समय बिना मूल्य मिलता है, लेकिन है बड़ा मूल्यवान

Published on 2017-12-15
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समय मनुष्य जीवन की वह मूल्यवान सम्पत्ति है, जिसकी कीमत पर संसार की कोई भी सफलता प्राप्त की जा सकती है। भगवान ने मनुष्य को अपने राजकुमार के रूप में भेजा है और साथ ही समय नाम की ऐसी बहुमूल्य सम्पदा प्रदान की है कि उसके बदले वह संसार का जो भी सुख- वैभव चाहे खरीद सकता है।

मनुष्य का समय, मनोयोग और परिश्रम जिस दिशा में भी लग जायें, उसी में चमत्कार पैदा होगा। संसार के महापुरुषों की प्रधान विशेषता यही रही है कि उन्होंने अपने जीवन का एक- एक क्षण निरन्तर काम में लगाये रखा है। वह भी पूरी दिलचस्पी और श्रमशीलता के साथ। यह रीति- नीति जो आदमी अपना ले और अपने जीवनक्रम की दिशा निर्धारित कर ले वह हर क्षेत्र में सफलता की ऊँची मंजिल पर सहज ही पहुँच सकता है।

महत्त्व समझें, सदुपयोग करें
मनुष्य की सामर्थ्य का अंत नहीं, पर कठिनाई इतनी ही है कि वह चारों तरफ बिखरी और अस्त- व्यस्त पड़ी रहती है। इसका एकीकरण, केन्द्रीकरण जो व्यक्ति कर लेगा, अपनी प्रचुर शक्ति का परिचय सहज ही दे सकेगा। सूर्य की किरणें बिखरी पड़ी हैं इसलिए उनके महत्त्व का पता नहीं चलता, पर यदि एक इंच परिधि में फैली हुई धूप को आतिशी शीशे द्वारा एक केन्द्र्र पर इकट्ठा कर लिया जाये तो तत्काल आग जलने लगेगी और उसे थोड़ा भी र्इंधन मिल जाये तो भयंकर अग्निकाण्ड प्रस्तुत कर देगी। ठीक उसी तरह मनुष्य की बिखरी शक्तियों को यदि किसी विषय पर एकाग्रता और दिलचस्पी के साथ केन्द्रित कर दिया जाये और परिश्रम, पुरुषार्थ एवं तन्मयता के साथ जुट पड़ा जाये तो आश्चर्यजनक सफलता सहज ही सामने उपस्थित हो सकती है।

यों देखते- देखते जिन्दगी के कितने वर्ष ऐेसे ही हँसते, रोते, खाते, खेलते जिन्दगी व्यतीत हो जाते हैं और शरीर यात्रा सम्पन्न करते चलने के अतिरिक्त और कोई महत्त्वपूर्ण कार्य नहीं हो पाता। पर यदि दिनचर्या बनाकर समय के एक- एक क्षण का ठीक तरह उपयोग करने वाला क्रम बना लिया जाये, तो पता चलेगा कि थोड़े ही समय में अभीष्ट दिशा में कितनी बड़ी प्रगति सम्भव कर सकता है, इस पर सुनने से नहीं अनुभव करने से ही विश्वास होता है।

विदेशों में लोग अपने दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर दो घण्टा रोज रात्रि पाठशालाओं में पढ़ने जाते रहते हैं। मामूली श्रमिक और छोटी स्थिति के लोग यह क्रम चलाते रहने पर दस- बीस वर्ष में एम.ए. आदि की उच्च परीक्षाएँ पास कर लेते हैं। जर्मनी के प्रसिद्ध विद्वान एण्डरसन ने एक घण्टा रोज अन्यान्य भाषा सीखने के लिए निर्धारित किया और वे तीस वर्ष में संसार की प्राय: सभी प्रमुख भाषाओं के विद्वान बन गये। अपने देश में संत विनोबा भावे २४ भाषाओं के विद्वान कहे जाते हैं। यह ज्ञान उन्होंने अपने व्यस्त कार्यक्रम में से थोड़ा- सा समय उपर्युक्त ज्ञान सम्पादन के लिए नियमित रूप से लगाकर ही उपलब्ध कर लिया था। यह रास्ता हर किसी के लिए खुला पड़ा है।

