हे योगेश्वर! आज शक्ति साधनों की कमी नहीं है, किन्तु वे कुयोग के कारण हित की जगह अहितकर ही सिद्ध हो रहे हैं। आप हमें ऐसी दृष्टि और शक्ति प्रदान करें कि हम कुयोग से बचकर सुयोग की दिशा में बढ़ सकें।
आसुरी मनोवृत्तियों ने कुछ ऐसा कुचक्र रच दिया है कि जीवनदायी पदार्थों का उत्पादक उनका समुचित लाभ नहीं उठा पा रहा है, अनुत्पादक तिकड़मी लोग उनका भरपूर लाभ उठाते हैं। आपके समय में भी तो कुछ ऐसा ही था। बृज के ग्वाल- बाल उनके यहाँ उत्पादित दूध, दही, मक्खन से वंचित थे और आसुरी प्रकृति के लोग उनका उपभोग कर रहे थे। तब आपने सत्याग्रह चलाया और जैसे बना वैसे ग्वाल- बालों को उनका हक दिलवाया। हमें भी वह विवेक, बुद्धि और साहसिकता दीजिये कि हम भी जीवनदायी द्रव्यों के उत्पादकों को उनके उत्पादों का उचित लाभ दिलवा सकें।
आपके समय में भी भले लोग, सज्जन लोग पुरुषार्थ छोड़कर त्याग और आत्मकल्याण के नाम पर निष्क्रिय हो रहे थे, इसलिए असज्जनों का पुरुषार्थ आतंक और अनाचार फैलाने में सफल हो रहा था। आपने सज्जनों को उस व्यामोह से उबारा तथा सत्कर्म से सद्गति का सूत्र समझाकर उन्हें संघबद्ध करके अनीति प्रतिरोध की ऐसी लहर चला दी कि अनाचारियों की शक्ति क्षीण हो गयी।
आज भी सभी ओर वैसे ही दृश्य सामने आ रहे हैं। संकीर्ण स्वार्थों में डूबे समर्थ लोग जनसेवा के नाम पर अनाचार भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे हैं। सज्जनों को पुनः सत्कर्म से सद्गति का पाठ पढ़ाकर उन्हें इतना संगठित और समर्थ बनायें कि वे अनाचार, भ्रष्टाचार को उखाड़कर सदाचार और संस्कारों की स्थापना कर सकें।
हे योगीराज! शक्ति कुयोग के कारण संरक्षण की जगह आतंक फैला रही है। संपत्ति कुयोग में पड़कर पोषण की जगह व्यसन पनपा रही है। बुद्धि कुयोग में पड़कर भोले- भालों को दिशा देने की जगह तरह- तरह के कुचक्र रच रही है। हे प्रभु! हमारी योगवृत्ति जगाइये ताकि शक्ति पुनः संरक्षण दे, धन पोषण दे तथा बुद्धि ज्ञान संवर्धन में लग सके।
हे भक्त वत्सल! हमें वह भक्तियोग सिखाइये जिससे हमारी भावना परिष्कृत होकर आपके विराट रूप को सभी में फैला देख सके। जनहित के कार्य आपकी पूजा- आराधना मानकर कर सकें। हमें वह ज्ञानयोग दीजिए, जिससे हमारा अविवेक भागे, विवेक जागे और हम उचित का ही वरण करते हुए आगे बढ़ सकें। हमें वह कर्मयोग चाहिए जो नश्वर पदार्थों के भोग के लिए श्रम करने की जगह अनश्वर दिव्य सम्पदा के लिए पुरुषार्थ कर सकें। हम कर्त्ता के अभिमान से दूर रहकर आपकी प्रेरणा से आपकी प्रसन्नता के लिए आपके अनुशासित स्वयंसेवक के रूप में कर्त्तव्य भाव से कर्मरत रह सकें।
हमने आपके निर्देशों की उपेक्षा करके बहुत त्रास सहे। हमारी अज्ञानजनित भूलों को क्षमा करके हमें अपने स्नेह अनुशासन में जीने का, योगयुक्त जीवन जीने का अवसर दीजिए। हमें दिशा दें, हम आपकी शरण में हैं। हम आपके निर्देशों का पालन करेंगे।... करिष्ये वचनं तव।


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