Published on 2018-03-28
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महामति प्राणनाथ के माध्यम से उतरी तारतमवाणी में है उसका उल्लेख

एक शृंखला-एक तारतम्य
ईश्वरीय योजना के अन्तर्गत अचानक कुछ चमत्कारी घटनाएँ भले ही देखी जाती हों, किन्तु वास्तव में दिव्य योजना एक शृंखलाबद्ध क्रम में होती हैं। अलग-अलग दिखने वाली घटनाओं में भी एक तारतम्य होता है। दृष्टा स्तर के व्यक्ति उसका संकेत समय-समय पर करते रहते हैं।

रामचरित मानस में इस प्रकार की सम्बद्धता का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। असुरता के उन्मूलन के लिए च्राम जन्मज् की व्यवस्था बनीं। उसी के साथ तमाम देवशक्तियों को यह निर्देश दिए गए कि वे विभिन्न शरीर धारण कर मृत्युलोक में पहुँचें। समय पर उन्हें जाग्रत् करके निर्धारित योजनानुसार विभिन्न भूमिकाओं में लगा दिया जाएगा। वही हुआ भी। वर्तमान नवसृजन की दिव्य योजना भी वैसी ही शृंखलाबद्ध क्रम से लागू की जा रही है। इसके संकेत १६वीं सदी से ही मिलने लगे थे।

संत सूरदास (१४८६-१५८४), फ्रांस के भविष्यवक्ता नेस्ट्रडेमस (१५०३-१५६६) के द्वारा एक श्रेष्ठ युग के आने की संभावनाओं का विवरण समय-समय पर मिलता रहा है। उसी शृंखला में महामति प्राणनाथ या प्राणनाथ महाप्रभु के नाम से प्रसिद्ध सिद्ध महात्मा द्वारा नवजागरण-नवसृजन की ईश्वरीय योजना का प्राकट्य बहुत स्पष्ट शब्दों में काफी विस्तार के साथ किया गया था।

उनके द्वारा घोषित सूत्रों का अध्ययन करने से पता लगता है कि उनमें और वर्तमान समय में च्युगऋषिज् द्वारा घोषित युग निर्माण योजना के सूत्रों में अद्भुत समानता है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि क्षर जगत (स्थूल, नश्वर जगत) में घटने वाली विशेष घटनाओं की सम्बद्धता परोक्ष जगत (अक्षर एवं अक्षरातीत) से होती है। संभवत: इसी सम्बद्धता को प्रकाश में लाने के कारण उनके द्वारा प्रकट पद्यबद्ध सूत्रों को च्तारतम वाणीज् कहा जाता है।

उनका जीवन वृत्त
इतिहासविदों के अनुसार प्राणनाथ महाप्रभु च्प्रणामीज् सम्प्रदाय के प्रणेता और बुन्देलखण्ड के प्रतापी राजा च्छत्रसालज् के आध्यात्मिक गुरु थे। छत्रसाल ने छत्रपति शिवाजी से प्रेरणा एवं मार्गदर्शन प्राप्त करके बुन्देलखण्ड को यवन शासकों से मुक्ति दिलाई थी। कविवर च्भूषणज् ने अपने काव्य में केवल दो ही राजाओं-छत्रपति शिवाजी और छत्रसाल की ही सराहना की है। उन्हीं के शब्दों में-

और राव सब एक मन में न लाऊँ  अब,
साहू को सराहों कि सराहों छत्रसाल को।

जिस प्रकार शिवाजी महाराज को समर्थ गुरु रामदास का संरक्षण-मार्गदर्शन मिला, उसी प्रकार छत्रसाल को प्राणनाथ महाप्रभु से वह सब प्राप्त हुआ। उन्होंने एक दिन सवेरे छत्रसाल को आशीर्वाद देकर कहा था कि आज सूर्यास्त तक तुम जितने क्षेत्र का दौरा कर लोगे, उतनी भूमि च्रत्नगर्भाज् हो जाएगी। छत्रसाल ने उसी क्षण अपना घोड़ा दौड़ाया तथा सूर्यास्त से पहले लौटकर उन्हें प्रणाम किया। पन्ना (अब मध्य प्रदेश का एक जिला) के उस भूभाग में आज भी हीरे निकलते हैं।

