भक्ति साधना से शक्ति, ज्ञान साधना से प्रगति, कर्म साधना से सिद्धि पायें

Published on 2017-09-11
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आयोजनों से जुड़ें शक्ति संवर्धन- संगठन के सुनिश्चित लक्ष्य 

नयी दृष्टि- नयी सृष्टि वर्ष २०१७- १८ की आयोजन शृंखला प्रारम्भ होने जा रही है। ध्यान रहे कि इसे नौ वर्षीय मातृशक्ति श्रद्धाञ्जलि महापुरश्चरण का प्रथम- सशक्त, प्रभावशाली चरण बनाना है। इसके लिए ऋषिसत्ता से नयी दृष्टि लेकर नयी सृष्टि करने के विवेकपूर्ण संकल्प करने और तद्नुसार साहसिक कदम बढ़ाने होंगे। 

मनुष्य का मन बड़ा समर्थ और कौतुकी है। यह झाड़ी में से भूत और पत्थर में से करुणा निधान भगवान को पैदा कर लेता है। यह 'ज्ञान साधना' से मूर्ख को विद्वान और विद्वान को मूर्ख बना सकता है। यह 'कर्म साधना' से नयी सृष्टि संरचना जैसे कमाल कर सकता है। जरूरत इतनी भर है कि यह एक सुनिश्चित संकल्प कर ले और फिर अविचल भाव से उस पर टिका रहे। 

प्रभु की माया भी बड़ी प्रबल है। कौतुकी मन स्वयं प्रभु की अपेक्षा उनकी माया- छाया में रुचि लेने लगता है तो भटक जाता है। साध्य को भूलकर साधनों में ही अटक जाता है। पू. गुरुदेव ने नवयुग सृजन के ईश्वरीय उद्देश्य में भागीदार बनने की प्रेरणा दी। उसके लिए प्रचारात्मक, सृजनात्मक और संघर्षात्मक चरण बढ़ाने के लिए सुनिश्चित मार्गदर्शन दिया। इन्हीं चरणों को क्रमश: पूरा करने के उद्देश्य से आयोजनों का क्रम चलाया गया। समर्थ मार्गदर्शन के अनुरूप नैष्ठिक प्रयास होने से सफलता मिलती ही है, मिली भी। लेकिन यही नैष्ठिक मन मायाग्रस्त होने लगता है। 

नैष्ठिक प्रचारात्मक प्रयासों से आयोजनों में सफलता मिलती है, उससे प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। प्राप्त प्रतिष्ठा को अगले चरण सृजन संगठन के लिए प्राप्त आवश्यक संसाधन भर मानना चाहिए। जिस व्यक्ति की प्रतिष्ठा ठीक नहीं होगी, उसके साथ कोई जुड़ना नहीं चाहता। प्रतिष्ठित व्यक्ति या समूह के साथ लोग सहज ही जुड़ने लगते हैं। यहाँ चूक यह होने लगती है कि लोग प्रतिष्ठा को प्रभु प्रदत्त संसाधन मानकर अपनी कमाई सम्पत्ति मानने लगते हैं। उसे संगठन और सृजन प्रवृत्तियों के विकास में लगाने की जगह लोग व्यक्तिगत मान और प्रभाव बढ़ाने में लगाने लगते हैं। इस विसंगति से बचना चाहिए। 

इस शृंखला में होने वाले आयोजन वन्दनीया माताजी के लिए श्रद्धाञ्जलि साधना के अंग हैं। शक्तिस्वरूपा माँ ने अपनी सभी धाराओं को अपने अभिन्न युगऋषि के उद्देश्यों के लिए समर्पित किया। उनसे यही विद्या लेने, इसी निष्ठा को फलीभूत करने के सदुद्देश्य से इस वर्ष के आयोजनों की रूपरेखा बनायी और निभाई जानी चाहिए। नयी सृष्टि करने के लिए नयी दृष्टि पाने और अडिग आस्था से काम करने के लिए भक्तियोग, ज्ञानयोग एवं कर्मयोग साधने की त्रिवेणी बहानी चाहिए। 

