युगावतार के लीला संदोह को समझें, युग देवता के साथ भागीदारी बढ़ायें

Published on 2017-12-14
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अग्रदूतों को खोजने, उभारने और सामर्थ्यवान बनाने का क्रम प्रखरतर बनायें

युगऋषि और प्रज्ञावतार
युगऋषि के माध्यम से नवयुग की ईश्वरीय योजना की जानकारी युगसाधकों को मिली। इस प्रचण्ड और व्यापक क्रांतिकारी परिवर्तन चक्र को घुमाने के लिए परमात्मसत्ता 'प्रज्ञावतार' के रूप में सक्रिय हो उठी है। समय को, कालचक्र को बलपूर्वक वाञ्छित दिशा में घुमाने के लिए सन्नद्ध उस प्रचण्ड अवतार चेतना को महाकाल कहा जाना भी युक्ति संगत है। जो भ्रम में भटक कर कुमार्ग पर चल पड़े हैं, उनके भ्रम का निवारण करके सहारा देकर सन्मार्ग पर लाने के लिए उसकी भूमिका च्प्रज्ञावतारज् की रहेगी और जो हठपूर्वक कुमार्ग पर चलने का दुराग्रह पाले रहेंगे, उनको बलात ठिकाने लगा देने के लिए 'महाकाल' की भूमिका उभर रही है। दोनों प्रक्रियाएँ एक साथ चलती रहने वाली हैं।

युगऋषि ने यह तथ्य भी स्पष्ट किया है कि अवतार चेतना हर युग की आवश्यकता के अनुसार स्थूल और सूक्ष्म दोनों ही रूपों में सक्रिय होती है। जब आसुरी शक्तियाँ व्यक्ति के रूप में प्रकट होती रहीं,  तब उनको निरस्त करने के लिए अवतारी चेतना राम-कृष्ण जैसे स्थूल विग्रहों में प्रकट हुई। फिर भी वह चेतना दशरथ नन्दन श्रीराम या वासुदेव श्रीकृष्ण की काया तक ही सीमित नहीं थी। यह रहस्य खोलने के लिए उन्होंने समय-समय पर अपने विराट स्वरूप की अभिव्यक्ति भी की।
 
इस युग में असुरता व्यक्तिरूप में नहीं, व्यापक दुर्बुद्धि के रूप में सक्रिय है, इसलिए अवतार चेतना भी व्यापक सद्बुद्धि-महाप्रज्ञा के रूप में अवतरित हुई है। चूँकि सूक्ष्म प्रवाह को पकड़ने, समझने, ग्रहण करने की क्षमता स्थूल शरीर धारियों में कम ही होती है, इसलिए उस सूक्ष्म प्रवाह को व्यक्त-प्रत्यक्ष रूप देने के लिए युगऋषि को माध्यम बनाया गया। इस दृष्टि से युगऋषि सूक्ष्म व्यापक प्रज्ञावतार की अभिव्यक्ति के प्रत्यक्ष माध्यम रहे। काया के माध्यम से जगत में परिवर्तन प्रक्रिया को सक्रिय करके वह दिव्य चेतना अपने विराट, सूक्ष्म एवं कारण स्वरूप में जा मिली।

सूक्ष्म जगत में युगऋषि पंच प्राणों से विकसित पाँच वीरभद्रों के रूप में और कारण जगत में महाप्रज्ञा के दिव्य प्रवाह के रूप में प्रज्ञावतार का लीला संदोह चल रहा है। वह अपने ढंग से प्रखर से प्रखरतर होता जा रहा है। उस लीला संदोह का मर्म समझने के लिए युगऋषि द्वारा अन्तिम चरण में लिखे गये साहित्य, प्रज्ञोपनिषद (प्रज्ञापुराण) और क्रान्तिधर्मी साहित्य को प्रत्यक्ष माध्यम बनाया जा सकता है। यहाँ प्रज्ञोपनिषद के प्रकाश में नैष्ठिक परिजनों को अगले अधिक महत्वपूर्ण चरण के दायित्वों का बोध करने का प्रयास किया जा रहा है।

संकट का मूल कारण

प्रत्यक्ष जगत में सभी प्राणियों में मनुष्य को श्रेष्ठ-वरिष्ठ बनाया गया है। यह तथ्य लगभग सभी धर्म-सम्प्रदाय और आदि ग्रन्थ स्वीकार करते हैं। मनुष्य सृष्टि बना तो नहीं सकता, किन्तु सृष्टा ने सृष्टि की रचना करके उसका संतुलन बनाये रखने की विशिष्ट क्षमता मनुष्य को दी है। उस विशिष्टता के कारण ही उसे वरिष्ठ माना जाता है। युगऋषि प्रज्ञोपनिषद खण्ड-१, अध्याय-१ श्लोक २४-२६ में वर्तमान संकटों का कारण मनुष्य की उस वरिष्ठता के अभाव को कहा है:-

