परीक्षा से भयभीत न हों, उसका स्वागत करें, भरपूर लाभ उठाएँ

Published on 2018-02-24
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वह हमारे लिए निर्भयता, प्रामाणिकता, विश्वसनीयता के अनुदान लेकर आती है

मनुष्य की मूल वृत्ति
इस प्रत्यक्ष जगत में मनुष्य को ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति माना जाता है। ईश्वर को महान सृजेता और महान नियंत्रक- व्यवस्थापक (ग्रेट क्रिएटर एण्ड ग्रेट कंट्रोलर- मैनेजर) कहा जाता है। अगणित ब्रह्माण्डों की रचना वह पलक झपकते कर देता है। प्रत्येक ब्रह्माण्ड में करोड़ों सूर्य और उनके सौर मंडल आदि होते हैं। उनमें अगणित तरह के जीव होते हैं। वे सभी उस महान सृजेता के अनुशासन में अपनी- अपनी नियति के अनुसार गतिमान रहते हैं। वह अपने क्रियाकलापों में कभी चूक नहीं करता, इसीलिए उसे अच्युत (अपने स्तर से न गिरने वाला) भी कहा जाता है।

मनुष्य को उसने महान बनाया है। विज्ञान, धर्म, सम्प्रदाय, दर्शन आदि की विभिन्न धाराओं में और अनेक मतभेद हो सकते हैं, किन्तु मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ प्राणी मानने में सभी एकमत हैं। ऊपरी आकार- प्रकार एवं परिस्थितियों में अंतर हो सकते हैं, किन्तु हर व्यक्ति अपने अन्दर दिव्यता लेकर ही आता है।

सनातन धर्म उसे "ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन अमल सहज सुखराशी।" कहता है। ईसाई मनुष्य को 'ईश्वर का वरद पुत्र' और इस्लामपरस्त उसे 'अशरफ़ुल मख़लूकात' (सृष्टि में सर्वश्रेष्ठ) मानते हैं। हर मनुष्य के अन्दर स्वयं एवं स्वाभाविक इच्छा तरंगित होती रहती है कि वह स्वयं की पहचान श्रेष्ठतर, कुशल, विशिष्ट व्यक्ति के रूप में बनाये। वह चाहता है कि वह अपनी महानता, श्रेष्ठता का अनुभव स्वयं भी करे तथा उसके संपर्क में आने वाले व्यक्ति भी उसे अनुभव करें, मान्यता दें। मनुष्य की यह सहज वृत्ति है। इसे अनुचित या अवांछनीय नहीं कहा जा सकता।

परमात्मा भी यही चाहता है कि उसने मनुष्य के अन्दर बीज रूप में जो महानता, दिव्यता स्थापित कर दी है, वह क्रमश: अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित, फलित हो। इसके लिए उसने जीवन के प्रवाह में इसकी व्यवस्था बना दी है। श्रेष्ठता के बीजों को विकसित करने की प्रक्रिया 'प्रेरणा और प्रशिक्षण' के नाम से पहचानी की जाती है। विकसित होने की प्रामाणिकता- विश्वसनीयता को स्थापित करने की प्रक्रिया को 'परीक्षण' कहा जाता है। उस महान सृजेता ने जीवन में समग्रता लाने के लिए बड़ी कुशलता के साथ जीवन- प्रवाह में प्रेरणा, प्रशिक्षण एवं परीक्षण के क्रम जोड़ दिये हैं। अपने अन्दर महानता, श्रेष्ठता जाग्रत करने के इच्छुक हर व्यक्ति को चाहिए कि वे प्रेरणा- प्रशिक्षण के क्रम को समझे, उसको प्रसन्नता और तत्परतापूर्वक अपनाये और भरपूर लाभ उठाये। प्रामाणिकता, विश्वसनीयता और निर्भयता प्राप्त करे।

