आवश्यकता अंधविश्वास, आडम्बर, मूढ़मान्यताओं से मुक्ति पाने की भी है

Published on 2018-04-28
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आशंका का भूत, अंधविश्वास की देवी

भूत- प्रेत क्या है, उनके अस्तित्व का प्रामाणिक आधार क्या है तथा उनकी वास्तविकता क्या है? यह अलग विषय है, पर सर्वसामान्य में भूत- प्रेतों के किस्से इस तरह प्रचलित हैं कि लगता है वे चिड़िया से भी सस्ते और सरलतापूर्वक प्राप्त हो जाने वाले हों जो हर किसी को हर कहीं चाहे जब मिल जाएँ। अंधेरे स्थान, गाँव का कोई पुराना पेड़, बरगद या पीपल की शाखाएँ अथवा उपेक्षित- सा कोई एकान्त में पड़ने वाला कुआँ प्राय: भूत- प्रेतों से सम्बद्ध हो जाते हैं। लोग उनके प्रति इस प्रकार विचित्र धारणाएँ बना लेते हैं कि उनके पास से निकलने में भी डर लगता है। इन बातों में तथ्य जरा भी नहीं होता, लेकिन आश्चर्य है कि भूत- प्रेतों के किस्से गली- गली और मुहल्ले- मुहल्ले सुनने को मिल जाते हैं।

भूत- प्रेतों की ही भाँति देवरा बैठक के रूप में भी गाँव से लेकर शहरों, कस्बों तक में अन्ध- विश्वासियों की भीड़ जुड़ती है। देवरा बैठक ऐसे स्थानों को कहा जाता है जहाँ पीपल वाली शीतला और भैरों पीर जैसी सत्ताओं की कल्पना कर लोग उनके पास अपनी समस्याओं का हल करने तथा कष्ट- कठिनाइयों को दूर करने, रोग- बीमरियों से मुक्ति पाने के लिए पहुँचते हैं। उस स्थान पर किसी मूर्ति की प्रतिष्ठा कर ली जाती है, फिर वहाँ का पण्डा या पुजारी नहा- धोकर पूजा की चौकी पर चुपचाप बैठ जाता है। सब लोग शान्तिपूर्वक देवता के आने की प्रतीक्षा करते हैं और जब पण्डा या पुजारी सिर हिलाकर उठल- कूद मचा कर झूमने लगता है तो समझा जाता है कि देवता का आगमन हो गया है। फिर क्रम से वहाँ आये लोग देवता के सामने अपनी समस्याएँ रखने लगते हैं। कहीं- कहीं तथाकथित देवता खुद फरियादी को पुकार कर पूछते हैं।

ऐसे नाटकों में देवता बड़े अजीब- अजीब कारण और विचित्र समाधान सुझाते हैं। कोई कहता है- "अमुक दिन तेरे घर पर मैं फकीर के या साधु के वेश में आया था तो तूने मेरा तिरस्कार कर दिया था।" कोई कहता है हवा लग गयी है। इन कारणों से उत्पन्न हुई समस्याओं का समाधान एक पूजा करवाना या पाँच ब्राह्मणों को जिमाना अथवा सन्त बैठक में हाजिर होना सुझाया जाता है। विचारशील लोग इन सुझाये गए समाधानों के पीछे विद्यमान कारणों को आप ही समझ लेते हैं, जैसे पूजा करवाने के साथ- साथ भक्त भेंट- चढ़ावा भी लाता है और साधु पुरुष को भोजन कराने की बात है तो उसी देवता के पण्डे से अच्छा साधु और कहाँ मिलेगा। बैठक में हाजिरी देने के लिए भी प्रत्येक भक्त कुछ दान- दक्षिणा तो लेकर पहुँचते ही हैं।

देवी- देवता आने का ढोंग कर जनसामान्य की धर्म श्रद्धा का शोषण करने वाले लोग बड़े होशियार होते हैं तथा भक्तों की नब्ज़ को पहचानते हैं। उसी के अनुसार भक्तों की सामर्थ्य देखकर वे समस्याओं का हल समझाते हैं।

आत्मघाती अंधश्रद्धा
अन्ध- विश्वासियों की भी बड़ी विचित्र स्थिति रहती है। वे अपने देवी- देवों पर इतनी श्रद्धा रखते हैं कि साधारण- सा बुखार भी दो चार दिन के इलाज से दूर नहीं हो तो उसे अमुक देवता का प्रकोप समझकर उनके स्थानों पर ले जाते हैं। गाँवों में चेचक की देवी शीतला, मोतीझरा के देवता मोतीसर आदि कितने ही ऐसे चौधरी, देवी- देवता विराजमान होते हैं, जैसे वे अलग- अलग बीमारियों के डॉक्टर हैं। बीमारी तो जैसे- तैसे दूर हो जाती है या नहीं भी होती, बहुत से यम देवता की शरण भी चले जाते हैं, पर अन्धविश्वासी लोग उन्हें दूर करने के लिए अपने देवों के पास ही जायेंगे और कोई डॉक्टरी उपचार नहीं लेंगे। ऐसे देवी- देवताओं की सप्ताह में एक बार या पखवाड़े की एक तिथि नियत होती है, जिस दिन उनकी सवारी आती है। कहीं- कहीं तो भेंट- पूजा का सामान जुटाकर जब उन्हें बुलाया जाता है, तभी वे आ जाते हैं।

