संयम- साधना से मिलता है उपासना- अनुष्ठान का फल

Published on 2018-06-21
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अध्यात्म पथ के पथिकों को युगऋषि का मार्गदर्शन

मनुष्य में उत्कृष्ट चिन्तन की पृष्ठभूमि बनाने का काम अध्यात्म करता है। आत्मा में विद्यमान परमात्मा को हम कैसे विकसित करें, इस विद्या का नाम अध्यात्म है, परन्तु आज का मनुष्य तो पूजा- पाठ, कर्मकाण्ड, अनुष्ठान तथा हनुमान जी को प्रसाद चढ़ा देने को ही अध्यात्म क्या, सब कुछ मान बैठा है। यह उसकी भूल है।

वास्तव में अध्यात्म का मतलब है आदमी के चिंतन, चरित्र, आदर्श एवं व्यवहार को ऊँचा उठाना। जो इस तथ्य को जानता है, वही सच्चा अध्यात्मवादी है। ऋषियों ने इसके लिए चार साधनाएँ बतलायी हैं, जो मनुष्य को करनी चाहिए। वे हैं 'सादा जीवन उच्च विचार', आत्मवत सर्वभूतेषु', 'लोष्ठवत् परद्रव्येषु' एवं 'मातृवत् परदारेषु'। इन सूत्रों को अपनाकर ही हमारे अन्दर अध्यात्म का बल 'आत्मबल' आ सकता है।

बेटे! आत्मबल एक सुन्दर तथा नफे का व्यापार है। गुरुनानक को उनके पिताजी ने २० रुपये दिये थे व्यापार के लिए। आत्मबल के धनी नानक ने ऐसा व्यापार किया कि आज वह करोड़ों के व्यापारी बन गए। बुद्ध ने बचपन में बूढ़े, बीमार एवं मरे आदमी को देखकर आत्मबल का व्यापार किया तो विश्व में अनेक जगहों पर उनके सोने के मंदिर बने हुए हैं। हम भी इसके व्यापारी हैं। हमारा आपसे निवेदन है कि आप भी भगवान की इस लिमिटेड कम्पनी में अपना शेयर खरीद लीजिए और भागीदार बन जाइये।

आहार संयम से भावशुद्धि
अध्यात्म एक भावना का नाम है, श्रद्धा का नाम है। आप जिस श्रद्धा एवं भक्ति के साथ गायत्री माता के फोटो को देखते हैं, आपको उसी प्रकार का लाभ मिलता है।

यह एक तथ्य है कि भगवान को प्राप्त करने के लिए भावना पवित्र होनी चाहिए तथा भावना को पवित्र करने के लिए आहार को ठीक करना परम आवश्यक है। आपके आहार के अनुसार ही भावना होगी। आपने गलत ढंग से पैसा कमाया है और उस पैसे का अन्न ग्रहण किया है तो आपकी भावना भी दूषित होगी। आपका आहार तमोगुणी होगा तो भावना भी उसी प्रकार की होगी। अत: हर साधक को अपने भोजन के बारे में सही मात्रा, सही समय तथा संस्कार संबंधी दोष एवं अवांछनीयता का ध्यान रखना चाहिए।

संस्कारवान बनने के लिए अपने आहार का नियंत्रण करना आवश्यक है, तभी हमारी उपासना में सामर्थ्य एवं बल की प्राप्ति होगी। हमने २४ साल तक जौ की रोटी और छाछ का आहार लिया है। अपने को परिष्कृत- परिमार्जित किया है। वास्तव में हमने चौबीस वर्ष जो आहार संयम किया था, उसके कारण आज भी हमारी पाचन शक्ति ठीक है। हम जो ग्रहण करते हैं उसे पेट ठीक ढंग से पचा लेता है। पिप्पलाद ऋषि ने अपना सारा जीवन केवल पीपल के फल से ही काटा था। इससे उन्हें बहुत फायदा हुआ था।

आहार के द्वारा मनुष्य के विचार बनते हैं। शास्त्रों में कहा गया है- जैसा खाये अन्न, वैसा बने मन। आपमें से अधिकांश होटलों में खाते हैं। वहाँ आपको जूठन भी मिलता है। वहाँ काम करने वाले नौकर ठीक से बर्तनों की सफाई या मँजाई नहीं करते हैं। ड्रम में रखे थोड़े- से पानी में बार- बार धो- पोंछकर पुन: आपको परोसकर दे देते हैं। इस प्रकार के आहार द्वारा आपका अन्नमय कोश कैसे ठीक होगा? आपकी उपासना कैसे ठीक ढंग से संचालित होगी?