पूर्ववृत्त :- उनका जन्म गुजरात प्रान्त में ईस्वी सन १६१८ में हुआ और १६९४ में उन्होंने देह त्यागी। उनका नाम हेमराज ठाकुर था और वे जामनगर राज्य के दीवान पद पर थे। ईर्ष्यालुओं के षड़यंत्र के कारण उन्हें उनके भाइयों के साथ जेल में डाल दिया गया। वे परम सात्विक एवं ईश्वरनिष्ठ व्यक्ति थे। जैसे श्री अरविंद को जेल में दिव्य बोध हुआ था, उसी तरह उन्हें समय-समय पर दिव्य आवेश आने लगे और तारतमवाणी प्रकट होने लगी। उन्हें मुक्त कर दिया गया। वे भ्रमणशील रहे। तारतम वाणी के अनुसार अन्धकार युग (कलियुग) की समाप्ति की ईश्वरी योजना लोगों को समझाते रहे। उनके अनुयायी च्प्रणामीज् कहलाए। बाद में वे छत्रसाल के साथ पन्ना क्षेत्र में रहे।

तारतमवाणी की दिशाधारा
• परब्रह्म की सृष्टि को तीन श्रेणियों में विभक्त माना गया है। गीता में लोकत्रयं (तीन लोकों) के अनुसार यह अवधारणा है। गीता में पृथ्वी, अन्तरिक्ष औ द्युलोक को तारतमवाणी में क्षर, अक्षर और अक्षरातीत कहा है।
• सृष्टि में जीवात्माओं को भी तीन स्तर का माना गया है।

१. जीव सृष्टि : इनकी गति क्षर लोक तक ही है।

२. ईश्वर सृष्टि : इनकी गति अक्षर लोक तक है।

३. ब्रह्म सृष्टि : इनकी गति अक्षरातीत धाम तक है।

• द्वापर युग के बाद कलियुग को अज्ञान जनित रात्रि काल माना गया है। दिव्य आत्माओं को उस काल में सुप्त अवस्था में रखे जाने की बात कही गई है। समय पर दिव्य योजना के अनुसार उन्हें जाग्रत किया जाएगा।

• उस जागरण के  काल को च्जागनीज् की लीला कहा गया है। दिव्य आत्माओं में पुन: सुरता जागेगी (देवत्व का उदय होगा)। पहले ब्रह्म सृष्टि की परात्माएँ (मोमिन, उच्च कोटि की आत्माएँ) अपने अन्दर के संस्कारों के दिव्य प्रकाश (नूर) का अनुभव करेंगी। वे ईश्वर कोटि की आत्माओं को जाग्रत करेंगी और उनके संयुक्त प्रभाव से पूरी जीव सृष्टि में दिव्य प्रकाश फैल जाएगा। श्रेष्ठ युग का फिर से अवतरण होगा।

• यह सब परमात्मा की इच्छानुसार उन्हीं की कृपा से होगा। तारतम वाणी में परमात्म सत्ता को च्हकज् (सत्य) या श्रीराजजी (विश्व नियंता) कहा गया है। उन्हीं की योजनानुसार नवजागरण-नवसृजन का क्रम चलेगा।

• महामति प्राणनाथ जी के समय तक जागनी (नवजागरण) के दो चरण पूरे हुए माने गए हैं। तीसरे चरण में जागनी का क्रम पूरा होने और नवयुग के नवप्रभात के उदय की बात कही गई है।

• दिव्य योजना के अनुसार रात्रि को कुछ लम्बा करके तीसरे चरण को थोड़ा आगे बढ़ाया गया है। तारतम वाणी के अध्येता-समीक्षक इसे २०वीं सदी के उत्तरार्ध में मानते हैं। तद्नुसार युग निर्माण अभियान को जागनी का, नवजागरण का तीसरा एवं अंतिम चरण मानना युक्ति संगत लगता है।

समीक्षात्मक चर्चा
• स्वामी विवेकानन्द ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि ठाकुर (श्रीरामकृष्ण परमहंस) के आने से नवसृजन का क्रम चल पड़ा है।

• योगी श्री अरविंद जी ने कहा कि नवजागरण के लिए मनुष्य का मानस पर्याप्त नहीं, अतिमानस (सुपर कोंशस) का अवतरण होना है। वह प्रक्रिया उन्होंने सन् १९२६ से प्रारंभ मानी। इसी वर्ष युगऋषि की अखण्ड ज्योति प्रज्वलित करके गायत्री के २४ महापुरश्चरण करने की साधना आरंभ हुई। वहीं से तारतम वाणी में दिए गए संकेतों के अनुसार नवजागरण के विविध प्रयोग चल पड़े।

