img

राष्ट्र , महापुरुषों की दृष्टि
      भारतीय ऋषि-मनीषियों की दृष्टि पश्चिमी विचारकों की अपेक्षा अधिक वेधक एवं गहरी रही है। पश्चिम में राष्ट्र (नेशन) को एक राजनैतिक इकाई माना जाता है। आजकल तो वह तकनीकी आर्थिक इकाई (टैक्रो एकानॉमिकल यूनिट) के रूप में भी देखा जाने लगा है। किन्तु भारतीय मनीषा तो उसे एक जीवंत चेतन सत्ता, एक सुगठिक सांस्कृतिक तंत्र के रूप में अनुभव करती है और तद्ïनुसार अपने आधार व्यवहार को निश्चित करती है। उसे भारत माता- 'जननी जन्मभूमिश्च, स्वर्गादपि गरीयसी कहकर पूजित सम्मानित किया है।
    सदुद्देश्य के लिए सत्ï शक्तियों को संगठित और प्रयुक्त करने के लिए यज्ञीय प्रयोगों में अश्वमेध भली प्रकार मान्य रहा है। ऋषियों ने राष्ट्र  उन्नयन के श्रेष्ठï प्रयासों को अश्वमेध के समतुल्य मानते हुए 'राष्ट्र वा अश्वमेध:' का उद्ïघोष किया है।
    साहसी वीर संन्यासी स्वामी विवेकानंद ने भी राष्ट्रीय भावना को असाधारण महत्त्व दिया है। उन्होंने तो यहाँ तक कहा है कि भारतवासी कुछ समय के लिए सारे देवी-देवताओं को भुलाकर केवल राष्ट् र देवता या भारत माता की आराधना करें, तो अच्छा हो। उत्कृष्टï राष्ट्र रीय भाव उनके अंदर जैसे कूट-कूट कर भरा हुआ था। उसी भाव से प्रेरित वे कन्याकुमारी में समुद्र तैरकर विशाल शिला पर जा बैठे और भारत माता का दिव्यदर्शन करते हुए ध्यानस्थ हो गये। वही शिला अब विवेकानंद शिला के नाम से तीर्थ का रूप ले चुकी है।
    योगी श्रीअरविन्द जी ने भी सारा जीवन राष्ट्र सेवार्थ ही लगाया। पहले क्रांतिकारी बनकर और बाद में अध्यात्मवेत्ता के रूप में उन्होंने भारत के उत्कर्ष के लिए प्रखर पुरुषार्थ किया। उन्होंने भारत द्वारा विश्व का आध्यात्मिक नेतृत्व करने की घोषणा करते हुए सभी भारतवासियों से यह अपील की कि वे अपने राष्ट्रीय और मानवीयदायित्वों को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध हों।
    युगऋषि पूज्य आचार्यश्री ने भी अपनी आध्यात्मिक तपश्चर्या के साथ राष्टï्रीय आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया। उन्होंने स्पष्टï कहा कि भारत को विश्व के मार्गदर्शन के लिए तैयार तो होना है, किन्तु उसके लिए अग्नि परीक्षा तथा प्रसव पीड़ा सहने जैसी स्थितियों से गुजरना होगा। भारतवासियों को ऋषिप्रणीत आध्यात्मिक जीवनचर्या अपनाकर राष्ट्र के विभिन्न स्तंभों को प्रामाणिक, पुष्टï और अनुशासित बनाना होगा, तभी भारत अपने गरिमामय स्वरूप में उभरेगा।