"मनुष्य की वरिष्ठता श्रद्धा, प्रज्ञा और निष्ठा पर  अवलम्बित है। इन्हीं की न्यूनाधिकता से उसका व्यक्तित्व गिरता-उठता है। उसी (व्यक्तित्व) के उठने-गिरने से उत्थानजन्य सुखों और पतनजन्य दु:खों का वातावरण बनता है। इन दिनों मनुष्य ने अपनी आन्तरिक वरिष्ठता गवाँ दी है, इसीलिए स्वयं अपने तथा सबके लिए संकट उत्पन्न कर रहे हैं।"(प्र.१/१/२४-२६)

युगऋषि ने श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा की व्यावहारिक, सहज व्याख्या इस प्रकार की है -

श्रद्धा - उच्च आदर्शों से असीम प्यार। उच्च आदर्शों का समुच्चय ही परमात्मा है। इसी नाते श्रद्धा को परमात्मसत्ता से असीम प्यार भी कहा जाता है। जिसके प्रति सच्चा प्यार होता है उसके अनुरूप बनने, उससे जुड़े रहने के लिए व्यक्ति हर कीमत चुकाने के लिए प्रसन्नतापूर्वक प्रयासरत रहता है।

प्रज्ञा - दूरदर्शी विवेकशीलता। जिससे प्यार है उन आदर्शों दिव्यता को पाने, उनके अनुरूप बनने का सही मार्ग इसी दूरदर्शी विवेकशीलता से मिलता है। उसके अभाव में तो मनुष्य तात्कालिक सुखों-आकर्षणों के मोह में फँस कर लक्ष्य से भटक जाता है।

निष्ठा-
इष्ट (उच्च आदर्शों या परमात्मसत्ता) की निकटता पाने के लिए विवेकपूर्ण मार्ग पर निरन्तर बढ़ते रहने की साहसिकता भरी तप साधना।

श्रद्धा से इष्ट लक्ष्य निश्चित होता है, प्रज्ञा उसका प्रामाणिक मार्ग सुझाती है और निष्ठा उस प्रगति पथ पर निरंतर आगे बढ़ाती रहती है। इन तीनों के समन्वय को च्आस्थाज् कहा जाता है। मनुष्य की आस्था अपनी वरिष्ठता पर से डिग गयी है। इसीलिए प्र. १/१/२८ में भगवान विष्णु कहते हैं-

"इस बार सुविधा साधन रहते हुए भी मनुष्य को जिस विनाश-विभीषिका में फँसना पड़ रहा है, उसका मूल कारण 'आस्था संकट' ही है। संकट के निवारण के लिए इसी 'आस्था संकट' से मनुष्य को उबारने की आवश्यकता है।"

भटकाव से बचाव

यह बात सत्य है कि किसी भी लक्ष्य को पाने के लिए उसके अनुरूप सुविधा साधन-सामर्थ्य की जरूरत होती है। लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उनका विकसित करना या पाना उचित भी है। किन्तु दूरदर्शी विवेकशीलता के अभाव में मनुष्य सुविधा, साधनों, सामर्थ्य को ही साध्य मानने लगता है। लक्ष्य भूल जाने के कारण संसाधनों का दुरुपयोग होने लगता है और उन्नति के स्थान पर दुर्गति पनपने लगती है।

प्रज्ञा के अभाव में मनुष्य आदर्शों के स्थान पर संसााधनों को ही प्यार करने लगता है। सारा पुरुषार्थ उसी दिशा में लगा देता है। इतिहास साक्षी है, कभी असुर साधन सम्पन्न थे, समर्थ थे, किन्तु अविवेक के कारण साधन-सुविधाओं, माध्यमों को ही लक्ष्य मान बैठे और पतन के गर्त में गिरे। वे अपने लिए और सारे समाज के लिए संकट पैदा करते रहे।

आज भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। मनुष्य सुविधा-साधनों, सामर्थ्य को ही इष्ट मान बैठा है। यही अनास्था मनुष्यता और समूची धरती के अस्तित्व के लिए संकट का कारण बन गयी है। अनास्था ही व्यापक रूप में असुरता की भूमिका निभा रही है। प्र. १/१/२९ में भगवान इसीलिए कहते हैं कि :-

