गायत्री को युगशक्ति के स्तर पर स्थापित करने योग्य विवेक और कौशल जुटायें

Published on 2018-06-02
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समय की माँग
युगऋषि नवयुग अवतरण की दैवी योजना को भूमण्डल पर क्रियान्वित करने के संकल्प के साथ आये। उन्होंने महामाया, आदिशक्ति को इस पुण्य प्रयोजन के लिए वेदमाता एवं देवमाता के साथ ही विश्वमाता की भूमिका निभाने के लिए सहमत किया। उनकी सहमति प्राप्त होते ही स्थूल- सूक्ष्म प्रकृति उस दिशा में सक्रिय हो उठी। जनमन में उस दिशा में जिज्ञासाएँ जागने लगीं, प्रकृति के स्थूल एवं सूक्ष्म प्रवाहों से तद्नुकूल परिस्थितियाँ भी बनने लगीं। युगऋषि ने गायत्री महाविद्या का स्वरूप गायत्री महाविज्ञान में खोला तथा छोटी- छोटी पुस्तिकाओं के माध्यम से जन- जन तक उसे सहज सुलभ रूप में पहुँचाया। उक्त सभी दिव्य और मानवी सत्पुरुषार्थों के परिणाम स्वरूप हजारों वर्षों से प्रतिबंधित मानी जाने वाली गायत्री साधना विश्वव्यापी स्तर पर प्रचारित हो गयी।

किसी कला या विद्या को प्रारम्भ कर देना आसान होता है। उसे प्रभावी स्तर तक ले जाने, विशिष्टता का दर्जा देने के लिए लम्बे समय तक अनवरत कठोर तप साधना करनी पड़ती है। कोई भी खेल सीमित साधनों से गलियों में भी खेलकर किसी हद तक मनोरंजन एवं स्वास्थ्य के लाभ उठाये जा सकते हैं। लेकिन उसी खेल में राष्ट्रीय- अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पहुँचने के लिए पर्याप्त संसाधन और अभ्यास की व्यवस्था जुटानी पड़ती है। संगीत गुनगुनाकर कोई भी व्यक्ति थोड़ी शान्ति का, उल्लास का बोध कर सकता है, किन्तु संगीत का प्रखर प्रभावी माहौल बनाने वालों को तो लम्बे समय तक कठोर साधना का क्रम बनाना ही पड़ता है।

जनमानस के शोधन- उन्नयन के लिए तथा रूठी हुई प्रकृति के अनुकूलन के लिए गायत्री उपासना- साधना के प्राथमिक प्रयास भली प्रकार फलित हो उठे हैं। उससे जुड़ने वाले लगभग सभी साधक अपने अन्दर दिव्यता के उभार होने और दिव्य सहयोग मिलने का अनुभव कर रहे हैं। किन्तु अभी समय की विसंगतियों, व्यक्ति- परिवार और समाज के विकृत रूढ़िवादी दृष्टिकोणों को निरस्त करके उन्हें सद्विवेकयुक्त दृष्टिकोण अपनाकर उनके पुरुषार्थ को त्रिविध क्रान्तियों को गति देने में लगा देने के लिए बहुत कुछ किया जाना है। जो हो सका है उससे संतुष्ट तो हुआ जा सकता है, किन्तु जो किया जाना है उसे संकल्पपूर्वक पूरा करने के लिए बलिदानी वारों की तरह सर्वस्व झोंककर जूझ जाने से कम में समय की माँग पूरी नहीं हो सकती। इससे कम में ऋषिसत्ता के विशिष्ट अनुग्रह और आत्मसंतोष पाना संभव नहीं है।

युगऋषि ने विराट प्रकृति के 'सूक्ष्म एवं कारण' स्तरों पर युगशक्ति के प्रवाह को सक्रिय कर दिया है। उसे स्थूल धरातल पर अवतरित करने के लिए युग साधकों को, युग सैनिकों को माध्यम बनाना है। युगऋषि ने इसी उद्देश्य के लिए युगसाधकों को जगाया और प्रज्ञा संस्थानों, प्रज्ञापीठों, शक्तिपीठों की स्थापना की है। गायत्री जयंती, गुरुपूर्णिमा जैसे पर्वों को समारोहपूर्वक मनाने की परम्परा भी इसीलिए चलाई है। इन पर्वों पर पुराने साधक अपने व्यक्तित्व परिष्कार और पात्रता विकास के लिए संकल्पित साधना करें तथा नये- नये संस्कारवान व्यक्तियों को खोज- खरादकर इस प्रक्रिया के साथ जोड़ें, यही उद्देश्य गुरुवर का रहा है।

ढर्रे की बात नहीं, संकल्पित साधना

गायत्री जयंती पर ढर्रे के कार्यक्रम पूरे करके अपने कर्त्तव्य की इतिश्री नहीं मान लेना है। गायत्री महाविद्या को युगशक्ति के स्तर पर स्थापित करने के लिए समयबद्ध योजना बनाकर संकल्पपूर्वक निर्धारित लक्ष्यों तक पहुँचने के लिए प्रखर साधना तंत्र स्थापित करना है। समय की परिस्थितियों को देखते हुए उसके लिए सूत्र इस प्रकार निर्धारित किए जा सकते हैं।

