ब्राह्मी चेतना के साथ तादात्म्य कराने में समर्थ गायत्री महामंत्र

Published on 2015-05-17
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गायत्री महात्म्य 

गायत्री महामंत्र एक अगाध सागर है, जिसके गर्भ में छिपे हुए रत्नों का पता लगाना सहज कार्य नहीं है। इस महासागर में से सभी ने अपनी- अपनी प्रज्ञा, योग्यता और आकांक्षा के अनुसार रत्न निकाले हैं, पर उस अक्षय भण्डार का पार किसी को भी नहीं मिला है। गायत्री के एक- एक अक्षर और एक- एक पद में कितना गहरा ज्ञान सन्निहित है, इसका पता लगाते हुए जो जितना ऊँचा विद्वान् है, उसे उतनी ही कठिनाई होती है। अनेक ऋषि महर्षियों ने गायत्री मंत्र के प्रत्येक अक्षर पर विशेष व्याख्याएँ की हैं और अपने- अपने दृष्टिकोण के अनुसार गायत्री के पदों के अर्थ निकाले हैं। वे अर्थ इतने अधिक विस्तृत और इतने मर्मपूर्ण हैं कि इन थोड़ी पंक्तियों में उनका खुलासा प्रकट नहीं किया जा सकता। यहाँ गायत्री मंत्र का सर्वसुलभ अर्थ संक्षिप्त रूप से लिखा जा रहा है। आइए पहले गायत्री मंत्र के एक- एक शब्द का अर्थ करें |

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
ॐ- ब्रह्म, भूः- प्राण स्वरूप, भुवः- दुःख नाशक, स्वः- सुख स्वरूप, तत्- उस, सवितुः- तेजस्वी, प्रकाशवान्, वरेण्यं- श्रेष्ठ, भर्गो- पाप नाशक, देवस्य- दिव्य को देने वाले को, धीमहि- धारण करें, धियो- बुद्धि को यो- जो, नः- हमारी, प्रचोदयात्- प्रेरित करे।

गायत्री मंत्र का अर्थ है- उस सुख स्वरूप, दुःखनाशक, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप ब्रह्म को धारण करते हैं जो हमारी बुद्धि को (सन्मार्ग पर चलने की) प्रेरणा देता है।

गायत्री के तीन चरण

इस अर्थ का विचार करने से उसके अंतर्गत तीन तथ्य प्रकट होते हैं। - ईश्वर के दिव्य गुणों का चिंतन, - ईश्वर को अपने अन्दर धारण करना, - सद्बुद्धि की प्रेरणा के लिए प्रार्थना। यह तीनों ही बातें असाधारण महत्त्व की हैं।

मनुष्य जिस दिशा में विचार करता है, जिन वस्तुओं का चिंतन करता है, जिन तत्वों का ध्यान करता है, वह सब धीरे- धीरे उस चिंतन करने वाले की मनोभूमि में स्थित होते और वृद्धि को प्राप्त करते जाते हैं। विचार विज्ञान का सारभूत सिद्धान्त हमें समझ लेना चाहिए कि जिन बातों पर चित्त को एकाग्र करेंगे, उसी दिशा में हमारी मानसिक शक्तियाँ प्रकाशित होने लगेंगी। वे अपनी अद्भुत सामर्थ्यों के द्वारा सूक्ष्म लोकों में से ऐसे- ऐसे साधन और उपकरण पकड़ लाती हैं, जिनके आधार पर उसी चिंतन की दिशा में मनुष्य को नाना प्रकार की गुप्त- प्रकट, दृश्य- अदृश्य सहायताएँ मिलती हैं और उस मार्ग में सफलताओं का ताँता लग जाता है। ध्यान योग की महिमा किसी से छिपी नहीं है।

