इस्लाम के अनेक विद्वानों ने गायत्री महामंत्र का महत्त्व स्वीकारा और सराहा है

Published on 2018-05-13
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इस्लाम में 'सूरह फातिहा' का भाव और महत्त्व गायत्री महामंत्र जैसा ही है

रमजान का महीना (मई १५ से जून १४) एवं गायत्री जयंती (२२ जून) के संदर्भ में

पंथ अनेक- लक्ष्य एक
दुनियाँ के सभी धर्म- सम्प्रदाय, दीन- मज़हब मनुष्य को एक सनातन सत्य की ओर प्रेरित करते रहे हैं। शास्त्र वचन है 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।' अर्थ सत्य एक ही है, ज्ञानी जन उसे अनेक ढंग से समझाते रहते हैं।

भगवान रामकृष्ण परमहंस ने अपने अनुभव के आधार पर इसी सत्य की घोषणा करते हुए कहा है-
"जितने मत, उतने पथ।"

महात्मा गाँधी कहते रहे हैं- "सभी पंथ मनुष्य को एक ही परम सत्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। जब हम एक ही लक्ष्य पर पहुँचना चाहते हैं तो किसी भी मार्ग से जाने में क्या हर्ज है?"

युगऋषि पं. श्री आचार्य श्रीराम शर्मा ने कहा है- "सभी धर्म- सम्प्रदाय अपने समय और क्षेत्र की आवश्यकता के अनुसार कुछ सनातन सूत्रों और कुछ सामयिक कार्यक्रमों को मिलाकर चले हैं। सामयिक कार्यक्रमों से परे, सनातन सूत्रों पर ध्यान दिया जाय तो बाहर से दिखते भेदों से परे एकता, समता के दर्शन किए जा सकते हैं।"

सभी धर्म- सम्प्रदायों के विवेकवान साधक इस तथ्य को समझते रहे हैं। इसके प्रमाण इतिहास में जगह- जगह मिलते हैं। इस्लाम में भी मलिक मोहम्मद जायसी, अब्दुल रहीम खानखाना उर्फ रहीम, रसखान आदि ने भक्ति के मूल भावों को अनुभव करते हुए जीवन जिया और उसी के अनुसार समाज को प्रेरणा देने के प्रयास किये।

गायत्री महामंत्र की महत्ता भारतीय संस्कृति में निर्विवाद रही है। उसे सर्वश्रेष्ठ मंत्र, गुरुमंत्र जैसे विशेषणों से सम्बोधित किया गया। उसे आदि गुरुमंत्र कहा गया है, सभी ऋषियों, अवतारियों ने इसकी साधना की है। इस्लाम के अनेक विद्वानों ने इस तथ्य को समझा- स्वीकारा है। अपने- अपने ढंग से उसकी महिमा का गान भी किया है। कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं :-

मौलवी शाह गुलहसन
मौलवी साहब की उर्दू भाषा में प्रकाशित प्रसिद्ध पुस्तक 'तजकराये गौसिया' में पृष्ठ ५२ पर एक ऐसे सूफी मुस्लिम संत का जिक्र है जो हिन्दू संत- योगी के रूप में विख्यात थे। उनसे मौलवी साहब ने पूछा कि 'हिन्दुओं और मुसलमानों की फकीरी में आपने क्या फर्क देखा? तो उनका उत्तर था, "फकीरी की बात तो दोनों तरफ एक- सी है, शब्दों और पारिभाषिक शब्दावली में भर फर्क है। इसी पुस्तक के पृष्ठ क्र. ४८ पर उन्होंने अपनी गायत्री साधना के संबंध में भी उल्लेख किया है। उन्होंने अपने "जाई बाप" (जिनकी धर्मपत्नी ने उन्हें अपना दूध पिलाया था) पं. राम सनेही जी की प्रेरणा से गायत्री महामंत्र का जाप कनखल, हरिद्वार में गंगा किनारे कुंभ के दौरान किया था। उन्होंने गायत्री मंत्र का अर्थ और महात्म्य कुछ इस प्रकार लिखा है :-

ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।।

अनुवाद 'अल्लाहताला जो कुल मख्लूकात (सृष्टि) में जलवागर है और परस्तिश (उपासना) के काबिल है। उस पैदा कुननदा (पैदा करने वाले) का नूर (दिव्य प्रकाश) सब जनों में जलवागर है। हम फरमावरदार (आज्ञाकारी) प्रेम और श्रद्धा से यकीन करते हैं कि वो हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ दिल और अक्ल आदि को अपनी तरफ लगाएँ।

स्पष्ट है कि उन्होंने गायत्री महामंत्र के महत्त्व को ठीक से समझा तो उसे इस्लाम की मूल भावना के अनुरूप ही पाया और उसकी साधना श्रद्धापूर्वक की।

अल्लामा मोहम्मद इकबाल
"सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा" जैसे लोकप्रिय राष्ट्रगीत के लेखक इकबाल साहब को भी गायत्री महामंत्र के भावों और विचारों ने प्रभावित किया है।
अल्लामा डॉ. मोहम्मद इकबाल की ग्रंथावली (कुल्लियात इकबाल) में पृष्ठ २० पर तरजुमा गायत्री- 'आफताब' शीर्षक से किया गया है, जो इस प्रकार है-

ऐ आफताब रूह खाने जहाँ है तू।
शीराजा बंद दफ़तरे कौनोमकां है तू।।
वाइस है तू जूदो अदम की नमूद का।
है सब्ज़ तेरे दम से चमन हस्तोबूँद का।।
कायम यह अन्सुरो का तामाशा तुझी से है।
हर शय में जिंदगी का तकाज़ा तुझी से है।।
हर शय को तेरी जलवागरी से सवात है।
तेरा यह सोजो साज सरापा हयात है।।
वो आफ़ताब जिससे जमाने में नूर है।
दिल है, खिरद है, रूहे रवा है, शऊर है।।
ए आफ़ताब, हमको ज़ियाए शऊर दे।
चश्मे खिरद को अपनी तजल्ली से नूर दे।।
है महफिले वजूद का सामां तराज़ तू।
यजदाने साकिनाने नशेबो फराज़ तू।।
तेरा कमाले हस्ती है हर जानदार में।
तेरी नमूद सिलसिलाए कोहसार में।।
हर चीज़ की हयात का परवरदिगार तू।
जाइदगाने नूर का है ताजदार तू।।
न इब्तदा कोई, न कोई इन्तहा तेरी।
आज़ाद कैदे अवल्लोआखिर जिया तेरी।।

अर्थात्- हे सविता (परमसत्ता) तू ही जीवन के स्पंदन का मूल है। तू ही इस संसार को संचालित करने वाला है, लोक- परलोक का विधाता, पंचतत्त्वों में प्राण डालने वाला है। हर वस्तु तेरे प्रकाश से प्रकाशित और गतिवान है, तू ही वह दैदीप्यमान सूर्य है, जिसका प्रकाश सब में व्याप्त है, चाहे बुद्धि हो या दिल हो। हे सूर्य! हमको सद्बुद्धि और अपने नूर की आभा का ज्ञान दे। तू ही सृष्टि के मूल का कारण है और यहाँ रहने वालों की स्थिति का पूर्ण ज्ञाता भी। पर्वत में, हर जानदार में, सृष्टि के कण- कण में तू ही व्याप्त है। तू सबका पालनहार है। सब तेरे ही प्रकाश से प्रकाशित हैं। तू आदि- अंत के बंधन से परे, सदा से प्रकाशित है।

उन्होंने भी सविता का अर्थ सबको उत्पन्न करने वाले परमात्मा ही दिया है। परमात्मा- परवरदिगार को अपने जीवन की बागडोर सौंप देने वाली यह प्रार्थना उन्हें भी अति उत्तम, प्रभावपूर्ण लगी। वे इसकी अभिव्यक्ति के लिए अपनी कलम को रोक नहीं सके।

