Published on 2017-09-04
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खेल मानवीय बुद्धि का 


मनुष्य हाड़- माँस का पुतला एक तुच्छ प्राणी मात्र है उसमें न कुछ विशेषता है न न्यूनता। उच्च भावनाओं के आधार पर वह देवता बन जाता है, तुच्छ विचारों के कारण वह पशु दिखाई पड़ता और निकृष्ट, पाप बुद्धि को अपनाकर वह असुर एव पिशाच बन जाता है। 
कोई व्यक्ति अच्छा या बुरा तभी तक रह सकता है, जब तक कि उसकी धर्मबुद्धि सावधान रहे। पाप बुद्धि के प्रकोप से यदि मनुष्य सँभल न सके तो वह स्वयं तो अन्धकार के गर्त में गिरता ही है, और भी दूसरे अनेकों को अपने साथ पाप पंक में ले डूबता है। विश्वामित्र ऋषि को प्रलोभन आया तो वे मेनका के जाल में फँस गये। पाराशर केवट कन्या पर मोहित हो गये और अपने को सँभाले न रह सके। चन्द्रमा ने गुरु पत्नी गमन का पाप कमाया और इन्द्र जैसे देवता अहल्या का सतीत्व नष्ट करने के कुकर्म में प्रवृत्त हुये। भीष्म और द्रोणाचार्य जैसे विवेकशील दुर्योधन की अनीति का समर्थन करने लगे। 

दूसरी ओर धर्म बुद्धि के जाग्रत होने पर फतेसिंह जोरावर जैसे छोटे- छोटे बालक दीवार में जीवित चुने जाना हँसी- खुशी स्वीकार कर सकते हैं। चोटी न कटने देने के बदले बोटी- बोटी कटवाने को प्रसन्नतापूर्वक तैयार होते है। स्वतन्त्रता संग्राम के सैनिक बनकर असंख्यों व्यक्ति सब प्रकार की बर्बादी सहन करते हैं और फाँसी के तख्तों पर गीता की पुस्तकें छाती से चिपकाये हुये चढ़ते चले जाते हैं। राम की सेना में रीछ- बन्दर जैसे दुर्बल प्राणी अपने प्राणों की आहुति देने के लिये सम्मिलित होते हैं। एक छोटी गिलहरी तक अपने बालों में धूलि भर- भर कर उसे समुद्र में झाड़ देने का अनवरत श्रम करके समुद्र को उथला करके राम की सेना का मार्ग प्रशस्त करने का प्रयास करती है। 

धर्मबुद्धि से दुर्बल व्यक्तियों में हजार हाथियों का बल आ जाता है। पर स्वार्थी बुद्धि तो सेनापतियों को भी कायर बना देती है। द्रौपदी को भरी सभा में नग्न किये जाते समय भीष्म और द्रोण जैसे योद्धा नपुंसक बने बैठे रहे। उनके मुख से एक शब्द भी विरोध का न निकला। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई सहायता और आश्रय प्राप्त करने के लिये समर्थ राजाओं के पास जाती है पर अँग्रेजों के डर से वे उसे साफ इन्कार कर देते हैं। 
  
कितने ही भारतीय अपनी स्वार्थ बुद्धि के कारण अँग्रेजों और मुसलमानों के नाक के बाल बने रहे और देश को गुलामी की जंजीरों में देर तक जकड़ा हुआ देखते रहे। जहाँ राणा प्रताप और शिवाजी जैसे स्वाभिमानी जीवन भर भारतीय स्वतन्त्रता के लिये तिल- तिल लड़ते रहे, वहीं खुशी- खुशी अपनी बहिन- बेटियाँ देकर अपने लिये सुविधायें प्राप्त करने वाले भी कम नहीं थे। राणा सांगा ८४ घाव होने पर भी युद्ध करते हैं पर दूसरे लोग शत्रु से मिलकर अपना स्वार्थ साधने में लगे रहते हैं। 

कमी साधन नहीं, संवेदना की है

इस लोक में जो कुछ सुख- शान्ति, समृद्धि और प्रगति दिखाई पड़ती है वह सब सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों का परिचय है, जितनी भी उलझनें, पीड़ायें और कठिनाइयाँ दीखती हैं उनके मूल में कुबुद्धि का विष बीज फलता- फूलता रहता है। सैकड़ों- हजारों वर्ष बीत जाने पर भी पुरानी ऐतिहासिक इमारतें लोहे की चट्टान की तरह आज भी अडिग खड़ी हैं पर हमारे बनाये हुये बाँध, स्कूल, पुल, इधर बनकर तैयार नहीं हो पाते, उधर बिखरने शुरु हो जाते है। 

