समग्र क्रान्ति के उपयुक्त शक्ति संवर्धन की योजनाएँ बनायें- चलायें

Published on 2018-04-30
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संगठित इकाइयाँ व्यक्तित्व निर्माण की टकसालें- संघबद्धता की मिसालें बनें

गहन चिंतन करें

जाग्रत आत्माओं, सृजन सैनिकों, सृजन साधकों के लिए यह समय एक महत्त्वपूर्ण अवसर तथा कठिन परीक्षा लेकर आया है। जैसे महाभारत के समय भगवान श्रीकृष्ण ने महान भारत निर्माण के अपने अभियान में पाण्डवों को माध्यम बनाया था, उसी प्रकार युगावतार ने नवयुग निर्माण के अभियान में सक्रिय सहयोग देने, अग्रदूतों की भूमिका निभाने के लिए जाग्रत आत्माओं, संस्कारवान प्रतिभाओं को माध्यम बनाने की रीति- नीति अपनाई है। अवसर का लाभ उठाना है तो कठिन परीक्षा या उसे पार करने के लिए कठोर प्रशिक्षण को बिना किसी असमंजस के प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करना ही होगा।

महाभारत के समय अर्जुन असमंजस में पड़ा तो भगवान कृष्ण ने उसे समझाया, अपना दिव्य- विराट रूप दिखाया और बतलाया कि कौरवों का विनाश सुनिश्चित है, तुम युगधर्म समझने और दिव्य चेतना के उपयुक्त माध्यम बन जाओ। कृष्ण मार्गदर्शन देते रहे, अर्जुन ने निष्ठापूर्वक पूरी शक्ति से पुरुषार्थ किया तो महाभारत विजय का यश और श्रीकृष्ण के नैष्ठिक सहयोगी, नारायण के साथ नर की भूमिका निभाने का अनुपम श्रेय- सौभाग्य प्राप्त कर सका।

युगऋषि ने भी कहा है कि युग परिवर्तन तो होना ही है। जाग्रत आत्माओं को उसके लिए दिव्य चेतना के उपयुक्त माध्यम बनना है। अग्रदूतों की भूमिका निभानी है। • अडिग आस्था, • अटूट साहस तथा • अथक पुरुषार्थ का परिचय देना पड़ा। सृजन सैनिकों को भी दिव्य शक्ति धारा से जुड़ने, उसके उपयुक्त माध्यम बनने के लिए • अडिग- सुदृढ़ आस्था • अखण्ड- सफल जीवन साधना और • अनुशासित समर्थ संगठन के विकास की रीतिनीति अपनानी होगी।

इसके लिए गहन चिन्तन- मनन की जरूरत है। युगऋषि ने मार्गदर्शन बहुत आगे तक के लिए दे रखा है। हर युग साधक को अपनी मन:स्थिति इसके अनुसार बनानी- विकसित करनी है। साथ ही अपनी वर्तमान स्थिति, अपने वर्तमान स्तर से एक चरण आगे बढ़ाने का समयबद्ध संकल्प करके मजबूती से कदम रखना है।

• अर्जुन अपने बूते भीष्म का वध नहीं कर सकते थे, किन्तु जब उन्होंने उन्हें मार्ग से हटाने का दृढ़ निश्चय कर लिया तो भगवान श्रीकृष्ण ने उसके लिए मार्ग बना दिया। अर्जुन ने अभिमन्यु वध से क्रुद्ध होकर जयद्रथ को सूर्यास्त तक मार देने का संकल्प कर लिया। अर्जुन के संकल्प को पूरा कराने के लिए श्रीकृष्ण ने अपनी माया का सटीक- सामयिक उपयोग करके संकल्प को पूरा करा ही दिया। इसी प्रकार सृजन सैनिक जब संकल्पपूर्वक कदम बढ़ाते हैं, तो युग देवता उसके साथ अपनी चेतन शक्ति लगाकर सत्प्रयासों को सार्थक बना ही देते हैं। इसके अनेक प्रमाण हम सबके सामने हैं। अनगढ़- सीमित साधकों के प्रयासों से प्रतिबंधित गायत्री साधना का जन- जन तक पहुँच जाने, यज्ञीय परम्परा के पुनर्जागरण से लेकर सामान्य व्यक्तियों के आश्वमेधिक प्रयोगों तक चेतनसत्ता के अदृश्य, किन्तु सुनिश्चित एवं समर्थ सहयोग को ही अनुभव किया जाता रहा है।