आलस्य और प्रमाद में हम बहुत समय गँवाते हैं। जो काम जितनी देर में हो सकता है, सुस्ती और आधे मन से करने पर वह उससे दूने- चौगुने समय में होता है। मुस्तैद ओर फुर्तीला मनुष्य एक घण्टे में दाल- रोटी बनाकर- खाकर निश्चिंत हो सकता है पर आलसी, ढीला और मन्दचर व्यक्ति उसी काम को अव्यवस्थित ढंग से करते रहने पर आधा दिन गुजार देगा। लोग ऐसे ही ऊँघते, सुस्ताते, जैसे- तैसे करते- धरते, छोटे- छोटे थोड़े से कामों में अपना सारा समय बर्बाद कर लेते हैं। जबकि मुस्तैदी और समय का मूल्य समझने वाले व्यक्ति उतने से समय में दस गुने काम निपटाकर रख देते हैं। शिथिलता से समय सिकुड़ता और मुस्तैदी से फैलता है, रबड़ खींचने से लम्बी हो जाती है और छोड़ने से सिकुड़ जाती है। इसी प्रकार ढीले- पोले मन और शरीर को लेकर काम करने से बहुत थोड़ा ही परिणाम निकलता है पर मन और शरीर को एकजुट करके उत्साह के साथ तत्परता दिखाई जाये तो थोड़े समय में कितना अधिक काम कितनी खूबसूरती के साथ सम्पन्न होता है, उसका चमत्कार कहीं भी देखा जा सकता है।

नियमितता जरूरी है
समय के प्रतिफल का सच्चा लाभ उन्हें मिलता है जो अपनी दिनचर्या बना लेते हैं और नियमित रूप से निरन्तर उसी क्रम पर आरूढ़ रहने का संकल्प लेकर चलते हैं। एक दिन एक सेर घी खा लें और एक महीने तक जरा भी न खायें, एक दिन सौ दण्ड पेलें और बीस दिन तक व्यायाम का नाम भी न लें तो उस ज्वार- भाटे जैसे उत्साह के उठने व ठण्डे होने से क्या परिणाम निकलेगा? नियत समय पर काम करने से अन्तरमन को उस समय वही काम करने की आदत भी पड़ जाती है और इच्छा भी होती है। चाय, सिगरेट आदि नशे जो लोग नियमित रूप से करते हैं उन्हें नियत समय पर उसकी तलब उठती है और न मिलने पर बेचैनी होती है। इसी प्रकार नियत समय पर कुछ काम करने का अभ्यास डाल लिया गया है तो उस समय वैसा करने की इच्छा होगी, मन लगेगा और काम ठीक तरह पूरा होगा।

मन्द चाल से चलने वाले कछुए ने तेज उछलने वाले, किन्तु क्षणिक उत्साही खरगोश से बाजी जीत ली थी। यह कहानी नियमित और निरन्तर काम करने वालों पर अक्षरश: लागू होती है। मन्दबुद्धि और स्वल्प साधनों वाले कालिदास सरीखे लोगों ने एक कार्य में दत्तचित होकर नियमित रूप से निरन्तर काम करते रहने का क्रम बनाकर उच्चकोटि का विद्वान और कवि बनने में सफलता पाई। इस तरह की सफलता कोई भी प्राप्त कर सकता है। उसमें कोई जादू- चमत्कार नहीं, केवल व्यवस्थित और नियमित रूप से मनोयोगपूर्वक क्रमबद्ध काम करने का ही प्रतिफल था। यह मार्ग कोई भी अपना सकता है और उन्नति के शिखर तक पहुँच सकता है।

रुचि हो तो अभाव कहाँ?

सामान्यत: रोटी कमाने के लिए आठ घण्टे, सोने के लिए सात घण्टे, नित्य कर्म करने के लिए दो घण्टे माने जायें तो कुल मिलाकर १७ घण्टे हुए। २४ घण्टे में से ७ घण्टे फिर भी बचते हैं, जो लगभग एक पूरे काम के दिन के बराबर होते हैं। व्यक्ति चाहे तो इन ७ घण्टो को किसी भी अभिरुचि के विषय में लगाकर आशातीत सफलता प्राप्त कर सकता है। दो- तीन घण्टे नियमित व्यायाम में लगाने वाले कुछ ही दिन में पहलवान बन जाते हैं। दो- तीन घण्टा रोज स्वाध्याय करने वाले अपने विषय में कुछ ही वर्षों में निष्णात हो जाते हैं। स्कूली परीक्षाएँ पास करते जाने के लिए सामान्य बुद्धि के व्यक्ति का तीन घण्टे का परिश्रम काफी है। रोजी- रोटी कमाते हुए उतना समय आसानी से निकाला जा सकता है। शर्त इतनी है कि किसी विषय में सच्ची रुचि हो और समय को नियमित रूप से लगाने का दृढ़ संकल्प कर लिया गया हो।

