हर व्यक्ति और समाज की बुनियादी आवश्यकता है गायत्री योग

Published on 2015-05-21

गायत्री उपासना अपने आप में समग्र सर्वांगपूर्ण है। अन्य उपासनाओं को मत, सम्प्रदाय एवं परम्परागत मान्यताओं के कारण ख्याति भले ही मिल गयी हो, पर इनमें समग्रता के तत्त्व कम ही पाये जाते हैं। दूध तो अन्य पशुओं का भी उपयोगी ही होता है, पर गाय के दूध में लगभग वे ही विशेषताएँ पायी जताती हैं जो नारी के दूध में होती हैं। इसलिए किसी पक्षपात के कारण नहीं, गुणों के कारण ही गौ- दुग्ध को प्रमुखता दी जाती है। गायत्री उपासना के सम्बन्ध में भी यही बात है। 

भूमि को जोतना तो हर हाल में आवश्यक है। इसके उपरांत बीज बोने में भिन्नता भी रखी जा सकती है। कपड़े का रंग अलग- अलग हो सकता है, लेकिन उसे रंगने से पहले धुलाई तो हर कपड़े की जरूरी है। उसी प्रकार गायत्री को भूमि शोधन- आत्मशोधन का प्रथम प्रयोजन पूर्ण करने वाली माना गया है। इसलिए अन्यान्य उपासनाओं में रुचि लेने वाले साधकों तक के लिए शास्त्र का परामर्श यह है कि वे गायत्री उपासना को तो अपनाये ही रहें, इसके अतिरिक्त वे अन्यान्य देवोपासना भी कर सकते हैं। 

उपासना :: प्रयोजन और स्वरूप

उपासना के बाह्य स्वरूप को देखकर भ्रम होता है कि यह किसी देवता से कुछ याचना करने के लिए गिड़गिड़ाने जैसी कोई प्रक्रिया है। यह भी भ्रम होता है कि देवताओं की मनोवृत्ति प्रशंसा और उपहार पाकर प्रसन्न हो जाने और बदले में उपासक को मनचाहा देने लगने जैसी है। यह दोनों ही मान्यताएँ भ्रमपूर्ण हैं।

उपासना किसी दूसरे की नहीं, वस्तुतः: अपने ही अंतराल की करी जाती है। वस्तुतः: उपासना का उपचार व्यक्तित्व के अंतराल की गहरी पर्तों को प्रभावित करता है और भाव संस्थान में उत्कृष्ट तत्त्वों का आरोपण- अभिवर्धन करते हुए साधक की आत्मसत्ता में प्रखरता भर देता है। भीतर से संत उगता है तो बाहर उसका विस्तार सिद्ध रूप में  परिलक्षित होता है। 

उपासना के अंतर्गत दैनिक संध्यावंदन तो आत्मोत्कर्ष का नित्यकर्म है। उससे आगे जब उच्च स्तरीय साधनाओं की प्रक्रिया आरम्भ होती है तो उसमें दो धाराएँ उभरती हैं। इन्हें अंतराल के हिमालय से निकलने वाली गंगा- यमुना कहा गया है, इसका नाम है- १.योग और २.तप। इसका समागम जिस बिन्दु पर होता है वहाँ एक नई अव्यक्त एवं अविज्ञात धारा सरस्वती के रूप में प्रकट होती है और तीर्थराज प्रयाग का माहात्म्य प्रत्यक्ष होने लगता है। योग और तप की दिव्य धाराओं का मिलन जहाँ भी  हो रहा होगा वहाँ सिद्धियों की अधिष्ठात्री आत्मशक्ति का नया उपहार उपलब्ध होगा। 

योग का तत्त्वदर्शन

योग साधना के नाम पर चलने वाले आम क्रिया- कृत्यों को देखने पर मोटी दृष्टि आमतौर पर भ्रमग्रस्त होती है और उन्हें कोई जादुई खिलवाड़ जैसी कौतूहलवर्धक हरकत मान बैठती है। इन कृत्यों को ही सबकुछ समझ लिया जाता है और उन्हें ही सीखने- सिखाने पर सारा ध्यान केन्द्रित किया जाता है। क्रियाओं के पीछे छिपे तत्त्वदर्शन और उनकी चमत्कारी शक्ति के उद्गम स्रोत की ओर ध्यान ही नहीं जाता। उथले शारीरिक प्रयत्न ही साधना बनकर रह जाते हैं। फलत: उनकी स्थिति प्राण- रहित शरीर जैसी, तेल रहित मोटर जैसी उपहासास्पद बनकर रह जाती है। साधकों का उत्साह कुछ ही दिन में ठंडा पडऩे लगता है। लेकिन जो वास्तविकता समझते हैं और साधना विज्ञान को आत्म- परिष्कार की सुनिश्चित पद्धति मानते हैं, उनकी साधना प्राय: निष्फल होती नहीं देखी जाती। 

