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अपने लीला सहचरों को आत्मबोध कराती युगऋषि की पुकार

राम ने संस्कृति- सीता के अपहरण को असह्य माना और वे दुर्दान्त रावण को परास्त करने के लिये कटिबद्ध हो गये। तब राम के पास कोई सेना नहीं थी। परदेश में मामूली- सा धनुष बाण लिये दोनों भाई वनवासी की तरह घूम रहे थे। आतंक के विरूद्ध लड़ने के लिये न साधन थे, न सुविधा, न परिस्थिति थी, न व्यवस्था। पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अकेले अपने मार्ग पर बढ़ चले।

लोग सच्चाई और न्याय का समर्थन तो करना चाहते हैं, पर तब, जब किसी पर्वत जैसे ऊँचे, भारी और सुदृष्ट व्यक्तित्व का नेतृत्व मिले। राम इन्हीं विशेषताओं के प्रतीक थे। उन्होंने समर्थ लोगों में अपने महान अभियान का संदेश पहुँचाया और सहयोग की याचना की, पर न तो एक भी भूपाल काम आया और न धनपति। वे तो विजयी के साथ होते हैं, क्योंकि उन्हीं की सहायता से उन्हें लाभ रहता है। दुर्बल दीखने वाले को सहायता देने में उन्हें अपना भौतिक लाभ तो दिखता नहीं, ऐसी दशा में घाटे का सौदा करें भी क्यों? अमीरी अपना बचाव पहले देखती है। सत्य और न्याय से उसे सहानुभूति भले ही हो, पर सहायता तो सफल और समर्थ की ही करना लाभदायक लगता है। इस प्रत्यक्ष तथ्य की वह उपेक्षा कैसे करें? सो राम की पुकार व्यर्थ चली गयी। एक भी समर्थ जन को उनका साथ देने का साहस नहीं हुआ।

राम ने गरीबों का द्वार खटखटाया और उन्हें बताया कि थोड़ी- सी सुविधायें भोगते हुए आराम की निर्जीव जिंदगी काटने की अपेक्षा अधर्म से लड़ने और धर्म को प्रतिष्ठापित करने के ईश्वरीय प्रयोजन में सहयोग देते हुए मर जाना श्रेयस्कर है। मजेदार जिन्दगी की तुलना में शानदार जीवन उत्तम है। सो यह बात रीछ- वानरों की समझ में आ गयी। भले और भोले लोग चतुर और समर्थ लोगों की अपेक्षा ईश्वर के अधिक निकट होते हैं, सो ईश्वरीय सन्देश उन्हीं को प्रभावित करता है। रीछ- वानरों ने घर, शरीर और सुविधाओं का मोह छोड़ा और वे सच्चे सूरमाओं की तरह निहत्थे होते हुए भी युग दानव के विरूद्ध संघर्ष में कूद पड़े। दीखता यही था कि शायद इतना बड़ा आतंक पराजित न हो सके, पर उनकी आत्मा ने कहा—न्याय और औचित्य के लिए लड़ने का प्रयत्न अपने आप में एक बहुत बड़ी विजय है, इस संघर्ष का हर कदम धर्म सैनिक की सफलता है। भौतिक विजय या पराजय के झंझट में क्यों पड़ा जाय?

