Published on 2018-04-13
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चेतें, भ्रम- भटकावों से उबरें, सन्मार्ग की ओर कदम बढ़ायें, श्रेय- सौभाग्य पायें

एकता और समता नये युग का, नये विश्व का नया लक्ष्य है। यों इन दिनों सर्वत्र विषमता का बोलबाला है। गरीबों- अमीरों की, शिक्षित- अशिक्षितों की, समर्थ- असमर्थों की, नर और नारियों की, दुर्बल और सशक्तों की, शोषक- शोषितों की विरादरियाँ स्पष्ट रूप से बढ़ी देखी जा सकती हैं और उनके बीच पाया जाने वाला अंतर इतना बड़ा प्रतीत होता है कि एक को खाई और दूसरे को टीले की उपमा दी जा सके। यह खाइयाँ किस प्रकार पटेंगी? और हर क्षेत्र में फैली हुई विषमताएँ किस प्रकार मिटेंगी, यह समझना साधारण बुद्धि के लिए कठिन हो जाता है।

असमंजस इस बात का है कि मनुष्य की संकल्प शक्ति, उत्कण्ठा और तत्परता अभीष्ट परिवर्तन का पक्ष यत्किंचित ही लेती है। समर्थ प्रयत्न भी योजनाबद्ध रूप से बड़े परिमाण में नहीं हो पा रहे हैं। छुट- पुट आवाजें उठतीं और छोटे स्तर की क्रिया- प्रक्रिया ही बन पड़ती दीख पड़ती हैं। मोटा अनुमान यही लगता है कि छुटपुट प्रयत्नों का प्रतिफल यत्किंचित ही होना चाहिए और उसे सुगठित होने में बड़ा समय लगना चाहिए।

सार्थक मापदण्ड में इस प्रकार का असमंजस स्वाभाविक है, क्योंकि लोक- व्यवहार में छोटे प्रयासों की थोड़ी प्रतिक्रिया ही होती देखी गई है। किन्तु यदि युग निर्माण जैसे विराट प्रयोजन को पूरा करने के लिए ६०० करोड़ (विश्व के समस्त) मनुष्यों का चिन्तन, चरित्र और व्यवहार बदलना है, उनके स्वभाव एवं अभ्यास को बदलना है तो उसके लिए कोई अति समर्थ प्रयास सामने आना चाहिए। आतंक के दबाव में हुए परिवर्तनों का प्रतिफल देखा जा चुका है। उनसे नये प्रकार के आतंक फूटे हैं और परिणाम नफे के स्थान पर घाटे का ही रहा है।

तब इस प्रकार असाधारण परिवर्तन कैसे संभव होगा? इसके लिए इस तथ्य और सत्य को ध्यान में रखना होगा कि इस वसुधा का निर्माता एवं नियन्ता कोई दूसरा है। मनुष्य की क्षमता बड़ी है, पर ऐसा नहीं कि इसी के सहारे सारी विश्व व्यवस्था चलती रही है या चलेगी।
बड़े प्रयास मनुष्यों के प्रयत्नों से ही सम्पन्न हुए हैं यह भी ठीक हैं, पर यह मान बैठना भी ठीक नहीं कि जिस सम्बन्ध में उसने उपेक्षा दिखाई है, वह बन ही नहीं पाता। दास- दासियों का क्रय- विक्रय लम्बी अवधि से चला आ रहा था। यह भी आशा नहीं थी कि वे उत्पीड़ित व्यक्ति मिल- जुलकर समर्थों से टक्कर लेने और उन्हें परास्त करने में सफल होकर ही रहेंगे। उनकी किसी ने बड़ी वकालत भी नहीं की। उनके पक्ष में कोई युद्ध भी नहीं लड़ा गया। इतने पर भी इतिहासकारों ने आश्चर्यचकित होकर देखा कि जाग्रत विश्वात्मा के दबाव से वे निविड़- बन्धन अपने आप ही छूटते गये और बिना युद्ध का सरंजाम जुटाये क्रान्तिकारी योजनाएँ बनीं, दुनिया में से दास प्रथा उठ गई। उसका समर्थन अपनी मौत मर गया। यद्यपि अमीरों को इससे कम हानि नहीं हुई, फिर भी वे मन मारकर बैठे रहने के सिवाय और कुछ कर नहीं सके। दैवेच्छा अपने ढंग से अपने समय पर पूरी होकर रही।

राजतंत्र की परम्परा युग- युगान्तरों से चली आई है। राजा को भगवान मानने की बात न जाने क्यों सीखी और सिखाई जाती रही है? उस समुदाय के पास शक्ति, क्षेत्र, सैनिक और साधनों की कमी नहीं थी। फिर भी न जाने क्या हुआ कि राजमुकुट धरती पर लोटते और धूल- धूसरित होते चले गये। उन्हें अपने वैभव की रक्षा करने का समय भी नहीं मिला और राज्य में राजा के रूप में सोये हुए सत्ताधारी भोर होते ही अपना समस्त वर्चस्व गँवा कर साधारण नागरिकों जैसे होकर रह गये।
जागीरदारों, साहूकारों, सामन्तों का भी एक वर्ग था, जो अपने आप को प्रजाजनों की खुशहाली का स्वामी मानता था। जिस तरह चाहे उसी तरह निचोड़ता रहता था, पर देखते- देखते वे परिस्थितियाँ न जाने किस हवा में विलीन हो गर्इं? अब कर्ज की सुविधा बैकों के माध्यम से सरलतापूर्वक ली जा सकती है।