मनुष्य का स्वभाव साधारणतया पानी की तरह निम्रगामी रहता है। पशु- प्रवृत्तियों का अभ्यास ही जीव की चिरसंचित सम्पदा है। उसी में रमण करने, रस लेने की सहज रुचि रहती है। वासना, तृष्णा और अहंता की खुमारी चढ़ी रहती है। इस स्थिति को उलटने से ही उत्कृष्टता की ओर उभरना, उछलना संभव हो सकता है। इन्हीं प्रयोजनों के लिए योग एवं तप की समूची विधि- व्यवस्था, क्रिया- कलाप, रीति- नीति का निर्माण- निर्धारण किया गया है। योग से मनःसंस्थान को और तप से शरीर तंत्र को उच्च स्तरीय गतिविधियों में रुचि लेने के लिए सहमत कर लेना ही साधना विज्ञान का एकमात्र लक्ष्य है। 

योग साधना की सच्ची सिद्धि 

योग का अर्थ है जोडऩा। आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़ देना ही योग है। उपासना में चिंतन के द्वारा ईश्वर के समीप पहुँचने एवं घनिष्ठ बनाने के लिए भक्तिभावना को विकसित करना होता है। इस घनिष्ठता को योग कहते हैं।

ध्यान के समय किसी शरीरधारी या प्रकाश प्रतिमा आदि के रूप में परमात्मा की धारणा की जाती है। वह एक सामयिक प्रयोजन है, वस्तुत: परमात्मा की अनुभूति अंत:करण में एक दिव्य संवेदना के रूप में होती है। वैयक्तिक उत्कृष्टता एवं सामाजिक उदारता के रूप में ही उसकी व्याख्या की जा सकती है। 

देवताओं की आकृतियाँ भी सद्गुणों के समुच्चय के रूप में ही गढ़ी गई हैं। उनके साथ घनिष्ठता बनाने का तात्पर्य है दैवी गुणों को अपने व्यक्तित्व की गहराई में समाविष्टï करना। जिनकी आस्थाओं में उत्कृष्टता का जितना समावेश हो सके, समझना चाहिए कि उसने उतने ही परिमाण में भक्ति साधना की (योग साधना की) ईश्वर प्राप्ति की मंजि़ल पूरी कर ली है। 

ईश्वर के ढाँचे में ढल जाना, उसके आदेशों की नीति- मर्यादाओं का पालन करना ही वह आत्म- समर्पण है, जिसे योगदर्शन में अनेक प्रकार से समझाया जाता है। समस्त योग साधनाओं का मूल उद्देश्य एक ही है कि ईश्वर को, अर्थात् उत्कृष्टता हो इतना आत्मसात कर लिया जाये कि व्यक्तित्व में उसी की प्रधानता परिलक्षित होने लगे। उपासना के विभिन्न क्रिया- कलाप और कर्मकाण्ड अंत:करण को सदाशयता का प्रशिक्षण देने का प्रयोजन ही पूरा करते हैं। 

तप- तितीक्षा भी जरूरी 

महानता के मार्ग पर चलने वाले हर व्यक्ति को आदर्शवादी निष्ठा का प्रमाण देना और उसके लिए जीवनभर तरह- तरह की कठिनाइयों से जूझना पड़ा है। इस कसौटी पर खरे उतरने के उपरान्त ही किसी को श्रेष्ठता का आत्मसंतोष और लोकसम्मान मिल सका है। तप- तितीक्षा की साधना में अनेक प्रकार के संयम बरतने पड़ते हैं और सत्प्रयोजनों के लिए बढ़- चढ़कर अंशदान करने पड़ते हैं। विरोध सहन का साहस भी दिखाना पड़ता है। यह समस्त प्रयोगक्रम तप- साधना कहलाता है। इसे प्रकारान्तर से आत्मबल के अभिवर्धन का अभ्यास ही कहा जा सकता है। 

युग देवता का आह्वान 


मन:स्थिति सुधरते ही परिस्थितियाँ सुधरती हैं। व्यक्तियों का समूह ही समाज है। व्यक्तिगत निकृष्टता की परिणति ही अनेक विपत्तियों के रूप में सामने आती हैं। तात्कालिक सुधार के लिए अन्य उपाय भी हो सकते हैं, किन्तु विपन्नता की जड़ काटने का एक ही मार्ग है कि जन- समाज में शालीनता की परम्पराएँ चल पड़ें। 

गायत्री का तत्वज्ञान और विधान, योगपरक चिंतन और तपपरक अभ्यास की भली प्रकार पूर्ति कर देता है। इसका जितना अधिक विस्तार होगा, उसी अनुपात से व्यक्ति  की श्रेष्ठता और समाज की सुव्यवस्था बढ़ती चली जायेगी। युग परिवर्तन का अभियान इसी लक्ष्य तक पहुँचने के लिए है। मोटी दृष्टि से देखने पर पूजापाठ की बात छोटी- सी प्रतीत होती है, किन्तु यदि उसको विशिष्टता और सम्भावना की दृष्टि से देखा जाय तो प्रतीत होगा कि युग समस्याओं के समाधान की, उज्ज्वल भविष्य के निर्माण की  आवश्यकता पूरी कर सकने की क्षमता आस्थाओं का स्पर्श करने वाली युगक्रांति से ही अभीष्ट परिवर्तन संभव हो सकेगा। 


वाङ्मय- उपासना योग, 
पृष्ठ- ३.९२ से संकलित- संपादित





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