जल संरक्षण करें, जीवन रक्षा और पर्यावरण संतुलन के पुण्य कमायें

Published on 2018-06-01
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पानी का महत्व समझें- स्वीकारें
परमात्म सत्ता ने पृथ्वी पर जीव जगत बनाया- बसाया है तो उनके जीवन निर्वाह के संसाधन भी उदारतापूर्वक प्रदान किये हैं। जीवन बनाये रखने के लिए आहार की जरूरत होती है तो उसने धरती को उर्वरता प्रदान की, अनेक प्रकार के पोषक आहार धरती की ऊर्वरता के नाते उगाये- खाये जा सकते हैं। उसके लिए अनुकूल ऋतुचक्र की भी रचना की। जो व्यक्ति प्रकृति के नियमों को समझें और अपनाएँ वे हर ऋतु में पर्याप्त मात्रा में पोषक आहार प्राप्त कर सकते हैं।

जीवन के लिए ठोस आहार से भी अधिक आवश्यकता पानी की होती है। उसे प्रकृति ने और भी अधिक मात्रा में और अधिक सहजता से उपलब्ध कराया है। धरती पर लगभग ४०% क्षेत्र में भूमि है, शेष ६०% में जल है। समुद्र में, ध्रुवों और पर्वतों पर हिम के रूप में, वर्षा जल के रूप में, नदियों, झीलों, तालाबों में वही जल उपलब्ध रहता है। भूमिगत जल भी बड़ी मात्रा में उपलब्ध है जिसे कुओं, बावड़ियों एवं नलकूपों के माध्यम से प्राप्त किया जाता है। सब्जी, वनस्पतियाँ, फल और उपयोगी लकड़ी देने वाले, वायु शोधन करने वाले वृक्षादि सभी के उत्पादन- संरक्षण के लिए पानी की जरूरत पड़ती है।

पानी का महत्त्व निर्विवाद रूप से स्वीकार्य है, लेकिन विडम्बना यह है कि सैद्धांतिक रूप में 'जल ही जीवन है' यह तथ्य स्वीकार करने पर भी जीवन रक्षक जल के स्रोतों को शुद्ध, सुरक्षित रखने और प्रचुर मात्रा में जल संरक्षण के उपाय करने के आम दायित्व को इन दिनों स्वीकार नहीं किया जा रहा है। ऋतु के अनुसार खाद्य पदार्थों का उत्पादन, संरक्षण करते रहने की जिम्मेदारी मनुष्य उठा रहे हैं, इसलिए हर ऋतु में खाद्य पदार्थ उपलब्ध होते रहते हैं। पानी के सम्बन्ध में भी इस प्रकार की जिम्मेदारियाँ अनुभव करने और उन्हें तत्परतापूर्वक निभाने के प्रयास मानव समाज द्वारा किये जाने जरूरी हैं। अन्यथा जल की कमी की समस्या चर- अचर जीवों के अस्तित्व पर ही प्रश्न वाचक चिह्न लगा देगी।

थोड़ा- सा पानी

जी हाँ! भले ही धरती के ६०% क्षेत्र पर जल विद्यमान है, लेकिन मनुष्य के प्रत्यक्ष उपयोग में आने वाला पानी बहुत थोड़ा- सा ही है। उसका समुचित प्रबंधन बहुत जरूरी है। विशेषज्ञों- वैज्ञानिकों के अनुसार धरती पर उपलब्ध जल का लगभग ९७% पानी तो समुद्र में संग्रहीत है। यह जल वर्षा का और परिवहन के माध्यम के साथ अप्रत्यक्ष रूप से पर्यावरण संतुलन की भूमिका भले ही निभाता हो, किन्तु धरती पर रहने वाले प्राणियों के लिए पीने या सिंचाई के योग्य नहीं है। शेष ३% पानी ही विभिन्न रूप में प्रयोग के योग्य है।

इस शेष उपयोगी (३%) जल का लगभग ७७% अंश तो ध्रुवों, पहाड़ों पर हिम शिलाखण्डों के रूप में जमा है। लगभग २२% अंश भूजल (भूमि की सतज और भूगर्भ में संचित) है। शेष ०१% जल के रूप में (नदियों, झरनों) के रूप में उपलब्ध है।

प्रत्यक्ष उपयोगी जल प्रवाहित जल एवं भूजल के स्रोतों से ही प्राप्त होता है। मनुष्य द्वारा उपयोग किये जाने वाले कुल जल का लगभग ७३% पानी सिंचाई के काम आता है। औद्योगिक इकाइयाँ २१% जल का उपयोग कर लेती हैं। घरेलू उपयोग में ६% जल ही आता है। इस जल की उपलब्धि भूजल एवं प्रवाहित जल स्रोतों से ही होती है। इसका मूल आधार वर्षा जल ही है। हमें उसी के संचय, संवर्धन एवं संरक्षण की रीति- नीति अपनाने की जरूरत है।

मनुष्य की गलतियों के कारण हिमखंडों के रूप में संचित जल घट रहा है। भूजल के अत्यधिक दोहन, दुरुपयोग करने तथा जल संरक्षण की अपनी जिम्मेदारी न समझने के कारण भूजल भी घटता जा रहा है। प्रवाहित जल का हिसाब लगायें तो वर्ष के चार महीनों में ८०% जल बह जाता है। शेष २०% से ८ महीने काम चलाना पड़ता है।