और भी कई क्रान्तियाँ अपने- अपने ढंग से हुई हैं जो यह बताती हैं कि मनुष्य का पुरुषार्थ नगण्य और दैवी इच्छा के माध्यम से बन पड़ा संयोग अत्यधिक महत्वपूर्ण है। पर्दा प्रथा अब कहीं किन्हीं कोतरों में ही अपने नाममात्र के अस्तित्व की झलक- झाँक देती है, अन्यथा संसार में से उसका प्रचलन एक प्रकार से उठ गया ही समझा जा सकता है। जाति- पाँति, ऊँच- नीच की मान्यता किन्हीं गिरे हुए खंडहरों में ही जब कभी छिपी दीख जाती है, पर उसका संवैधानिक और लोक- व्यवहार में प्रचलन समाप्त हुआ ही समझा जाना चाहिए। सती प्रथा कभी गौरवान्वित रही है, पर अब तो उस पर कानूनी प्रतिबंध है और इसके लिए उकसाने तथा महिमामंडित करने पर कोई भी जेल की हवा खा सकता है।

अँगे्रजी साम्राज्य, जिसके क्षेत्र में कभी सूर्य अस्त नहीं होता था, ऐसी परिस्थितियों से घिरा कि हर कहीं से अपने बोरिया बिस्तर समेटकर अपने छोटे- से दायरे में सीमित रहने के लिए ही विवश हो गया। नेपोलियन, सिकन्दर, चंगेजखाँ जैसे आतताइयों की करतूतें अपनी परम्परा देर तक नहीं निभा सकीं। आक्रान्ताओं की अपनी फूट ने ही उन गिरोहों का अस्तित्व समाप्त कर दिया, जो कभी अजेय समझे जाते थे। चन्द्रमा पर मनुष्य चहलकदमी करेगा, इसकी कल्पना कभी किसी ने नहीं की थी? अब तो अन्तरिक्ष में बस्तियाँ बसाने की योजना कार्यान्वित होने जा रही है।

पुराण गाथाओं का अधिकांश कलेवर दैवी शक्तियों के चमत्कारी वर्णनों से ही भरा पड़ा है। अवतारों, सन्त, सिद्धों में से अधिकांश ऐसे हैं जिनके द्वारा स्वयं ऐसे कार्य सम्पन्न किये तथा दूसरों से कराये गये हैं, जो मनुष्य की साधारण शक्ति के सहारे बन पड़ेंगे, ऐसा संभव प्रतीत नहीं होता था। ।। फिर भी वे हुए। इसे देखते हुए इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि उन्हें किसी अदृश्य शक्ति का अवलम्बन मिला और उसके सहारे उन्होंने प्रतिकूलताओं को अनुकूलताओं में बदलने में विजय पाई।

दार्शनिक, वैज्ञानिकों को प्राय: ऐसी ही अन्त:स्फुरणा होती रही है, जिसके मार्गदर्शन में उनका अन्तस् उस दिशा में चल पड़ा जो उनके लिए ही नहीं, अन्य असंख्यों के लिए भी श्रेयस्कर सिद्ध हुआ। वस्तुत: दैवी अनुकम्पा का दार्शनिक रूप यही है।

अदृश्य ईश्वर का दर्शन कर सकना किसी प्रकार भी संभव नहीं। इन्द्रियों की सहायता से तो जड़ पदार्थ ही देखे जाते हैं। ईश्वर की भी यदि कोई छवि कल्पित की जाय, तो भी वह किसी प्राणी या पदार्थ से मिलती- जुलती होने के कारण भौतिक ही कही जायेगी,जबकि सृष्टा की सत्ता अदृश्य एवं निराकार है। भक्तों की कल्पना उनकी इच्छानुसार भी ध्यान स्थिति में साकार रूप धारण कर सकती है, पर तत्वदर्शी उसे विराट् ब्रह्म के रूप में देखते और विश्व- वसुधा में विद्यमान सत्प्रवृत्तियों के समर्थन में अपनी सेवा अर्पित करते हैं। यही वास्तविक पूजा- अर्चना है। उसका उपयोग एवं स्वरूप यही है कि उच्चस्तरीय आदर्शों का अवलम्बन लेने के लिए भावना और क्षमता को पूरी तरह से नियोजित कर सकने जैसी अदम्य उमंगें मन में उठें। इक्कीसवीं सदी में ऐसे ही अवलम्बन के धनी अनेक प्रतिभाशाली उत्पन्न होंगे और वे नव- सृजन की दिव्य योजना को पूरा करने में कार्यरत दिखाई  पड़ेंगे।


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