Published on 2018-05-11
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व्यक्ति और समाज
हमारे जीवन के दो बिन्दु हैं- एक व्यक्तिगत, दूसरा समष्टिगत। एक हमारी जीवन यात्रा का प्रारम्भ स्थान है तो दूसरा गन्तव्य। व्यक्तिगत जीवन अपूर्ण है, वह समाजिक जीवन में आत्मसात होकर ही पूर्ण बनता है। व्यक्ति और कुटुम्ब मरते हैं, नष्ट होते रहते हैं, पैदा भी होते हैं, किन्तु समष्टि का जीवन अखण्ड है, अनन्त है, सदा- सदा चलता रहता है। व्यक्तिगत जीवन सामयिक बरसाती चिर- प्रवाहित सुरसरि की तरह है जो कभी रुकता ही नहीं।

जीवन के विकास के अनुकूल साधन, परिस्थितियाँ, समाज ही जुटा सकता है। समाज से परे एकाकी रहकर तो व्यक्तिगत जीवन का भी विकास सम्भव नहीं है। विभिन्न शिक्षण संस्थायें, उनमें काम करने वाले व्यक्ति, जीवन- निर्वाह के साधन, ज्ञान विज्ञान, अविष्कार अन्वेषण के व्यापक कार्यक्रम क्या एक व्यक्ति से सम्भव है? एकाकी व्यक्ति तो सुख भी नहीं भोग सकता। जिसे हम सुख और आनन्द कहते हैं, वह भी तो समाज की ही एक स्थित है। सुख के स्वर्ग में भी यदि मनुष्य को एकाकी छोड़ दिया जाए तो वह उससे ऊब जाएगा और भयभीत हो उठेगा।

हमारे कार्य व्यवहार सामाजिक जीवन को परिपुष्ट और विकसित करने के लिए हो। स्वामी रामतीर्थ ने कहा था- "तुम समाज के साथ ही ऊपर उठ सकते हो और समाज के साथ ही तुम्हें नीचे गिरना होगा। यह तो नितान्त असम्भव है कि कोई व्यक्ति अपूर्ण समाज में पूर्ण बन सके। क्या हाथ अपने को शरीर से पृथक्बलशाली बना सकते हैं? कदापि नहीं।"
जिस समाज में व्यक्ति अपने- अपने लाभ, अपने सुख, अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं की प्रेरणा से जीते हैं, वह समाज विशृखंलित हो जाता है, चाहे उसमें कितने ही बड़े विद्वान योद्धा, राजनीतिज्ञ, शक्तिशाली व्यक्तित्व क्यों न हों?

स्मरण रहे व्यक्ति और समाज की उन्नति साथ- साथ चलती है। यदि समाज कमजोर, विशृंखल, अव्यवस्थित होगा तो वह व्यक्ति के विकास में समर्थ न हो सकेगा। इतिहास इस बात का साक्षी है कि इसी कमजोरी के कारण; सामाजिक चेतना के अभाव में अपने ही लाभ और सुख को मान्यता देने के कारण ही हमें विदेशियों के आक्रमण तथा अत्याचार के दिन देखने पड़े। मुहम्मद गौरी, गजनवी, तैमूरलंग, नादिरशाह को हमारी सामाजिक विशृंखलता, व्यक्तिवाद के कारण ही अपने पैर जमाने में सफलता मिली।

वर्तमान समय की विडंबनाएँ
आज राजनैतिक दृष्टि से हम स्वतंत्र हो गये हैं, लेकिन अभी तक हम अपनी नागरिक जिम्मेदारियों के प्रति सचेत नहीं हो पाये हैं। यही कारण है कि कन्ट्रोल के समय हमारे यहाँ काला बाजार जोरों पर चलता है। अनाज के भण्डार भरे रहने पर भी कृत्रिम महँगाई पैदा करके अत्यधिक मुनाफा कमाते हैं। और तो और सार्वजनिक निर्माण कार्यों में लगने वाले सामान यथा- सीमेन्ट, लोहा, कोलतार, लकड़ी आदि बहुत- सा सामान चोर बाजार में बेच दिया जाता है और हमी लोग सस्ता पाकर उसे खरीद लेते हैं, फिर भारी मुनाफे के साथ उसे बेचते हैं। कई महत्वपूर्ण वस्तुएँ, दवा, मशीनें आदि जो बड़ी कठिनाई से विदेशी मुद्रा खर्च करके प्राप्त की जाती है, हमारे यहाँ वे भी काले बाजार में पहुँच जाती हैं, ऐसी स्थिति में क्या हम एक स्वतन्त्र देश के उत्तरदायी नागरिक कहला सकते हैं?