राम- रावण का ऐतिहासिक युद्ध होने की तैयारी हो गयी। बाधाओं का सेतु बाँधना था। नल- नील ने रीछ वानरों की सहायता से पत्थर के टुकड़े जुटाये और जल पर तैरने वाला पुल बनाने की तैयारी की। भगवान् राम ने कहा- भौतिक साधन तो जुटाने ही चाहिये, पर परिवर्तन के देवता महाकाल को भी साथ ले लेना चाहिये, क्योंकि सूक्ष्म रूप में उन्हीं की शक्ति बड़े प्रयोजन को सम्पन्न करती है। सच तो यह है कि हम सब उन्हीं की प्रेरणा से इतना दुस्साहस कर सके हैं और आगे उन्हीं के संकेतों पर चलते हुए अभीष्ट उद्देश्य की प्राप्ति में सफलता प्राप्त क रेंगेसेतुबन्ध के स्थान पर भगवान राम ने अपने ईश्वर मार्गदर्शक रामेश्वर- महेश्वर की प्रतिष्ठापना की और आराधना अर्चना के साथ आत्म- समर्पण करते हुए कहा- ‘‘हे महान्! आपकी इच्छा पूर्ण हो, हम सब आपकी भृकुटि संकेतों पर बलिदान होने के लिये खड़े हैं।’’ महेश्वर ने उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा- ‘‘मेरा प्रयोजन पूर्ण करने में संलग्र बालको! तुम्हें श्रेय मिलेगा, यशस्वी होगे और उज्ज्वल नक्षत्रों की तरह अनन्त काल तक चमकोगे। मेरी विजय, तुम्हारी विजय गिनी जायगी।’’ महाकाल के आशीर्वाद ने राम दल का साहस सैकड़ों गुना बढ़ा दिया।

बूढ़ा जटायु जानता था कि मेरी शक्ति स्वल्प है, रावण से जूझने का क्या परिणाम हो सकता है, वह भी उसे विदित था, फिर भी उसने सोचा जीवन की इससे बड़ी सार्थकता और सफलता दूसरी नहीं हो सकती कि उसका उपयोग न्याय- धर्म की रक्षा करने और लोकमंगल के अभिवर्धन में हो सके। इस अनुपम अवसर को वह दूरदर्शी चूकने वाला न था, सो रावण से लड़ पड़ा और मारा गया। हो सकता है किसी कायर पर इसका बुरा असर पड़ा हो और कुछ उमंग उठ रही हो तो इस प्रकार की हानि उठाने से बचने के लिये डर कर अपना हौसला खो बैठा हो, पर दुनिया में सभी तो डरपोक नहीं हैं। कुछ ऐसे भी हैं, जिनका शौर्य अवसर आने पर ही उभरता है। जटायु जैसी यशस्वी मौत पाने के लिये अनेकों दिल वालों के दिल छाती की ठठरी में छिपे रहने की अपेक्षा बाहर निकलकर दो- दो हाथ दिखाने और कुछ कर गुजरने के लिये मचलने लगे।

इन्हीं दिल वालों में से थी एक गिलहरी। उसने सोचा, ‘‘मैं बहुत छोटी जरूर हूँ- साधन विहीन भी, पर इससे क्या आखिर मैं कुछ तो हूँ ही! और जो कुछ है उसे लेकर लोकमंगल के लिये, आत्म बलिदान करने के लिये मातृ- मन्दिर में जा पहुँचने का अधिकार हर किसी को है, सो मैं ही क्यों सकुचाऊँ। जितना ईश्वर ने दिया है उसी को लेकर उसके आगे आत्म- समर्पण क्यों न करूँ?’’ गिलहरी को एक सूझ आई। वह बालों में धूलि के थोड़े से कण भर ले जाती और समुद्र में छिड़क आती। उसका यह अनवरत श्रम देखकर- देखने वालों ने हैरत में भरकर उससे पूछा- ‘‘आखिर यह सब क्यों कर रही हो, इसका क्या परिणाम होने की आशा है।’’

गिलहरी ने कहा- ‘‘राम समुद्र पार जाकर रावण से लड़ने खड़े हैं। नल, नील समुद्र पर पुल बनाने में जुटे हैं, हनुमान समुद्र को छलाँग चुके, फिर क्या इस बाधा के सागर को पाटने में मेरा कोई योगदान न होना चाहिये? छोटी हूँ तो क्या, बालों में थोड़ी बालू भरकर समुद्र में डालती रहूँगी तो आखिर इस बाधाओं के सागर को कुछ तो पाटा ही जा सकेगा। इस छोटे से प्रयत्न से कितने समय में क्या परिणाम होगा, यह सोचना मेरा काम नहीं। सचाई के समर्थक एक ही बात जानते हैं- जो अपने पास है उसे लेकर आगे बढ़ना और निष्ठापूर्वक सतत संघर्ष में अपनी अन्तिम बूँद समर्पित कर देना। सो ही तो मैं कर रही हूँ।’’

