अगले दिनों होगा सर्वमान्य ईश्वर एवं सर्वसमर्थित पूजा विधान

Published on 2018-07-02
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परिष्कृत होती मान्यताएँ
आ दिमकाल से लेकर अब तक मनुष्य ने प्रगति पथ की अनेकों सीढ़ियाँ पार की हैं। इसी के साथ-साथ धर्म का भी विकास होता चला आया है।
 
दार्शनिक : आदिम काल में आग का गोला सूर्य, आकाश में चमकने वाले चाँद-तारे, बिजली की कड़क, जन्म-मरण जैसी हलचलों को लोगों  ने किन्हीं अदृश्य अतिमानवों की करतूत समझा होगा और उनके कोप से बचने के लिए एवं उन्हें सहायक बनाने के लिए पूजा उपक्रम का कुछ ढंग सोचा होगा। संभवत: यहीं से उपासनात्मक अध्याय का आरंभ हुआ है।

एकाकी स्वेच्छाचार ने जब समूह में रहने की प्रवृत्ति अपनाई होगी तो आचारसंहिता की आवश्यकता पड़ी होगी अन्यथा सहयोग का अभिवर्धन और टकराव का समाधान ही संभव न होता। धर्म यहीं से चला है।

भय के बाद लोभ की प्रवृत्ति पनपी। उसने अतिमानवों से, देवताओं से अभीष्ट लाभ पाने की आशा रखी होगी। मनुष्य की आकांक्षाएँ बढ़ीं और साधन सीमित रहे। ऐसी परिस्थितियों में किन्हीं अदृश्य अतिमानवों का, देवमानवों का पल्ला पकड़ना उसने उचित समझा होगा। संयोगवश जो भले-बुरे अवसर आते गये उन्हें दैवकृत माना जाता रहा। उनके कोप से बचना और प्रसन्न करके लाभान्वित होना तब एक दिव्य कौशल रहा होगा। उन्हीं दिनों मंत्र-तंत्र के देव-परिकर के रूप में विधान गढ़े गये।

भय और लोभ की व्यक्तिवादी आकांक्षाओं से बढ़कर मनुष्य अधिकाधिक समाज पर निर्भर होते चलने की स्थिति में यह समझने के लिए बाध्य हुआ कि समूहगत हलचलें मनुष्य को अधिक प्रभावित करती हैं। अतएव व्यक्ति और समाज की नीति-मर्यादाओं को अधिक सबल, अधिक परिष्कृत बनाया जाय। इस मान्यता ने नीति के, उपकार के तत्त्वज्ञान को धर्म में सम्मिलित किया और इसके लिए आचारशास्त्र का विकास हुआ। यह और भी अधिक महत्त्वपूर्ण कदम था।

इससे आगे ब्रह्मविद्या का युग है। एक ही आत्मा सब में समायी हुई है, सब में अपनी ही सत्ता जगमगा रही है, अपने भीतर सब है, सब में एक ही आत्मा का प्रतिबिम्ब है।  यह विश्व मानव की, विश्व परिवार की एकात्म, अद्वैत बुद्धि सचमुच धर्म की अद्भुत और अति उपयोगी देन है।

सामाजिक : कोई देश अपने पड़ोसियों के कारण ही नहीं, दूर देशों की आन्तरिक परिस्थितियों के कारण भी प्रभावित होता है।

व्यक्ति की प्रगति और अवगति अब उसके निजी पुरुषार्थ पर निर्भर नहीं, वरन सामाजिक परिस्थितियाँ उसे बनने, बदलने के लिए विवश करती हैं। व्यक्ति पूरी तरह समाज-यंत्र का पुर्जा मात्र बन गया है। इन परिस्थितियों में यदि व्यक्ति को समाजनिष्ठ बनने के लिए कहा जाय, उसे अपनी प्रगति, अवगति को समाज के उत्थान-पतन के रूप में जोड़ने के लिए कहा जाय तो यह सर्वथा उचित और सामयिक है।

जो परिस्थितियाँ आज अनिवार्य हो गई हैं, कुछ समय पहले ही उनकी सम्भावना दूरदर्शियों ने भाँप ली थी और धर्म एवं अध्यात्म को अधिकाधिक समाजनिष्ठ बनाना आरम्भ कर दिया गया था। अहंकार को, स्वार्थ को, परिग्रह को, तृष्णा-वासना को त्यागने के लिए कहने का तात्पर्य व्यक्तिवाद की कड़ी पकड़ से अपनी चेतना को मुक्त करना ही हो सकता है। सेवा, परोपकार, जन-कल्याण, दान-पुण्य, त्याग-बलिदान के आदर्श मनुष्य को समाजनिष्ठ बनाने के लिए विनिर्मित हुए हैं। मनुष्य में संयम की, तप की, तितीक्षा की, पवित्रता की, मितव्ययिता की, शालीनता की, सज्जनता की, संतोष और शान्ति की वे धाराएँ सम्मिलित की गई हैं, जो उसके अपने लिए अपनी शक्तियों का न्यूनतम भाग खर्च करने की प्रेरणा देती हैं और तन-मन, धन का जो भाग इस नीति को अपनाने के कारण बचा रहता है उसे जनकल्याण में खर्च करने की ओर धकेलती हैं।    

