उत्कृष्टता का आधार है- आदर्श

Published on 2018-04-02
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इक्कीसवीं सदी सतयुगी वातावरण का शिलान्यास होने की प्रभात बेला है। इन दिनों नवजीवन के नवनिर्माण का एक ही आधारभूत कारण होगा- लोकमानस का परिष्कार। जन- जन को समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी का पाठ पढ़ना होगा। चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में आदर्शों का समावेश करना होगा। मानवी गरिमा को अक्षुण्य रख सकने वाली रीति- नीति को अपनाना होगा।

सामान्य बुद्धि ही यह सोचती है कि साधन सुविधाओं के आधार पर मनुष्य को उन्नति करने का अवसर मिलता है। यह कथन किसी हद तक तभी तक सार्थक होता है, जब साधनों के साथ उच्चस्तरीय सूझबूझ भी हो। अन्यथा दुष्ट, दुर्जन जितने ही अधिक साधन सम्पन्न होते हैं, उतनी ही अधिक दुष्प्रवृत्तियाँ अपनाने और अपने सम्पर्क क्षेत्र के लिए संकट खड़ा करते है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण इन दिनों की परिस्थितियों को देखकर समझा जा सकता है।

पूर्वजों की तुलना में हम सुविधा में कहीं अधिक सम्पन्न हैं, शिक्षित भी हैं और समर्थ -संभ्रान्त भी। इस पर भी हमारी गतिविधियाँ इस स्तर की नहीं बन पातीं, जिन्हें सन्तोषजनक, सुख- चैन से युक्त या भविष्य को उज्ज्वल बनाती दीख पड़ें। इसके विपरीत उन असंख्य महामानवों का इतिहास साक्षी है जो साधारण परिस्थितियों में जन्मे और अपने गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता से निजी चरित्र और सम्पर्क क्षेत्र का सम्मान प्राप्त करते- करते उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँचे।

सतयुगी आदर्श
सतयुग के दिनों भावनाशील प्रतिभाओं ने अपने निजी संकीर्ण स्वार्थों को तिलाञ्जलि दी थी और महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति का एक ही केन्द्र पर नियोजन किया था कि जन- जन को पुरुषार्थीं, कर्मयोगी, समाजनिष्ठ और उदारचेष्टा बनाने के लिए जो कुछ किया जा सकता था, वह सब कुछ उन्होंने कर दिखाया था। इस हेतु सर्वप्रथम उनने अपनी जीवनचर्या को ऐसे ढाँचे में ढाला था जो सर्वसाधारण को अनुप्राणित कर सके, अनुसरण की श्रद्धा उत्पन्न कर सके। उसके साथ ही वे लोकसेवा की साधना को सर्वोपरि ईश्वर- भक्ति मानकर उसके निमित्त सर्वतोभावेन जुट गये। धर्मतन्त्र का उन्होंने आश्रय लिया, क्योंकि अन्त:करण की गहराई तक प्रवेश कर सकने की क्षमता उसी में है। आकांक्षा, आस्था, भावना, विचारणा की उत्कृष्टता के साथ जोड़ने की क्रिया अन्त:करण के क्षेत्र में सम्पन्न होती है। जले हुए दीपक ही बुझोंं को जलाने में समर्थ होते हैं। सुयोग्य ही अयोग्य को सुयोग्य बना सकते हैं। ऋषियुग का प्रचलन इसी प्रकार हुआ। सतयुग इसी प्रकार उगा और फल- फूल कर विशाल कल्पवृक्ष के रूप में परिणित हुआ। इस भूतकालीन प्रचलन को वर्तमान में अपनाया जाना चाहिए और इसी आधार पर उज्ज्वल भविष्य का स्वप्न सँजोया जाना चाहिए। विगत को आगत के रूप में इसी प्रकार अवतरित किया जा सकता है।

ब्राह्मण परम्परा का नवजीवन

इस हेतु ब्राह्मण और साधु परम्परा को पुनजीर्वित करना होगा। पुरोहितों और परिव्राजकों का नया वर्ग खड़ा करना होगा। वंश और वेश के आधार पर तो ये दोनों ही इतने अधिक हैं कि उनकी गतिविधियाँ देखकर एक बार तो गहरी निराशा होती है। उनका स्वरूप अपने उत्तरदायित्व के साथ संगति नहीं खाता। ऐसी दशा में पुराने खंडहरों के साथ बड़ी आशा सँजोने की अपेक्षा नये झोंपड़े खड़े करने होंगे। जाति, वंश की प्रक्रिया किसी को ऊँचा, नीचा नहीं बनाती। प्रश्न भावना और क्रिया का है। जो अपना क्रिया- कलाप जनमानस के परिष्कार में नियोजित कर सकें, जो ब्राह्मणों की तरह गृहस्थ अथवा विरक्त रहकर परिव्राजक की भूमिका निभा सकें, उन्हें कहीं से ढूँढना, उभारना और पुरातन विधि- व्यवस्था के अनुरूप कर्त्तव्य पथ पर आरूढ़ करना होगा।