बहस आगे नहीं बढ़ी। पूछने वाले को उसी के एक साथी ने यों कहकर चुप कर दिया कि- ‘‘उस टिटहरी की कथा याद करो, जिसने अपने अण्डे बहा ले जाने के अपराधी समुद्र से लोहा लिया था और चोंच में बालू भरकर उसे पाटने का दुस्साहस किया था। जानते नहीं, ऐसे दुस्साहसी भगवान का सिंहासन हिला देते हैं और उनकी सहायता में उन्हें नंगे पैरों आना पड़ता है। टिटहरी के समर्थन में अगस्त ऋषि आये थे और उनने तीन चुल्लू में सारा जल पीकर अभिमानी समुद्र को इस बात के लिये विवश किया था कि अपने अनीति भरे कदम वापस ले ले। जीत जब टिटहरी की ही रही, तो यह गिलहरी अपने लक्ष्य तक क्यों न पहुँच सकेगी।’’
पूछने वाला निरुत्तर था, निदान बहस बन्द हो गयी और गिलहरी का अभिनन्दन करने राम उसके पास पहुँचे और अपने श्यामल हाथों की उँगलियाँ उसकी पीठ पर फेर कर एक ऐसा स्मृति पदक प्रदान किया जो हर छोटे समझे जाने वाले, साधनहीन की हिम्मत अनन्त काल तक बढ़ाता रहेगा। कहते हैं कि तभी राम द्वारा फेरी हुई उँगलियों की रेखायें अभी भी उस गिलहरी के वंशजों की पीठ पर एक शानदार पदक की तरह अंकित हैं।

जो हो, राम- रावण युद्ध होकर रहा। सोने की लंका जल- बल कर खाक हो गयी। रामराज्य की स्थापना हुई। सभी क्षत्रपों ने आश्चर्य किया- भला इतना साधन सम्पन्न रावण सपरिवार इतनी आसानी से कैसे मारा गया? समाधानकर्त्ता ने बताया, इसमें तनिक भी अचम्भे की बात नहीं। पाप तो अपनी मौत मरता है। उसकी चमक बादल में चमकने और कड़कने वाली बिजली की तरह होती है, जो कुछ ही समय में अपनी उछलकूद दिखाती और फिर अपनी इस मूर्खता पर पछताती- सकुचाती हुई मुँह छिपाकर बैठ जाती है। आश्चर्य की बात तो यह कही जा सकती है कि साधनहीन राम दल ने इतनी बड़ी विजय का श्रेय प्राप्त कैसे कर लिया? सो हे समीक्षक! पूरी बात समझो। अन्ततः सत्य ही जीतता है, अन्ततः धर्म ही जीतता है, अन्ततः विवेक ही जीतता है। अनीति का अन्त करने के लिये जब महाकाल की थिरकन गतिशील होती है तो असम्भव दिखने वाली बातें सम्भव होने में देर नहीं लगती।
रावण का आतंक आखिर समाप्त हुआ ही। स्वार्थ और अविवेक का वर्तमान आतंक, जिसने आज जनमानस को बुरी तरह सम्मोहित कर लिया है और दशों दिशाओं में हा- हाकार भरा नारकीय वातावरण प्रस्तुत कर दिया है, आखिर यह भी तो समाप्त होना ही है।
वाङ्मय खंड- सूक्ष्मीकरण एवं उज्ज्वल भविष्य का अवतरण पृष्ठ1.43-45


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