दिव्य गुणों का सिंचन

गायत्री मंत्र के प्रथम भाग में ईश्वर के कुछ ऐसे गुणों का चिंतन है जो मानव- जीवन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। आनन्द, दुःख का नाश, श्रेष्ठता, तेज, निर्भयता एवं आत्मा की सर्वव्यापकता, ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की मान्यता पर जितना भी ध्यान एकाग्र किया जायेगा, मस्तिष्क इन तत्त्वों की अपने में वृद्धि करेगा। मन इनकी ओर आकर्षित होगा, अभ्यस्त बनेगा और उसी आधार पर काम करेगा। आत्मा की सच्चिदानन्द स्थिति का चिंतन, दुःख- शोक रहित ब्राह्मी स्थिति का चिंतन, श्रेष्ठता, तेजस्विता और निर्मलता का चिंतन, आत्मा की सर्वव्यापकता का चिंतन यदि गहरी अनुभूति और श्रद्धापूर्वक किया जाय, तो आत्मा एक स्वर्गीय दिव्य भाव से ओतप्रोत हो जाती है। आत्मा इस दिव्य आनन्द को विचार क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रखती, वरन् क्रिया में लाकर इसका सुदृढ़ आनंद भोगने की ओर कदम उठाती है।

धारण करने की प्रतिज्ञा

गायत्री मंत्र के दूसरे भाग में उपर्युक्त गुणों वाले तेज पुंज को, परमात्मा को, अपने में धारण करने की प्रतिज्ञा है। इन दिव्य गुणों वाले परमात्मा का चिंतन मात्र किया जाय सो बात नहीं, वरन् गायत्री की आत्मा का सुदृढ़ आदेश है कि उस ब्रह्म को, उस दिव्य गुणसम्पन्न परमात्मा को, अपने अंदर धारण करें। उसे अपने रोम- रोम में ओतप्रोत कर लें। परमात्मा को अपने कण- कण में व्याप्त देखें और ऐसा अनुभव करें कि उन दिव्य गुणों वाला परमात्मा हमारे भीतर बाहर आच्छादित हो गया है। उन दिव्य गुणों में, उस ईश्वरीय सत्ता में अपना ‘अहम्’ पूर्ण स्वरूप से निमग्न हो गया है। इस प्रकार की धारणा से जितने समय तक मनुष्य ओत- प्रोत रहेगा, उतने समय तक उसे भूलोक में रहते हुए भी ब्रह्मलोक के आनन्द का अनुभव होगा। यह अनुभव इतना गम्भीर है कि आगामी जीवन में बाह्य आवरणों में उसका प्रभाव पड़े बिना नहीं रहता। उसमें सात्विक तत्वों की मंगलमयी अभिवृद्धि न हो, ऐसा नहीं हो सकता।

सद्बुद्धि की प्रार्थना

गायत्री मंत्र के तीसरे भाग में परमात्मा से प्रार्थना की गई है कि वह हमारे लिए सद्बुद्धि की प्रेरणा प्रदान करें। हमें सात्विक बुद्धि प्रदान करें। हमारे मस्तिष्क को कुविचार, कुसंस्कार, नीच वासनाओं से, दुर्भावनाओं से छुड़ा कर सतोगुणी ऋतम्भरा बुद्धि से, विवेक से, सद्ज्ञान से पूर्ण करें। 


इस प्रार्थना के अंतर्गत बताया गया है कि प्रथम भाग में बताये हुए दिव्य गुणों को प्राप्त करने के लिए दूसरे भाग में बताई गई ब्रह्म धारणा करें। तीसरे भाग में उपाय बता दिया गया है कि अपनी बुद्धि को सात्विक बनाओ, आदर्शों को ऊँचा उठाओ, उच्च दार्शनिक विचारधाराओं में रमण करो और अपनी तुच्छ तृष्णा एवं वासनाओं के इशारे पर नाचते रहने वाली कुबुद्धि को मानस लोक में से बहिष्कृत कर दो। जैसे- जैसे बुद्धि से कल्मष दूर होगा, वैसे ही वैसे दिव्य गुण सम्पन्न परमात्मा के अंशों की अपने आप वृद्धि होती जायेगी और उसी अनुपात से लौकिक और पारलौकिक आनन्दों की अभिवृद्धि भी होती जायेगी।

