नवप्रभात आ रहा है, नयायुग आ रहा है, युगशक्ति का अवतरण हो रहा है, कुकुडू...कूँ ...।
    हम गायत्री की फिलॉसफी व युग के देवता-विज्ञान की बात आपको बताते हैं। यह ब्रह्मविद्या घर-घर पहुँचे, इसमें आप सबका सहयोग चाहते हैं। जैसे सेतुबंध के लिए, गोवर्धन उठाने के लिए अवतारों को सहयोग मिला, हम भी चाहते हैं कि आप भी इस प्रवाह में सम्मिलित हो जायें। आपको भी बाद में लगेगा कि हम भी समय पर जुड़ गये होते तो अच्छा रहता।
    युगशक्ति का उदय एवं अवतरण हो रहा है। आप इस अवतरण में एक हाथ भर लगा दें। आपकी भी गणना युगान्तकारी पुरुषों में होने लगेगी। आप समय दीजिए, पैसा दीजिए। यह सोचकर नहीं कि हमारा काम रुकेगा। आप अपनी श्रद्धा को परिपक्व करने के लिए जो भी कर सकें वह कीजिए। हमें गुरुदीक्षा से मतलब है। घर-घर, जन-जन तक गायत्री का सद्ज्ञान पहुँचाने का काम करना है। दवा तो हमारे पास है, आस्थाओं में छाई विषाक्तता की। आप मात्र सुई बन जाइये। आज के दिन सम्पूर्ण समर्पण की, युग देवता के काम के लिए खपने की मैं आपसे अपेक्षा रखता हूँ। आशा है आप मेरी इच्छा पूरी करेंगे।


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