Published on 2017-10-28
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एक पौराणिक कथा
एक बार इन्द्र देव ने कुपित होकर दुष्ट दुरात्मा प्रजाजनों के दुष्कर्मों का दण्ड देने के लिए उन्हें वर्षा का अनुदान देना बन्द कर दिया। बारह वर्षों तक लगातार दुर्भिक्ष पड़ा। पानी न बरसने से घास- पात, पेड़- पौधे, जलाशय सब सूख गये। अन्न उपजना बन्द हो गया। तृषित और क्षुधित प्राणी त्राहि- त्राहि करके प्राण त्यागने लगे। सर्वत्र हा- हाकार मच गया।

स्थिति असह्य हो गयी तो मनीषियों ने विचार किया कि आकाश से जलधारा का अवतरण कैसे हो? निष्कर्ष यही निकला कि देवता तप और त्याग से ही प्रसन्न होते हैं। उनके कुपित होने का एक मात्र कारण प्रजाजनों का अनाचार है। यदि लोकहित के लिए त्याग और तप की अवरुद्ध परम्परा पुन: प्रचलित हो उठे तो देवताओं का मन पिघलते देर न लगे और अभीष्ट वर्षा का अभाव सहज ही दूर हो जाय।

धरती वालों ने उत्कृष्टता और आदर्शवादिता की परम्पराओं को अपनाना- कुमार्ग छोड़कर सन्मार्ग पर चलना पुन: आरम्भ कर दिया, लेकिन देवताओं को इस बात का विश्वास दिलाने और प्रमाण देने की आवश्यकता पड़ी। इसके लिये नरमेध यज्ञ रचाये जाने का निर्णय लिया गया।

लोकहित के लिए आत्माहुति के लिए आह्वान हुआ। लोग हिचकिचा रहे थे, यज्ञीय बलि के लिये अपने को कौन प्रस्तुत करे? पहला साहस कौन दिखाये? प्रश्न चुनौती जैसा बनता जा रहा था, चारों और सन्नाटा छाया हुआ था। नरमेध आयोजन की व्यवस्था सुनकर लोगों में जिस आशा का संचार हुआ था, वह निराशा में परिणत होने लगी।

तभी सन्नाटे को चीरता हुआ एक व्यक्ति आगे बढ़ा- नाम था 'शुनिशेप'। उसने यज्ञ के अध्वर्यु और ऋत्विजों को सम्बोधित करते हुए कहा- 'यज्ञीय बलिदान के लिये सर्वप्रथम प्रस्तुत हूँ।' आशा की किरणें फूटीं, यज्ञ आयोजन आरम्भ हुआ, एक के बाद एक लोग बलि के लिये आगे बढ़ने लगे। परम्परा प्रचलित हुई तो आदमियों का ताँता लग गया।

मनुष्यों की बदली मनोवृत्ति का परिचय पाकर आशुतोष शिव प्रसन्न हुए। उन्होंने दुर्भिक्ष निवारण के लिये विपुल वर्षा की व्यवस्था कर दी। शुनिशेप एवं अन्यों के बंधन खोल दिये गये। प्राणियों के दु:ख दूर हुए और सर्वत्र सुख- शान्ति भरे मोद- मंगल मनाये जाने लगे।

आज के संदर्भ में

परिस्थिति आज भी ठीक उसी तरह की है। मनुष्यों ने अपनी नैतिक मर्यादाएँ छोड़ दी हैं, परमार्थ का उदार मानवीय दृष्टिकोण भुला दिया गया है और हर कोई अपने व्यक्तिगत संकीर्ण स्वार्थों की पूर्ति में बेतरह व्यस्त हो गया है। इसके फलस्वरूप वैयक्तिक और सामाजिक समस्याएँ उत्पन्न होनी ही थीं। इनकी प्रतिक्रिया उन दिनों की तरह अगणित शोक- संतापों का कारण बने दुर्भिक्ष के रूप में भले ही न दिखाई देती हो, लेकिन भावनात्मक दुर्भिक्ष इतना विषम है कि आज नारकीय दावानल में जलते हुए प्राणी हर दिशा में हा- हाकार कर रहे हैं। महाकाल कुपित होकर कठोर प्रताड़ना का सरंजाम जुटाने में व्यस्त है।

स्थिति को बदला कैसे जाय? इसका एक ही उपाय है- लोग अपनी रीति- नीति बदलें, भावनात्मक परिवर्तन करें और अपने जीवन के तौर- तरीके उलटें। स्वार्थ निमग्नता को परमार्थ प्रयोजनों की अभिरुचि में परिवर्तन करें। देवता ऐसी ही मनोमूमि के लोगों को प्यार प्रदान करते हैं, उन्हीं पर उनका अनुग्रह बरसता है। इस उदात्त दृष्टि एवं जीवन पद्धति का नाम ही यज्ञ है।