त्रिवेणी संगम : नवसृजन अभियान को उन्होंने त्रिवेणी संगम की उपमा दी। योजना और शक्ति ईश्वर की, मार्गदर्शन एवं संरक्षण ऋषियों का, पुरुषार्थ एवं सहकार जाग्रत आत्माओं का। तारतम वाणी ने इन्हीं चरणों को च्हक का हुक्मज् मोमिनों द्वारा पहल और सज्जनों द्वारा विस्तार कहा गया है।

देवत्व का उदय : युग निर्माण अभियान में श्रेष्ठ आत्माओं के अन्दर सुप्त देवत्व को जगाने की बात तारतम वाणी में परात्माओं में सुरता के जागरण के संकेत का ही प्रायोगिक संस्करण है। मनुष्य में देवत्व के विकास के साथ ही दिव्य योजनानुसार धरती पर स्वर्ग का अवतरण सुनिश्चित होगा।

आत्मशक्ति से युगशक्ति : तारतम वाणी में कहा गया है कि श्रेष्ठ आत्माएँ अपने दिव्य स्वरूप का बोध करेंगी, उसी से उत्पन्न प्रकाश नया सवेरा लाएगा। युगऋषि ने इसी को आत्मशक्ति से युगशक्ति के उदय की प्रक्रिया कहा है।

निष्ठा, प्रज्ञा, श्रद्धा : तारतम वाणी में कहा गया है कि सत्कर्म क्षर जगत का वातावरण सुधारेगा, इल्म लुंदन (सद्ज्ञान, सद्विवेक, प्रज्ञा) आत्माओं को अक्षर जगत से जोड़ेगा और इश्क (दिव्य प्रेम, श्रद्धा) के माध्यम से वे अक्षरातीत लोक स्थित परमात्मा से जुड़ेगी।

सहूर (स्वाध्याय, मनन, चिंतन) : आत्मोन्नति के लिए तारतम वाणी (दिव्य ज्ञान) की महत्त्वपूर्ण भूमिका होने की बात कही गई है। इसका सहूर (अध्ययन, मनन, चिन्तन) करते रहने पर बल दिया गया है। युग निर्माण अभियान में सत्साहित्य का, युग साहित्य का नियमित स्वाध्याय उसी प्रक्रिया का द्योतक है।

अवतरित ज्ञान : तारतम वाणी महामति के माध्यम से दिव्य ज्ञान के अवतरण से प्रकट हुई। प्राणनाथ जी ने कहा कि परम धाम में सम्पन्न खिलवत (बैठक) में हुई 'बत' (बहस-परिचर्चा) का सारांश ही उनके माध्यम से प्रकट हुआ है। युगऋषि कहते रहे हैं कि मैं लेखक नहीं हूँ, मैं तो यहाँ की समस्याएँ लेकर उच्च लोकों में जाता हूँ, वहाँ परिचर्चा में जो समाधान निकलते हैं, उन्हें ही चिट्ठी के रूप में जाग्रत् आत्माओं तक पहुँचाता रहता हूँ। दिव्य ज्ञान का दिव्य स्रोत वही है।

इष्ट सविता : तारतम वाणी में एकमात्र इष्ट 'हक' को स्थापित करने की बात कही गई है। हक को 'मूल प्रकाश' कहा गया है। 'सविता' उसी का शास्त्रीय नाम है। वही सबका उत्पादक एकमात्र इष्ट कहा जा सकता है।

दिव्य प्रार्थना : वाणी में कहा गया है कि 'हक' से जुड़ने की दिव्य बुद्धि, प्रज्ञा केवल अपने प्रयासों से नहीं जागती, उसके लिए च्हकज् की कृपा भी जरूरी है। इसीलिए युगऋषि ने सर्वव्यापी प्रभु से 'धियो यो न: प्रचोदयात्।' (वह प्रभु हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रेरित करे) यह प्रार्थना करवाई है। इस अभियान को विश्वव्यापी बनाकर सभी जाग्रत् आत्माओं को इससे लाभान्वित करने का क्रम बनाया।
 