भक्ति की आत्मीयता 
माँ के प्रति भक्ति को विकसित, परिपक्व बनाया जाय। माँ अपनी आत्मीयता के आधार पर ही बच्चों के प्रजनन और पालन- पोषण के कष्टकारक कार्यों को सुखानुभूति के साथ कर पाती है। गर्भ में शिशु के आते ही उसका खाना- पीना दूभर हो जाता है। जन्म देते समय मरणासन्न कष्ट झेलना पड़ता है। पालन- पोषण के क्रम में वर्षों कठोर तप करना पड़ता है। उक्त सभी कष्ट- कठिनाइयों को माँ झेलती तो है ही, उसमें सुख, प्रसन्नता और गौरव का अनुभव भी करती है। उसकी गहन आत्मीयता का भाव ही इस कष्टदायक प्रक्रिया को हर्षदायक, आनन्ददायक बना देता है। मातृ श्रद्धाञ्जलि से जुड़े इन आयोजनों में माँ से ऐसी ही समर्थ और सृजनोन्मुख आत्मीयता पाने और उसे अपने व्यक्तित्व में आत्मसात करने की साधना की जानी चाहिए। 

आयोजनों के माध्यम से जुड़ने वाले नर- नारियों की संख्या और उनका श्रद्धाभरा उत्साह देखकर हम सब प्रसन्नता और गर्व का अनुभव करते हैं। लेकिन उन्हें आत्मीयता के सूत्रों से निरन्तर जोड़े रखने, सृजन कौशल से सतत विकसित- परिष्कृत करते रहने की साधना नहीं के बराबर ही कर पाते हैं। वह सृजन की गौरवमय प्रक्रिया हमें कठिन और बहुत बार अरुचिकर लगने लगती है। यह विसंगति अपने अन्दर आत्मीयता का स्तर कमजोर होने के कारण ही उभरती- पनपती है। मातृ श्रद्धाञ्जलि अनुष्ठान की ऊर्जा से हमें यह कमी पूरी करनी ही है, ऐसा  संकल्प अन्त:करण में निरन्तर उमड़ता रहे तो बात बने।
 
हम कुछ इस तरह सोचें, अनुभव करें कि नवसृजन के इस महा अभियान में हमने प्रभु की साझेदारी स्वीकार की है। स्नेह सलिला, शक्तिस्वरूपा वन्दनीया माताजी के हम पुत्र- पुत्रियाँ हैं। संतान के अन्दर माँ की विशेषताएँ बीज रूप में होती ही हैं। उन्हें विकसित- पल्लवित करके ही हम अपने इष्ट प्रयोजन में सफल हो सकते हैं। माँ ने कृपा करके इसके लिए ताना- बाना बुना है। यह आयोजन उनके उसी समर्थ ताने- बाने का अंग है। हमें इसका भरपूर लाभ उठाना है। 

माँ बच्चों को समर्थ- स्वावलम्बी बनाये बगैर संतोष का अनुभव नहीं करती। आयोजनों के माध्यम से जुड़ने वाले नर- नारी सब माँ की विकासशील संतानें हैं। हमें माँ उन्हें विकसित करने की जिम्मेदारी सौंप रही है। हम नैष्ठिक प्रयास करेंगे तो माँ हमें उसके लिए समुचित अनुदान प्रसन्नता पूर्वक उपलब्ध कराती रहेगी। इन्हें हम इतना प्यार- सहकार दें कि ये हमसे जुड़े रहने में हर्ष और हित होने का अनुभव करें। उन्हें क्रमश: परिजन, सहयोगी के रूप में विकसित करते हुए अग्रदूत के दायित्व निभाने के स्तर तक पहुँचाने का प्रयास करें। माँ के प्रति सच्ची भक्ति हमें इसके लिए वाञ्छित कौशल, हर्ष एवं गौरव प्रदान कर सकती है। 

ज्ञान की प्रखरता 
विमल भक्ति के गर्भ से उपजे सदुद्देश्यपूर्ण लक्ष्यों की पूर्ति में ज्ञान की प्रखरता का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। प्रत्येक माता अपने शिशु को निश्चित रूप से स्वस्थ और संस्कारवान बनाना चाहती है। उसकी यह पवित्र चाह उससे कठोर तप साधना भी करवा लेती है। किन्तु यदि उसे स्वास्थ्य के नियमों का पता न हो, संस्कारों को विकसित करने की मनोवैज्ञानिक बारीकियों की जानकारी न हो, तो उन पवित्र भावों और कठोर तप- साधना के वाञ्छित परिणाम निकलने में संदेह ही बना रहेगा। यदि समुचित ज्ञान हो तो अपेक्षाकृत कम श्रम से भी बेहतर परिणाम  पाये जा सकते हैं। इसलिए 'भक्ति साधना' के साथ समुचित 'ज्ञान साधना' भी हम सबको करनी ही पड़ेगी। 

नवयुग सृजन के लिए उपयुक्त एवं समर्थ ज्ञान की धाराएँ तो युगऋषि ने अपने भागीरथी तप से प्रवाहित कर दी हैं। उन्हें सर्वसुलभ और सुगम बनाकर जन- जन तक पहुँचाने की व्यवस्था 'वेदमूर्ति' ने कर दी है। अब उनके साझेदार- सहयोगी के रूप में विकसित होने के लिए हमें उसकी पूरक ज्ञान साधना करनी है। हमें 'वेदमूर्ति' के समर्थ 'वेददत' की भूमिका निभाने के लिए कमर कसनी होगी। 

