Published on 2017-11-13
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समझदारी अपनायें, श्रेय- अनुदान पायें

बात प्रौढ़ों और प्रखरों से
ऐतिहासिक महाभारत में भारत देश को विशाल भारत के रूप में विकसित करने की योजना थी। आज का लक्ष्य एवं प्रसंग ऊँचा है। अब मनुष्य को महामानव, धरातल को स्वर्ग लोक बनाने की तैयारी है। पतन की दिशा में प्रवाहमान लोक मानस को मानवी गरिमा का गला घोंट डालने से कठोरतापूर्वक रोकना है। पतनोन्मुख प्रवाह को उलटना कितना कठिन होता है, यह उस प्रयोजन में संलग्न शक्तियाँ ही जानती हैं।

सृजन किसे कहते हैं? यह हर कोई नहीं जानता। जिन्हें योगियों जैसा मनोयोग जुटाने, पराक्रमियों जैसे श्रम- स्वेद बरसाने का अभ्यास है, उन्हीं को सृजन का मूल्य समझने की भी जानकारी है। लोग तो विघटन, पतन और ध्वंस का ही ताना- बाना बुनते रहते हैं और माचिस की भूमिका निभाते, फूलझड़ी चलाते अपनी आतंकवादी अहन्ता का ढिंढोरा पीटते हैं। ऐसे उद्दण्ड दुबुर्द्धियों की चर्चा यहाँ कौन करे? बात उनकी चल रही है जो स्रष्टा के युग सृजन में भागीदारी ग्रहण करने की बात सोचते हैं।

गीता के संदर्भ से
महासृजन की इस बेला में युगदेवता के आह्वान का क्या उत्तर दिया जाय? इस संदर्भ में अर्जुन के असमंजस और कृष्ण के उद्बोधन को स्मरण करने से समाधान मिल सकता है। गीता को जिन्होंने पढ़ा है वे जानते हैं कि उसमें भगवान का सर्वोपरि स्नेह सौजन्य बरसा है। वे अपने सच्चे भक्त को सच्चे मन से जो उपहार दे सकते हैं, उनको ७०० श्लोकों वाली गीता में पढ़ा, सुना, समझा, और हृदयंगम किया जा सकता है। उस अध्यात्म- काव्य में वाक् जंजाल और तर्क विस्तार तो सुविस्तृत और अद्भुत है, किन्तु सार तत्व इतना ही है कि "पास की नहीं दूर की सोचें, लाभ को नहीं, श्रेय को चुनें"।

इस मार्ग पर चलने वालों को सदा झंझट सहने और कष्ट उठाने पडे़ हैं। इससे कम प्रसव पीड़ा सहे बिना किसी को भी महानता की देव नगरी में प्रवेश नहीं मिला। तर्क और तथ्य प्रस्तुत करते हुए भगवान ने अर्जुन का व्यामोह दूर कर दिया, साथ ही वह असमंजस भी हवा में उड़ गया जो लगता पर्वत के समान भारी था, किन्तु वस्तुत: था तिनके से भी हलका।

भगवान भक्त का असमंजस हरते और दिव्य आलोक देते हैं। वही अर्जुन को भी मिल गया। पाञ्चजन्य बजाते, घोड़ों की रास थामते, सारथी की भूमिका निभाते भगवान को दिव्य चक्षुओं से देखा तो उसकी भुजाएँ फड़कने लगीं। गाण्डीव बिजली की तरह उठा और तरकश से एक के बाद दूसरे तीर का निकलना, तूफान की तरह बरसना आरम्भ हो गया।

यह प्राचीन प्रसंग इसलिए स्मरण दिलाया गया है कि युग के अर्जुनों के सामने असमंंजस बन कर अड़ा हुआ व्यामोह सामयिक समस्याओं के ढेर पर ढेर इस तरह खड़े करता दीखता है कि झोली से गुब्बारे निकालने वाले बाजीगर को मानो उसने हरा देने की ठान ली हो। आदर्शों के मार्ग पर चलने का सत्साहस जुटाने वाले को सर्वप्रथम तात्कालिक लाभों को न छोड़ने की एक ही अड़चन सामने आती है। इसी के पक्ष में चतुर वकील की तरह कल्पना कौशल अनेकानेक उलझनों कठिनाइयों के वास्तविक काल्पनिक चित्र प्रस्तुत करता चला जाता है।