साविर अबोहरी
साविर अबोहरी उर्दू के प्रसिद्ध लेखक हुए हैं। उर्दू पत्रिका 'हमारी जुबान' ८ मई १९९४ में पृष्ठ ६ पर वे कहते हैं कि यह मंत्र 'सूरह फातिहा' से बहुत मिलता- जुलता है। वे गायत्री मंत्र का कविता में इस प्रकार अनुवाद करते हैं।

१. ए खुदाए इज्जु जल, खालिके अरजो- समां।
मालिके कौनोमकां, ममवए लुत्फोकरम।
वाहिदो यकता है तू, बे नजीरो बे मिसाल।।
२. कादिरे मुतलक है तू, तेरी हस्ती बेकरां।
इब्तदा इसकी कोई और न कोई इन्तहा।
तेरे दम से है रवां, जिंदगी का कारवाँ।।
३. नूर का दरया है तू, तेरे जलवे सूबसू।
तेरी ज़ाते पाक पर, हम दिलोजां से फिदा।
तू हमारी अक्ल को, कामिल व पुख्ता बना,
नेक रास्ते पर लगा।।

सूरह फातिहा
'सूरह फातिहा' को इस्लाम में सर्वोपरि प्रार्थना का स्थान दिया गया है। क़ुरान शरीफ के प्रारंभ में यह प्रार्थना की गई है। संत विनोबा भावे ने अपनी पुस्तक च्रूहुल क़ुरान (क़ुरान सार) में इसे क़ुरान शरीफ का मंगलाचरण कहा है। हर नमाज में इसका पाठ जरूरी होता है। मौत के बाद मृतक की रूह (आत्मा) की शान्ति के लिए उसकी कब्र पर जाकर उसके प्रिय जन सूरह फातिहा अवश्य पढ़ते हैं। उसका मूल पाठ और भावार्थ कुछ इस प्रकार है :-

'बिस्मिल्लाहर्रमानर्रहीम' यह इस्लाम का सूत्र वाक्य है जो क़ुरान शरीफ की हर आयात के पहले लिखा गया है।

इसका भावार्थ है :- शुरू करें अल्लाह के नाम से जो अत्यंत दयालु और परम कृपालु है।

१. अलहम्दुलिल्लाहिरविबल आलमीन यह सूरह फातिहा का प्रथम चरण है, इसलिए 'फातिहा को 'अलहम्द शरीफ' भी कहते हैं।इसका भावार्थ है- सारी स्तुतियाँ सिर्फ अल्लाह के लिए हैं, जो सारी सृष्टि का पालन- पोषण करने वाला है।
२. अर्रहमानर्रहीम वह रहमतों (कृपाओं) की वर्षा करने वाला और दयालु है।
३. मालिके यौमद्दीन वही अन्तिम न्याय और दीन- धर्मानुशासन को लागू करने वाला- मालिक है।
४. इय्याक़ नआबुदु व इय्याक नस्तईन
भावार्थ- (हे परमात्मा) हम तेरी ही भक्ति करते हैं और तुझसे ही सहायता पाना चाहते हैं।
• इहदिनस्सिरात्तलमुस्तक़ीम
भावार्थ- (हे प्रभु) तू हमें सीधी राह पर चला।
• सिरातल्लजीन अन्ऊम्त अलैहिम
भावार्थ उस राह पर चला जिस पर चलने वालों पर तू अपने अनुदानों की वर्षा करता है।
• गैरिल- मगजूबिअलैहिम वलज्ज्वाल्लीन

भावार्थ- उस राह पर मत चला जिस पर चलने वालों पर तेरा कोप बरसता है।

सूरह फातिहा का अध्ययन करने पर स्पष्ट दिखता है कि गायत्री महामंत्र के भावों को ही समय की आवश्यकता के अनुसार कुछ विस्तार दे दिया गया है।

दोनों का समीक्षात्मक अध्ययन
अनेक विद्वानों ने इनकी समता के बारे में समीक्षात्मक अध्ययन किया है। यहाँ डॉ. मोहम्मद हनीफ खाँ शास्त्री के अध्ययन का सार- संक्षेप प्रस्तुत किया जा रहा है। उन्होंने कामेश्वर सिंह दरभंगा विश्वविद्यालय, दरभंगा (बिहार) से महामंत्र गायत्री एवं सूरह फातिहा विषय पर संस्कृत में पीएच.डी. किया है। उन्होंने 'महामंत्र गायत्री'और सूरह फातिहा का एकीकरण इन शब्दों में किया है-