 गणतंत्र के स्तंभ
     वर्तमान चिंतकों ने गणतंत्र के चार प्रमुख स्तंभ माने हैं। वे हैं- 1. विधायिका, 2. कार्यपालिका, 3. न्यायपालिका तथा 4. प्रचार माध्यम (मीडिया)। इन चारों को भारतीय संविधान तथा जनहित के प्रति प्रतिबद्ध जवाबदेह और सक्षम होना चाहिए। इसी के साथ यह सत्य भी अनुभव किया जा रहा है कि यह चारों स्तंभों की आधार (नींव) जन चेतना ही होती है।
    विधायिका में आम जनता के चुने हुए जन प्रतिनिधि ही पहुँचते हैं। विधायिका में यदि अप्रामाणिक व्यक्ति प्रवेश कर जाते हैं, तो ऐसा जन जागरुकता की कमी के कारण ही होता है। जब जनता के अधिकांश व्यक्ति जन प्रतिनिधियों को राष्ट्र रहित के कसौटी पर जाँचे बिना, किसी भय, लोभ या उदासीनतावश वोट देने लगते हैं, तभी वे विधायिका के सदस्य बन पाते हैं। निश्चित रूप से राष्ट्र  चेतना सम्पन्न व्यक्ति अप्रामाणिक व्यक्तियों को या तो चुनेंगे ही नहीं, अथवा भूलवश चुन लिये जाने पर उन्हें जन दबाव से रास्ते पर लाने के प्रयास करेंगे।
    कार्यपालिका में भी समाज के ही प्रतिभाशाली व्यक्ति अपनी योग्यता के बल पर पहुँचते हैं। उनके चुनाव के लिए योग्यता परखने के लिए मापदंड तो हैं, किन्तु उनकी नीति निष्ठï परखने की कोई व्यवस्था नहीं है। उनका नैतिक स्तर उस समाज के नैतिक स्तर के अनुरूप ही होता है, जिसके अंदर रहकर वे पलते और पनपते हैं। जागरुक जनता और जनप्रतिनिधियों के रहते कार्यपालिका के सदस्य कभी मार्ग भ्रष्टï नहीं हो सकते।
    न्यायपालिका कार्यपालिका की तरह न्यायपालिका में भी समाज के प्रतिभावान व्यक्ति पहुँचते हैं। इस तंत्र में भी प्रवेश के क्रम में उनकी योग्यता के साथ नैतिकता, न्यायनिष्ठï की कसौटी  का प्राय: अभाव ही दीखता है। उनके स्तर को ठीक करने के लिए भी जन मानस में प्रखर राष्ट्र  चेतना होनी जरूरी है।
    प्रचार माध्यम (मीडिया) के व्यक्ति तो जनता के ही अंग होते हैं और उन्हीं के बीच रहते हैं। वे स्वार्थी पक्षपाती तभी बन पाते हैं, जब उन्हें जनता का पोषण संरक्षण मिलता है।
    थोड़ा विचार करने पर ही यह बात स्पष्टï हो जाती है कि यह चारों स्तंभ जन चेतना के आधार पर ही खड़े होते हैं। इसलिए राष्ट्र  की गरिमा जागरण के लिए इन्हें प्रामाणिक पुष्टï एवं अनुशासित बनाने के लिए जन मानस में राष्ट्र चेतना का प्रखर उभार जरूरी है। इस पुष्टï आधार पर ही पुष्टï स्तंभों को तैयार किया जा सकता है।
    इन सभी को भारतीय संविधान के प्रति निष्ठïावान होने की बात कही जाती है। संविधान की उद्देश्यिका (प्रिएम्बिल) का अध्ययन करने पर भी यह तथ्य स्पष्टï होता है कि संविधान को लागू करने-कराने का मुख्य श्रेय भारत की आम जनता को ही दिया गया है।
    उद्देश्यिका में संक्षेप में संविधान के उद्देश्य एवं सिद्धांतों का संक्षिप्त विवरण दिया जाता है। इसी पृष्ठï पर (ऊपरी कालम में) पैनल में संविधान की उद्देश्यिका को यथावत्ï दिया गया है। उसकी समीक्षा करने से भारतीय जनता का महत्त्व और उसके कर्तव्यों का बोध सहज ही किया जा सकता है।
 
समीक्षात्मक चर्चा

    उद्देश्यिका के प्रारंभ में लिखा है 'हम भारत के लोगÓ तथा अंत में लिखा है 'इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं। अर्थात्ï- संविधान को भारत की जनता द्वारा ही जनता को समर्पित किया गया है। उसे अपनाने और व्यवस्थित रूप से लागू करने का काम भी उन्हीं के द्वारा होना निश्चित है।
    भारत के लोगों ने भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने का लक्ष्य सामने रखा है।
    संप्रभु का अर्थ होता है- जिस पर बाहर से किसी की प्रभुता लागू नहीं होगी। भारत की चेतना ही स्वयं नीति निर्धारक होगी।
    समाजवादी का तात्पर्य है- जिसमें समाज के सभी वर्गों को समान रूप से महत्व दिया जाएगा। वर्ग भेद के आधार पर पक्षपात नहीं होने दिया जाएगा।
    उद्देश्यिका के अंग्रेजी प्रारूप में सैकुलर शब्द भी है। जिसका अर्थ होता है कि सरकार सभी धर्म सम्प्रदायों का समान आदर करेगी तथा किसी सम्प्रदाय विशेष को ऊँचा उठाने या नीचे गिराने का कार्य नहीं करेगी। हिन्दी में इसे समाजवादी विशेषण के अन्तर्गत ही स्वीकार किया गया है।
    लोकतंत्रात्मक का अर्थ है कि उस तंत्र में सारी व्यवस्थाओं का आधार लोकमत ही होगा, किसी व्यक्ति या वर्ग विशेष का स्वामित्व नहीं चलेगा।
    भारत को ऐसा गणराज्य बनाने का संकल्प भारत के आम लोगों का है। केन्द्र इसके लिए राष्ट्र के सभी नागरिकों को न्याय, स्वतंत्रता और समानता प्राप्त कराने, उनमें भाई चारा या सहयोग जगाने के लिए संविधान को अंगीकृत और लागू करने की बात कही गयी है।
    न्याय में सामाजिक-आर्थिक तथा राजनैतिक न्याय।
    स्वतंत्रता में विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता।
    समानता में प्रतिष्ठï (स्टेटस) तथा अवसर की समानता के लक्ष्य रखे गये हैं।

