पर्वों पर श्रद्धा-उल्लास भरा माहौल बने, साथ ही वे विवेक-विज्ञान सम्मत हों

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पर्वों की प्रेरक प्रक्रिया

ऋषियों-मनीषियों ने पर्व-समारोहों की परम्परा समाज में सत्प्रवृत्तियों के विकास के लिए चलायी थी। कालान्तर में उनका स्वरूप विकृत हो गया और वे दिशाहीन खर्चीले समारोह बनकर रह गये। युगऋषि ने उन्हें पुनः प्रेरक एवं जनसुलभ स्वरूप देने का अभियान प्रारम्भ किया। उसके सत्परिणाम भी उभरने लगे हैं; फिर भी अभी उस दिशा में बहुत कुछ करने की जरूरत है।

निकट भविष्य में तीन विशेष पर्व आ रहे हैं। ये सभी एक दिवसीय नहीं, कई दिनों तक निरन्तर चलने वाले लोकप्रिय समारोहों का स्वरूप ले चुके हैं।  वे हैं :-
गणेशोत्सव: यह गणेश चतुर्थी से अनन्त चतुर्दशी तक (१० दिन) मनाया जाता है। यह इस बार ५ सितम्बर से १५ सितम्बर तक चलेगा।

पितृपक्ष: यह भाद्रपद (भादों) की पूर्णिमा से आश्विन (क्वार) की अमावस्या तक चलता है। इस बार १६ सितम्बर से ३० सितम्बर तक है।

नवरात्रि उत्सव: यह आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से आश्विन शुक्ल नवमी तक मनाया जाता है। इस बार १ अक्टूबर से १० अक्टूबर तक है।

उक्त तीनों पर्व देश के बड़े भूभागों में बहुत उत्साहपूर्वक मनाये जाते हैं। इन पर्वों को उत्साह भरे समारोहों के साथ अधिक से अधिक विवेक और विज्ञान सम्मत ढंग से मनाये जाने के प्रभावी प्रयास किये जाने चाहिए।

समारोहों के साथ श्रद्धा

गणेशोत्सव और नवरात्रि उत्सव के समारोह जगह-जगह बहुत धूमधाम से मनाये जाने लगे हैं। मुहल्लों-मुहल्लों में, चौराहों-चौराहों पर गणेश जी की मूर्तियों की स्थापना, दुर्गा एवं काली की प्रतिमाओं की स्थापना की जाती है। सुबह-शाम पूजा-आरती का क्रम भी चलता है। अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रम भी किये जाते हैं, जिनमें बड़ी संख्या में आबालवृद्ध, नर-नारी भाग लेते हैं। अधिकांश समारोहों में प्रदर्शन-मनोरंजनपरक उत्साह ही अधिक दिखाई देता है। श्रद्धा-साधनापरक गतिविधियाँ बहुत कम होती हैं। प्रयास यह किये जाने चाहिए कि सभी समारोहों के साथ श्रद्धा-साधनापरक कार्यक्रम भी जुड़ें।

श्रद्धा का अर्थ है उत्कृष्ट आदर्शों के प्रति असीम प्रेम। श्रद्धा होने पर श्रद्धास्पद के अनुरूप स्वयं को गढ़ने-ढालने की साधना स्वाभाविक रूप से जुड़ने लगती है।

गणपति बुद्धि-विवेक के देवता हैं। वे गण-समूह के नायक अर्थात् आदर्श, प्रेरक, मार्गदर्शक हैं। ऐसे व्यक्ति को सहज रूप से ऋद्धि-सिद्धियों की प्राप्ति होती है। गणपति उत्सव में भाग लेने वाले व्यक्तियों को गणपति के सही अनुयायी बनने, बुद्धि-विवेक की कसौटी पर कस कर ही गतिविधियाँ अपनाने, वृत्तियाँ विकसित करने की साधना करने की प्रेरणा दी जानी चाहिए। जैसे-   

•    साधकगण इस दस दिन की अवधि में गणपति  मंत्र अथवा गणेश गायत्री मंत्र के जप/लेखन की विशेष साधना करें। इस अवधि में इन्द्रिय संयम रखने, सात्विक और सुपाच्य आहार सीमित मात्रा में लेने, ब्रह्मचर्य व्रत लेने, नित्य निर्धारित समय तक मौन रहने या मित भाषण का क्रम अपनाने के नियम बनायें-अपनायें।
•    समारोह करने वाले विभिन्न समाज, वर्ग, अपने समाज एवं क्षेत्र में प्रचलित अविवेकपूर्ण, रूढ़िवादी परम्पराओं-कुरीतियों को दूर करने, विवेकसम्मत श्रेष्ठ प्रचलन चलाने के लिए विशेष प्रयास करें। प्रस्ताव पास करें, विशेष आन्दोलन चलायें।