ईश्वर आस्था : ईश्वर का स्वरूप भी अब भयंकर, वरदाता, नीति-निर्देशक की क्रमिक भूमिका से आगे बढ़ते-बढ़ते इस स्थिति पर आ पहुँचा है कि हम विराट् ब्रह्म के, विश्व दर्शन के रूप में उसकी झाँकी कर सकें और श्रद्धा-विश्वास जैसे उत्कृष्ट चिन्तन को भवानी-शंकर की उपमा दे सकें। अग्निहोत्र की व्याख्या यदि जीवनयज्ञ के, सर्वमेध के साथ जोड़ी जाने लगी है, तो यह अत्यन्त ही सामयिक परिभाषा का प्रस्तुतीकरण है। क्रिया-काण्ड को यदि भाव परिष्कार का प्रतीक-संकेत कहा जाय तो वस्तुत: यह प्राचीन ईश्वर की परिष्कृत चेतना भी कहा जायेगा।

अब प्रसाद खाकर या प्रशंसा सुनकर प्रसन्न होने वाले ईश्वर का रूप बदल रहा है। प्रतिमाओं का दर्शन करने, नदी, तालाबों में नहाने, मंत्र के जपोच्चार से, चित्र-विचित्र कर्मकाण्डों से अब ईश्वर के प्रसन्न होने की बात पर केवल बहुत पिछड़े लोग ही विश्वास करते हैं।

आदिम ईश्वर सर्वतन्त्र स्वतन्त्र था, जिस पर प्रसन्न हो उसे लाभ देना और जिस पर अप्रसन्न हो उसे हानि पहुँचाना ही उसका काम था। मनुष्यों से वह भेंट, पूजा और स्तवन की आकांक्षा करता था। पुरोहित वर्ग उसका एजेंट था। उन्हें प्रसन्न करना ही प्रकारान्तर से ईश्वर को प्रसन्न करना था।

अब का ईश्वर एक नियम है। उसने समस्त जड़-चेतन को संसम्बद्ध नियंत्रण में जकड़ा है, यहाँ तक कि अपने को भी कायदे-कानून के बंधनों में बाँध लिया  है।

आधुनिक ईश्वर की झाँकी स्थूल शरीर में सत्कर्म के रूप में और मन में सद्भावों के रूप में की जाने लगी है। परिष्कृत व्यक्तियों की गणना दैवी अथवा अवतार के रूप में की जाने लगी है। यह शुभ चिह्न है।

एकता-समता की ओर
धर्म और ईश्वर जिस क्रम से विकास पथ पर चल रहे हैं, उसे देखते हुए अगले दिनों नास्तिक और आस्तिक का झगड़ा दूर हो जायेगा। धर्म और विज्ञान के बीच जो विवाद था, उसका हल निकल आयेगा। साम्प्रदायिक विद्वेष की भी गुंजायश न रहेगी। पिछले और पिछड़े सम्प्रदाय अपने-अपने ईश्वरों के अलग-अलग आदेशों को पृथक प्रथा- परम्पराओं के रूप में मानते थे और मतभेद रखने वालों को तलवार के घाट उतारते थे। अब वैसी गुंजाइश नहीं रहेगी। सद्भावना एवं सज्जनता की परिभाषाएँ यों अभी भी कई तरह की जाती हैं, पर उनमें इतना अधिक मतभेद नहीं है, जिनका समन्वय न किया जा सके।

दुनिया अब एक धर्म, एक आचार, एक संस्कृति, एक राष्ट्र, एक भाषा के आधारों को अपनाकर एकता की ओर चल रही है। ऐसी दशा में एक सर्वमान्य ईश्वर और उसका एक सर्वसमर्थित पूजा-विधान भी होना ही चाहिए। अब इस दिशा में आशाजनक स्थिति उत्पन्न होने जा रही है। धर्म और कर्म का मर्म समझने वाले ब्रह्मपरायण व्यक्ति ईश्वर को निर्विवाद स्थिति तक पहुँचाकर ही रहेंगे।


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