युवा क्रान्ति वर्ष के निष्कर्ष क्रान्तिकारी, सृजनशील और शानदार निकलें

Published on 2017-11-14
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'जागो और जगाओ' के साथ ही 'बनो और बनाओ' का सशक्त क्रम चल पड़े

सारे संसार को उज्ज्वल भविष्य की ओर ले जाने के लिए, युग निर्माण के सूत्रों का विश्वव्यापी प्रचार करना और उन्हें व्यावहारिक जीवन में स्थान देना आवश्यक है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए देश की युवा पीढ़ी को जगाने, संस्कृतिनिष्ठ बनाने की जरूरत अनुभव की गयी। इसीलिए सन् २०१६ और १७ को 'युवा क्रांति वर्ष' के रूप में मनाने की योजना लागू की गयी। इस बीच बहुत से उल्लेखनीय कार्य सम्पन्न हुए, जिन्हें सराहा भी गया। अब समय की वह अवधि समाप्त हो रही है। इस शेष अवधि में इस अभियान को उस मुकाम तक पहुँचाना जरूरी है, जहाँ वह स्वचालित बनकर लक्ष्य प्राप्ति तक, बिना रुके तीव्र गति से आगे बढ़ता रहे। इसी उद्देश्य से प्राणवान संकल्पशील, सृजन सैनिकों तक यह आलेख पहुँचाया जा रहा है।

मंथन और उसके बाद
मंथन की प्रक्रिया का मूल्यांकन उसके माध्यम से प्राप्त सार्थक उपलब्धि और उसके सार्थक उपयोग के आधार पर ही किया जा सकता है।

देखना होगा कि दूध के मंथन से क्रीम और दही के मंथन से मक्खन कितना निकला और उसका उपयोग किस कुशलता से किया गया। यदि अपेक्षा से कम निकला तो या तो दूध- दही खराब किस्म का रहा होगा अथवा मंथन ठीक ढंग से नहीं किया गया होगा। जो मिला उसका उपयोग भी सही दिशा में सही ढंग से करना होगा।

सोचें यदि प्राप्त क्रीम अथवा मक्खन को चिकना पदार्थ होने के नाते पहियों और धुरी के बीच, दरवाजों के कब्जों, चूलों को चिकना करने के लिए किया गया तो सारी प्रक्रिया की सार्थकता ही समाप्त प्राय: हो जायेगी। उसका उपयोग तो स्वास्थ्य संवर्धक आहार और ओषधियाँ बनाने में ही किया जाना चाहिए।

अरणी मंथन किया गया और अग्नि प्रकट नहीं हो सकी तो, अथवा प्राप्त अग्नि का उपयोग वन या मकान जलाने में किया गया तो क्या लाभ? अग्नि पैदा हो और वह यज्ञ, भोजन पकाने, उपयोगी गलाई- ढलाई करने जैसे शुभ कार्यों में प्रयुक्त हो सके, तभी उस क्रिया की सार्थकता है।

युवा क्रांति वर्ष के अन्तर्गत युवा पीढ़ी के बीच व्यापक विचार मंथन का क्रम चलाया गया। कोशिश की गयी कि देश के हर क्षेत्र और हर वर्ग में युवाशक्ति को जाग्रत् करने के लिए प्रयास किये जायें। उनमें वह गर्मी फूँकी जाय कि वे अपनी शक्ति- सामर्थ्य को अनगढ़- असंस्कृत कार्यों से बचाकर, सुगढ़- सुसंस्कृत उद्देश्यों में लगाने के लिए उत्साहित- उल्लसित हो उठें। जिनमें ऐसी गर्मी- ऊर्जा का उभार हो, उन्हें प्रेरित- प्रशिक्षित करके श्रेष्ठ सृजनशील कार्यों में लगाने की व्यावहारिक, प्रभावपूर्ण कार्ययोजना भी बनायी जाय।

स्पष्ट है कि जो स्वयं जागा है, वही दूसरों को जगा सकता है और जो स्वयं को गढ़ रहा है, वही अपनों- परायों को गढ़ने का कार्य कर सकता है। इसलिए युवाओं के बीच चलाये गये इस मंथन में से ऐसे प्राणवान युवाओं- युवतियों को तलाशने- तराशने की जरूरत है जो 'जागो और जगाओ' के साथ 'बनो और बनाओ' के अभियान को निरंतर आगे बढ़ाते रह सकें। इससे कम में इतनी तत्परता से चलाये गये इस अभियान को सार्थक नहीं बनाया जा सकता।

