Published on 2018-04-01
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विशेष परिस्थितियों में 'इच्छामृत्यु' का अधिकार सम्बद्ध व्यक्ति को देने सम्बन्धी वैचारिक उथल- पुथल लम्बे समय से चल रही थी। दिनांक ९ मार्च २०१८ को 'कॉमन कॉज़' नामक एक गैर सरकारी संगठन की याचिका के संदर्भ से सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने विशेष शर्तों के साथ इसे मान्यता दे दी है। उक्त संविधान पीठ में मुख्य न्यायाधीश सहित पाँच न्यायाधीश थे। उन्होने सर्वसम्मति से इस संदर्भ में निम्नानुसार फैसला दिया है।

कोर्ट ने माना है कि संविधान के अनुच्छेद २१ के अन्तर्गत सम्मान के साथ जीने के अधिकार में सम्मान के साथ मरने का अधिकार भी शामिल है। इस फैसले में निष्प्रयास इच्छा मृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) को सशर्त मान्यता दी गयी है। उसका स्वरूप इस प्रकार है।

दो प्रकार : इच्छा मृत्यु या दया मृत्यु को यूथेनेशिया कहा जाता है। इसके दो प्रकार हैं १. पैसिव और २. एक्टिव।

पैसिव के अन्तर्गत सम्बद्ध व्यक्ति इच्छा और मेडिकल विशेषज्ञों की सहमति के आधार पर जीवन रक्षक दवाएँ न देने और उपकरण ना लगाने या हटाने का निर्णय लिया जा सकता है। व्यक्ति को शान्ति से स्वाभाविक मौत पाने का मौका दिया जाता है।

एक्टिव के अन्तर्गत उसे मरने में सहायक दवाएँ या इन्जेक्शन देने की भी छूट रहती है।

दो श्रेणियाँ : इनकी दो श्रेणियाँ होती हैं- स्वैच्छिक और गैर स्वैच्छक। स्वैच्छक के अन्तर्गत सम्बन्धित व्यक्ति की स्वीकृति या उसकी जीवन सम्बन्धी वसीयत (लिविंग विल) के आधार पर कार्यवाही की जाती है। गैर स्वैच्छिक के अन्तर्गत यदि व्यक्ति की जीवन सम्बन्धी वसीयत नहीं है और वह स्वयं स्वीकृति देने की स्थिति में नहीं है, तो उसके सम्बन्धियों और मेडिकल विशेषज्ञों की सहमति से कार्यवाही की जा सकती है।

न्यायालय ने अपने फैसले में 'स्वैच्छिक निष्प्रयास दया मृत्यु' को मान्यता दी है। कोई व्यक्ति इसके लिए अपनी जीवन सम्बन्धी वसीयत भी कर सकता है। उसका नियम इस प्रकार है।

कोई व्यक्ति इस वसीयत में पहले से यह घोषित कर सकता है कि मरणासन्न स्थिति आने पर उसे जीवन रक्षक प्रणाली पर न रखा जाय, शान्ति से स्वाभाविक मौत मरने दिया जाय।

इस वसीयत पर वसीयतकर्त्ता और दो प्रत्यक्ष गवाहों के हस्ताक्षर होने चाहिए। वसीयतकर्त्ता के क्षेत्र के प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के हस्ताक्षर के साथ वह वसीयत पंजीकृत (रजिस्टर्ड) होगी। उसे मैडिकल बोर्ड की सहमति से ही लागू किया जायगा। मेडिकल बोर्ड सहमति न दे तो वसीयतकर्त्ता या उसके परिजन हाईकोर्ट का आश्रय ले सकते हैं।

इस नियम के बन जाने से अंगदान और देहदान करनेवाले व्यक्ति भी इसका लाभ ले सकते है।


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