आपने अगर अपनी जीभ को साध लिया, किसी की चुगली नहीं की, कभी अभक्ष्य पदार्थ नहीं खाया, किसी का दिल नहीं दु:खाया तो आपकी जीभ भगवान बन जायेगी। आप जिस किसी को भी कुछ कहेंगे वह उसके लिए वरदान सिद्ध हो जाएगा। हमने अपनी जीभ को, अपनी इंद्रियों को साधा है, तब ही यह चमत्कार आपको यहाँ दिखाई पड़ रहा है।

ब्रह्मचर्य पालन- मानसिक संयम
आपने ब्रह्मचर्य व्रत का पालन भी नहीं किया है। आपकी पत्नी कितनी खूबसूरत, सुकोमल आयी थी, आपने उसके साथ भी संयम नहीं बरता और बच्चे पर बच्चे पैदा करते चले गये। आपकी जो थोड़ी- सी शक्ति अर्जित होती थी, वह भी बार- बार निकल जाती रही। अगर आपको कुछ बनना है, उपासना- साधना करनी है तो आपको सीमित ब्रह्मचर्य का पालन कर संयमशील बनना चाहिए, तभी मन की चंचलता थमेगी और आपका मन उपासना में लगेगा।

मित्रो, ब्रह्मचर्य के साथ- साथ मन:संयम भी बरतना आवश्यक है। संयम शारीरिक एवं मानसिक दोनों प्रकार का होता है। स्त्री- पुरुष के बीच में एक स्वाभाविक आकर्षण होता है। जब भी कोई जवान व्यक्ति एक- दूसरे को देखते हैं तो उन्हें लगाव महसूस होता है। दोनों अगर अपनी भावनाओं में परिवर्तन कर लें तो दोनों ही महानता की ओर अग्रसर हो सकते हैं। ऐसी अनेक घटनाएँ हैं जो इस प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक संयम का प्रतिपादन करती हैं।

शिवाजी ने जब मुगलों पर विजय पायी थी, तो उनके सेनापति ने एक सन्दर युवती को लाकर उनके सामने खड़ा कर दिया था। शिवाजी में शारीरिक एवं मानसिक संयम विद्यमान था। उसे देखकर वे बोल उठे- काश हमारी माँ भी ऐसी सुन्दर होती तो हम भी सुन्दर होते। उन्होंने सेनापति को बुलाकर भला- बुरा कहा और उसे उसके निवास स्थान पर छोड़ आने का निर्देश दिया।

स्वामी विवेकानन्द जब विदेश गये थे, तो एक लड़की ने भी उनकी परीक्षा ली थी, परन्तु वे डिगे नहीं, अपनी वासना को जला दिया और उस लड़की को शिष्या बना लिया। वही आगे चलकर सिस्टर निवेदिता के नाम से प्रख्यात हुई। यह सब अपनी भावनाओं में परिवर्तन की बात है।

अध्यात्ममार्ग की साधनाएँ
आपको आत्मबल प्राप्त करने के लिए अध्यात्म के रास्ते पर चलना होगा और इसके लिए निम्नलिखित सिद्धांतों को अपनाना होगा। पहला- माला के विधान को समझना होगा- यानी कि व्यक्तित्व का परिष्कार करना होगा। दूसरा- एक नये किस्म की आरती एवं दीपक का थाल सजाना होगा, अर्थात् अपने को भगवान के प्रति समर्पित करना होगा। तीसरा- आहार पर नियंत्रण करना होगा। चौथा- शारीरिक एवं मानसिक संयम साधना और पाँचवाँ- स्वाध्यायशील बनना होगा। आप इस प्रकार कर सकेंगे तो मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि आपका जीवन महान बन जाएगा।


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