गायत्री उपासना- प्रकाश की साधना

Published on 2017-10-09
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ज्योति है तो जीवन है
अध्यात्म विज्ञान में स्थान- स्थान पर प्रकाश की साधना और प्रकाश की याचना की चर्चा मिलती है। यह प्रकाश बल्ब, बत्ती अथवा सूर्य आदि से निकलने वाला उजाला नहीं वरन् वह परम ज्योति है जो इस विश्व में चेतना का आलोक बनकर जगमगा रही है। गायत्री के उपास्य सविता देवता इसी परम ज्योति को कहते हैं। इसका अस्तित्व प्रत्येक व्यक्ति ऋतम्भरा प्रज्ञा के रूप में प्रत्यक्ष और कण- कण में संव्याप्त जीवन ज्योति के रूप में अपने को भी देख सकता है। इसकी जितनी मात्रा जिसके भीतर भीतर विद्यमान हो, समझना चाहिए कि उसमें उतना ही अधिक ईश्वरीय अंश आलोकित हो रहा है।

डॉ. जे.सी. ट्रस्ट ने 'अणु और आत्मा' ग्रंथ में स्वीकार किया है कि प्रकाश- अणुओं की प्रकाश वाष्प न केवल मनुष्य में, वरन अन्य जीवधारियों, वृक्ष- वनस्पति, ओषधि आदि में भी होती है। यह प्रकाश- अणु ही जीवधारी के यथार्थ शरीरों का निर्माण करते हैं। खनिज पदार्थों से मनुष्य या जीवों का शरीर तो तभी तक स्थिर रहता है, जब तक यह प्रकाश- अणु शरीर में रहते हैं। इन प्रकाश- अणुओं के हटते ही स्थूल शरीर बेकार हो जाता है, फिर उसे जलाते या गाड़ते ही बनता है। खुला छोड़ देने पर तो उसकी सड़ाँद से उसके पास एक क्षण भी ठहरना कठिन हो जाता है।

उत्थान- पतन का कारण

स्वभाव, संस्कार, इच्छाएँ, क्रिया, शक्ति यह सब इन प्रकाश- अणुओं का ही खेल है। हम सब जानते हैं कि प्रकाश का एक अणु (फोटोन) भी कई रंगों के अणुओं से मिलकर बना होता है। मनुष्य शरीर की प्रकाश आभा भी कई रंगों से बनी होती है। डॉ. जे. सी. ट्रस्ट ने अनेक रोगियों, अपराधियों तथा सामान्य व श्रेष्ठ व्यक्तियों का सूक्ष्म निरीक्षण करके बताया है कि जो मनुष्य जितना श्रेष्ठ और अच्छे गुणों वाला होता है, उसके मानव अणु दिव्य तेज और आभा वाले होते हैं। जबकि अपराधी और रोगी व्यक्तियों के प्रकाश- अणु क्षीण और अन्धकारपूर्ण होते हैं।

उन्होंने बहुत से मनुष्यों के काले धब्बों को अपनी दिव्य दृष्टि से देखकर उनके रोगी या अपराधी होने की बात को बताकर लोगों को स्वीकार करा दिया था कि सचमुच रोग और अपराधी वृत्तियाँ काले रंग के अणुओं की उपस्थिति का प्रतिफल होते हैं, मनुष्य अपने स्वभाव में चाहते हुए भी तब तक परिवर्तन नहीं कर सकता, जब तक यह दूषित प्रकाश- अणु अपने अन्दर विद्यमान बने रहते हैं।

यही नहीं, जन्म- जन्मान्तरों तक खराब प्रकाश- अणुओं की उपस्थिति मनुष्य से बलात् दुष्कर्म कराती रहती है। इस तरह मनुष्य पतन के खड्ड में बार- बार गिरता और अपनी आत्मा को दु:खी बनाता रहता है। जब तक यह अणु नहीं बदलते या निष्क्रिय होते, तब तक मनुष्य किसी भी परिस्थिति में अपनी दशा नहीं सुधार पाता।

