Published on 2017-09-04
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एक नया सुयोग मनुष्य मात्र के लिये उज्ज्वल भविष्य की संरचना हेतु ईश्वरीय नवसृजन की प्रक्रिया चालू है। इसके लिये विश्व की भौतिकतावादी, भोगवादी मानसिकता को दुरुस्त करके उसे अध्यात्मवादी, योगयुक्त जीवनशैली के लिये प्रेरित, प्रशिक्षित करना होगा। यह महत्वपूर्ण भूमिका भारतवर्ष को निभानी है। स्वामी विवेकानन्द और श्री अरविन्द जी ने इस सन्दर्भ में अनेक बार प्रकाश डाला है। युगऋषि (पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य) ने उस ईश्वरीय योजना की स्पष्ट रूपरेखा प्रस्तुत कर दी। यही नहीं, उन्होंने मनुष्य मात्र को उसमें भागीदार बनने के लिये मार्ग प्रशस्त  कर दिया। 'इक्कीसवीं सदी- उज्ज्वल भविष्य' के उद्घोष के साथ जागृतात्माओं, नैष्ठिक परिजनों के माध्यम से वह अभियान गति पकड़ने लगा। 
युगऋाषि ने अपनी सूक्ष्मीकरण साधना के क्रम में यह बात कही थी कि सन् २००० के बाद विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिभाएँ विभिन्न रूपों में इस अभियान को गतिशील बनाने के लिये सक्रिय भूमिका निभाती दिखेंगी। उनके कथन की सत्यता के प्रमाण विश्व में घट रही घटनाओं के माध्यम से मिलने लगे हैं। भारत में कार्य कर रहे नैष्ठिक सृजन सैनिकों के लिये भी नवसृजन अभियान को एक नई उल्लेखनीय उछाल देने का सुअवसर दैव योग से मिला है। वह है सन २०१८ से २०२२ तक, पाँच वर्षों में भारत को एक नए जीवन्त स्वरूप में प्रस्तुत कर देने के लिये उभरा राष्ट्रीय संकल्प। इस सुयोग का भरपूर लाभ उठाने के लिये युग निर्माण अभियान से जुड़ी प्रत्येक संगठित इकाई को तत्परता बरतनी ही  चाहिये। 
सुयोग संदर्भ भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के दौरान दिनांक ९ अगस्त सन १९४२ के दिन अंग्रेजी शासन के विरुद्ध 'भारत छोड़ो'(क्विट इंडिया) आंदोलन का शुभारम्भ किया गया था। उस प्रसंग को 'अगस्त क्रांति' के नाम से याद किया जाता है। इस वर्ष उस आंदोलन की पचहत्तरवीं वर्षगाँठ- हीरक जयंती मनायी गई। उसी क्रम में अगले पाँच वर्षों में सन २०२२ तक भारत को एक नए जीवन्त आदर्श राष्ट्र के रूप में विश्व पटल पर प्रस्तुत कर देने का संकल्प उभरा। उसमें भारत के माननीय प्रधानमंत्री जी द्वारा सभी राजनीतिक एवं सामाजिक संगठनों को एकजुट होकर कार्य करने की अपील की गयी। उसके मुख्य बिन्दु कुछ इस प्रकार हैं- भारत का स्वतंत्रता संग्राम काफी लम्बा चला। सन् १८५७ की क्रान्ति विफल होने के बाद भी कुछ न कुछ प्रयास निरंतर किये जाते रहे। किन्तु  ९ अगस्त १९४२ से १५ अगस्त १९४७ तक पाँच वर्ष उसमें तूफानी गति आई। महात्मा गाँधी जी ने 'अँग्रेजो भारत छोड़ो' का उद्घोष दिया। उसके साथ 'करो या मरो' जैसी जीवन्त शर्त उभारी। उस समय विभिन्न विचारधाराओं के राष्ट्रसेवी सब एकमत, एकजुट हो उठे। गरम दल(क्रांतिकारी)- नरम दल (सत्याग्रही) सभी एक हो गए थे। काँग्रेस में भी विभिन्न विचारधाराओं के नेता (जिन्होंने बाद में अलग संगठन बना लिये थे) श्री जयप्रकाश जी, डॉक्टर लोहिया, आचार्य कृपलानी आदि सब उस आंदोलन में पूरी तत्परता से जुट पड़े थे। उसके परिणाम स्वरूप भारत को राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त हो गई। भारत की सफलता ने विश्व के अन्य अनेक देशों को भी प्रेरणा- दिशा दी। वे भी क्रमश: ब्रिटिश साम्राज्य के शिकंजे से मुक्त हुए। 
वर्तमान समय में भी कुछ इसी प्रकार का अवसर आया है। राष्ट्र को कमजोर बनाने वाली दुष्प्रवृत्तियों, कमियों के विरुद्ध जोरदार संघर्ष करके उन्हें निरस्त करना, राष्ट्र को उनके चंगुल से मुक्त कराना बहुत जरूरी हो गया है। गंदगी, कुपोषण, निरक्षरता, भ्रष्टाचार, वर्ग विशेष (सम्प्रदाय  भेद, जाति भेद, रंग भेद, लिंग भेद) आदि से मुक्त भारत बनाने के लिये एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम (कॉमन मिनिमम प्रोग्राम) तैयार किया जा सकता है। हमारी प्रतिबद्धता और सफलता अनेक देशों को इस दिशा में प्रतिबद्ध होने के लिये प्रेरित करेगी। बड़ी संख्या में विकासशील देश भारत को आशा भरी निगाहों से देख रहे हैं। 
नौ अगस्त को उभरे इस संकल्प को स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर माननीय राष्ट्रपति महोदय ने अपना समर्थन देकर पुष्ट किया। स्वतंत्रता दिवस के दिन ऐतिहासिक लाल किले की प्राचीर से भारत के प्रधान सेवक प्रधानमंत्री जी ने पुन: इस संकल्प पर बल दिया। 
अपनी बात उक्त सभी संकल्प युग निर्माण अभियान की मूल अवधारणा के अनुरूप ही हैं। मिशन के सातों आन्दोलनों, शत सूत्रीय कार्यक्रमों के अन्तर्गत वे सभी आते हैं। युग निर्माण सत्संकल्प के सूत्र क्रमांक ५,९,१०,१३,१५,१६ स्पष्ट रूप से उक्त संकल्पों को पूरा करने की प्रेरणा देते हैं। भारत  को और संपूर्ण विश्व को नया, श्रेष्ठ स्वरूप देने के कठिन किन्तु अति महत्त्वपूर्ण कार्य को पूरा करने की जिम्मेदारी उठाते हुए युगऋषि ने उद्घोष किया- 'हम यह कर सकते है, हम यह करेंगे।' 
वर्तमान संदर्भ में दिव्य प्रेरणा से राष्ट्र को नया स्वरूप देने वाले कार्यक्रमों को पूरी तत्परता से एकजुट होकर करने के लिये उद्घोष उभरे हैं। 
'भारत छोड़ो' की जगह 'भारत जोड़ो' अभियान चलाया जाए। सदाशयता सम्पन्न सभी वर्ग के नर नारी मिलकर युग निर्माण परिवार की तरह 'राष्ट्र निर्माण परिवार' बनाएँ और निष्ठा भरा प्रखर उद्घोष करें। हम कर सकते है, हम करेंगे। हम करेंगे, हम करके रहेंगे। युग निर्माण की दिशा में यह राष्ट्रीय पुरुष्ज्ञार्थ एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और शक्तिशाली कदम सिद्ध होगा।


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