Published on 2018-06-29
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मौसम की अनुकूलता एवं पर्वों की प्रेरणा की सुसंगति बिठाई जाय

चिंताजनक समस्या का उपचार
पर्यावरण प्रदूषण चिंताजनक स्थिति तक पहुँच गया है। बढ़ती आबादी और बढ़ती औद्योगिक इकाइयों के कारण तमाम कोशिशें करने पर भी प्रदूषण पैदा करने वाले स्रोतों पर नियंत्रण हो नहीं पा रहा है। दिल्ली सहित भारत के अनेक शहरों में प्रदूषण का प्रतिशत जान लेवा स्थिति तक पहुँच गया है। वृक्ष निश्चित रूप से पर्यावरण प्रदूषण के स्तर में कमी ला सकते हैं, किन्तु उनकी संख्या भी भारत में बहुत घट गई है। एक सर्वेक्षण के अनुसार विभिन्न देशों में प्रति व्यक्ति वृक्षों की संख्या इस प्रकार है :-

ग्रीन विजार्ड न्यूज़ लैटर के अनुसार आँकड़ेदेश प्रतिव्यक्ति वृक्ष देश प्रतिव्यक्ति वृक्ष
कनाडा ९९५९ रशिया ४४६१
ब्राज़ील १४९४ यू.एस. ७१६
चाइना १०२ भारत २८

वास्तव में ये आँकड़े चौंकाने वाले और चिंताजनक हैं। जो भारतवासी वृक्ष- वनस्पतियों की पूजा करते हैं, वे उनके संबंध में इतने संवेदनहीन और गैर जिम्मेदार कैसे हो गए?

समस्याओं पर चर्चा भर करते रहने से उनके समाधान नहीं निकलते। उसके लिए तो नैष्ठिक प्रयास पूरी तत्परता और तन्मयता के साथ करने पड़ते हैं। युग निर्माण योजना के अन्तर्गत, गायत्री परिवार संगठन ने इसी लिए पर्यावरण संरक्षण को अपने प्रमुख आन्दोलनों में शामिल किया है। इसके अंतर्गत स्वच्छता के प्रति जागरूकता लाने, ठोस अपशिष्टों के पुनर्चक्रण की व्यवस्था बनाने, यज्ञ करने- कराने आदि प्रयोगों के साथ 'हरीतिमा संवर्धन' कार्यक्रम को भी जीवन्त रूप दिया है। यों तो इसके लिए प्रयास वर्षभर चलते रहते हैं, किन्तु वर्षाकाल इसके लिए सबसे अनुकूल समय होता है। इस वर्ष भी हमें संकल्पपूर्वक सुनिश्चित लक्ष्य बनाकर इस अभियान को तेजस्वी रूप देना है। गायत्री जयंती से लेकर शारदीय नवरात्र तक वृक्षारोपण, हरीतिमा सवंर्धन के लिए प्रकृति की अनुकूलता का पूरा- पूरा लाभ उठाने के प्रयास करने चाहिए।

जनभागीदारी बढ़ायें
किसी भी आन्दोलन को विस्तार और मजबूती देने के लिए उसमें जन- जन की भावभरी भागीदारी अत्यंत आवश्यक है। अभी तक के सफल प्रयोगों के पीछे पहल करने वाले प्राणवान परिजनों के साथ ही जनभागीदारी निभाने वाले भावनाशीलों का भी महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। इसी सुसंगति के कारण परिजनों ने देश के विभिन्न भागों में अनेक कीर्तिमान स्थापित किए हैं। उनके विवरण समय- समय पर पाक्षिक में छपते भी रहते हैं। इस दिशा में प्रयास बराबर करते रहना है।

जनसामान्य को हरीतिमा संवर्धन में भागीदार बनने की प्रेरणा देने के लिए वैज्ञानिक आँकड़ों के माध्यम से संकट की भयावहता का बोध कराना भी उपयोगी है। उसके साथ ही इस अभियान से जन- जन को जोड़ने के लिए उनमें भावनात्मक संवेदना जगाना और भी अधिक उपयोगी होता है। नीचे दिए गये पद के भावों को जनमानस में बिठाकर उन्हें भागीदार बनाने में अच्छा योगदान मिल सकता है।

वृक्ष बने ब्रह्मा के साथी, रचते हैं भू पर जीवन।
और विष्णु के संगी बनकर, करते हैं पालन- पोषण।।
यही सदाशिव रूप लोकहित, विषपायी बन जाते हैं।
इंद्रदेव की तरह मेघ से वर्षा भी करवाते हैं।।
ऋषि दधीचि की तरह विश्वहित अस्थिदान कर देते हैं।
इन्हें उगाओ- संरक्षण दो, ये अनुपम वर देते हैं।।
हरीतिमा संवर्धन के कार्यक्रमों में इन भावों को बैनरों पर छापा भी जा सकता है और गाया भी जा सकता है।

सटीक व्यवस्था बनायेंजनमानस में प्रेरणा भरने से अनेक भावनाशील उसमें भागीदारी के लिए उत्साहित होते हैं। उन्हें संकल्पित कराने के साथ- साथ संकल्प पूर्ति में आवश्यक सहयोग देने का व्यवस्थित तंत्र भी बनाया जाना चाहिए। जैसे :-