"उस (अनास्था रूपी असुरता) के निवारण के लिए मुझे इस अस्थिर समय में इस बार 'प्रज्ञावतार' के रूप में अवतरित होना है।"

प्रज्ञावतार का लीला संदोह चल रहा है। उसे ठीक से समझने, अपनाने और उस आधार पर अपने प्रभाव क्षेत्र के व्यक्तियों को समझाने और सन्मार्ग पर गतिशील करने के लिए अग्रदूतों को तैयार करना जरूरी है। युगऋषि ने कहा है कि इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अवतारी चेतना के सहयोगी के रूप में वरिष्ठ आत्माओं को भी भेजा जाता है। श्रीराम के साथ भीलों, रीछ-वानरों भक्तों को भेजा गया था। श्रीकृष्ण के साथ ग्वाल-वालों, पाण्डवों ने यही भूमिका निभाई थी। प्रज्ञावतार के साथ भी ऐसी आत्माओं को भेजा गया है। इस सम्बन्ध में प्र.१/१/३२-३३ में लिखा है :-

"इसके लिए वरिष्ठ आत्माएँ चाहिए। इन दिनों उन्हीं को खोजा जाना, उभारना और सामर्थ्यवान बनाना है, जिससे कि वे अपने प्रभाव-वर्चस से समूचे समुदाय की दिशा बदल सकें। समूचे वातावरण में परिवर्तन प्रस्तुत कर सके।"

प्रज्ञावतार की योजनानुसार 'प्रज्ञा अभियान' चलाया जा रहा है। इसके लिए मिलकर समर्थ प्रज्ञावतार के साथ साकार नैष्ठिक शरीरधारी साधकों को सक्रिय होना पड़ता है। इसे युगऋषि ने भगवान के साथ साझेदारी कहा है। प्र. १/१/३४-३५ में भगवान इस बात को स्पष्ट करते हैं :-

"हे नारद इसके लिए हम लोग संयुक्त प्रयास करें। हम प्रेरणा भरें, आप सम्पर्क साधें और उभारें। इस प्रकार वरिष्ठ आत्माओं की प्रसुप्ति जागेगी और वे युग मानवों की भूमिका निभा सकने में समर्थ हो सकेंगे।"

प्रज्ञावतार की चेतना सक्रिय है। प्रेरणा देने और आवश्यकता के अनुसार शक्ति अनुदान देने का कार्य उन्होंने ही संभाल रखा है। नैष्ठिक साधकों, प्रमुख साझीदारों को जन-जन से सम्पर्क करके सूचित करने, उनके उत्साह को उभारने का कार्य क्रान्तिकारी ढंग से करना है।

बढ़ते चरण
नारद जी ने प्रभु से पूछा कि आपकी बात समझ में आ गयी। अब उसके व्यावहारिक चरण समझायें। वरिष्ठों को कैसे ढूढ़ा जाय? उन्हें क्या सिखाया जाये और क्या कराया जाये? प्र. १/१/३८-३९ में भगवान कहते हैं :-
"युग सृजन का अभियान आरंभ करना चाहिए। जिनमें पूर्व संचित संस्कार होंगे, वे युग निमंत्रण सुनकर मौन बैठे न रह सकेंगे, उत्सुकता प्रकट करेंगे और समीप आवेंगे, जुड़ेंगे।"

यह क्रम चल पड़ा है। जनसम्पर्क द्वारा, पत्रिकाओं और युग साहित्य द्वारा छोटे-बड़े संस्कार, सत्संग एवं यज्ञायोजनों द्वारा संदेश प्रसारित हो रहा है। भटके हुए एवं उदासीन समाज में से बड़ी संख्या में नर-नारी उत्सुकता प्रकट करते और समीप आते हैं। समीप आने वालों के अन्दर वरिष्ठता को उभारने का अगला महत्त्वपूर्ण क्रम भी तो पूरा करना है। उनकी श्रद्धा-प्रज्ञा-निष्ठा जाग्रत् हो जाये कि युग परिवर्तन के लिए आवश्यक आत्मनिर्माण और विश्वनिर्माण करने का क्रम वे सहज ही अपना सकें।

लगता है हम प्रारंभिक चरणों में  ही अटक गये हैं। शायद हम यह भूल गये कि सम्पर्क एवं प्रचारात्मक कार्यक्रमों का उद्देश्य वरिष्ठ आत्माओं को खोजना, उनके अन्दर की वरिष्ठता को उभारना और उन्हें नवसृजन के अग्रदूतों की भूमिका निभाने के लिए समर्थ बनाना भी है। हमारी प्रज्ञा भी कहीं कुंठित होकर प्रचार माध्यमों को ही साध्य मानने लगी है। हमें इस अविवेक को छोड़कर अपने अधूरे प्रयास को पूर्णता की तरफ संकल्पपूर्वक बढ़ाना चाहिए।

