भूजल संरक्षण- संचयन के कुछ जनसुलभ उपचार

Published on 2018-06-12

पूर्व प्रसंग
पाक्षिक के गत (१ जून) अंक में आज की एक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता के रूप में जल संरक्षण के लिए विविध प्रयास जन स्तर पर भी किए जाने की अपील की गयी। क्षेत्रों के कई कर्मठ परिजनों ने भूजल संरक्षण- संचयन के कुछ जनसुलभ उपायों पर प्रकाश डालने का आग्रह किया है। उसी के अनुसार इस आलेख में कुछ सफल व्यावहारिक प्रयोगों का उल्लेख किया जा रहा है।

पहले उल्लेख किया जा चुका है कि भूमि पर उपलब्ध जल का अधिकांश भाग तो समुद्र में खारे पानी के रूप में विद्यमान है। उसे पीने योग्य बनाने के जनसुलभ शोध प्रयोग जब सफल होंगे, तब होंगे। अभी तो शेष उपयोगी जल को ही समझदारी से सँजोने और प्रयोग में लाने की जरूरत है। उस उपयोगी जल का ७७% जो अंश बर्फ के रूप में विद्यमान है, उसके लिए भी मनुष्य सीधे- सीधे कुछ नहीं कर सकता ।। पर्यावरण संतुलन से ही उसके संरक्षण में कुछ मदद हो सकती है। वह भी पिघलकर झरनों- नदियों आदि के माध्यम से उपलब्ध होता है।

उपयोगी जल का २२% भाग भूजल के रूप में स्थित रहता है। मनुष्य के द्वारा भूजल का दोहन इस हद तक किया जा रहा है कि उसकी उपलब्धता दुरूह होती जा रही है। महर्षि कश्यप ने जल संरक्षण के लिए जो सूत्र सुझाये थे, उनमें से चार जनसामान्य द्वारा भी अपनाये जा सकते हैं।

महर्षि कश्यप के सूत्र
१. पानी के प्रवाहित स्रोतों को शुद्ध रखा जाय तथा उनके प्रवाह में कम से कम रुकावट आने दी जाय। यदि जन जागरूकता लायी जा सके तो जल स्रोतों को प्रदूषित होने से बहुत अंशों तक बचाया जा सकता है। गन्दे नाले या तो औद्योगिक इकाइयों द्वारा पनपते हैं अथवा मनुष्यों के निस्तार से। जो लोग पानी का लाभ उठा रहे हैं वे उसे शुद्ध रखने की जिम्मेदारी निभायें, तो उपचार कठिन नहीं है।

२. जल प्रवाहों, स्रोतों के आसपास के इलाके में सघन वृक्षारोपण किया जाय। पेड़ों की जड़ों के सहारे पानी जमीन के अन्दर गहराई तक उतरता है। जल प्रवाह के साथ मिट्टी के कटान को भी वृक्षों- वनस्पतियों की जड़ें रोकती हैं। अस्तु तालाबों, नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों में खूब वृक्ष लगाये जायें। यह कार्य जन सहयोग से बखूबी किया जा सकता है।

३. पानी के उपयोग में समझदारी और किफ़ायतसारी बरती जाय। जल प्रवाह, झरने, नदी, नल आदि से पानी किसी पात्र में लेकर उसका उपयोग मितव्ययिता से किया जाय। झरने, नदी, तालाब आदि के पानी से सीधे सफाई करने से उसमें प्रदूषण बढ़ता है। किसी पात्र से लेकर उससे सफाई करने से पानी कम भी खर्च होता है तथा भूमि में बहकर आंशिक रूप से शोधित होकर फिर जल स्रोतों तक पहुँचता है।

नल खोलकर हाथ- मुँह धोने, कुल्ला आदि करने से अधिक पानी बेकार बह जाता है। किसी पात्र में लेकर वही कार्य करने से बहुत कम पानी से कार्य चल जाता है। मोटर आदि वाहनों की सफाई यदि पाइप से पानी डालकर की जाती है तो अधिक पानी व्यय होता है। बाल्टी में मग्गे के द्वारा पानी डालकर कपड़े या ब्रश से साफ किया जाय तो बहुत कम पानी से काम चल जाता है। यह आदतें थोड़े से अभ्यास से ठीक की जा सकती हैं और पर्याप्त पानी निरर्थक बहने से बचाया जा सकता है।