आज सामान और ज्ञान दोनों ही पहले की अपेक्षा अधिक उच्चकोटि के हैं पर उस लगन की कमी दिखाई पड़ती है, जिसके कारण प्राचीनकाल में लोग स्वल्प साधन होते हुये भी बड़ी- बड़ी मजबूत चीजें बना देते थे। कुतुबमीनार, ताजमहल, आबू के जैन मन्दिर, मीनाक्षी के देवालय, अजंता की गुफायें, मिश्र के पिरामिड और चीन की दीवार समय के बौद्धिक ज्ञान का नहीं, उत्कृष्ट वस्तु निर्माण करने की भावना का  प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। 
मशीनों, कारखानों, नहर, बाँध और सड़कों के आधार पर हमारी सुख- शान्ति नहीं बढ़ सकती। इनसे थोड़ी आमदनी बढ़ सकती है पर उसी बढ़ी आमदनी से अनर्थ ही बढ़ने वाला है। देखा जाता है कि कारखानों के मजदूर और दूसरे श्रमिक ४० फीसदी तक पैसा शराब, तंबाकू, सिनेमा आदि में खर्च कर डालते हैं। आमदनी बढ़ती चलने पर तरह- तरह की फिजूलखर्ची के साधन बढ़ते जाते हैं। जिन्हें ऊँची तनख्वाहें मिलती हैं वे भी अभाव और कमी का रोना रोते रहते हैं। धनी लोगों का व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक जीवन क्लेश और द्वेष से भरा रहता  है। पैसे के साथ- साथ दुर्गुण बढ़ते चलने पर वह दौलत और उलटी विपत्ति का कारण बनती चलती है। 

समय की माँग- सदाचार आर्थिक उन्नति के साथ- साथ विवेकशीलता और सत्प्रवृत्तियों की अभिवृद्धि भी अवश्य होनी चाहिए। यदि इस दिशा में उपेक्षा बरती गई तो प्रगति के लिये आर्थिक सुविधा बढ़ाने के जो प्रयत्न किये जा रहे हैं वे हमारी समस्याओं को सुलझा सकने में कदापि समर्थ न हो सकेंगे। 

जब तब मजदूर ईमानदारी से काम न करेंगे कोई कारखाना पनप न सकेगा। जब तक चीजें अच्छी और मजबूत न बनेंगी, उससे किसी खरीदने वाले को लाभ न मिलेगा। जब तक विक्रता  और व्यापारी मिलावट, कम तौल- नाप, मुनाफाखोरी न छोड़ेंगे, तब तक व्यापार की स्थिति दयनीय ही बनी रहेगी। सरकारी कर्मचारी जब तक अहंकार, रिश्वत, कामचोरी और घोटाला करने की प्रवृत्ति न छोड़ेंगे तब तक शासन तंत्र कर उद्देश्य पूरा न होगा। यह सत्प्रवृत्तियाँ इन वर्गों  में अभी उतनी नहीं दिखाई देतीं जितनी होनी चाहिए। यही कारण है कि हमारी प्रगति अवरुद्ध बनी पड़ी है। साधनों की कमी नहीं है। आज जितना ज्ञान, धन और श्रम- साधन अपने पास मौजूद है उसका सदुपयोग होने लगे तो सुख- सुविधाओं की अनेक गुनी अभिवृद्धि हो सकती है। 

ईश्वर की प्रसन्नता के लिए आत्म- कल्याण की लक्ष्य- पूर्ति तो सर्वथा सत्प्रवृत्तियों पर ही निर्भर है। ईश्वर का साक्षात्कार, स्वर्ग एवं मुक्ति को प्राप्त कर सकना केवल उन्हीं के लिये सम्भव है जिनके विचार, और कार्य उच्चकोटि के, आदर्शवादी एवं परमार्थ भावनाओं से ओतप्रोत हैं। कुकर्मी और पाप वृत्तियों में डूबे हुये लोग चाहे कितना ही धार्मिक कर्मकाण्ड क्यों न करते रहें, कितना ही भजन, पूजन कर लें, उन्हें ईश्वर के दरबार में प्रवेश न मिल सकेगा। भगवान घटघटवासी हैं, वे भावनाओं को परखते हैं और हमारी प्रवृत्तियों को भली प्रकार जानते हैं, उन्हें किसी बाह्य उपचार से बहकाया नहीं जा सकता। वे किसी पर तभी कृपा करते हैं, जब भावना की उत्कृष्टता को परख लेते हैं। उन्हें भजन से अधिक भाव प्यारा है। भावनाशील व्यक्ति बिना भजन के भी ईश्वर को प्राप्त कर सकता है, पर भावनाहीन व्यक्ति के लिये केवल भजन के बल पर लक्ष्य प्राप्ति सम्भव नहीं हो सकती।
 
लौकिक और पारलौकिक, भौतिक और आत्मिक कल्याण के लिये उत्कृष्ट भावनाओं की अभिवृद्धि नितान्त आवश्यक है। प्राचीनकाल में जब भी अनर्थ के अवसर आये हैं तब उनका कारण मनुष्यों की स्वार्थपरता एवं पाप बुद्धि ही रही है और जब भी सुख- शान्ति का आनन्दमय वातावरण रहा है, तब उनके पीछे सद्भावनाओं का बाहुल्य ही मूल कारण रहा है। आज भी हमारे लिये वही मार्ग शेष है। इसके अतिरिक्त और कोई मार्ग न पहले था और न आगे रहेगा। हमें वर्तमान दुर्दशा से ऊँचा उठने के लिए जनमानस में गहराई तक धर्मबुद्धि की स्थापना करनी होगी। इसी आधार पर विश्वव्यापी सुख- शान्ति का वातावरण बन सकना सम्भव होगा। 


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