अब जहाँ सूरह फातिहा की बात है, वह गायत्री मंत्र से अलग नहीं है। यदि द्वेष रहित एवं उदारतापूर्वक इसके वाक्यांशों पर विचार किया जाए तो ऐसा प्रतीत होता है कि सूरह फातिहा- सूत्र रूप महामंत्र गायत्री की ही व्याख्या स्वरूप है। उदाहरणार्थ एक- एक करके प्रत्येक वाक्य की व्याख्या इस प्रकार देखी जा सकती है-

तत्सवितुर्वरेण्यं अर्थात् वही सविता देव वरण करने योग्य है। अब प्रश्न उठता है कि कौन सविता देव है, उनका परिचय क्या है और सिर्फ वही क्यों वरण करने योग्य है? चूँकि पीछे यह सिद्ध किया जा चुका है कि ब्रह्म या अल्लाह का ही गुणवाचक नाम 'सविता' है, इसलिए उक्त प्रश्न का उत्तर सूरह फातिहा के पहले वचन से ही मिल जाता है कि सविता देव ही क्यों वरण करने योग्य है।

अलहम्दुलिल्लाहिरब्बिल आलमीन
अर्थात् (क्योंकि) दुनिया की सारी प्रशंसाएँ सिर्फ अल्लाह के लिए ही हैं जो (बड़ी ही उदारतापूर्वक)सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का पालन- पोषण करने वाला है।
यहाँ भी साफ- साफ बता दिया जा रहा है कि वह अल्लाह ही हर प्रशंसा के लायक है। क्योंकि वही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का पालन- पोषण करने वाला- रब्बुल आलमीन है, इसलिए बस वही वरण करने योग्य है।

भर्गो देवस्य धीमहि अर्थात् उसी महातेज स्वरूप देवता का ध्यान करते हैं, जो हमारे पापों को जलाकर राख कर देता है। अब प्रश्न उठता है कि बस उन्हीं तेज स्वरूप देवता का ध्यान क्यों करते हैं? उससे क्या लाभ है? इसका उत्तर सूरह फातिहा के अगले वचनों से मिलता है।

अर्रहमाननिरहीम मालिकेयोमिद्दीन

अर्थात् (क्योंकि) वह अपनी रहमतों की निरन्तर बारिश करने वाला, अत्यंत दयालु है, इसलिए हमारे पापों को जलाकर रख देता है यानी गुनाहों को माफ कर देता है और अन्त में सही न्याय देने वाला है। हमारी निष्ठा और मेहनत से किये गये कर्मों का सही- सही न्यायपूर्वक मजदूरी के रूप में बदला जो देता है, इसीलिए बस उसी महातेज स्वरूप देवता का ध्यान करते हैं और कहते भी हैं कि-

इय्याक नअबुदु व इय्याक नस्तईन :-

अर्थात् (हे महातेज स्वरूप परमात्म देव) हम तेरी ही भक्ति करते हैं और बस तुझ से ही मदद चाहते हैं। क्या मदद चाहते हैं? उत्तर में महामंत्र गायत्री के वचन बोल पड़ते हैं-

धियो यो न: प्रचोदयात्।
अर्थात् जो हमारी बुद्धि को प्रेरित करें।

जब वह परमात्मा, परवरदिगार हमारी बुद्धि को पे्ररित करेगा तो वह भटक कर गलत रास्ते पर नहीं जा सकती। सही रास्ते पर आगे बढ़ती हुई मनुष्य के इष्ट लक्ष्य तक पहुँच ही जायेगी।

प्रार्थना के इसी भाव को सूरह फातिहा में इस प्रकार व्यक्त किया गया है।

इहदिनस्सियतल्मुस्तकीम

अर्थात् (हे परमेश्वर) हमको सीधी राह चला।

सीधी राह कैसी होनी चाहिए, इस उधेड़- बुन में प्रार्थी नहीं पड़ता। क्योंकि उसे पता नहीं है कि सीधी राह क्या है। तभी तो बुरे कर्म भी अच्छे समझ कर करता है, किन्तु समझ में तब आता है जब वह काफी भटक गया होता है। इसलिए वह सहज भाव से अबोध बालक की तरह साफ- साफ बोल देता है कि

