हम प्रकाश की ओर ही चलें

Published on 2017-12-30
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सुख- दु:ख का कारण
दु:ख का एक कारण है अज्ञान। अज्ञान- अर्थात् किसी वस्तु के वास्तविक स्वरूप को न जानना। वास्तविकता का ज्ञान न होने से ही मनुष्य गलती करता है और दण्ड पाता है। यही दु:ख का स्वरूप है अन्यथा परमात्मा न किसी को दु:ख देता है, न सुख। वह निर्विकार है, उसकी किसी से शत्रुता नहीं जो किसी को कष्ट दे, दण्ड दे।

प्रकाश ज्ञान का प्रतीक है इसीलिये वह उपासनीय है। परमात्मा प्रकाश- रूप में, ज्ञान- रूप में ही सर्वत्र व्याप्त है। जो उसे इस रूप में जानते और भजन करते हैं उनका अज्ञान दूर होता है। अज्ञान दूर होने से मनोविकार मिटते हैं, दोषपूर्ण कार्य नहीं होते, फलस्वरूप उन्हें किसी प्रकार की यातना भी नहीं भुगतनी पड़ती। ज्ञानवान् परमात्मा की सृष्टि को मंगलमय रूप में देखता है। उसके लिये इस सृष्टि में आनन्द ही आनन्द होता है।

दीपक की प्रेरणा-
ज्ञान की उपासना
भारतीय- संस्कृति में दीपक का जो असाधारण महत्त्व है वह इसी दृष्टि से है। दीपक जीवन के ऊर्ध्वगामी होने, ऊँचे उठने और अन्धकार को मिटा डालने की प्रेरणा देता है, इसलिये वह प्रत्येक मंगल कार्य में प्रतिष्ठित होता है। भावार्थ यह है कि मनुष्य प्रकाश की व्याख्या को समझे। संसार में जो अन्तर्निहित ज्ञान है, उसे अपने हृदय में प्रवेश होने दे। जब तक मनुष्य के लिये यह सत्य प्रकट नहीं होता, तब तक उसके जीवन का कुछ मूल्य नहीं होता।

दीपक कहता है कि तुम्हारे अन्दर जो प्राण जलता है, जो सत्, चित् और आनन्दमय है तुम उसे ढूँढ़ो, जानो और अपने जीवन के अभावों को दूर कर लो। प्रकाश में सब कुछ साफ और स्पष्ट दिखाई देता है। भय नहीं लगता। ज्ञान से मनोविकार शान्त होते हैं और सांसारिक शूल मिटते हैं। इसलिये जब यह कहा जाता है कि दीपक की उपासना करो, तो उसका संकेत ज्ञान की उपासना ही होती है। ज्ञान,अर्थात् प्रकाश ही परमात्मा का दिग्दर्शन स्वरूप है। इसलिये प्रकाश की पूजा परमात्मा की ही पूजा हुई।

एक तत्त्व, अनेक रूप
प्रकाश ही एक तत्व है जो विभक्त होकर दृश्य और द्रष्टा बन गया है। वह परमात्मा भी है और मनुष्य शरीर में प्रतिष्ठित आत्म- चेतना भी। ऋग्वेद का मन्त्र दृष्टा लिखता है-

अयं कविरकविषु प्रचेता- मर्त्त्येप्वाग्निरमृतो नि धायि।
समानो अत्र जुहुर: सहस्व: सदा त्वे सुमनस: स्याम।। ऋग्वेद ७/४/४


अर्थात् हे प्रकाश रूप परमात्मा! तुम अकवियों में कवि होकर, मृर्त्यों में अमृत बनकर निवास करते हो। हे प्रकाश स्वरूप! तुम से हमारा यह जीवन दु:ख न पाये। हम सदैव सुखी बने रहें।