इस भवसागर से पार निकलना कठिन है। सभी मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाने, सभी गुत्थियाँ सुलझ जाने, अपेक्षित अनुकूलताओं का मनोरथ पूरा हो जाने पर कुछ उच्चस्तरीय करने की बात बनेगी, ऐसा सोचने वालों को अभीष्ट अवसर की प्रतीक्षा लम्बी अवधि तक करनी पड़ेगी, कम से कम इस जन्म में तो वैसा अवसर आने वाला है ही नहीं, यह भली- भाँति नोट करना और गाँठ बाँधना चाहिए। किसी का वास्ता भगवान से पड़े तो ही यह असमंजस छूटे, तो ही यह उमंग उठे कि वर्तमान परिस्थितियाँ कितनी ही जटिल और कठिन लगती हों, उनके मध्य भी युग निमंत्रण को स्वीकार करने के लिए बहुत कुछ कर गुजरना नितान्त सम्भव है।

गुत्थियाँ अपने ढँग से सुलझें और आदर्शों का निर्वाह साथ- साथ चलता रहे, ऐसा सुयोग बिठाने में हर किसी का विवेक, हर किसी की दूरदर्शिता, ऋतम्भरा प्रज्ञा सुनिश्चित रूप से सफल हो सकती है। गीता का तत्वदर्शन, भगवान का आक्रोश भरा निर्देशन और अन्तत: अर्जुन का जाग्रत विवेक और प्रखर पौरुष्य उबल पड़ना चरितार्थ होकर रहा। आज के अर्जुनों का समाधान भी इसी आधार पर सम्भव है। अन्यथा असमंजस की दुहाई देते रहने की और अपने को असहाय, असमर्थ कहते रहने की आत्म प्रवंचना से उन्हें रोक भी कौन सकता है।

पाञ्चजन्य का उद्घोष
बड़े प्रयोजनों के लिए बड़े आदमी ही आगे आते हैं। दलदल में फँसे हाथी को प्रौढ़ हाथियों का झुण्ड ही जंजीरों में जकड़ कर घसीटता और किनारे पर ला पटकता है। युग संकट दलदल में फँसे हाथी की तरह है, उसे उबारने के लिए ऐसे लोग चाहिए जो समुद्र छलाँगने और पर्वत उड़ा ले जाने वाले पवन पुत्र के समान उमंगों से लबालब भरे हों। सामर्थ्य के स्रोत ऐसों के लिए ही देव केन्द्रों में सुरक्षित है।

सभी जानते हैं कि नल नील की योग्यता, शिक्षा समुद्र पर पुल बनाने वाले मूर्धन्य इन्जीनियरों जैसी नहीं थी। विभीषण अपने पुरुषार्थ से लंका का शासक नहीं बन सकता था। बिना महान सारथी के साधनहीन अर्जुन महाभारत जीतने के सरंजाम कैसे जुटा पाता? जिन्होंने अध्यात्म का ककहरा पढ़ा है वे जानते हैं कि उच्च आदर्शों को अपनाने की उमंगें यदि गहरी, वास्तविक और साहसभरी हों तो फिर पग- पग पर आने वाली कठिनाइयों को बुहारते रहने की जिम्मेदारी अदृश्य सत्ता ने भूतकाल में भी उठाई है और भविष्य में भी उठाती रहेगी।

श्रेयार्थी सदा इसी स्तर का दृष्टिकोण अपनाते रहे हैं। परिस्थितियों का समाधान होने की प्रतीक्षा न करके युगधर्म को जिस- तिस प्रकार निभाने के लिए दुस्साहसियों की तरह छलाँग लगाते और पार होते रहे हैं। शहीदों का डूबना भी कृपणों के किनारे पर सुरक्षित बैठे रहने की तुलना में कहीं अधिक शानदार होता है।

जाग्रत् आत्माओं को युग निमंत्रण यही है। इन दिनों अनन्त अन्तरिक्ष में गूँजने वाले पाञ्चजन्य की प्रतिध्वनि जो सुन सकें, सुनें। जो उसका अनुसरण कर सकें, करें। श्रेय- सौभाग्य और अवसाद- पश्चात्ताप में से एक को चुनने के लिए हममें से हर कोई पूर्ण स्वतंत्र है। इस स्वतन्त्रता का उपयोग इन्हीं दिनों करना होगा। 'आज की स्थिति 'अभी नहीं तो कभी नहीं' की, 'करो या मरो' की चुनौती स्वीकार करने या इन्कार करने का स्पष्ट फैसला करने के लिए लगता है दरवाजा रोक कर हठपूर्वक अड़ गई है।


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