धर्म शास्त्रों का सार- गायत्री

गायत्री मंत्र के गर्भ में सन्निहित उपर्युक्त तथ्य में ज्ञान, कर्म, उपासना- तीनों हैं। सद्गुणों का चिंतन ही ज्ञान है। ब्रह्म की धारणा कर्म है और बुद्धि की सात्विकता, अभीष्ट प्राप्ति की क्रिया प्रणाली एवं उपासना है। वेदों की समस्त ऋचाएँ इस तथ्य को सविस्तार प्रकट करने के लिए प्रकट हुई हैं। वेदों में ज्ञान, कर्म और उपासना यह तीनों विषय हैं। गायत्री के बीज का वर्णन व्यावहारिक, संक्षिप्त एवं सर्वांगपूर्ण है। इस तथ्य को, इस बीज को सच्चे हृदय से निष्ठा और श्रद्धा के साथ अन्तःकरण में गहरा उतारने का प्रयत्न करना ही गायत्री की उपासना है। इस उपासना से साधक का सब प्रकार कल्याण ही कल्याण है।

परमात्मा की प्रार्थना का सर्वोत्तम मंत्र गायत्री है। उसमें ईश्वर से वह वस्तु माँगी गई है, जो इस संसार में इस जीवन में सर्वोपरि महत्व की है। ‘‘बुद्धि की सन्मार्ग की ओर प्रगति’’ यह इतना बड़ा लाभ है कि इसे प्राप्त करना ईश्वर की कृपा का प्रत्यक्ष चिह्न माना जा सकता है। इस मंत्र के द्वारा ऋषियों ने हमारा ध्यान इस ओर आकर्षित किया है कि सबसे बड़ा लाभ हमें इसी की प्राप्ति में मानना चाहिए। गायत्री की प्रतिष्ठा का अर्थ सद्बुद्धि की प्रतिष्ठा है। गायत्री का मार्ग अपनी बुद्धि को शुद्ध करना है, उसमें से दूषित दृष्टि को हटाकर दूरदर्शितापूर्ण दृष्टिकोण की स्थापना करना है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए परमात्मा की सहायता के निमित्त इस मंत्र में प्रार्थना की गई है। 

गायत्री में परमात्मा को जिन गुणों के साथ संबोधित किया गया है, वे गुण मनुष्य जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। सविता, वरेण्यं, भर्ग, देव- इन चार शब्दों में तेजस्वी, प्रतिभावान, शक्तिशाली, श्रेष्ठ, संयमी, सेवाभावी बनने की शिक्षा है। परमात्मा इन गुणों वाला है। यही गुण गायत्री उपासक में आयें, इसलिए उनकी ओर इस मंत्र में संकेत किया गया है। इन विशेषणों के साथ बार- बार परमात्मा को स्मरण करने से इन गुणों की छाया बार- बार मन पर पड़ती है और वैसा ही संस्कार मन पर जमता है। इस प्रकार गायत्री- उपासक श्रेष्ठताओं को अपनाने के लिए प्रस्तुत एवं अग्रसर होता है।

यह तो गायत्री का स्थूल अर्थ है। सूक्ष्म रूप से देखा जाये तो इन चौबीस अक्षरों में इतने सारगर्भित रहस्य छिपे हुए हैं कि उनके उद्घाटन से संसार की समस्त विद्याएँ, कलाएँ, शक्तियाँ एवं सम्पदाएँ करतलगत हो सकती हैं।

वाङ्मय खण्ड ‘गायत्री साधना का गुह्य विवेचन
(पृष्ठ २.३१ से २.३३)’, से संकलित, संपादित  


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