देव उपासना से चित्तशुद्धि

यह तो है कि अपने प्रकाश- अणुओं में यदि तीव्रता है तो उससे दूसरों को आकस्मिक सहायता दी जा सकती है। रोग दूर किए जा सकते हैं। खराब विचार वालों को कुछ देर के लिए अच्छे सन्त स्वभाव में बदला जा सकता है। महर्षि नारद के सम्पर्क में आते ही वाल्मीकि के प्रकाश- अणुओं में तीव्र झटका लगा और वह अपने आपको परिवर्तित कर डालने को विवश हुआ। भगवान बुद्ध के इन प्रकाश- अणुओं से निकलने वाली विद्युत विस्तार सीमा में आते ही डाकृू अंगुलिमाल की विचारधाराएँ पलट गई थीं। ऋषियों के आश्रमों में गाय और शेर एक घाट पर पानी पीने आते थे। वह इन प्रकाश- अणुओं की ही तीव्रता के कारण होता था। उस वातावरण के निकलते ही व्यक्तित्वगत प्रकाश- अणु फिर बलवान हो उठने से लोग पुन: दुष्कर्म करने लगते हैं।

इसलिए किसी को आत्म- शक्ति या अपना प्राण देने की अपेक्षा भारतीय आचार्यों ने एक पद्धति का प्रसार किया था, जिसमें इन प्रकाश- अणुओं का विकास कोई भी व्यक्ति इच्छानुसार कर सकता था। देव- उपासना उसी का नाम है।

उपासना एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसमें हम अपने भीतर के काले, मटमैले और पापाचरण को प्रोत्साहन देने वाले प्रकाश- अणुओं को दिव्य तेजस्वी, सदाचरण और शान्ति एवं प्रसन्नता की वृद्धि करने वाले मानव- अणुओं में परिवर्तन करते हैं।

गायत्री ही क्यों?

विकास की इस प्रक्रिया में किसी नैसर्गिक तत्त्व, पिण्ड या ग्रह- नक्षत्र की साझेदारी होती है, उदाहरण के लिए जब हम गायत्री की उपासना करते हैं तो हमारे भीतर के दूषित प्रकाश- अणुओं को हटाने और उसके स्थान पर दिव्य प्रकाश- अणु भर देने का माध्यम 'गायत्री' का देवता सविता, अर्थात् सूर्य होता है।

वर्ण रचना और प्रकाश की दृष्टि से यह मानव- अणु भिन्न- भिन्न स्वभाव के होते हैं। मनुष्य का जो कुछ भी स्वभाव आज दिखाई देता है, वह इन्हीं अणुओं की उपस्थिति के कारण होता है, यदि इस विज्ञान को समझा जा सके तो न केवल अपना जीवन शुद्ध, सात्विक, सफल, रोगमुक्त बनाया जा सकता है, वरन् औरों को भी प्रभावित और इन लाभों से लाभान्वित किया जा सकता है। परलोक और सद्गति के आधार भी यह प्रकाश- अणु या मानव अणु ही हैं।

आत्मा या चेतना जिन अणुओं से अपने को अभिव्यक्त करती है, वह प्रकाश- अणु ही हैं, जबकि आत्मा स्वयं उससे भिन्न है। प्रकाश- अणुओं को प्राण, अग्नि, तेजस् कहना चाहिए, वह जितने शुद्ध, दिव्य, तेजस्वी होंगे, व्यक्ति उतना ही महान तेजस्वी, यशस्वी, वीर, साहसी और कलाकार होगा। महापुरुषों के तेजोवलय उसी बात के प्रतीक हैं जबकि निकृष्ट कोटि के व्यक्तियों में यह अणु अत्यन्त शिथिल मन्द और काले होते हैं। हमें चाहिए कि हम इन दूषित प्रकाश- अणुओं को दिव्य अणुओं में बदलें और अपने को भी महापुरुषों की श्रेणी में ले जाने का यत्न करें।

ब्रह्म विद्या का उद्गाता 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' की प्रार्थना में इस दिव्य प्रकाश की याचना करता है। इसी की प्रत्येक जाग्रत् आत्मा को आवश्यकता अनुभव होती है। अस्तु गायत्री उपासक अपने जप प्रयोजन में इसी ज्योति को अन्त: भूमिका में अवतरण करने के लिए सविता देवता का ध्यान करता है।

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