यह शुरुआत है, समापन नहीं
अंग्रेज भारत में थोड़े से थे। भारतीयों की संख्या के मुकाबले उनकी संख्या नगण्य जैसी ही थी। लेकिन उन्होंने हमारी शक्ति से हमें ही दास बनाये रखने की कुशलता प्राप्त कर ली थी। 'डिवाइड एण्ड रूल' अर्थात् 'विभाजन करो और शासन करो' की कुटिल नीति अपना रखी थी। सेना और पुलिस में अधिकांश भारतीय ही थे। लेकिन सबके मनों में यह हीन भावना भर दी गयी थी कि अंग्रेज बहुत समर्थ हैं और हम कमजोर हैं। इसलिए उनकी आज्ञा मानकर भारतीय ही भारतीयों को अनीति सहने के लिए बाध्य करते रहते थे।

महात्मा गाँधी जी ने इस सत्य को समझा। उन्होंने भारतीयों को अपनी सामर्थ्य का बोध कराने और अंग्रेजों को उनकी लाचारी का अनुभव कराने के लिए एक आन्दोलन चलाया। उसका नाम था 'सविनय अवज्ञा' अर्थात् विनम्रतापूर्वक अंग्रेजों के अनीतिपूर्ण निर्णय मानने से इनकार कर देना। इस विचार को हवा देने के लिए उन्होंने 'नमक सत्याग्रह' चलाया। नमक भारत को दी गयी प्रकृति की भेंट है। अंग्रेज उस पर अपना टैक्स लगाते थे। गाँधी जी ने कहा हम हमारे ही उत्पाद नमक पर अंग्रेजों को टैक्स नहीं देंगे। इसके लिए उन्होंने 'दाण्डी यात्रा' की। उनके नेतृत्व में सत्याग्रहियों का एक दल पैदल रवाना हुआ। दाण्डी क्षेत्र में जाकर गाँधी जी ने घोषणापूर्वक बिना टैक्स दिये थोड़ा नमक उठाया और उसे लोगों में बाँटा।

दाण्डी यात्रा पूरी हो गयी, लेकिन क्या नमक सत्याग्रह पूरा हो गया? नहीं, वह यात्रा नमक सत्याग्रह को प्रचार देने, गति देने के लिए किया गया एक प्रयोग भर था। प्रयोग पूरा हुआ, लेकिन अभियान तो शुरू हुआ था। उससे जो हवा बनी, उसके कारण जगह- जगह अनेक ढंगों से सविनय अवज्ञा आन्दोलन चल पड़ा। अंग्रेजों ने भारत की शक्ति और अपनी लाचारी को समझा।

युवा क्रान्ति वर्ष का अंतिम चरण चल रहा है। चार युवा क्रांति रथ देश के चारों कोनों, चारों दिशाओं से युवाशक्ति के जागरण का अभियान चलाते हुए आगे बढ़ रहे हैं। जनवरी- २०१८ के अंत में नागपुर (महाराष्ट्र) में एक विराट समागम के साथ यह यात्रा पूरी हो जायेगी। युवा क्रांति वर्ष की अवधि भी लगभग पूरी हो जायेगी। लेकिन ...?

युवाओं को जगाने और संस्कृतिनिष्ठ बनाने का अभियान तो तब तक चलता रहेगा, जब तक सुसंस्कृत युवाशक्ति के प्रभाव से अनगढ़ प्रचलन और प्रवृत्तियाँ हथियार डाल देने के लिए मजबूर न हो जायें। हमारे प्रयास यह होने चाहिए कि इस मंथन के प्रभाव से बड़ी संख्या में ऐसी युवा टोलियाँ उभरें जो हर क्षेत्र और हर वर्ग में 'जागने और जगाने, बनने और बनाने' की निरंतर चलने वाली शृंखला के सूत्रधार- अग्रदूत बन जायें।

दुर्बलता नहीं, सामर्थ्य जगायें
भारतीय संस्कृति, देव संस्कृति का स्पष्ट मत है कि जड़ पंचतत्त्वों से बनी इस दुर्बल दिखने वाली काया के अन्दर चेतन- समर्थ आत्मा विद्यमान है। संत तुलसीदास ने लिखा है :-

जड़- चेतन, गुण- दोषमय विश्व कीन्ह करतार।
हंस वंश गुन गहहि पय परिहरि वारि विकार।।

अर्थात्- इस संसार को परमात्मा ने जड़ एवं चेतन, गुण एवं दोष के समन्वय से बनाया है। हंस प्रवृत्ति अपनाकर सत्पुरुष इन दोषों को अलग कर गुणों को उसी तरह अपना लेते हैं जैसे हंस पानी से अलग करके दूध को ग्रहण कर लेता है। मनुष्य को चाहिए कि वह जड़ पदार्थों से बनी काया के अन्दर विद्यमान समर्थ चेतन को अनुभव करे। अपने 'स्व' को उसी से जोड़े।

ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन अमल सहज सुखराशी।
भारतीय संस्कृति इसी सत्य को समझने, अनुभव करने की प्रेरणा देती रही है। युवाओं के आदर्श स्वामी विवेकानन्द ने युवाओं से यही अपील की है कि वे स्वयं को नश्वर, दुर्बल जड़ पदार्थ की काया न मानें, अपने आप को सामर्थ्यवान ईश्वर का अंश मानें। अपने को काया तक सीमित मानना दुर्बलता को स्वीकार करना है और समर्थ चेतन का अंश अनुभव करना, अपनी अनन्त सामर्थ्य को जगाने का अमोघ सूत्र है। उन्होंने कहा-

"स्वयं को दुर्बल मत बनाओ। सम्पूर्ण दोषपूर्ण कार्यों की प्रेरक दुर्बलता ही है। दुर्बलता के कारण ही मनुष्य सभी स्वार्थों में प्रवृत्त होता है। दुर्बलता के कारण ही मनुष्य दूसरों को कष्ट पहुँचाता है। दुर्बलता के कारण ही मनुष्य अपना सच्चा स्वरूप प्रकाशित नहीं कर सकता। सब लोग जानें कि वास्तव में वे क्या हैं? इसके लिए वे रात- दिन अपने स्वरूप 'सोऽहम्' (मैं वही समर्थ, अविनाशी ईश्वर का अंश हूँ।) इस ओजस्वी भाव का पान करें। इसी चिन्तन और मनन से ऐसे श्रेष्ठ कार्य होंगे, जिन्हें संसार ने कभी देखा नहीं होगा।"

युवाओं को संस्कृति के सूत्र अपनाने वाले सत्पुरुषों से प्रेरणा लेनी होगी। यह जाग्रत् आत्मशक्ति ही थी, जिसके प्रभाव से साधनहीन दिखने वाले वशिष्ठ राजा विश्वरथ को परास्त कर देते हैं। इसी शक्ति के सहारे निरक्षर कबीर बड़े- बड़े विद्वानों पर भारी पड़ जाते हैं। इसी के आधार पर वो जो धन को हाथ नहीं लगाते थे; जिनकी प्रत्यक्ष सम्पदा केवल एक काले कम्बल तक ही सीमित दिखती थी, वे काली कमली वाले बाबा जंगलों में अस्पताल खोलते, पहाड़ी क्षेत्र में गहरी घाटियों और नदियों को पार करने के लिए लोहे के रस्सों के पुल बनाते हैं। यह सामर्थ्य हम सभी के अंदर विद्यमान है। उसे जगाने की जरूरत है। इसी संदर्भ में स्वामी जी कहते हैं :-

"अतएव हे आर्य संतानो! आलसी होकर मत बैठे रहो। जागो, उठो और जब तक इस चरम लक्ष्य तक न पहुँच जाओ तब तक मत रुको। अब अद्वैत के सिद्धान्त को व्यावहारिक क्षेत्र में प्रयोग करने का समय आया है। उसे स्वर्ग से, अमरलोक से इस नश्वर संसार में ले आना है। उस विधाता का विधान यही है। तुम्हारे उस प्राचीन शास्त्र का उपदेश सम्पूर्ण संसार में इस प्रकार व्याप्त हो जाये कि समाज के प्रत्येक मनुष्य की वह साधारण सम्पत्ति हो जाये। हमारी नस- नस में, रुधिर के प्रत्येक कण में उसका प्रवाह है।"

इसी बात को युगऋषि पू. गुरुदेव ने इस प्रकार कहा है:-
• समय आ गया है कि श्रद्धा को सक्रियता में बदला जाय।
• मनुष्य में देवत्व को जगाया जाय।
• स्वर्ग को धरती पर ले आया जाय। ईश्वर की यही योजना है, आदि।

युवाक्रान्ति वर्ष की उपलब्धि यही होनी चाहिए कि संस्कृतिनिष्ठ प्राणवान युवाओं- युवतियों की सेना हर क्षेत्र में खड़ी हो जाय। वह ऐसा अभियान चलाये कि संस्कृतिनिष्ठ युवा वाहिनी के लिए 'जागने और जगाने', 'बनने और बनाने' की अटूट शृंखला चल पड़े। दुष्प्रवृत्तियाँ भाग खड़ी हों और सत्प्रवृत्तियों के विकास का मार्ग प्रशस्त हो जाये।