आदि शंकराचार्य ने 'प्रश्नोत्तरी' प्रकरण में लिखा है- का दीर्घरोग:?' अर्थात् लम्बा चलने वाला, कठिन रोग क्या है? उत्तर है- 'भव एव साधो।' हे सज्जनो! यह संसार ही दीर्घ रोग है। 

पुन: प्रश्न है, किमोषधं तस्य?' अर्थात् भवरोग की दवा क्या है? उत्तर है- विचार एव।' सुविचार ही उसकी प्रभावशाली दवा है। उपनिषद् का भी कथन है, संसार दीर्घ रोगस्य, सुविचारो हि महौषधम्।' अर्थात् संसार रूपी दीर्घ रोग की महान औषधि सुविचार ही हैं। 
युगऋषि, वेदमूर्ति ने अपनी प्रचण्ड ज्ञान साधना से इस युग के प्रत्येक रोग की महान औषधियाँ जीवन्त विचारों के रूप में तैयार कर दी हैं। उन्होंने एक कुशल वैद्य, चिकित्सक की कठिन भूमिका बड़ी कुशलता से पूरी कर दी है। यह बड़ा- कठिन कार्य वे ही कर सकते थे, सो उन्होंने कर दिया। अब अगले चरण का अपेक्षाकृत सरल कार्य हमारे जिम्मे है, उसे हमें ही करना होगा। 

उसके अनिवार्य चरण इस प्रकार हैं :- 
• विचार रूप सिद्ध औषधियों का महत्त्व स्वयं समझना और अपने सम्पर्क क्षेत्र वालों को समझाना। 
• रोग के अनुरूप औषधि का चुनाव करके उसका सेवन स्वयं करना। 
• विचाररूप सिद्ध औषधियों का महत्व स्वयं समझना और अपने सम्पर्क क्षेत्र वालों को समझाना। 
• रोग के अनुरूप औषधि का चुनाव करके उसका सेवन स्वयं करना और उस अनुभव के आधार पर सम्पर्क में आने वालों को उनके रोग के अनुरूप विचार रूपी औषधियाँ बताना, उपलब्ध कराना। 
• औषधि सेवन करने में नियमितता बरतने और उसके साथ पथ्य- कुपथ्य का संतुलन बिठाने में अकसर चूक होती है। उस समय उन्हें आत्मीयता भरे प्रोत्साहन, मार्गदर्शन और सहयोग की आवश्यकता होती है। यह भूमिका निभाने की क्षमता अर्जित करना ही सृजन शिल्पियों की ज्ञान साधना की सफलता मानी जा सकती है।
• गायत्री परिवार से सीधे जुड़े नर- नारियों को ज्ञान साधना में प्रवृत्त कराने और उसमें आगे बढ़ाते रहने का कार्य पहले चरण का सुगम कार्य है। इसमें कुशलता विकसित होने लगे तो अगले चरण में विभिन्न संगठन, धर्म- सम्प्रदायों के व्यक्तियों को भी इस धारा से जोड़ना होगा। भव रोग से पीड़ित तो वे भी हैं। रोगमुक्त तो उन्हें भी करना है। उज्ज्वल भविष्य के संवाहक समर्थ व्यक्तित्व तो उन सभी वर्गों में भी विकसित करने हैं। इसके लिए अपेक्षाकृत अधिक जीवन्त संकल्प, सूझबूझ और प्रयास करने होंगे। इस स्तर की ज्ञान साधना करने वाले मनस्वी भी सृजन- सैनिकों में से ही उभारने होंगे। 

जब तक अपनी ज्ञान साधना का स्तर छोटा है, तब तक उक्त कार्य कठिन लगते हैं। साधना में प्रखरता आते ही वे कार्य संभव और सुगम लगने लगेंगे। ज्ञान साधना में प्रखरता लाये बगैर माँ को सार्थक श्रद्धाञ्जलि देने की भावना आधी- अधूरी ही रह जायेगी। हमें अपनी- अपनी श्रद्धाञ्जलियों को इस स्तर का बनाना है जिसे दुनिया सार्थक माने और माँ के लिए संतोषप्रद सिद्ध हों। 