नवरात्रि :- शक्ति साधना का पर्व है। दुर्गा, देवशक्तियाँ, सत्पुरुषों की संयुक्त शक्ति, संघशक्ति की प्रतीक है। काली असुरों-आसुरी वृत्तियों को नष्ट करने वाली प्रचण्ड शक्ति है। नवरात्रि समारोहों में दुर्गा स्थापना, काली स्थापना करने वालों को व्यक्तिगत तथा सामूहिक रूप से शक्ति साधना के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। जैसे-
•    व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्तर पर गायत्री मंत्र, दुर्गा मंत्र, काली मंत्र आदि के जप, अनुष्ठान किये-कराये जायें। इस अवधि में ब्रह्मचर्य, सात्विक आहार, मौन एवं मित भाषण के व्रत यथासाध्य लिये जायें। दुर्गा अष्टमी के दिन कन्या पूजन-भोजन के साथ साधकों द्वारा कन्या एवं पुत्र में भेद न करने, नारीमात्र को श्रद्धा-सम्मान की दृष्टि से देखने, तद्नुसार अपने आचरण और व्यवहार को साधने के संकल्प कराये जायें।
•    प्रत्येक समारोह मण्डल को बालक-बालिकाओं, युवक-युवतियों को स्वस्थ शरीर और स्वस्थ, शालीन स्वभाव बनाने के लिए योग-व्यायाम केन्द्र चलाने की प्रेरणा दी जाय। इन केन्द्रों के माध्यम से तैयार युवक-युवतियों के दल क्षेत्र के लिए आदर्श स्वयंसेवक समूह के रूप में गठित और सक्रिय किए जा सकते हैं। वे दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन और सत्प्रवृत्ति संवर्धन की अनेक गतिविधियाँ चला सकते हैं

विवेक-विज्ञान सम्मत क्रम
दोनों ही समारोहों को विवेकपूर्ण और विज्ञान सम्मत रूप देने की भी जरूरत है। जैसे :-
मूर्तियाँ : पर्यावरण को ठीक रखने वाली (ईको फ्रैण्डली) बनायी जायें। इस सम्बन्ध में अनेक सफल प्रयोग किये-कराये जा चुके हैं। कलाकारों को मिट्टी की मूर्तियाँ बनाने तथा उन पर रंग-पॉलिश आदि करने में जहरीले पदार्थों का प्रयोग न करने के लिए प्रेरित-प्रशिक्षित किया जाय।
•    आयोजकों, पंडित-पुरोहितों को प्लास्टर ऑफ पेरिस की बनी तथा जहरीले रंग-वार्निश वाली मूर्तियाँ न खरीदने और उनकी प्राण-प्रतिष्ठा न कराने के लिए संकल्पित कराया जाय।
•    मूर्ति विसर्जन के लिए नदी, जलाशयों आदि के पास अलग से जलकुण्ड बनाने अथवा उन्हें भू-समाधि देने (साफ-सुथरी भूमि में गाढ़ देने) की परम्परा डाली जाय। बड़े शहरों में नदियाँ बहुत प्रदूषित हैं। गन्दे नाले उनमें मिलते हैं। वहाँ दुर्गन्ध से बचने के लिए नाक बंद करके मूर्ति को उसी गंदगी में डाल देने की अपेक्षा उसे सम्मानपूर्वक शुद्ध स्थान पर भू-समाधि देना अधिक युक्तिसंगत है।

•    सांस्कृतिक कार्यक्रमों के नाम पर देर रात तक हो-हल्ला करना, लोगों की नींद हराम करना और छात्र-छात्राओं का पढ़ना-लिखना मुश्किल कर देना भी विवेक और विज्ञान के विरुद्ध है। साधकों को स्वयं भी समय पर सोने और समय पर उठकर साधना करने व व्रत निभाने होते हैं। समारोहों को साधना प्रधान बनाने से इन दुःखदायी गतिविधियों से सहज ही मुक्ति पायी जा सकती है।

उक्त दोनों पर्वोत्सवों में श्रद्धा-साधना तथा विवेक-विज्ञान सम्मत प्रवृत्तियों को बढ़ावा देने के प्रयास सभी विचारशीलों, भावनाशीलों को करने चाहिए।

पितृपक्ष

पितृपक्ष में परिवार एवं समाज को श्रेष्ठ गति देने के लिए पूर्व पुरुषों, पितरों को श्रद्धापूर्ण कार्यों से संतुष्ट करने की परम्परा है। इसमें श्राद्ध, तर्पण, हवन करके ब्राह्मणों-कन्याओं को भोजन कराने के क्रम तो चलते ही हैं। इसके साथ पितरों की स्मृति में वृक्षों का आरोपण करने, उन्हें रक्षित-विकसित करने के क्रम भी चलाये जाने चाहिए। यह एक ऐसा शुभ कार्य है जो एक बार करने से वर्षों तक पुरखों को शान्ति और नयी पीढ़ी को समृद्धि देता रहता है। 

मृत-पितरों के साथ जीवित पितरों, वयोवृद्धों को तुष्ट-तृप्त करने के विशेष प्रयोग भी इसके साथ जोड़े जाने चाहिए। यदि अपने परिवार के बुजुर्ग पास में नहीं हैं तो किन्हीं अन्य बुजुर्गों को पुष्ट-तृप्त करने के प्रयास किये जाने चाहिए। इस कार्य को श्राद्ध-तर्पण, ब्राह्मण भोजन आदि जैसा ही पुण्यदायी माना जाना चाहिए।


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