उत्सुकता दिखाने वाले, निकट आने वालों को सत्पात्र समझकर उन्हें च्महाप्रज्ञा ज् की साधना में लगाने की बात प्र. १/१/४०-४५ में कही गयी है। इस नाते हम सम्पर्क में आने वालों को 'गायत्री मंत्र' याद करा देते हैं। उसके जप की प्रेरणा दे देते हैं। यह क्रम ठीक है, किन्तु इसे आधा-अधूरा ही कहा जायेगा। प्रज्ञोपनिषद में प्रभु कहते हैं :-

"सत्पात्रों को उस 'तत्त्वज्ञान' को सार-संक्षेप में हृदयंगम कराया जाय जिसे अमृत कहा गया है। जिसकी तुलना सदा पारसमणि और कल्पवृक्ष से होती रही है।

तत्वज्ञान से प्रज्ञा जागती है। प्रज्ञावान आत्मनिर्माण में जुट जाता है। जिसके लिए आत्मनिर्माण कर पाना संभव हो सका है, उसके लिए विश्वनिर्माण की भूमिका निभा सकना अति सरल हो जाता है, भले ही वह बाहर कठिन दीखती हो।

 ज्ञान ही कर्म बनता है। कर्म से प्रयोजन पूरे होते हैं, इसमें सन्देह नहीं। उस सद्ज्ञान की देवी 'महाप्रज्ञा' है, इन दिनों  जिनकी उपासना, साधना और आराधना का व्यापक क्रम बनाना चाहिए। (४०-४५)"

आत्म समीक्षा करें :
-निश्चित रूप से गायत्री महामंत्र में अमृत, पारस, कल्पवृक्ष कहा जाने वाला तत्त्वज्ञान भरा है, किन्तु मंत्र याद करा देना, उसका जप चालू करना या करा देना भर पर्याप्त तो नहीं। उसकी उपासना, साधना और आराधना का क्रम भी तो विकसित किया जाना चाहिए।

उपासना से श्रद्धा परिपुष्ट होनी चाहिए। आदर्श ही वरणीय लगने चाहिए।
 
साधना से प्रज्ञा प्रखर होनी चाहिए। आत्मसमीक्षा, आत्मशोधन, आत्मनिर्माण और आत्मविकास की प्रक्रिया क्रमश: तीव्र और प्रभावी होनी चाहिए।

आराधना से निष्ठा परिपक्व होनी चाहिए, जो बिना विचलित हुए, बिना रुके, निरंतर लोक कल्याण के पथ पर गौरव और हर्ष का अनुभव करते हुए बढ़ती रह सके।

जो तत्वज्ञान गायत्री मंत्र में है। वह न्यूनाधिक मात्रा में बौद्धों की सम्यक साधना, ईसाइयों की ईश प्रार्थना (गॉड्स प्रेयर) और इस्लाम के सूरह फातेहा में भी मिल सकते हैं। प्रारंभ में हर मतावलम्बी को उन्हीं की श्रद्धा के अनुरूप माध्यमों से उस दिशा में प्रेरित करना उचित होता है। एक बार क्रम चल पड़ने पर प्रभु चेतना उसे आगे बढ़ाती रहती है। प्र. १/१/४८-५१ में भगवान कहते हैं -

"हे तात! सर्वप्रथम दिग्भ्रान्तों को यथार्थता का आलोक दिखाना और सन्मार्ग अपनाने के लिए तर्कों और तथ्यों सहित  मार्गदर्शन करना है। दूसरे चरण का उपाय यह है कि पहले आधार पर उभरे हुए उत्साह को किसी सरल कार्यक्रम में जुटा देना है, ताकि वे युगधर्म से परिचित और उसके अभ्यस्त हो सकें। इन दो चरणों के उठ जाने पर आगे की प्रगति का आधार मेरी अवतरण प्रक्रिया, युगान्तरीय चेतना स्वयमेव सम्पन्न करा लेगी।

यह कार्य ईश्वर के साथ साझेदारी का है, यदि हम युगऋषि द्वारा सुझाये गये पहले और दूसरे चरण को पूरे प्रामाणिक ढंग से करने का संकल्प लें, उसके लिए कौशल विकसित करें, तो निश्चित रूप  से युगान्तरीय चेतना का क्रांन्तिकारी स्वरूप उभर उठेगा।


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