Published on 2018-02-09
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मनुष्य छोटा अवतार है
मनुष्य का अवतरण- ईश्वरीय अवतार धारण का ही छोटा स्वरूप है। ईश्वर अवतार लेता है धर्म के संस्थापन और अधर्म के निराकरण के लिए, साधुता का परित्राण और दुष्कृतों का शमन करने के लिए। भगवान की लीलाएँ इसी का ताना- बाना बुनने के लिए बनती, चलती हैं। अवतार अतिरिक्त ईश्वरीय शक्ति लेकर निजी मोद- प्रमोद के लिए नहीं आते, वरन् उस सामर्थ्य का उपयोग सृष्टि संतुलन के लिए ही करते हैं।

मनुष्य निश्चित रूप से एक छोटा अवतार है। समस्त प्राणियों की तुलना में उसे जो अतिरिक्त मिला है, उसे विशुद्ध रूप से दिव्य प्रयोजनों के लिए दी गई पूँजी की अमानत ही समझा जाना चाहिए। जिस प्रकार हम अवतारी देवदूतों को असाधारण क्षमताओं से भरा- पूरा देखते हैं, ठीक उसी प्रकार जीव- जगत के समस्त सदस्य मनुष्य को धरती पर विचरण करने वाले देव सम्पदा सम्पन्न सत्ता के रूप में देख- समझ सकते हैं। यह असाधारण अनुदान उसे अकारण ही नहीं मिला होता। उसके पीछे निश्चित रूप से ईश्वर प्रदत्त कर्त्तव्य और महान् उत्तरदायित्व जुड़े होते हैं।

बंधन मुक्ति का स्वरूप

माया उसी भ्रान्ति का नाम है जो आत्मा के स्वरूप, कर्त्तव्य और लक्ष्य को भुला देती है। वासना और तृष्णा के हेय आकर्षणों में फँसा देती है। लोभ और मोह के भवबन्धनों में बाँध देती है। दूसरी ओर माया के जाल- जंजाल से छुटकारा पाकर जीवन के स्वरूप, संसार के व्यक्तियों तथा पदार्थों के साथ अपने सम्बन्धों का यथार्थता के आधार पर निर्धारण करना ही मुक्ति है।

मुक्ति को परम पुरुषार्थ माना गया है। उसमें लोक- प्रवाह से उलटी दिशा में सोचने और चलने का साहसिक पराक्रम करना पड़ता है। अपना चिन्तन और कर्तृत्व लोगों के अनुकरण या परामर्श पर निर्धारण न रहने देकर विवेकभरी दूरदर्शिता के सहारे निश्चित करना पड़ता है। जो ऐसा कर सकें, समझना चाहिए कि वह जीवित रहते हुए भी मोक्ष का महान् अनुदान प्राप्त कर सकने में सफल हो गया।

आमतौर से लोगों का सारा चिन्तन- सारा कर्तृत्व शरीर और मन की आकांक्षाएँ पूरी करने में ही लगता है। उन्हें इन्द्रियजन्य वासनाओं की पूर्ति और मनोगत तृष्णाओं को जुटाने के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं। परिणाम स्वरूप शोक- संताप, अभाव, दारिद्र्य, क्लेश- कलह की ठोकरें पग- पग पर लगती हैं। शरीर को रोग और मन को उद्वेग घेरे रहते हैं।

सामाजिक दायित्व अनुभव कीजिए

समाज के प्रति हर मनुष्य का प्रचण्ड कर्त्तव्य है। उसे संसार को सुखी, समुन्नत और सुन्दर बनाने के लिए अपनी अधिकाधिक क्षमताएँ और विभूतियाँ लगानी चाहिए। यही तो मानव- जीवन के दिव्य अवतरण का एकमात्र उद्देश्य है। पर होता यह है कि इन्द्रियजन्य लिप्सा- वासना, मनोगत अहंता- तृष्णा की पूर्ति में ही अधिकांश क्षमता समाप्त हो जाती है। रही बची परिवार की संख्या बढ़ाने और उन्हें अमीर, उमराव स्तर का बनाने के लिए तानाबाना बुनने में चुक जाती है। ऐसी दशा में जीवनोद्देश्य की पूर्ति के लिए, लोकमंगल के लिए कुछ करना सम्भव ही नहीं हो पाता है।

इस विडम्बनाग्रस्त जीवन जंजाल में अन्तरात्मा के मनोस्थल सदा कराहते रहते हैं। निर्वाह के आवश्यक साधन रहते हुए भी ऐसा लगता है मानो वह मरघट में रहकर अशान्त जीवन जी रहा हो; न कहीं चैन, न शान्ति न सन्तोष। भीतर ही भीतर कोई काटता, कचोटता रहता है, जिसकी प्रतिक्रिया बाहरी जीवन में पग- पग पर झल्लाहट के रूप में प्रकट होती है। इस अन्तर्व्यथा से बचने के लिए कितने ही लोग गम गलत करने के लिए नशा करते हैं, कभी भड़काने वाले मनोरंजनगृहों का चक्कर काटते हैं, कभी ताश- शतरंज जैसे व्यसनों में भीतरी कसक को भुलाने का प्रयत्न करते हैं, पर वे सभी साधन मृग तृष्णावत् लगते हैं।

हम भ्रान्तियों से भरा- पूरा मायाग्रस्त जीवन जीते है। शरीर, मन, परिवार, समाज, भगवान किसी के भी प्रति हमारा दृष्टिकोण सही नहीं है। किसी भी क्षेत्र में सही रीति- नीति नहीं अपनायी जा सकी, इसका एकमात्र कारण आत्मा और संसार के साथ अपने संबंधों को ठीक तरह न समझ पाना ही है। इस भ्रान्ति को सुधारना, मायाग्रस्त मन:स्थिति को बदलना और लोक- व्यवहार की रीति- नीति का पुन:निर्धारण करना; यही है अध्यात्म- दर्शन का उद्देश्य। उसे जितना प्राप्त किया जा सके, उतना ही सुख- शान्ति का जीवन जिया जा सकता है।


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