Published on 2018-02-26
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हल्का- फुल्का जीवन
मानवी सद्गुणों में प्रसन्न रहना मूर्धन्य है। इससे चित्त हल्का रहता है और प्रतिकूलताओं के कारण उत्पन्न होने वाले तनाव से सहज ही बचाव होता रहता है। अपने उत्तरदायित्व को पूरी तरह निबाहते हुए भी व्यक्ति के चिन्तन का स्तर इतना परिष्कृत होना चाहिए कि परिस्थितियों को अनावश्यक महत्त्व न दिया जाय। जो तिल का ताड़ बनाते हैं, सामान्य- सी प्रतिकूलताएँ देखकर चिन्तित, भयभीत, निराश होने लगते हैं, उन्हें वास्तविक कठिनाई से कई गुना कष्ट उठाना पड़ता है। मन:स्थिति को यदि सन्तुलित और हल्का- फुल्का रखा जा सके तो फिर जीवन में आते- जाते रहने वाले प्रिय एवं अप्रिय प्रसंग इतना दबाव नहीं डाल सकते कि प्रसन्नता और सरलता से रहित भारभूत जीवन जीने के लिए विवश होना पड़े।

हँसते- हँसाते रहने की आदत एक दैवी वरदान है। जिसे वह मिला हो उसे बड़भागी ही माना जाना चाहिए। उदार लोग दूसरों को कुछ उपहार देकर उनका दु:ख हरते और आनन्द बाँटते देखे गए हैं। यह कार्य हँसी का उपहार देकर निर्धन व्यक्ति भी सरलतापूर्वक कर सकते हैं। हँसी उनके मन का बोझ हल्का करने में इतनी सहायता करती है जितना मुफ्त में अन्न वस्त्र बाँटने वाले भी नहीं कर सकते। मानसिक स्वास्थ्य का मूल्य शारीरिक आरोग्य से भी बढ़कर है। प्रसन्न रहना अमीरों के वैभव से किसी भी प्रकार कम नहीं है।

विद्वानों, शास्त्रों का मत

हास्य को विद्वान स्टैनिसलार ने आत्मा का गुण कहा है। उनका कथन कितना उपयुक्त है- "अच्छा हास्य आत्मा का हास्य है। उदासी उसके लिए विष है।" आत्मा के परिष्कार, मन:सन्तुलन एवं स्वस्थ रहने के लिए हास्य नि:सन्देह बहुत ही महत्त्वपूर्ण है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से तो जी खोलकर हँसना स्वयं में एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्वास्थ्यप्रद टॉनिक है और हँसते रहने वाले, प्रसन्न चित्त रहने वाले व्यक्तियों का शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है।

चित्त की प्रसन्नता के सम्बन्ध में गीता के अध्याय दो के ६५वें श्लोक में कहा गया है-
"प्रसादे सर्वदु:खानां हानिरस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धि: पर्यवतिष्ठते।।"

अर्थात्- "चित्त प्रसन्न रहने से सब दु:खों की निवृत्ति हो जाती है, उनकी हानि हो जाती है। जिसको आन्तरिक प्रसन्नता, चित्त की प्रफुल्लता, उल्लास प्राप्त हो जाता है उसकी बुद्धि शीघ्र ही स्थिर हो जाती है।" मानसिक सन्तुलन, स्थिरता, समस्वरता बनाये रखने के लिए मन की प्रसन्नता आवश्यक है।

गाँधी जी ने प्रसन्नता एवं हँसी के सम्बन्ध में लिखा है- "हँसी मन की गाँठें खोल देती हैं, हमारे मन की ही नहीं सभी के मन की। हँसी हृदय की ऐसी पवित्र उमंगभरी गंगा है जो सबको शीतलता प्रदान करती है। भीतर का विषाद और अवसाद हँसी के तेज़ झोंकों से रुई के कतरों की भाँति नष्ट हो जाता है।"

तथ्य को समझा जाय तो किसी भी परिस्थिति में आशावादी दृष्टिकोण, सन्तोषवृत्ति एवं उत्साह को अपनाते हुए प्रसन्न और प्रफुल्ल रहा जा सकता है। विपरीत परिस्थितियों में ही तो मानसिक समस्वरता बनाये रखने में चित्त की प्रसन्नता की कसौटी है। अनुकूल परिस्थितियों में तो सभी मोद मनाते रहते हैं। मन की प्रफुल्लता से जीवनी शक्ति में वृद्धि होती है, रोगों से संघर्ष करने की क्षमता बढ़ती है।