साधक बनें, ढोंगी नहीं

महानता से युक्त मनुष्य यदि अपनी महानता को स्वयं भी अनुभव करना चाहता है और दूसरों को भी उसका लाभ देना, बोध कराना चाहता है तो इसमें कुछ बुराई नहीं। लेकिन विसंगति तब पैदा होती है जब कि मनुष्य अपने अंदर की महानता को विकसित करने की साधना करने की तत्परता नहीं बरतता और बिना बने ही दिखने की चतुराई बरतने लगता है।

साधक वह जो पूरी तत्परता से बनना चाहता है।
ढोंगी वह जो बिना बने ही दिखना चाहता है।

प्रारंभिक स्थिति में दोनों एक जैसे दिखते हैं। उदाहरण के लिए भक्ति की बात करें। मुझे भक्त बनाना है, इस भाव को जीवंत रखने के लिए व्यक्ति भक्त के प्रतीकों को धारण कर लेता है। अभी वह भगत बना नहीं, लेकिन अपनी स्मृति को बनाये रखने के लिए, उसकी दिशा को सही बनाये रखने के लिए भक्त के स्थूल चिह्न धारण कर लेता है। उसे 'साधक' कहा जायेगा। वह वेश की मर्यादा के अनुसार स्वयं को गढ़ने- ढालने का प्रयास करता रहेगा और क्रमश: प्रामाणिक भक्त के रूप में विकसित होता जायेगा। वह आत्मकल्याण और लोकमंगल के पथ पर सफलतापूर्वक बढ़ता रहेगा।

दूसरा व्यक्ति भक्तों को मिलने वाले सम्मान- सहयोग आदि पाने के लिए वैसा ही वेश बना लेता है, प्रतीक धारण कर लेता है, किन्तु उसका लक्ष्य बनना नहीं है। वह भक्त बने बिना, भक्त दिखकर भक्त को मिलने वाले सम्मान- सहयोग से अपनी अनगढ़ कामनाएँ पूरी करना चाहता है। ऐसे भक्त वेशधारी व्यक्ति को ढोंगी ही कहा जायेगा। वह स्वयं भी भटकेगा और दूसरों को भी भटकायेगा। स्वयं भी ठगा जायेगा और दूसरों को भी ठगेगा।

गुरुसत्ता और परमात्म सत्ता दोनों की ही चाह यह होती है कि मनुष्य महानता के पथ पर प्रामाणिकता के साथ बढ़ता रहे। इसके लिए कदम- कदम पर प्रेरणा एवं प्रशिक्षण के अवसर पैदा किये जाते हैं। इस प्रक्रिया में 'साधक' और 'ढोंगी' दोनों तरह व्यक्ति शामिल हो जाते हैं। इनमें से प्रामाणिक- विश्वसनीय को उभारने के परीक्षण की प्रक्रिया को शामिल किया जाता है। परीक्षा से साधक आत्म सम्मोहन से उबरकर आत्मशोधन- निर्माण और विकास की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए आत्मविश्वास की दिव्यानुभूति तक जा पहुँचता है। परीक्षण के प्रभाव से ही समाज को ढोंगियों से बचने, भ्रमों से उबरकर सही मार्ग पर बढ़ने का सुअवसर मिलता है।

परीक्षित की महिमा

प्रामाणिकता परीक्षित को ही प्राप्त होती है। विश्वास भी परीक्षित के प्रति ही उपजता है। परीक्षित ही निर्भयता का आधार बनता है। कोई दवा तभी प्रामाणिक बनती है, जब वह लम्बे समय तक विभिन्न प्रकार के प्रयोग- परीक्षणों में सफल होती है। कोई अस्त्र- शस्त्र भी तभी प्रामाणिक माना जाता है, जब उसका परीक्षण विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न प्रकार से किया जाता है। परीक्षित का उपयोग बिना शंका के निर्भयतापूर्वक किया जा सकता है।