लोकसेवा में, आत्मिक आकांक्षाओं की तृप्ति के लिए, जीवनोद्देश्य की पूर्ति के लिए कुछ समय लगाया जाना आवश्यक है। यह भी यदि कोई चाहे तो इसी बचे हुए सात घण्टे के समय में से आसानी के साथ लगा सकता है। पिछले स्वाधीनता संग्राम के नेताओं तथा कार्यकर्त्ताओं में से अधिकांश ऐसे थे जो अपनी रोजी- रोटी भी कमाते थे और उस आन्दोलन में बढ़- चढ़ कर हाथ बँटाते थे। अभी भी युग- निर्माण आन्दोलन के अनेक कार्यकर्त्ता अत्यधिक व्यस्त कार्यक्रम में से बहुत सारा समय निकालकर उतना काम कर डालते हैं जितना कि पूरे आठ घण्टे काम करने वाला कर्मचारी भी नहीं कर सकता। यह केवल लगन और मनोयोग का चमत्कार है। समय सबके पास २४ घण्टे होता है, पर जो उसके सदुपयोग का महत्त्व समझते हैं और थोड़े से भी समय की बर्बादी को अपनी भारी क्षति समझते हैं, उनके लिए उतने ही समय में आश्चर्यजनक मात्रा में काम कर सकना संभव होता है।

फुरसत न मिलने की बात का सिर्फ इतना ही तात्पर्य है कि उस कार्य में दिलचस्पी कम है अथवा हल्के दर्जे का बेकार काम माना गया है। जिस काम को हम महत्त्वपूर्ण समझते हैं उसे अन्य कामों से आगे की पंक्ति में रखते है और उसके लिए पर्याप्त समय आसानी से निकल आता है। थकान भी उन्हीं कार्यों में आती है, जिन्हें बेकार समझकर किया जाता है। किसान १४ घण्टे काम करता है, वो भी हर दिन जीवन भर। पान और दूध की दुकान वाले १४ घण्टे दुकान खोले बैठे रहते हैं, वो भी एक दिन नहीं, जीवन भर। पर न उन्हें थकान आती है न ऊब, कारण उनकी दिलचस्पी भर है।

यदि हम जीवनोत्कर्ष के महत्त्वपूर्ण कार्यों में दिलचस्पी पैदा करें तो उसके लिए समय की कमी न रहेगी। नियमितता और व्यवस्था से भरी दिनचर्या बनाकर कोई भी व्यक्ति समय का सदुपयोग कर सकता है और अभीष्ट दिशा में आश्चर्यजनक प्रगति कर सकता है।

अहंकार के अतिसूक्ष्म मार्ग और प्रवेश द्वार
'भगवन्!'


तथागत एक वृक्ष के नीचे नीरव संध्या में मौन बैठे थे। अचानक आवाज़ सुनकर वक्ता की ओर देखने लगे। "आज सुबह के प्रवचन में आपने कहा था कि त्याग से ही जीवन में आनन्द के फूल खिलते हैं और संगीत के स्वर मुखर होते हैं। अब मैं अपना सबकुछ छोड़कर आपके पास आ गया हूँ। मैंने अपनी सम्पदा, उत्तराधिकार, माता- पिता और पत्नी- पुत्री के मोह जाल का छेदन कर दिया है। अब मुझे दीक्षा दीजिए।"

अमिताभ शून्य की ओर देखते हुए तथागत बोले, "अभी त्याग पूरा नहीं हुआ है। एक अंश भी नहीं छूटा। पहले त्याग करने वाले का ही त्याग करना पड़ता है, तभी सम्यक त्याग संभव है।

ऐसी ही एक घटना है। एक धनी व्यक्ति ने महात्मा सुकरात की सादगी से प्रभावित होकर अपनी धन- सम्पदा का त्याग कर दिया। सादगी और त्याग की वास्तविकता से दूर वह फटे कपड़ों में रहने लगा। महात्मा सुकरात ने उसे देखकर कहा, "तुम्हारे फटे हुए वस्त्रों में से सिवाय अभिमान के और कुछ नहीं झाँकता है।"

वस्तुत: अहंकार के मार्ग अति सूक्ष्म हैं, जो त्याग को भी अपना प्रवेश द्वार बना लेता है। अहंकार के सारे मार्ग बंद हो जाते हैं तो वह त्याग के रास्ते ही मन में प्रवेश कर जाता है। त्याग का अहंकार व्यक्तित्व के विकास की एक बहुत बड़ी बाधा है।


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