सिरातल्जीन अन् अम्ता अलैहिम


अर्थात् उन लोगों की राह चला, जिस राह पर चलने वालों को तूने असीम पारितोषिकों से पुरस्कृत किया है। यहाँ कोई भेदभाव नहीं है, कोई जात- पात नहीं है, किसी प्रकार का कोई वैमनस्य नहीं। ये सीधी राह चलने वाले पुरस्कृत लोग किसी भी देश, किसी भी भाषा भाषी, किसी भी जाति, किसी भी धर्म के हों, बस उन्हीं की राह पर चलाने के लिए प्रार्थना की जा रही है। इसके विपरीत यह भी कहा जा रहा है कि ऐ अल्लाह।
गैरिल- मगजूबि अलैहिम वलज्ज्वाल्लीन
अर्थात् उन लोगों की राह पर मत चलाओ, जो पथ भ्रष्ट हुए और तेरे प्रकोप के भाजन हुए हैं।

इस प्रकार दोनों महामंत्रों की उपर्युक्त व्याख्या से स्वत: ही ज्ञात होता है कि दोनों में आश्चर्यजनक एकीकरण है। हाँ समय के हिसाब से सूरह फातिहा द्वारा याचना में भी वृद्धि की गयी- सी लगती है और इसमें साफ- साफ स्पष्ट रूप से व्याख्या सहित याचना की गयी है, ताकि सूत्रात्मक शब्दों के अर्थों में मनगढंत कल्पना न की जा सके। इसके साथ ही एक बात और उभर कर सामने आती है कि यदि द्वेष रहित होकर सूरह फातिहा की दृष्टि से महामंत्र गायत्री को देखा जाए तो इसकी कल्याणमयी आभा और भी दैदीप्यमान होती है।

समय के अनुरूप प्रयोग हों
यह युग परिवर्तन का महत्त्वपूर्ण समय है। मनुष्य मात्र के लिए सतयुग जैसी परिस्थितियाँ लाने के लिए, परमात्मा के साथ साझेदारी निभाने के लिए सनातन धर्म वालों द्वारा जो किया जा रहा है, वैसे ही इस्लाम धर्म के पाबन्द विवेकवान व्यक्ति भी कर सकते हैं। वे गायत्री महामंत्र के स्थान पर सूरह फातिहा के जप और लेखन की व्यक्तिगत और सामूहिक साधनाएँ कर सकते हैं। सूरह फातिहा में समय के अनुसार कुछ व्याख्याएँ बढ़ जाने से वह लम्बा हो गया है, इसलिए उसके जप- लेखन में कठिनाई आ सकती है। उसका समाधान यह है कि व्याख्या वाले अंश कम करके मूलभाव वाले चरण भर चुनकर उनके जप और लेखन का अभियान चलाया जाय। जैसे-

ॐ भूर्भुव: स्व: के तत्सम अर्रहमानर्रहीम मालिके यौमद्दीन को लें। दोनों में परमात्मा को सारे विश्व में समाया हुआ और श्रेष्ठ गुणवाला माना गया है। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि के तत्सम इय्याक़ नआबुदु व इय्याक नस्तईन को लिया जाय। दोनों में परमात्मा को वरण करने योग्य और धारण करने की भावना की गई है।

धियो यो न: प्रचोदयात् के स्थान पर इहदिनस्सिरात्तलमुस्तक़ीम लें। दोनों में प्रभु के अनुरूप सीधे मार्ग पर सही दिशा में बढ़ने की प्रार्थना है। इस्लाम के अनुसार भी 'दौरे हक' सतयुग आना ही है। इसके लिए ईश्वर की साझेदारी करने की साधना वे भी करें और परमात्मा के अनुग्रहों- अनुदानों को पाने के सच्चे हकदार बनें।


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