विश्व में व्याप्त परम- तेज की गाथा ऋषि दार्शनिकों ने पग- पग पर की है। माण्डूक्य उपनिषद् में सृष्टि और तेज दोनों को कार्य और कारण माना है। सृष्टि फल है तो प्रकाश उसका बीज। दोनों एक- दूसरे में लिपटे हुये हैं। न प्रकाश से संसार विलग है, न संसार से प्रकाश अलग है। दोनों प्रेम और परमात्मा की तरह अलग- अलग दिखाई देते हुए भी एकरूप हैं।

जीवन की गति को बदलें
पर हम उस पूर्ण प्रकाश को देख नहीं पाते, क्यों? इसलिये कि हमारा गमन अंधकार की ओर है। अंधकार अज्ञान का वैसा ही प्रतीक है जैसा ज्ञान का प्रकाश। बाह्य जीवन में बुरी तरह भटके होने का नाम अज्ञान है। हम आन्तरिक सत्य को न ढूँढ़कर भौतिक सुखों से चिपटे हुये हैं। उन्हें छोड़ने को जी नहीं करता। वह अंधकार की ओर बढ़ना हुआ। अधियारे में साफ नहीं सूझता। कहीं पत्थर से टकरा जाते हैं, कहीं ऊँचे- नीचे में लड़खड़ा जाते हैं। कहीं पाँव में काँटा चुभ जाता है, तो कहीं फिसलकर गिर पड़ते हैं। अंधकार के गर्भ में दु:ख ही दु:ख भरा है इसलिये वह अवांछनीय है, घृणित और त्याग देने योग्य है।

अग्नि में वह शक्ति है कि वह लोहे के किसी बड़े टुकड़े को पिघलाकर छोटे- छोटे टुकड़े कर दे या अनेक टुकड़ों को जोड़कर एक कर दे। कण- कण में जीवन बिखेरने या उन्हें समेटने, एक कर देने का कार्य प्रकाश द्वारा होता है। इस प्रकाश की प्राप्ति ही हमारा जीवनोद्देय है।

सूर्य की विपरीत दिशा में छाया की ओर बढ़ने पर छाया तो हाथ नहीं आती, सूर्य भी दूर हटता जाता है। पर जब सूर्य की ओर बढ़ते हैं तो रास्ता भी साफ दिखाई देता है, सूर्य की समीपता अनुभव करते हैं और भोग- रूपी छाया भी पीछे- पीछे चलने लगती है। जिस प्रकाश के न होने से मार्ग भ्रष्ट हो जाता है वह यह आत्मज्ञान या ईश्वर- प्राप्ति ही है। इसलिये प्रार्थना की जाती है-

तव त्रिधातु पृथिवी उतद्यौर्वैश्वानर व्रतमग्ने सचन्त।
त्वम् भासा रोदसी अततन्थाजस्रेण शोचिषा शोशुचान:।।

अर्थात् हे वैश्वानर देव! वह पृथ्वी अन्तरिक्ष तथा द्युलोक तुम्हारा ही अनुशासन मानते हैं। तुम प्रकाश द्वारा व्यक्त होकर सर्वत्र व्याप्त हो। तुम्हारा तेज ही सर्वत्र उद्भासित हो रहा है, हम तुम्हें कभी न भूलें।

प्रकाश की अन्त:चेतना में सत्य और चेतना के साथ सौन्दर्य भी है। अज्ञान अंधा और कुरूप है, उस पर सदैव प्रकाश शासन किया करता है। व्यावहारिक जीवन में भी ज्ञानवान् ही अज्ञानियों पर विजयी होते है। ज्ञान का ही सर्वत्र आदर होता है, वह इसी रूप में है। सौन्दर्य सबको मधुर और प्यारा लगता है। सब उसकी ओर आकर्षित होते हैं और उसके समीप कुछ क्षण बिताना चाहते हैं। अपने इस रूप में वह लौकिक सुखों का दाता बन जाता है। इसलिये यह आवश्यक हो जाता है कि अंधकार की ओर न जाकर प्रकाश की ओर गमन करें। तब यह प्रकाश ही आनन्द बनकर जीवन में ओत- प्रोत हो जाता है।

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