विसंगतियाँ दूर करनी होंगी

    संविधान की उद्देश्यिका को सटीक भाषा देने के लिए उसके शिल्पियों को साधुवाद दिया जाना उचित है। इस उद्देश्यिका में भारत की आत्म चेतना की यथेष्टï अभिव्यक्ति है। इसे जनता के द्वारा, जनता के लिए, जनता को सौंपा गया है। जनता के द्वारा ही ऐसे श्रेष्ठï गणतंत्र को आकार देने के लिए चार स्तंभ खड़े किए गये हैं। यह सब ठीक है, किन्तु?
    देखा जाता है कि चारों समूहों में राष्ट्रनिष्ठव्यक्तियों के साथ स्वार्थी-अप्रामाणिक व्यक्ति भी बड़ी संख्या में शामिल हो गये हैं। फलस्वरूप राष्ट्र रहितों की अनदेखी होने तथा व्यक्तिगत, वर्गगत लाभों को महत्व मिलने की शिकायत आम हो गयी है। प्रश्न उठता है कि इन विसंगतियों को ठीक कौन करें?
    विधायिका के विधानों की अनदेखी करके कार्यपालिका के लोग मनमानी कर लेते हैं। न्यायपालिका के जनहितकारी कठोर निर्णयों से बचने के लिए विधायिका अपने रास्ते खोजती रहती है। हर व्यक्ति को उचित समय पर न्याय देने में न्यायपालिका कहाँ सफल हो रही है? मीडिया में भी स्वार्थनिष्ठï और राष्टï्रनिष्ठïों का ऐसा घालमेल हो गया है कि वर्गीकरण करना कठिन हो जाता है। उन्हें अनुशासित करने में विधायिका और न्यायपालिका के प्रयास भी कभी-कभी ही सफल हो पाते हैं।
    विचार करने पर यही बात स्पष्टï होती है कि जागरूक जनमानस ही इन विसंगतियों का उपचार करने की क्षमता रखता है, किन्तु मुश्किल यह है कि जनमानस को उसके पवित्र कत्र्तव्यों और गरिमामय अधिकारों का बोध ही ठीक से नहीं कराया जा रहा है। जब मालिक ही जागरूक न होंगे, तो विसंगतियाँ दूर कैसे होगी?
    युगऋषि ने इस तथ्य को ध्यान में रखकर एक पुस्तिका लिखी थी 'मालिकों को जगाओ, प्रजातंत्र बचाओ प्रजातंत्र में मालिक की भूमिका प्रजा की होती है। उसे जागरूक करना जरूरी है।
    विभूतिवानों में व्यवस्था को दिशा देने की क्षमता तो होती है, परन्तु वे ही दिशा भटक जायें, तब क्या हो? उन्हें भटकाव से रोककर सही दिशा में चलाने की क्षमता जागरूक जनमानस में होती है। अस्तु, भारत के भावनाशील नर-नारियों को अपने राष्ट्रीय कर्तव्यों के प्रति जागरूक और प्रशिक्षित करने का कार्य प्राणवान राष्ट्रसेवियों को हाथ में लेना चाहिए। ऐसा हो सके तो सार्थक क्रान्तियों को खड़ा करने तथा उन्हें लक्ष्य तक पहुँचाने का कार्य कठिन नहीं है। यदि स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) से गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) तक इस हेतु ठोस प्रयास किए जाये, तो इसे राष्ट्र सेवा का एक उच्चस्तरीय प्रयोग, एक श्रेष्ठï यज्ञ कहा जा सकेगा। हमें इस दिशा में पहल करनी चाहिए ।


Write Your Comments Here:


img

तमसो मा ज्योतिर्गमय

प्रकाश ही जीवन है प्रकाश ही जीवन है और अन्धकार ही मरण। प्रकाश में वस्तुओं का स्पष्ट रूप दर्शाने.....

img

गृहे- गृहे गायत्री यज्ञ - उपासना अभियान

इन दिनों देशभर में नौ वर्षीय मातृशक्ति श्रद्धांजली महापुरश्चरण के अन्तर्गत गृहे-गृहे गायत्री यज्ञों का अभियान तेज गति से चलाया जा रहा है। इसी श्रृंखला के अंतर्गत इस वर्ष परम पूज्य गुरुदेव की पुण्य तिथि 02 जून 2019 को विश्वव्यापी ‘.....