४. जो कोई भी व्यक्ति पानी का उपयोग करते हैं, उन सभी को जल संरक्षण संचयन के लिए उचित प्रयास करने चाहिए। इस सूत्र के आधार पर हर घर में वर्षा के समय छत के पानी को एकत्रित करने के हौद (टैंक) बनाये जा सकते हैं। उसे सोकपिटों, रीचार्ज सिस्टमों के द्वारा भूजल के रूप में संग्रहीत किया जा सकता है। कुछ सफल सहज उपचार यहाँ दिये जा रहे हैं।

सोक पिट : जिस मार्ग से पानी बहकर निकल जाता है, उस मार्ग में थोड़ी- थोड़ी दूरी पर यह बनाये जा सकते हैं। इन्हें स्थानीय आवश्यकता के अनुसार गोल या चौकोर बनाया जा सकता है। इनकी लम्बाई, चौड़ाई एवं गहराई लगभग तीन- तीन मीटर रखी जाती है। इनमें नीचे एक मीटर तक बड़े पत्थर (बोल्डर), उसके ऊपर एक मीटर तक गिट्टी- रोड़ी भर दी जाती है। सबसे ऊपर आधा मीटर रेत भर दी जाती है। इसके माध्यम से सतह पर बह जाने वाला पानी भूजल के रूप में धरती के अन्दर समा जाता है। कुओं को रीचार्ज करने के लिए भी इनका उपयोग किया जा सकता है।

पर्कोलेशन टैंक : यह छोटे या कच्चे तालाबों, पोखरों की तरह होते हैं। जल बहाव की दिशा में कहीं- कहीं ऐसे स्थान मिलते हैं, जहाँ पानी के लिए अवरोध बना देने से पानी रुक जाता है और धीरे- धीरे धरती के अन्दर समाता रहता है। इसके लिए कई उपचार किए जा सकते हैं।

जल अवरोध : बड़े- बड़े पत्थरों के अवरोध बना देने से पानी में रुकावट आती है। इन्हीं पत्थरों को यदि तार के जाल में भर दिया जाय तो यह अधिक टिकाऊ होते हैं। इसी प्रकार जूट या प्लास्टिक की बोरियों में मिट्टी भरकर बोरी बाँध भी बनाया जा सकता है। प्राकृतिक नालों पर यदि छोटे- छोटे पक्के बाँध बना दिए जायें तो और भी अच्छे परिणाम पाये जा सकते हैं।

कन्टूर ट्रैन्च : पहाड़ियों पर, तीव्र ढलानों पर इस विधि का प्रयोग किया जा सकता है। पानी के बहाव की दिशा में लगभग ६० से.मी. चौड़ी और लगभग ४५ से.मी. गहरी खाइयाँ खोद दी जाती हैं। इन्हें लगातार- सम्बद्ध या क्रमबार- असम्बद्ध ढंग से खोदा जा सकता है।

रीचार्ज भाफ्ट : अच्छे तालाबों में एक सीमा तक पानी भर जाने पर अतिरिक्त पानी को वेस्ट वियर (फालतू निकास) के द्वारा निकाल दिया जाता है। वर्षा का बहुत- सा पानी बहकर क्षेत्र के बाहर चला जाता है। इसे भी भूमिजल के रूप में भूगर्भ में डाला जा सकता है।

इस प्रयोग में तालाब के बीच में एक गहरा बोर कर दिया जाता है। उसके अन्दर नीचे बड़े बोल्डर, फिर गिट्टी और फिर रेत भर देते हैं। बोरिंग के पाइप की ऊँचाई वेस्ट वियर की सतह से कुछ नीची रखी जाती है। वर्षा का अतिरिक्त जल वेस्ट वियर से निकलने की जगह इस संरचना के द्वारा धरती के अन्दर भूजल के रूप में फैल जाता है, जो भूजल का स्तर बढ़ा देता है।

खेतों की नाली : खेतों के आसपास मेड़ों से लगी गहरी नालियाँ, छोटी खाइयाँ बना दी जाती हैं। इनके माध्यम से वर्षा का पानी पर्याप्त मात्रा में भूमि में समा जाता है।
यह सभी उपचार ऐसे हैं, जिन्हें हर क्षेत्र में सहजता से व्यक्तिगत प्रयासों से, जन सहयोग से, ग्राम पंचायतों, नगर पालिकाओं, समझदार उद्योगपतियों, उदार सम्पन्नों के सहयोग से कहीं भी सफल बनाया जा सकता है। इससे खेत का पानी खेत में, गाँव का पानी गाँव में, क्षेत्र का पानी क्षेत्र में भूजल के रूप में संग्रहीत होकर धरती और वृक्ष- वनस्पतियों सहित विभिन्न जीवों के लिए वरदान बन सकता है।


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