यह कठिन नहीं है
सामान्य दृष्टि से यह कार्य बहुत कठिन दिखता है। लेकिन ईश्वरी योजना में साझेदारी के नाते यह कठिन नहीं है। जब अनगढ़ स्वभाव वाले रीछ- बन्दर समुद्र पर पुल बना सकते हैं, जब अविकसित ग्वाल- बालों के सहयोग से गोवर्धन उठाने और कंस के आतंक को निरस्त करने वाले सफल प्रयोग किए जा सकते हैं, तो सामान्य दिखने वाले नैष्ठिक साधकों द्वारा नवयुग सृजन के नये कीर्तिमान भी खड़े किए जा सकते हैं।

युगऋषि के सूत्र :- युगऋषि ने इस सम्बन्ध में बहुत व्यावहारिक सूत्र दिए हैं। युवाक्रान्ति के अग्रदूत इन्हें अपनाकर आत्मकल्याण एवं लोकहित के दोहरे लाभ कमा सकते हैं

  • प्राणवान परिजन सतत जनसम्पर्क करें। इस क्रम को इतना प्रभावी बनायेेंं कि हर दरवाजा खटखटाकर, युग संदेश जन- जन तक पहुँचाते रहने का अविरल क्रम चल पड़े।
  • जो प्रभावित हों, जिनमें प्राण दिखे, उन्हें तत्काल उनकी रुचि एवं क्षमता के अनुरूप कोई सुगम काम सोंप दिया जाए। उसके लिए उन्हें पे्ररणा और प्रशिक्षण देते रहने की साधना की जाए।
  • यह क्रम एक से पाँच- पाँच से पच्चीस के क्रम में बढ़ाया जाता रहे। एक निष्ठावान, प्राणवान युवक नवसृजन साधना के लिए अपने ४ साथी चुन ले। पाँचों मिलकर अपनी सामर्थ्य विकसित करने के लिए संस्कृति के सूत्रों को जीवन में उतारने की साधना करते रहे।
  • जब अपना क्रम सहज रूप से चल पड़े तो पुन: हर साधक अपने चार- चार सहयोगी बना लें। इस प्रकार ५ से २५ का क्रम चल पड़ेगा। यदि यह चक्र छ: माह में पूरा किया जा सके तो.....

छ: माह में १ से २५, १२ माह में ६२५, १८ माह में १५६२५, २४ माह में ३९०६२५ साधक तैयार हो सकते हैं। यदि जगने- जगाने, बनने बनाने की प्रक्रिया को कुछ हजार प्राणवान युवा अपना लें तो करोड़ों क्रांतिकारी युवा तैयार किए जा सकते हैं। वे ईश्वरीय दिव्य योजना के अग्रदूत बनकर राष्टःव्यापी और विश्वव्यापी सृजन क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का अनुपम श्रेय और सौभाग्य प्राप्त कर सकते हैं। युवा क्रान्ति वर्ष में चले दो वर्षीय मंथन के फलस्वरूप नवनीत के रूप में इसी कार्ययोजना को मूर्त रूप देने के लिए अपना सर्वस्व दाव पर लगा देने वाले युवा सृजन सैनिक निकालने का लक्ष्य हमें सफल बनाना चाहिए।

इस कार्य के लिए मनस्वी, तेजस्वी युवा कार्यकर्त्ताओं के साथ विवेकवान, उत्साही प्रौढ़ परिजनों को मिलकर योजना बनानी और प्रयास करने होंगे। जैसे पुराने अनुभवी खिलाड़ी और कोच नयी आदर्श टीम खड़ी कर देते हैं, जैसे नये खिलाड़ी अपने दमखम और कौशल को पुरानों के अनुभव और मार्गदर्शन के सहारे निखार लेते हैं, वैसा ही सुन्दर, सृजनशील तालमेल पुराने और नये सृजन सैनिकों के बीच उभरना चाहिए।

दोनों पक्ष परस्पर 'सलाह लो, सम्मान दो' की रीतिनीति अपनायें। प्रत्येक टीम प्रत्यक्ष रचनात्मक कार्यों के साथ सृजनशील युवाओं की संख्या और गुणवत्ता बढ़ाने के सुनिश्चित लक्ष्य बनाकर चलें, युगऋषि के श्रीचरणों में नयी तेजस्वी युवा सेना समर्पित करके धन्य बनें और बनायें।

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