उपयुक्त पौध :- क्षेत्र विशेष में सहजता से पनपने वाले उपयोगी वृक्षों की पौध उपलब्ध रहनी चाहिए। इस कार्य में कुशल व्यक्तियों से पौध तैयार कराकर, वन विभाग की पौधशालाओं से संगति बिठाकर उन्हें उपलब्ध कराया जा सकता है। सम्पन्न भावनाशील लोग अपनी तरफ से पौध उपलब्ध कराने के लिए आगे आ सकते हैं।

उपयुक्त क्षेत्र :- वृक्षारोपण करने- कराने के लिए उपयुक्त भूमि पर भी दृष्टि रखनी चाहिए। जैसे :-
  • ग्राम पंचायतों के अधिकार में खाली पड़ी भूमि।
  • आश्रमों, स्कूल- कॉलेजों में उपलब्ध भूमि।
  • सड़कों, रेलवे लाइनों, नदियों, जलस्रोतों के किनारे उपलब्ध खाली क्षेत्र।
  • ऊबड़- खाबड़, बंजर भूमि, छोटी- छोटी पहाड़ियाँ।
  • व्यक्तिगत भवनों, खेतों, आहातों आदि में उपयुक्त स्थान।
जहाँ वृक्षारोपण न हो सकें वहाँ फूलवाले पौधे, तुलसी, आज्ञाघास, मेंहदी, मीठी नीम जैसे उपयोगी पौधे भी लगाये जा सकते हैं। यह भी पर्यावरण शोधन तथा आरोग्य संवर्धन के लिए उपयोगी हैं।

उपयुक्त अवसर :- हरीतिमा संवर्धन के लिए लोगों को संकल्पित तो कभी भी कराया जा सकता है, किन्तु विशेष अवसरों पर कराये गए संकल्प अधिक प्रभावशाली सिद्ध होते हैं। जैसे

पर्वों पर : वर्षाकाल में गुरुपूर्णिमा, श्रावणी (रक्षाबंधन), जन्माष्टमी, ऋषिपंचमी, पितृपक्ष जैसे महत्त्वपूर्ण पर्व आते हैं। गुरुपूर्णिमा पर गुरु की स्मृति में या गुरुनिर्देशों के नाते; श्रावणी और ऋषि पंचाी पर ऋषि परम्परा, ऋषिऋण चुकाने, भाई- बहिन के प्रेम की स्मृति में; पितृपक्ष में पितृऋण चुकाने, पितरों की स्मृति में वृक्षारोपण के प्रभावी प्रयोग किए- कराए जा सकते हैं। यज्ञों- संस्कारों के साथ तो यह क्रम जोड़ने के प्रयास किए ही जाते हैं।

कहने का तात्पर्य यह है कि मौसम की अनुकूलता के साथ पर्वों की प्रेरणा का सुसंयोग बनाकर प्राणिमात्र के लिए हितकारी इस अभियान को व्यापक गति दने के विवेकपूर्ण प्रयोग बहुत ही प्रभावी सिद्ध हो सकते हैं।
तरुपुत्र- तरुमित्र कार्यक्रम इस दिशा में बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ है। भविष्य में इसे और भी व्यापक और लोकप्रिय बनाया जा सकता है। इसके लिए निम्न गेय पद के अनुसार जनभावनायें उभारने और उन्हें साकार रूप देने में पर्याप्त सफलता मिल सकती है।

पद :
तरुपुत्रों का वरण करो, ये थोड़े में पल जाते हैं।
निश्चित ही पुत्रों से ज्यादा, पुण्य- सुयश दे जाते हैं।।
मित्र मानकर तुष्ट करो, ये स्वार्थ रहित करते उपकार।
प्राणवायु, आहार आदि के,जीवन में भरते उपहार।।
मातु- पितावत्, श्रद्धापूर्वक वृक्षों का सम्मान करें।
ये विषपायी औगढ़दानी, जगती का कल्याण करें।।

अपने देश के नर- नारी भावनावश विशेष पुरुषार्थ कर लेते हैं। शरीर से जर्जर व्यक्ति भी किसी के लिए मनौती मनाने के लिए सैकड़ों सीढ़ियाँ, कठिन चढ़ाईयाँ पार करके देवस्थलों तक पहुँच जाते हैं। स्वयं भूखे रहकर भी प्रसन्नतापूर्वक दान- पुण्य करते हैं। प्रकृति माता के पूजन के भाव से ब्रह्मा- विष्णु, इन्द्रादि के पूरक प्रतीक वृक्षों के रक्षण- संवर्धन के लिए वे अनुपम पुरुषार्थ कर सकते हैं। नैष्ठिक साधक जनमानस में ऐसे भाव जगाने में समर्थ हो सकते हैं।

भारतभूमि को सस्यश्यामला (हरीतिमा से शोभित) कहा गया है। उसे पुन: उसी गरिमामय अवस्था में पहुँचाने के लिए संकल्पित, समन्वित, सहकारी पुरुषार्थ करना श्रेष्ठतम यश आौर पुण्य देने वाला कार्य है। आइये हम तुरंत इसमें जुट जाएँ। *


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