अगले चरण कठिन भले हों, किन्तु नैष्ठिकों के संकल्पयुक्त पुरुषार्थ के साथ जुड़ने वाली समर्थ सत्ता के प्रभाव से वे भी शानदार ढंग से पूरे किए जा सकेंगे। हमें दिव्य चेतना के उपयुक्त प्रामाणिक माध्यम बनने के लिए शक्ति संवर्धन के ऊपर निर्दिष्ट अनिवार्य सूत्रों के अनुसार अपने प्रयासों को और अधिक धारदार बनाना है।

संगठित इकाइयाँ प्रखर हों
इसके लिए जहाँ प्रत्येक साधक अपने व्यक्तित्व को अधिक सृजनशील, प्रखर और बेहतर तालमेल के लिए विकसित करे, वहीं सभी छोटी- बड़ी संगठित इकाइयों को भी नवसृजन के अगले मोर्चे सँभालने के लिए अधिक पुष्ट और कुशल बनाना होगा। उन्हें आस्था संवर्धन, जीवन साधना और संगठन को समर्थ बनाने के लिए प्रचार, प्रेरणा एवं प्रशिक्षण के प्रामाणिक केन्द्रों की भूमिका निभानी होगी। प्रज्ञा मण्डलों (पुरुष, महिला, युवा), प्रज्ञा केन्द्रों, प्रज्ञापीठों एवं शक्तिपीठों को इस स्तर पर विकसित और सक्रिय किया जाना है।
प्रचार- विस्तार :- इसके लिए इस एक वर्ष में नये एक लाख गाँवों तक युगसंदेश पहुँचाने, नये व्यक्तियों को प्रेरित करके सुगम कार्यक्रमों से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। बड़े नगरों के नये मोहल्लों को भी एक गाँव मानकर चला जा सकता है। इसी प्रकार समाज के विभिन्न वर्गों तक भी नवसृजन का संदेश पहुँचाने और उनकी मानसिकता के अनुरूप सुगम कार्यक्रमों से जोड़ने के लक्ष्य बनाये जा सकते हैं।

संपर्क यात्राएँ :- इसके लिए समयदानियों को सम्पर्क यात्राएँ करने के लिए प्रेरित, प्रशिक्षित एवं नियुक्त किया जाना जरूरी है। युगऋषि ने लिखा है-

युगनिर्माण का एक सूत्रीय कार्यक्रम यह है कि प्राणवान व्यक्ति जनसंपर्क करें। इस प्रकार दीपक से दीपक जलाने की तरह, आस्था से आस्था, विवेक से विवेक, पुरुषार्थ से पुरुषार्थ और कौशल से कौशल जगाने की दिव्य प्रक्रिया को प्रभावशाली एवं प्रचण्ड बनाया जा सकता है।

साइकिल यात्राएँ :- एक लाख गाँवों तक नवसृजन का संदेश देने और जन- जन को उसमें भागीदार बनाने के लिए साइकिल यात्राओं की व्यवस्था बनाई जाय। चार साइकिलें, हो सके तो पीले रंग से रंगाकर प्रशिक्षित समयदानियों को ग्राम प्रव्रज्या के लिए भेजा जाय। इस संदर्भ में साइकिलें तैयार करने, साउण्ड सिस्टम एवं आवश्यक साजोसामान संबंधी मार्गदर्शन शांतिकुंज युवा प्रकोष्ठ अथवा संगठन कार्यालय से प्राप्त किया जा सकता है।

अन्य क्रम :-
साइकिलें न होने पर निर्धारित गाँव, नगर के मोहल्लों तक किसी भी साधन से सम्पर्क टोलियों को पहुँचाने, वापिस लाने की व्यवस्था बनायी जा सकती है। वहाँ वे निर्धारित क्रम से रैली, धर्मफेरी, सद्वाक्य लेखन, संगोष्ठियाँ आदि के माध्यम से जनजागरण का कार्य कर सकते हैं। इस क्रम में भाइयों की तरह बहनों की टोलियाँ भी नियुक्त की जा सकती हैं।

झोला पुस्तकालय :-
घर- घर संपर्क करके बिना मूल्य जीवन उपयोगी साहित्य पढ़ाने- वापिस लेने के लिए सभी समयदानियों को तैयार किया जाय। पूज्य गुरुदेव ने झोला पुस्तकालयों को अमृत कलश कहा है। इस माध्यम से कम जानकार व्यक्ति भी सभी को ज्ञानामृत का पान कराने का पुण्य कार्य कर सकते हैं। प्रौढ़ पुरुषों, महिलाओं को इसमें विशेष रूप से लगाया जा सकता है।

पर्व- त्यौहार :- संस्कारों की तरह पर्वों के माध्यम से सामाजिक श्रेष्ठ आदर्शों के प्रति जन- जन को आकर्षित किया जा सकता है। पूज्य गुरुदेव ने वर्ष में १२ चुने हुए पर्वो पर सामूहिक प्रेरक आयोजन करने का विधान धर्मतंत्र से लोकशिक्षण के अन्तर्गत दिया है। क्षेत्र विशेष में प्रचलित किन्हीं लोकप्रिय पर्वों की प्रक्रिया निर्धारित करने के लिए शांतिकुंज से मार्गदर्शन, सहयोग प्राप्त किया जा सकता है।