कर्म से सिद्धि 
सिद्धियों का सम्बन्ध लोग चमत्कारिक- जादुई घटनाओं से जोड़ते हैं। वास्तव में सिद्धियों का सम्बन्ध कर्म की विशिष्ट कुशलताओं से होता है। अपनी आंतरिक ऋद्धियों- विभूतियों को उत्कृष्ट स्तर पर विकसित और विशिष्ट कुशलता के साथ प्रयुक्त करने की प्रमाणिक स्थिति को सिद्धि कहते हैं। इनके परिणाम बहुधा चमत्कारी भी होते हैं। 

उत्कृष्ट भावों को संकल्प का रूप देने और उन्हें पूरा करने वाले साधक संकल्प- सिद्ध हो जाते हैं। वाणी को सत्य, प्रिय, हितकारी ढंग से प्रयुक्त करने वाले साधक वचन- सिद्ध हो जाते हैं। जिनके हाथ कुशलतापूर्वक उत्कृष्ट कार्य करते रहते हैं वे सिद्धहस्तों की श्रेणी में आते हैं।
 
हमें सृजनशिल्पी सिद्ध होना है। इसके लिए सृजन में सर्वोपरि रुचि लेनी होगी। उसके लिए समुचित भक्ति साधना और ज्ञान साधना करनी होगी। अन्दर भक्ति की आत्मीयता और ज्ञान की सदाशयतापूर्ण प्रखरता के विकास के साथ ही उन्हें व्यवहार में उतारने की साधना तपश्चर्या स्तर पर करनी होगी। इस वर्ष के आयोजनों को हमें इस उच्चस्तरीय साधना के लिए एक अच्छी प्रयोगशाला, व्यायामशाला जैसा स्वरूप देना होगा। आयोजनों के प्रयाज, याज और अनुयाज तीनों में इसी दृष्टि से नयी सृष्टि करने के लक्ष्य निर्धारित करने होंगे। इसके लिए सार- संक्षेप में सूत्र इस प्रकार हैं :- 

स्त्र विश्व के सभी नर- नारी माँ जगतजननी के पुत्र- पुत्रियाँ, हमारे लिए सम्माननीय और प्रिय परिजन हैं। सभी को सद्भाव और सद्बुद्धि की साधना के माध्यम से उज्ज्वल भविष्य के मार्ग पर आगे बढ़ाना है। प्यार और सहकार पूर्वक सभी को सत्कर्म की साधना में लगाना है। आयोजन की सफलता के लिए साधना करने वालों को आत्मीयता के सूत्र में बाँधकर उन्हें संगठित- समर्थ बनाना है। 

स्त्र सभी को भव रोग से मुक्त करके स्वस्थ, समर्थ व्यक्तित्व के स्तर तक ले जाने के लिए भवरोगों की सिद्ध औषधियों, ऋषियों के अनुभूत ज्ञान सूत्रों को जन- जन तक पहुँचाना है। सफल स्वाध्याय के माध्यम से उनकी प्रज्ञा को इतना प्रखर बनाना है कि वे जीवन में उभरने वाले भेदों- अवरोधों को पार करते हुए इष्ट लक्ष्य की ओर निरन्तर बढ़ते रह सकें। इसके लिए जरूरी है- स्त्र साधनाक्रम में जुड़ने वालों के यहाँ छोटे- छोटे स्वाध्याय सेट स्थापित कराना। नियमित स्वाध्याय के लिए प्रेरित- प्रशिक्षित करने का क्रम बनाना। 
स्त्र आयोजनों में साहित्य प्रदर्शनी, छोटे- बड़े पुस्तक मेले लगाना। वहाँ ऐसे आकर्षक वाक्य लगाना जिन्हें पढ़कर लोगों में जिज्ञासा और उत्साह जागे। जैसे- पुस्तकें जो रोज बदल रही हैं हमारा जीवन।' 'आयें, समस्या के अनुरूप समाधान, रोग के अनुरूप औषधि ले जायें। ' 
स्त्र वहाँ विभिन्न प्रकार की जिज्ञासाओं के अनुरूप पुस्तकों के सेट उपलब्ध हों। वहाँ ऐसे स्वाध्यायशील व्यक्ति उपलब्ध रहें जो जिज्ञासुओं को उनकी आवश्यकता के अनुरूप पुस्तकें दिखा सकें। 

स्त्र साधना एवं स्वाध्याय के माध्यम से जुड़ने वालों को प्रज्ञा मण्डल, स्वाध्याय मंडलों में गठित करके युगशक्ति, लालमशाल की छोटी- छोटी  प्रामाणिक इकाईयों को जीवन्त बनाने के लक्ष्य रखें। यह सृजनशील भूमिका निभाकर ही हम माँ के प्रति सार्थक श्रद्धाञ्जलि अर्पित कर सकते  हैं।

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