मनुष्य के बारे में भी यही बात है। युगऋषि ने लिखा है कि मनुष्य की काया तो सहज भी मिल सकती है, किन्तु मनुष्यता कड़ी मेहनत से विकसित होती है। प्रेरणा विकास मार्ग पर ला देती है, प्रशिक्षण उसे आगे बढ़ाता है और परीक्षण उसे प्रामाणिक, विश्वसनीय स्तर तक पहुँचा देता है। विश्वास दो प्रकार के होते हैं।

१. आत्मविश्वास :
अपनी प्रामाणिकता पर स्वयं विश्वास। 'मैं ऐसा कर लूँगा या मैं गलत नहीं करूँगा' यह आत्मविश्वास परीक्षण की अग्नि से पार होने पर ही जागता है। यह मनुष्य को जीवन की तमाम सफलताएँ दिलाता हुआ आत्म साक्षात्कार तक पहुँचा देता है।

२. जनविश्वास : किसी व्यक्ति की प्रामाणिकता पर जनसामान्य का विश्वास होना। यह विश्वास यूँ ही नहीं मिल जाता, इसे अपनी प्रामाणिकता के माध्यम से जीतना पड़ता है। यह विश्वास जिसने अर्जित कर लिया उसे लोकसम्मान, जनसहयोग भरपूर मात्रा में मिलने लगते हैं। इसी के आधार पर आधी धोती पहनने वाला गाँधी राष्ट्रनायक बन जाता है और फक्कड़ विनोबा को भूदान में लाखों एकड़ भूमि सौंप दी जाती है।

यह दोनों विश्वास केवल 'परीक्षित' को ही मिलते हैं। इसलिए जीवन में सफलता, श्रेष्ठता, महानता अर्जित करने के इच्छुक हर व्यक्ति को 'परीक्षित' बनने के लिए पूरे उत्साह और पूरी तत्परता से तैयार रहना चाहिए। 'परीक्षित' की महत्ता ध्यान में रखी जाय, परीक्षित, प्रामाणिक बनने का उत्साह निरंतर बना रहे तो परीक्षा मुसीबत नहीं, उन्नत बनाने वाली सीढ़ी प्रतीत होने लगती है। फिर साधक- विद्यार्थी किसी अन्य द्वारा परीक्षा लिए जाने की प्रतीक्षा नहीं करता, स्वयं हर चरण पर आत्मपरीक्षण की व्यवस्था स्वयं बनाता है। स्वयं की प्रामाणिकता पर इतना विश्वास बढ़ा लेता है कि लौकिक परीक्षा उसे सहज लगने लगती है और परीक्षा भय, तनाव, अवसाद का कारण नहीं बनती, प्रामाणिक, विश्वस्त बनने की उत्साहवर्धक प्रक्रिया बनने लगती है।

कुछ प्रामाणिक सूत्र
ऋषियों, विचारकों, सत्पुरुषों ने जीवन को एक विद्यालय मानने तथा उसमें विद्यार्थी या शिक्षक की भूमिका निभाते रहने की सलाह दी है। शिक्षक को भी विकसित विद्यार्थी की मानसिकता में ही रहना चाहिए। हम जो जानते हैं, समझते हैं, उसे दूसरों को सिखाना, समझाना है, लेकिन अपने वर्तमान स्तर से ऊपर उठने के लिए सीखते भी रहना है। सीखने के प्रयास से अपना ज्ञान परिपक्व होता है, इसलिए सीखने वाले को सिखाने का उत्साह और कौशल भी विकसित करना चाहिए। सारांश यह कि चाहे स्कूल के विद्यार्थी हों अथवा जीवन के विद्यार्थी- 'निरंतर ग्रहणशील और जिज्ञासु बने रहें।'

जिज्ञासा :
जीवन के सत्य समझने की उत्कट, अदम्य इच्छा। यह होने पर अपनी ग्रहणशीलता, पात्रता बढ़ती रहती है। इसी को देखकर लौकिक शिक्षक अथवा अलौकिक शक्तियों के विशेष अनुदान मिलते हैं।