यज्ञ परंपरा पुनर्जीवित हो

यज्ञ का मेरुदण्ड है- बलिदान। निरीह पशुओं का खून बहा डालना तो एक पैशाचिक कृत्य है। बलिदान का मर्म है परमार्थ के लिये अधिकाधिक आत्म- संयम और तप- त्याग का, उदारता का परिचय देना; अपने लिए कम से कम रखकर अपनी क्षमता, योग्यता और समृद्धि का परमार्थ के लिये उत्सर्ग करना। यही मानवोचित पुण्य- परम्परा है। जब तक ऐसे यज्ञानुष्ठान घर- घर में होते रहते हैं, देवता प्रसन्न होकर विपुल सुख- शान्ति की वर्षा करते रहते हैं, पर जैसे ही लोगों ने यज्ञ से मुँह मोड़ा कि दैवी अनुग्रह की वर्षा बन्द हो जाती है।

अग्निहोत्र यज्ञीय परम्परा का एक प्रतीकात्मक पुण्य प्रदर्शन है। वास्तविक यज्ञ है- परमार्थपरायण जीवन जीने का निश्चय। देवता यही चाहते हैं और यही करने वालों को विभूतियाँ प्रदान करते हैं। स्वार्थरत यज्ञ- विरोधी लोग दैवी कोप का भाजन बनते हैं और उन्हें वस्तुओं का न सही, सुख- शान्ति भरी परिस्थितियों का असह्य दुर्भिक्ष अवश्य त्रास देता है।

अस्तु परिस्थिति बदलने की योजना बनाने वालों को बलिदानों की व्यवस्था करनी होती है- नरमेध रचाने होते हैं। ऐसे आयोजन खड़े करने होते हैं, जिनसे अधिकाधिक तप- त्याग करने की परम्परा प्रचलित हो सके।

गाँधीजी अभी कुछ ही दिन पूर्व ऐसे नरमेध के ब्रह्मा रह चुके हैं, जिसमें हजारों- लाखों बलिदानियों ने बढ़- चढ़कर जौहर दिखाये थे। उस नरमेध से संतुष्ट हुए देवताओं ने भारत को हजार वर्ष की गुलामी से मुक्त किया और स्वाभिमानी, पुरुषार्थी लोगों की पंक्ति में बैठ सकने का अवसर प्रदान किया।

यह एक कदम पूरा हुआ- यज्ञ का एक चरण (खण्ड) ही सम्पन्न हुआ। अभी दो चरण और शेष हैं। एक विश्व के भावनात्मक नवनिर्माण की आवश्यक पृष्ठभूमि की रचना और दूसरा संघर्षात्मक स्थिति आने पर अधिक से अधिक बलिदान करने की तैयारी।

बहानेबाज नहीं, बलिदानी बनें

इन पुण्य प्रयोजनों के लिये बातूनों और ढोंगियों की नहीं, बलिदानियों की आवश्यकता अनुभव की जा रही है। अभियान तैयार है, पर बलिदान का अवसर आते ही चतुर लोग बगलें झाँकते और बहाने बनाते दीख पड़ते हैं। किसी को फुरसत की कमी है, किसी की आर्थिक स्थिति खराब है तो कोई तथाकथित झंझटों में फँसा है बेचारा, क्या करे?

धूर्त बहानेबाज इस प्रकार अपनी आत्मा को धोखा देकर किसी प्रकार मन बहला सकते हैं, पर देवता तो असलियत जानते हैं। उन्हें तो इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण चाहिये कि धरती वालों ने बलिदानी परम्पराएँ अपनायी या नहीं?

आज दुर्भिक्ष का अन्त कर विपुल वर्षा का सरंजाम जुटाने के लिए नरमेध रचा पड़ा है, पर बलिदानी परम्पओं के आरंभ होने का प्रमाण देने वाले शुनिशेप अभी भी चुप्पी साधे बैठे हैं। इस प्रमाण के लिये आगे बढ़ने और साहस दिखाने से ही तो नरमेध पूरा हो सकता है और उसी से तो देवताओं का कोप अनुग्रह में बदल सकता है। न जाने कब तक नरमेध का यज्ञकुण्ड बलिदानी शुनिशेपों की बाट जोहता रहेगा? यदि 'सादा जीवन- उच्च विचार' के सूत्र को अपनाकर लोकमंगल के लिए आत्मोत्सर्ग करने वाले शुनिशेप आगे कदम बढ़ा सकें, बलिदानों की परम्परा पुन: प्रचलित हो सके तो वर्तमान विश्व संकट का समाधान हो सकता है। शुनिशेप को बलिस्तंभ से बाँधा गया। वह आत्मसमर्पण के भाव से ध्यानस्थ हो गया। अचानक उसके मुख से वेद की नयी ऋचाएँ प्रकट होने लगीं। वह ऋषित्व प्राप्त कर चुका था, इसलिए बंधन खोल दिये गये।


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