हमारे दायित्व
नि:संदेह एक सच्चे नागरिक का यह कर्तव्य है कि अपने आराम के लिए वह समाज की शक्ति को दुर्बल न करें। वरन् उसे परिपुष्ट करने के लिए अपनी बहुत- सी आवश्यकताओं को स्वेच्छा से त्याग करने के लिए भी उद्धत रहे।

जीवन- निर्वाह की सीमित जरूरतों के अतिरिक्त भोग- विलास, मौज- मजे, आराम- सुख की जिंदगी बिताने के नाम पर हमारे यहाँ कितना अपव्यय होता है, सम्पत्ति, पदार्थों का कितना नाश होता है? लेकिन हम यह नहीं जानते कि व्यर्थ ही नष्ट किये जाने वाले पदार्थों को, बड़े भारी अपव्यय को रोककर यदि उस बचत को हम राष्टः निर्माण की दिशा में लगाएँ तो कोई संदेह नहीं कि कुछ ही समय में हमारा देश संसार में समृद्ध देशों की पंक्ति में खड़ा हो सकने योग्य बन जायेगा।

एक प्रेरक दृष्टांत
सर टामास रो के डॉक्टर ने बादशाह शाहजहाँ की लड़की का इलाज किया और वह अच्छी हो गयी। इसके प्रति उपकार में शाहजहाँ ने मनचाहा इनाम माँगने के लिए कहा। सर टामस रो ने अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए कुछ न माँग कर इंग्लैण्ड से आने वाले माल पर से चुंगी हटाने की माँग की, जो स्वीकार कर ली गई। इससे उनके देश से आने वाला माल भारत में सस्ता बिकने लगा। उनका व्यापार बढ़ा और वे इस देश पर अपना राजनैतिक वर्चस्व जमा सकने योग्य सामर्थ्यवान हो गये। इंग्लैंड मालामाल और शक्तिवान हो गया। यह है व्यक्तिवाद को हटकर उसके स्थान पर समूहवाद की प्रतिष्ठापना करने का प्रतिफल।

इसके विपरीत हमारे देशवासियों ने व्यक्तिवाद को जब से आगे रखा तब से प्रत्येक क्षेत्र में अध:पतित होते चले गये। मुट्ठी भर विदेशी आक्रमणकारी हमारी व्यक्तिगत मनोभूमि के कारण ही इस देश पर हजार वर्ष तक अपना खूनी पंजा गड़ाये रह सके। अध्यात्मवादी अपनी व्यक्तिगत मुक्ति, स्वर्ग कामना एवं ऋद्धि- सिद्धि में लग गये। धर्मवादी अपनी पूजा- प्रतिष्ठा कराने के लिए अपने- अपने नाम के नये- नये सम्प्रदाय खड़े करने लगे। देश समाज- जाति, प्रांत, भाषा और सम्प्रदाय जैसी संकीर्णताओं में बँट गया। हर व्यक्ति अपने छोटे दायरे के लाभ की बात सोचने लगा और बड़े दायरे की उपेक्षा की जाने लगी। इन संकीर्णताओं को यदि हम अब भी न छोड़ सके और समूहवादी विशाल दृष्टिकोण न अपना सके तो न व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्ध होगा और न समूहगत सुस्थिरता के दर्शन होंगे। आवश्यकता इस बात कि है कि हम व्यक्तिगत लाभ की उपेक्षा करके सामाजिक लाभ एवं उत्थान की बात सोचें। परस्पर सहयोग करना सीखें और सम्मिलित शक्ति से मिल- जुलकर आगे बढ़ने की सर्वानुभूत सच्चाई को अपनाएँ।


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