उपयुक्त तैयारी : कहा जा चुका है कि प्रेरणा- प्रशिक्षण को प्रामाणिक स्तर देने के लिए परीक्षा तो आनी ही चाहिए। उसकी समुचित तैयारी करनी चाहिए। तैयारी कई प्रकार की होती है।

एक जब कोई रोग या महामारी फैलने की संभावना होती है तो उससे बचने के लिए भी तैयार होना पड़ता है। इसे अवांछनीय से बचने की तैयारी कहा जा सकता है। इसके मूल में भय रहता है।

दो जब कोई प्रियजन आने वाले होते हैं तो उनके स्वागत के लिए उनके सान्निध्य का लाभ पाने की तैयारी भी की जाती है। इसे वाञ्छित के स्वागत की तैयारी कह सकते हैं। इसके मूल में प्रेम रहता है।

परीक्षा की तैयारी अवाञ्छनीय से बचने वाली नहीं, वाञ्छित के स्वागत वाली तैयारी की तरह करनी चाहिए। इससे भय और तनाव के स्थान पर उत्साह और उल्लास बढ़ने लगता है। भय और तनाव के कारण व्यक्ति की ऊर्जा क्षीण होने लगती है। ऐसी स्थिति अच्छे परिणाम कैसे पाये जा सकते हैं? इसके विपरीत उत्साह एवं उल्लास से व्यक्ति में नयी ऊर्जा का संचार होता है, इससे परिणाम श्रेष्ठतर होने लगते हैं।

आत्म प्रतियोगिता :
परीक्षा में प्रतियोगिता का भाव सहज ही आ जाता है। प्रतियोगिता दूसरों से न करें, इससे खतरा ही खतरा है। यदि प्रतियोगी से पीछे रह गये तो आत्महीनता तथा निराशा घेर लेगी, और यदि आगे निकल गये तो अहंता जकड़ लेगी। दोनों ही विकार प्रगति के लिए बाधक हैं। इन विकारों के कारण व्यक्ति का पुरुषार्थ कमजोर होने लगता है। कार्य के प्रति तत्परता घटने लगती है।

प्रतियोगिता स्वयं से करें। हमने पहले जो किया है उससे अच्छा करेंगे, यह भाव निरंतर उत्साह और संतोष पैदा करता रहता है। यही साधक विद्यार्थी के लिए उचित है।

आत्म परीक्षण :
हमें पहले से अधिक श्रेष्ठ, प्रामाणिक बनना है, इसलिए अपनी परीक्षा स्वयं करते रहें। आत्म परीक्षण में रुचि लेने वाले के लिए बाह्य परीक्षण सहज- सामान्य लगने लगते हैं। यदि कभी बाह्य परीक्षण के परिणाम आशा के अनुरूप नहीं रहे तो भी साधक का आत्मविश्वास डिगता नहीं। वह जानता है कि मैं बेहतर बना हूँ और बेहतर कर सकता हूँ।

डॉ. कलाम साहब पायलेट बनने गये। परीक्षा के परिणाम अनुकूल नहीं निकले। वे चुने नहीं गये। किन्तु उनके आत्मविश्वास ने उन्हें विचलित नहीं होने दिया और प्रगति पथ पर अग्रसर करते हुए उन्हें मिसाइल मैन, भारत रत्न और भारत के राष्ट्रपति स्तर तक पहुँचा दिया।

निरन्तरता : प्रशिक्षण के साथ आत्म परीक्षण की प्रक्रिया निरन्तर चलाई जानी चाहिए। इससे अपनी समीक्षा के आधार पर प्रशिक्षण के क्रम को अधिक प्रभावी ढंग से चलाना संभव होता है। साथ ही परीक्षण की प्रक्रिया अभ्यास में आजाने से उससे भयभीत न होकर पूरी तत्परता से उत्साहपूर्वक उसका लाभ उठाना संभव हो जाता है।

तो स्कूली परीक्षा हो या जीवन प्रवाह की परीक्षायें, सिद्ध, प्रामाणिक सूत्रों को अपनायें और जीवन को धन्य बनाने के ध्येय तक पहुँचें।

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