झाड़- फूँक का जंजाल
देवी- देवताओं के पण्डों की तरह जो किसी अदृश्य शक्ति का ढोंग तो नहीं करते, पर अपनी कलाबाजियाँ झाड़- फूँक कर सिद्ध करते ऐसे ओझे- सयाने भी गाँव में दो- चार तो मिल ही जाते हैं। वात दोष के कारण होने वाली पेट की बीमारियों से लेकर पीलिया और मोतीझरा झाड़ने वालों तथा बिच्छू और साँप का जहर उतारने वाले जान लेवाओं का अपना व्यवसाय भी गाँवों में बड़ी खूबी से चलता रहता है। जाहिर है कि रोग- बीमारियों का कारण प्रकृति के अनुसार जीवन न जीने के कारण आये दोष होते हैं अथवा मौसम और मानवी प्रकृति की विषमता है, परन्तु आश्चर्य है कि तथाकथित ओझा उनकी जिम्मेदारी देव- शक्तियों पर ही डाल देते हैं और उन्हें समझा- बुझाकर मनाने की दलाली खाते हैं। समझ में नहीं आता कि संसार में देव- शक्तियों का अस्तित्व अगर है भी तो क्या इसलिए कि वे लोगों को बीमार करते रहें और अपने ऐजेण्टों की सिफारिश पर लोगों को उनसे मुक्त कर दें। यदि देव- शक्तियों का यही काम है तो उनमें और राक्षसों में क्या फर्क हुआ?

ओझा, सयानों को चरित्र की दृष्टि से परखा जाए तो वे सामान्य लोगों की अपेक्षा हीन स्तर के ही होते हैं और उनके पास प्राय: ऐसे गँवार- मूढ़ स्त्रियाँ तथा पुरुष ही जाया करते हैं जो उनके लिए बोतल, चिलम या हुक्के का प्रबन्ध कर अपना काम करवाते हैं। कई अवसरों पर तो ओझा, सयानों पर ज्यादा विश्वास करने से घाटा भी उठाना पड़ता है। आये दिन समाचार पत्रों में ऐसी घटनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं, जिनसे व्यक्त होता है कि झाड़- फूँक करने वालों पर जरूरत से ज्यादा विश्वास करने वाला चरित्र और धन दोनों ही दृष्टि से ठगा जाता है। कई बार तो जान तक से हाथ धोना पड़ता है।

वैज्ञानिक दृष्टि से सोचें विष उतारने वालों सें प्राण खोने का खतरा ज्यादा रहता है। वैज्ञानिक रूप से यह सिद्ध हो चुका है कि काटने वाले साँपों में ९७ प्रतिशत साँप विषहीन होते हैं। उनका विष ही नहीं चढ़ता, केवल मनोवैज्ञानिक भय के कारण ही लोगों की मृत्यु होती है। झाड़- फूँक करने वाले ऐसे लोग मनोवैज्ञानिक विष जरूर ठीक कर देते हैं, पर जब कभी सचमुच ही विषैले साँप ने काटा हो तो ओझा क्या देवता भी उसे बचाने में समर्थ नहीं होते और जीवन- ज्योति बुझ जाने पर च्च्समय अधिक हो गया।ज्ज् अथवा च्च्नाग देवता बहुत ज्यादा कुपित हैं।ज्ज् कहकर अपनी बात जाने से बचा लेते हैं। काश, ओझा, सयाने के चक्कर में न आ कर डॉक्टरी सहायता ली जाती।

यहाँ तो कुछेक ही अन्ध- विश्वासों का जिक्र किया गया, पर उनकी संख्या इतनी अधिक है कि यदि सबका विवरण एकत्रित किया जाए तो एक बड़ी पुस्तक तैयार हो सकती है, फिर भी यह निश्चिततापूर्वक नहीं कहा जा सकता कि उस पुस्तक में सभी विवरण आ सकेंगे, केवल भारत के ही। कहाँ तो हमारा देश किसी काल में जगद्गुरु रह चुका है और इस सत्य तक पहुँच चुका है कि रोग, शोक, विपत्तियाँ, कठिनाइयाँ अपनी ही गलतियों के कारण आती हैं, ईश्वर भी उनमें कोई मदद नहीं करता, वरन् सच्चे आस्तिकजन तो उनमें ही ईश्वर की कृपा मानते हैं कि इस प्रकार हमारे पाप हलके हो रहे हैं और कहाँ यह निकृष्टतम स्थिति कि साधारण से बुखार को भी दैवी प्रकोप मानते हैं।

यह तो स्पष्ट है कि इस विश्वास को व्यवसाय का रूप देने वाला वर्ग बड़ा होशियार और चालाक है पर विचारशील व्यक्तियों का भी तो यह कर्त्तव्य हो जाता है कि वे फैलाये जाने वाले अन्धविश्वासों को निरस्त करें।

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