महत्त्वपूर्ण समय : तारतम वाणी के समीक्षक यह मानते हैं कि जागनी का समय २०वीं सदी का उत्तरार्ध होगा। युगऋषि ने सन् १९८० से २००० तक के समय को युगसंधि काल कहा। उसी बीच उन्होंने सूक्ष्मीकरण साधना की, ताकि दिव्य सूक्ष्म तंत्र को प्रत्यक्ष जगत में सक्रिय किया जा सके। जागनी के तीसरे चरण का समय आने तक तारतम वाणी को प्रकाश में लाने की प्रेरणा प्रणामी सम्प्रदाय में नहीं उभरी। २०वीं सदी में ही उसके अनुवाद, प्रकाश और विस्तार की प्रक्रिया चालू हई।

कयामत विनाश नहीं, नवजागरण : कुरान में १४वीं सदी (हिजरी) के बाद कयामत की बात कही गई है। लोग कयामत को प्रलय से जोड़ते हैं। तारतम वाणी ने कहा कि कयामत का आशय प्रलय नहीं, नव जागरण है। कहा गया है कि कयामत के समय तमाम रूहें जाग जायेंगी। एक नया सवेरा होगा। युगऋषि ने स्पष्ट किया कि मनुष्य की भूलों के कारण भले ही विश्व के विनाश की संभावनाएँ दिख रही हों, किन्तु नियंता को यह मंजूर नहीं। नव जागरण के प्रभाव से श्रेष्ठ आत्माएँ जाग्रत और सक्रिय होंगी। फिर से श्रेष्ठ युग आएगा।
 
जागरण का क्रम : तारतम वाणी में जागरण के क्रम में पहले ब्रह्म सृष्टि स्तर की सुरताओं के जागरण, फिर ईश्वरीय सृष्टि स्तर की आत्माओं के जागरण के प्रभाव से सम्पूर्ण जीव सृष्टि में नूर फैलने की बात कही गई है। युगऋषि ने उन्हें क्रमश: जीवन मुक्त आत्माएँ और जाग्रत आत्माएँ कहा है। वे अग्रदूत की भूमिका निभाएँगी तथा उनके प्रभाव से नवजागरण की प्रचण्ड लहर उभरेगी। जैसे चक्रवात के प्रभाव से निर्जीव पत्ते और धूलिकण भी आकाश चूमने लगते हैं, वैसे ही नवजागरण के तूफानी प्रवाह के साथ जन सामान्य भी उच्च आदर्शों का अनुगमन करने लगेंगे।
 
तारतम वाणी में उक्त उच्च आत्माओं की संख्या क्रमश: १२००० और २४००० कही गई है। युगऋषि ने ईश्वरीय आदेश से समय की आवश्यकता के अनुसार बड़ी संख्या में उनको लाए जाने की योजना पर प्रकाश डाला है।

परिवर्तन की तीव्र गति : सभी परात्माओं की सामूहिक जागनी होने पर विश्व का वातावरण तीव्र गति से सुधरेगा, की बात तारतम वाणी में कही गई है। युगऋषि ने कहा च्हम विश्व की तमाम विभूतियों को जगाने की साधना कर रहे हैं। सन् २००० के बाद जगह-जगह से क्रान्तियाँ फूट-फूट कर निकलेंगी। वह क्रम स्पष्ट दिखाई देने लगा है। उन्होंने सन् १९५८ के सहस्र कुण्डीय यज्ञ के समय कहा था एक दिन सारे विश्व में गायत्री मंत्र गूँजेगा। सन् २००० आते-आते वह स्थिति दिखने लगी है।

एक विश्व व्यवस्था बनाने की उनकी घोषणा विश्व पटल पर दिखने लगी है। विश्व युद्ध न होने देने की ईश्वरीय इच्छा प्रकट करते हुए उन्होंने ८० के दशक में कहा था, तनी हुई बंदूकें नीचे होंगी, 'तू पीछे हट-तू पीछे हट' की तकरीर रुकेगी, परस्पर वार्ता से तमाम मसले हल होंगे। महाशक्तियों को भी मर्यादा में रहने के लिए बाध्य किया जाएगा। उक्त कथन पिछले वर्षों में चरितार्थ होते दिखे हैं। रूस में आयरन कर्टेन (फौलादी पर्दे) की जगह ग्लास नोस्त (पारदर्शिता) और पैरस्त्रोयका (सहगमन) के नारे उभरे। अमेरिका के स्टार वॉर कार्यक्रम को लाचारी में रोक देना पड़ा।
 
स्पष्ट है कि जागनी का तीसरा चरण सक्रिय हो चुका है। हर व्यक्ति को ईश्वरीय योजना में भागीदारी के लिए अपने समय-साधनों का एक अंश लगाकर अनुपम सौभाग्य से जुड़ना ही चाहिए।


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