स्लाइड शो :-
पहले स्लाइड प्रोजेक्टरों के माध्यम से जन- जन में विचार क्रांति, नैतिक क्रान्ति तथा सामाजिक क्रान्ति की प्रेरणा देने के लिए व्यवस्था बनाई गई थी, जो बहुत प्रभावकारी सिद्ध हुई थी। अब नई तकनीकों के अनुसार सामान्य रूप से उपलब्ध साधनों- लैपटॉप, स्मार्ट फोन आदि के माध्यम से या सस्ते प्रोजेक्टरों के माध्यम से इस प्रक्रिया को पुन: नये रूप में जीवन्त बनाने के प्रयास केन्द्रीय एवं क्षेत्रीय स्तर पर किए जा रहे हैं।

उक्त माध्यमों से सम्पर्क में आने वाले व्यक्तियों को क्रमश: साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवा के सुगम कार्यक्रमों से जोड़ने के लिए प्रयास करने चाहिए। उत्साह उभरने पर उन्हें समयदान एवं अंशदान के लिए भी प्रेरित किया जा सकता है। इन सब कार्यक्रमों को वे ठीक से चला सकें, इसके लिए छोटे- छोटे प्रशिक्षणों का क्रम चलाया जाना चाहिए।
प्रशिक्षण व्यवस्था सुलभ बने

विविध कार्यक्रमों के माध्यम से सम्पर्क बनने और जानकारी मिलने पर बड़ी संख्या में नर- नारी कुछ करने के लिए उत्साहित और संकल्पित तो होते हैं, किन्तु आत्मीयता और प्रशिक्षण न मिल पाने से वे पुन: निष्क्रिय होने लगते हैं। इसलिए प्रत्येक सक्रिय मण्डल, प्रज्ञा केन्द्रों, प्रज्ञापीठों, शक्तिपीठों को अपने- अपने स्तर पर प्रशिक्षण की व्यवस्था बनानी चाहिए। प्रशिक्षण देने वाले व्यक्तियों में क्रमश: लोकनेतृत्व के गुण विकसित होने लगते हैं, जो संगठन को व्यापक और सशक्त बनाने के साथ उसे सही दिशा देते रहने में भी सफल हो पाते हैं। इस संदर्भ में युगऋषि ने 'युग निर्माण योजना भाग- दो' में लिखा है :-

युग निर्माण अभियान के उमड़ते हुए प्रवाह को सँभालना और उसे दिशा देना अपने आप में एक बड़ा काम है। लोक- नेतृत्व एक जटिल कला है। उसमें निर्जीव मशीनों से नहीं, वरन सजीव मनुष्यों से पाला पड़ता है और विरोधी को भी सहयोगी बनाने का, मूर्छित को गतिवान हनुमान बनाने का कार्य पूरा करना होता है। साधनों की जहाँ कोई व्यवस्था नहीं, वहाँ उन्हें उपलब्ध करके कुछ से कुछ कर दिखाने का चमत्कार करना होता है। लोक नेतृत्व कर सकने वाले सुयोग्य और सुलझे हुए व्यक्ति हमें आज ही तैयार करने चाहिए ताकि कल की आवश्यकताओं को ठीक तरह पूरा किया जा सके।

यह कार्य बहुत पहले ही आरम्भ होना चाहिए था। मगर अब तो उस आवश्यकता की पूर्ति अनिवार्य हो गई है। संगठन की आवश्यकता और गतिविधियों की तीव्रता आँधी और तूफान की तरह बढ़ रही है। प्रवाह और उफान तो कोई दिव्य शक्ति ला रही है, उसकी चिन्ता नहीं करनी है। चिन्ता इतनी भर करनी है कि विश्व इतिहास के इस सबसे महत्त्वपूर्ण अभियान को सँभालना, व्यवस्थित और नियंत्रित करना जिस प्रकार संभव हो, उसका प्रबन्ध करना चाहिए। अभियान की आज सबसे बड़ी आवश्यकता है सुयोग्य और प्रशिक्षित अनुभवी और कुशल लोकनेताओं की जो इस अभियान के महामत्त गजराज को सही दिशा में चलाने की भूमिका कुशलतापूर्वक निभा सकें। अन्यथा वह शक्ति अव्यवस्थित और अनियंत्रित होकर अवाँछनीय दिशा में फूट सकती है।