अनुकरणीय परम्पराएँ

धर्म के नाम पर ईसाई मिशनों ने कुछ कहने लायक काम किया है। सेवा को आगे रखकर अपना सम्प्रदाय बढ़ाने की यों उनकी बेतुकी नीति है, फिर भी पादरियों का चरित्र देखते बनता है। गिरजे खपरैलों के बने होते हैं। पादरी घर- घर जनसम्पर्क के लिए जाते हैं और जो कहना है, भावनापूर्वक कहते हैं। फलस्वरूप दो हजार वर्ष में दुनियाँ की आधी जनसंख्या उनके धर्म में दीक्षित हो गई।

प्राचीनकाल में ऋषि भी यही करते थे। ढाई- हजार वर्ष पूर्व बुद्ध धर्म इसी रीति- नीति को अपनाकर विश्वव्यापी बना था। स्याम (अनाम) में यह प्रथा थी कि हर व्यक्ति को एक वर्ष तक परिव्राजक बनकर बुद्ध विहार में रहना पड़ता था। साधना, स्वाध्याय, संयम की व्यक्तिगत आचार संहिता का पालन करते हुए अधिकांश समय लोकसेवा के निमित्त नियोजित रखना पड़ता था। यह प्रचलन जिन्होंने भी, जब भी अपनाया है, तभी उतने अंश में जनसहयोग मिला है और अभीष्ट प्रगति का पथ प्रशस्त हुआ है।

आवश्यकता इस बात की है कि वर्तमान विकृतियों से जूझने और सत्प्रवृत्तियों का नये सिरे से अभिवर्धन करने के लिए धर्मसेवी समुदाय का नये सिरे से उत्पादन किया जाय। देश में श्रद्धा, भक्ति का मूल तत्त्व अभी भी कम नहीं हुआ है। यदि घटा होता तो धर्मजीवियों का इतना बड़ा समुदाय गुलछर्रे किस प्रकार उड़ाता? इतने विशालकाय देवालय किस प्रकार खड़े होते? धार्मिक कर्मकाण्डों में, तीर्थ यात्राओं में लगने वाली इतनी बड़ी राशि कहाँ से आती? जड़ जीवित है, पत्ते और टहनियाँ भर सूखी हैं। यदि जड़ को नई भावना और नई योजना के साथ सींचा जा सके तो इस पतझड़ जैसे ठूँठ बने उपवन में फिर से नया बसन्त आ सकता है।

लोकसेवा की उमंग जागे

ऐसे भावनाशील लोग ढूँढने पर कहीं न कहीं अवश्य मिल जायेंगे जो जीवन्त धर्मधारणा की सेवा- साधना के लिए जीवन समर्पित करें और उसी कार्य पद्धति को अपनाएँ जो सतयुग के देवमानवों ने अपनाई। ऐसे असंख्य व्यक्ति भी निकल पड़ेंगे जो उनके निर्वाह का भार कितने ही दरिद्र होने पर भी सहन करते रहें। इस नवनिर्मित देव समुदाय का एक ही कार्य होना चाहिए जनसाधारण के चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को उच्चस्तरीय बनाना, हर किसी में लोकसेवा की आदर्शवादी प्रतिस्पर्धा करने के लिए महत्वाकांक्षा जगाना।

आवश्यकता ऐसे गोताखोरों की है जो गहरी डुबकी लगाकर मणिमुक्ताओं को खोज सकें। इन्हें एक सूत्र में पिरोकर शोभायमान हार की तरह देव संस्कृति का सुशोभित मुकुट बना सकें। साथ ही अन्य क्षेत्रों की प्रतिभाओं से भी अपने ढंग से अपने- अपने स्तर का लोकोपयोगी कार्य करा सकें। प्रतिभावान वरिष्ठ जन अपनी विशेषता का उपयोग इन दिनों प्राय: धन संचय में, अहंकार जताने वाला ठाट- वाट जुटाने में करते रहते हैं। यदि उनकी दिशा बदले तो ऐसे आधार खड़े हो सकते हैं जो युग का कायाकल्प कर सकें। साहित्यकार ऐसा साहित्य सृजें, कलाकार ऐसा संगीत अभिनय प्रस्तुत करें। लेखनी और वाणी का इन्हीं प्रयोजनों के लिए उपयोग हो सम्पदा उस व्यवसाय या अनुदान में लगे जिससे हरिश्चन्द्र और भामाशाह की कथाएँ नया संस्कार बनकर उभरें।

आदर्श एकांकी भी बहुत कुछ कर सकता है। छोटी स्थिति वाला भी बड़ी भूमिका निभा सकता है। किन्तु सर्वसमर्थ होते हुए भी व्यक्ति पतनोन्मुख रहा हो तो दुर्दान्त असुरों की तरह सर्वत्र संकट ही खड़ा करेगा। आवश्यकता आर्दशवादिता के अभिवर्धन की है। इसी को धर्मधारणा, आस्तिकता या मानवी गरिमा के नाम से भी पुकारा जा सकता है।


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