पूर्व परिजनों में हंसवृत्ति विकसित हो

गायत्री का वाहन हंस कहा गया है। हंसवृत्ति जिनमें जिस स्तर तक विकसित होती है, वे उसी अनुसार युगशक्ति के संवाहक माध्यम बन पाते हैं। हंस के तीन विशेष गुण सर्वमान्य हैं।

(क) शुभ्र बेदाग काया : बाह्य जीवन अनुशासनबद्ध रहे। उस पर शक, कुशंका, छल, अविश्वास रूपी दाग न लगने देने के जीवन्त प्रयास हों।

(ख) नीर- क्षीर विवेक : विवेकी, प्रज्ञावान हों। तमाम विसंगतियों के बीच भी अपने कर्त्तव्यों, अकर्त्तव्यों का ठीक- ठीक विवेचन करके एकनिष्ठ होकर कर्त्तव्यरत रह सकें। इसे विचार क्रान्ति की क्षमता कह सकते हैं।

(ग) मुक्ता चयन : हंस मोती चुगते हैं, अर्थात् अपने निर्वाह के लिए उच्च आदर्शयुक्त माध्यमों- संसाधनों का ही उपयोग करते हैं। गन्दे, हीन, अभक्ष्य का सेवन कभी नहीं करते। यह प्रवृत्ति नैतिक क्रान्ति सम्मत न्याययुक्त संसाधनों- माध्यमों का ही उपयोग करने की प्रतिबद्धता की परिचायक है। पहले से जुड़े हुए साधक प्रतिवर्ष अपने अन्दर हंस वृत्तियों को क्रमश: विकसित करते रहने की संकल्पित साधना करें।

क्षेत्र विस्तार हो, साधकों की संख्या बढ़े :
युगशक्ति के अवतरण का उद्देश्य युग निर्माण है, मनुष्य मात्र के लिए उज्ज्वल भविष्य का सृजन है। इसके लिए विश्व के हर क्षेत्र में, हर सम्प्रदाय में, हर वर्ग में युग साधकों की संख्या बढ़ाना जरूरी है। ऋषिसत्ता ने हर क्षेत्र में, हर वर्ग में श्रेष्ठ आत्माओं को भेजा है। उन तक युग संदेश पहुँचाना, उनके अन्दर इसके लिए सहमति और उमंग जगाना पुराने साधकों का कार्य है। इसके लिए हर प्राणवान परिजन और जीवन्त, संगठित इकाई को अपने- अपने समयबद्ध लक्ष्य निश्चित कर लेने चाहिए। अपनी रुचि और सामर्थ्य के अनुसार किस क्षेत्र एवं किस वर्ग में नये सृजन साधक बनाने हैं, यह निर्धारित करके योजनाबद्ध ढंग से जुट जाना चाहिए।
गायत्री जयंती पर प्रात:कालीन कार्यक्रम पूर्व परिजनों के स्तर को बढ़ाने की दृष्टि से किये- कराये जाने चाहिए। सायंकालीन कार्यक्रमों में नये वर्ग के भावनाशीलों, विचारशीलों को युगसृजन अभियान से परिचित कराने और नये सृजन साधकों के रूप में विकसित करने की दृष्टि से किए जाने चाहिए। उसमें पूर्व पूजन, प्रवचन, सांस्कृतिक कार्यक्रम- संगीत आदि का विवेकयुक्त समावेश किया जा सकता है।

गायत्री मंत्र यों तो सार्वभौम है। इसमें परमात्मा का कोई नाम नहीं है। उसे सर्वव्यापी, कल्याणकारी सत्ता के रूप में मानने का भर आग्रह है। उसी का वरण करने, उसी को धारण करने के संकल्प के साथ उसी से सन्मार्ग पर प्रेरित करने की प्रार्थना करना है। यदि किन्हीं को संकोच या एतराज हो तो वे अपनी भाषा में परमात्मा से सबके लिए सद्बुद्धि देने और उज्ज्वल भविष्य लाने की प्रार्थना कर सकते हैं। इस्लाम में इसी आशय की पूर्ति 'सूरह फातिहा' नामक आयात से होती है। पाक्षिक के १६ मई २०१८ अंक में उसके जप एवं लेखन करने योग्य अंश भी प्रस्तावित किए गये हैं। पुराने साधकों को अपने व्यक्तित्व इस स्तर पर विकसित करने चाहिए कि वे किसी क्षेत्र या सम्प्रदाय विशेष को उनके विश्वासों की रक्षा करते हुए युग साधना से जोड़ सकें।

सृजन प्रशिक्षण केन्द्र सक्रिय- विकसित हों
जब किसी जन आन्दोलन को विस्तार दिया जाता है तो उसके लिए समर्थ प्रेरणा- प्रशिक्षण केन्द्रों की अनिवार्य आवश्यकता पड़ती है। युगऋषि ने शक्तिपीठों, प्रज्ञापीठों, प्रज्ञा केन्द्रों की स्थापना इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए की थी। उन्हें युगऋषि के संकल्प के अनुरूप समर्थ सृजन, प्रशिक्षण केन्द्रों के रूप में विकसित करने- कराने की जिम्मेदारी भी प्राणवान परिजनों को सँभालनी है।

हर क्षेत्र के नये- पुराने प्राणवान परिजन गायत्री जयंती के पूर्व ही विचार गोष्ठी करके ऊपर दर्शाये गए सूत्रों के अनुसार गायत्री जयंती पर्व को अधिक प्रभावी ढंग से मनाने की योजना बनायें और तद्नुसार प्रयास- पुरुषार्थ करें।


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