समझदार बनें, जिम्मेदारी निबाहें

समझदारी का तकाजा है कि पानी का उपयोग करने वाले हर व्यक्ति, परिवार एवं संस्थान को पानी के स्रोतों को शुद्ध बनाये रखने तथा पानी के संचयन एवं सदुपयोग के लिए कोई सुनिश्चित जिम्मेदारी उठानी चाहिए। प्राचीन काल में राज्य सरकारें, ग्राम पंचायते तथा सम्पन्न वर्ग के लोग जल संचयन- संरक्षण को पर्याप्त महत्त्व देते थे। हर गाँव में एक पोखर (छोटा कच्चा तालाब) जनसहयोग से बनाया जाता था। राजा एवं धन सम्पन्न लोग बड़े और पक्के तालाब बनवाते थे। वर्षा में बेकार बह जाने वाला पानी उनमें संग्रहीत हो जाता था। उसके कारण उस क्षेत्र के भूजल का स्तर बना रहता था। इस कारण कुओं, बावड़ियों आदि में हर मौसम में पर्याप्त जल मिलता रहता था।

जब इन छोटे- बड़े तालाबों का पानी घट जाता था तो लोग खाली क्षेत्र की मिट्टी विभिन्न कामों (र्इंट बनाने, कच्चे मकान मरम्मत करने, खेतों में ऊर्वर मिट्टी डालने आदि) के लिए निकलवा लेते थे। इससे तालाबों की जल संरक्षण की क्षमता घटने नहीं पाती थी।

पुराने जमाने में संसाधन कम थे, जनसंख्या भी कम थी, फिर भी हर क्षेत्र में सैकड़ों तालाब बनाये गये थे। बढ़ते संसाधनों और बढ़ती जनसंख्या को देखते हुए उनकी संख्या बढ़नी चाहिए थी, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। उल्टे उनकी देखरेख के अभाव में और जल क्षेत्र की सूखी जमीन पर अतिक्रमण पूर्वक अधिकार कर लेने की दुष्प्रवृत्ति बढ़ने के कारण उनकी संख्या और जल संचयन क्षमता घटती जा रही है। इसी कारण वर्षाकाल द्वारा दिये गये जल अनुदान का अधिकांश भाग बहकर खारे समुद्र में चला जाता है। जमीन के चर- अचर जीव आठ महीने पानी का अभाव झेलते रहते हैं।

अब तो विज्ञान और टेक्नोलॉजी ने काफी प्रगति कर ली है। राज्यों की सम्पदा और धन सम्पन्न व्यक्तियों में भी काफी वृद्धि हुई है। यदि उनकी सम्पदा और जन- जन के श्रम- सहयोग का एक सुनिश्चित अंश भी जल स्रोतों की शुद्धता बनाये रखने तथा जल संचयन के उपक्रम बनाने में लग सके तो बात बन जाये।

उपचार कठिन नहीं

यदि मनुष्य समझदारी अपनाए, जिम्मेदारी निभाने का मन बनाये तो जल की कमी दूर करने के लिए अनेक कारगर उपचार थोड़े श्रम, सहयोग एवं साधनों से किए जा सकते हैं। जैसे-

  • पुराने तालाबों- पोखरों का जीर्णोद्धार, पुनर्विकास। यह कार्य ग्राम पंचायतें, नगर पालिकाएँ, राज्य सरकारें तथा  सम्पन्न औद्योगिक इकाइयाँ अपने निश्चित बजट इस हेतु खर्च करके, जनसहयोग जाग्रत करके आसानी से कर सकती हैं। तालाबों की भूमि पर अतिक्रमण न होने दिया जाय। गर्मियों में पानी घट जाने या सूख जाने पर जेसीबी मशीनें लगाकर तालाबों की मिट्टी निकाली जाय। वह मिट्टी बहुत उपजाऊ होती है। किसान ट्रैक्टर ट्रॉलियों में भरकर उन्हें खेतों में बिखेर दें।
  • जहाँ भी ढलानें हैं, वहाँ बहने वाले पानी के रास्ते में जगह- जगह छोटी- छोटी खाइयाँ खोद दी जायें, स्वाभाविक रूप से बन गई पानी की गलियों के मार्ग में पत्थरों के छोटे- छोटै अवरोध बना दिए जायें, वनस्पतियाँ उगा दी जायें तो बहने वाला पानी का बड़ा अंश जमीन के अन्दर उतर कर भूजल को बढ़ा देता है।
  • सम्पन्न किसान अपनी जमीन के १०% भूखण्ड में तालाब बना लें। इससे उनकी शेष जमीन और आसपास की जमीन के लिए सिंचाई की व्यवस्था भी बन सकती है और भूजल के स्तर में वृद्धि भी हो सकती है।
  • नये छोटे तालाबों का निर्माण सरकारी मनरेगा के अन्तर्गत भी किया जा सकता है। विधायक और सांसद निधि को भी इस उद्देश्य में खर्च किया जा सकता है। बड़े औद्योगिक संस्थानों के पास जनहित (वैलफेअर) कार्यों के लिए काफी बजट होता है।
भूजल का स्तर बढ़ाने के छोटे- छोटे सफल प्रयोग अनेक हैं। जो प्राणवान परिजन इस दिशा में काम करना चाहें, आदर्श ग्राम योजना में जल संरक्षण को भी शामिल करना चाहें, वे शांतिकुंज युवा प्रकोष्ठ से सम्पर्क साधकर जानकारियाँ प्राप्त कर सकते हैं एवं मार्गदर्शन ले सकते हैं।


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