प्रारंभ में जुड़ने वाले व्यक्ति प्रशिक्षण के लिए दूर जाने या अधिक समय लगाने के लिए तैयार नहीं हो पाते, इसलिए उन्हें मण्डल स्तरों पर कम समय के प्रशिक्षण देने की व्यवस्था बनायी जानी चाहिए। एक बार सक्रियता में रस आने पर वे अधिक समय वाले दूरस्थ प्रशिक्षणों में भी शामिल होने लगते हैं।

आस्था संवर्धन :- हर आस्तिक व्यक्ति को समस्त विश्व के लिए उज्ज्वल भविष्य लाने वाली युगशक्ति के साथ सक्रिय साझेदारी के लिए प्रेरित, प्रशिक्षित करना चाहिए।

उपासना क्रम में गायत्री मंत्र जप, मंत्रलेखन अथवा गायत्री चालीसा पाठ के साथ जीवन परिष्कार की साधना के सूत्रों से जुड़ने का मार्गदर्शन देना चाहिए। जो गायत्री मंत्र जप न करना चाहें वे सबके लिए उज्ज्वल भविष्य की भावना के साथ किसी भी इष्ट मंत्र या इष्ट नाम का जप- लेखन कर सकते हैं। इस प्रयोजन के लिए 'परिवर्तन के महान क्षण', 'सबके लिए सुलभ उपासना- साधना' एवं 'जीवन देवता की साधना आराधना' आदि पुस्तकों को माध्यम बनाया जा सकता है।

जीवन साधना :- उज्ज्वल भविष्य के लिए श्रेष्ठ चरित्र निर्माण की आवश्यकता समझते हुए उन्हें स्वाध्याय, संयम एवं सेवा कार्यों में तत्परतापूर्वक लग पड़ने की रीतिनीति समझाई और सिखाई जानी चाहिए। इसके क्रम में आत्मसमीक्षा, आत्मशोधन, आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास की साधनाएँ सिखाई जानी चाहिए। इन्द्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम तथा विचार संयम की सामर्थ्य अर्जित करने के लिए प्रेरित करते रहना चाहिए। अगले क्रम में युग निर्माण सत्संकल्प के सूत्रों के अनुसार आत्मप्रगति के चरण बढ़ाये जा सकते हैं। इसके लिए 'जीवन साधना के स्वर्णिम सूत्र' जैसी पुस्तकों को और प्रज्ञा पुराण के द्वितीय खंड को माध्यम बनाया जा सकता है।

संघबद्धता :- प्रत्येक नैष्ठिक साधक को किसी न किसी संगठित इकाई- मण्डल से जोड़ा जाना चाहिए। युगऋषि ने इस संदर्भ में लिखा है -

यह विचारधारा ही अत्यंत उच्च कोटि की है, फिर उसको संघशक्ति का पोषण मिल जाय तो उसके प्रयासों का आँधी- तूफानों की तरह उठ खड़ा होना स्वाभाविक है। थोड़े से डाकू बहुत बड़े समुदाय पर संघशक्ति के बल से विजय पा जाते हैं, उसी प्रकार संघशक्ति से सम्पन्न देवत्व हजार गुना अधिक प्रभावी होगा।

इसके लिए 'संगठन की रीतिनीति' एवं 'युग निर्माण योजना का दर्शन, स्वरूप एवं कार्यक्रम' जैसी पुस्तकों को माध्यम बनाया जा सकता है। संगठन तंत्र इतना समर्थ एवं प्रामाणिक बने कि हर क्षेत्र में सम्पर्क एवं प्रशिक्षण करने के साथ आवश्यकता के अनुसार विभिन्न आन्दोलनों को प्रभावी ढंग से चलाया जा सके। सभी आन्दोलनों को गति देने के लिए उनके विशिष्ट प्रशिक्षणों का तंत्र भी क्षेत्रीय और केन्द्रीय सहयोग से विकसित किया जाना चाहिए।

शक्ति संवर्धन वर्ष में दिव्य सत्ता शक्ति अनुदान देने की उदार व्यवस्था बना ही चुकी है। व्यक्तियों, समयदानियों की संख्या और गुणवत्ता बढ़ने से ही दिव्य शक्ति प्रवाह को प्रत्यक्ष जगत में उतरने का आधार मिलेगा। इसके लिए प्रचार, प्रेरणा, प्रशिक्षण के साथ उनके संगठन और सुनियोजन के सुनिश्चित समयबद्ध संकल्प करने, उन्हें पूरा करने के लिए प्राण- प्रण से लग जाने से ही हम इष्ट प्रयोजन पूरा कर सकेंगे। 'हम यह कर सकते हैं और जरूर करेंगे' युगऋषि के इस वाक्य को आधार बनाकर जुट पड़ें, यही उचित है।


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