मनोवैज्ञानिकों का भी कथन है कि विनोदवृत्ति आत्म- उपचार का सर्वोत्तम माध्यम है। वस्तुत: निर्मल हास्य आन्तरिक उत्कृष्टता से घनिष्ठ रूप से जुड़ा है। दुनिया में जितने भी श्रेष्ठ एवं क्रियाशील पुरुषार्थी लोग हुए हैं, उन सभी में अनवरत सक्रियता, स्वाभाविक स्फूर्ति और सहज विनोद की प्रवृत्ति समान रूप से पायी जाती है।

महात्मा गाँधी और महान वैज्ञानिक चिन्तक आइन्स्टाइन की हँसी को उनके सम्पर्क में आने वाले लोग कभी भी भूल नहीं पाते थे। डॉक्टर राममनोहर लोहिया की बाँकी हँसी उनके अनुयायियों को मुग्ध कर लेती थी। रवीन्द्रनाथ ठाकुर की मुस्कराहट के बारे में भी लोगों का यही कथन है।

श्री गोलवलकर गुरु जी का विनोद, उनकी हँसी न केवल उनके संगी- अनुयायी स्वयंसेवकों को आकर्षित करती थी, अपितु उनके कट्टर विरोधी श्री खुशवन्त सिंह जैसे पत्रकार तक ने उनसे मिलने के बाद इस स्वस्थ परिहास एवं निर्मल हँसी की मुग्धभाव से चर्चा की।

सहज सुलभ, सदैव सुखद

कहा जा सकता है कि यह तो सब ठीक है, किन्तु विपन्नता, अभाव और प्रतिकूलता में विनोदभाव एवं प्रसन्नता कैसे बनी रहे? वस्तुत: स्थिति यह है कि साधन- सम्पन्नता और सुविधा- संरक्षण से प्रसन्नता का कोई अनिवार्य सम्बन्ध नहीं है। ऐसा आये दिन देखने में आता है कि रूखा- सूखा खाने, पहनने वाले भी प्रसन्न और धन- वैभव से सज्जित लोग भी चिड़चिड़े, बेचैन, अधीर, अशान्त होते हैं। अस्थिर अनमन आँखें, तने तेवर, फूलती नसें और खिंची मुखाकृति बड़े अफसरों, धनपतियों और साधन- सम्पन्नों के बीच भी कोई दुर्लभ दृश्य नहीं है। दूसरी ओर आर्थिक कठिनाइयों और तीखे संघर्षों के बीच भी जी- खोलकर हँसने वाले व्यक्तियों की संख्या कुछ कम नहीं है।

विनोद वृत्ति तो भीतरी खुशी का अजस्र झरना है, निरन्तर चलने वाला फव्वारा है। बाहर खुशियों की तलाश के नतीजे अनिश्चित रहते हैं। बाहरी परिस्थितियाँ सदा व्यक्ति के वश में नहीं होतीं। उत्तम मार्ग यही है कि खुशियों का स्रोत भीतर ही प्रवहमान, गतिशील रखा जाय। बाहर खुशी ढूँढ़ना, प्यास लगने पर कुएँ या प्याऊ की तलाश करना है। कुआँ सूखा या खारे जल वाला हो सकता है, पर भीतर बहने वाला निर्मल हास्य का झरना तो तृप्ति के लिए सदा ही उपलब्ध रहता है।

मुस्कराते रहो

मुस्कान भी हँसी का ही एक स्वरूप है। यह सदा बनी रहने वाली स्थिति है। चौबीसों घण्टे खिलखिलाते रहना असम्भव हो सकता है परन्तु सदा मुस्कराते रहना ज्यादा कठिन नहीं है। दर्पण में खिला हुआ मुख कमल देखकर मन आह्लादित हो उठता है। मुस्कराते हुए व्यक्तियों के समीप क्रोध, ईर्ष्या और प्रतिहिंसा फटकती तक नहीं। प्रतिहिंसा की अग्नि को शान्त करने वाली यह अचूक औषधि है। कभी- कभी घर में पति- पत्नी के बीच कलह होती है, या कोई मित्र रूठ जाता है तो मुस्कराने का नुस्खा आजमा कर इस दु:स्थिति को आसानी से सँभाला जा सकता है। मन पर जमा हुआ सारा मैल मुस्कान के जल- प्रवाह में बह जाता है।

इसी तथ्य की ओर इंगित करते हुए श्रीमती एलिजाबेथ सैफोर्ड ने लिखा है कि "सौ वर्ष जीने के लिए चारों ओर से जवान और हँसमुख मित्रों से घिरे रहो।" यही है सफल जीवन के कुछ स्वर्णिम सूत्र, जिन्हें हर किसी को हृदयंगम कर जीवन जीना सीखना चाहिए।


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