Published on 2018-07-09
img

गुरुकृपा का पूरा लाभ उठायें, मनोकामना पूर्ति ही नहीं, चित्तवृत्तियों का शोधन भी करायें

पर्व का सार्थक उपयोग
पर्व आते हैं, एक उत्साहवर्धक वातावरण बनाते हैं। उनका क्षणिक, सामयिक लाभ ही अधिकांश लोग उठा पाते हैं। उनके द्वारा बनाये गये वातावरण और जमाये गये उल्लास का दीर्घगामी या स्थाई लाभ कितने लोग उठा पाते हैं? प्रयास यह किया जाना चाहिए कि उस वातावरण और उल्लास का उपयोग अपने व्यक्तित्व के परिष्कार एवं विकास के लिए किया जा सके। ऐसा किया जा सके तो प्रत्येक पर्व हमें एक ऐसा अनुदान देकर जायेगा जो हमें दीर्घकालीन, स्थाई लाभ देने में समर्थ हो।

गुरुपूर्णिमा पर्व मनाइये, उत्सव- उल्लास का माहौल बनाइये, गुरु की कृपा की महिमा के गीत गाइये, किन्तु उनका समुचित लाभ भी उठाइये, अपनी श्रद्धा को अधिक परिष्कृत और जीवन्त बनाइये।

गुरुदेव ने स्पष्ट किया है कि श्रद्धा उत्कृष्टता के प्रति असीम प्रेम है। जिस व्यक्ति या वस्तु से गहरा प्रेम होता है, उसके निकट रहने, उसे अपनाने का मन होने लगता है। जिस उत्कृष्टता से प्रेम होगा, उसको भी अपनाने, जीवन में धारण करने का उत्साह जागेगा ही, लगन लगेगी ही।

पर्व मनाने के दौरान एवं उसके बाद आत्मसमीक्षा करिए। गुरुपर्व मनाने के क्रम में उनके प्रभाव से अपनी मनोकामनाएँ पूरी होने, कठिनाइयाँ हल होने भर का विश्वास जागा या उनकी उत्कृष्टता को वरण करने के लिए कठिनाइयाँ स्वीकार करने की श्रद्धा भी विकसित हुई? यदि ऐसा होता है तो ही पर्व का सार्थक उपयोग हुआ, ऐसा माना जा सकता है।

गुरु का स्वभाव और प्रभाव
गुरु का, संत का स्वभाव होता है कि वह सम्पर्क में आने वालों की सेवा- सहायता करें, उनके दु:ख- कठिनाइयों का निवारण करें। लेकिन उसका कार्य, उसका उद्देश्य हमेशा यही रहता है कि उसके शिष्य दु:खों से उबरने और कठिनाइयों को हल करने में स्वयं समर्थ बनें।
विचार करें, किसी समर्थ पिता ने अपने बच्चों के लिए एक कुशल शिक्षक (ट्यूटर) नियुक्त कर दिया। स्कूल में बच्चों को घर पर पूरा करने के लिए कार्य (होमवर्क) दिया जाता है। बच्चे यदि यह चाहें कि उनका ट्यूटर उन्हें दिये जाने वाले होमवर्क को पूरा कर दिया करें और वह ऐसा करने भी लगे तो क्या होगा? समझदार लोग उन बच्चों को और उस शिक्षक को भी मूर्ख ही मानेंगे। बच्चे तो अविकसित ही रह जायेंगे। स्कूली परीक्षा या जीवन में सहज उभरने वाले प्रश्नों को वे हल न कर पायेंगे तथा कदम- कदम पर दु:ख और अपयश के भागीदार बनेंगे।

गुरु स्तर के व्यक्ति एवं सच्चे शिक्षक ऐसी भूल कभी नहीं करते। बच्चों की समस्या हल करने में उन्हें प्रसन्नता भी होती है और उसमें वे सक्षम भी होते हैं। लेकिन उनकी असली प्रसन्नता तो तभी होती है जब उनके सहयोग से बच्चे स्वयं भी प्रश्नों का, जीवन की समस्याओं का हल निकालने योग्य बन जायें।

पूज्य गुरुदेव एक बार प्रवचन के दौरान कहने लगे कि "कहा जाता है लोगों की नि:स्वार्थ सेवा की जाये। लेकिन हमसे तो ऐसा हुआ नहीं। लोगों की सेवा- सहायता करते समय यही भावना- कामना अन्दर बनी रही कि किसी बहाने से वे मेरे पास आयें तो उन्हें पकड़कर इंसान बना दूँ।" गुरु स्तर के व्यक्ति अपने उच्च उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हम सबको सेवा- सहायता के छोटे- छोटे आकर्षक- लालच भी देते हैं, किन्तु उनका उद्देश्य हमें ठगना नहीं, हमें उच्च स्तरीय सम्पदा से मालामाल बना देने का होता है।

साधकगण इस तथ्य को समझें और तद्नुसार गुरु के उच्च स्तरीय सहयोग का लाभ उठाने की तैयारी करें। उनके स्वभाव को देखकर उनके निकट जायें और उनके प्रभाव का लाभ उठाने में, अपने व्यक्तित्व को श्रेष्ठतर बनाने में उनके सहयोगी बन जायें। तो ध्यान रखें :-

उनके स्वभाव से कष्ट दूर भगायें और प्रभाव से जीवन सम्पदा कमायें। सच्चे शिष्य कहायें, धन्य हो जायें।

प्रौढ़ता लायें, श्रेष्ठता अपनायें
बच्चे जब छोटे होते हैं तो स्कूल का, शिक्षा का महत्त्व नहीं समझते। उन्हें टॉफी, मिठाई, नये कपड़ों जैसे उनकी पसंद के आकर्षण दिखाकर मन लगाकर पढ़ने, नियम से स्कूल जाने के लिए प्रेरित किया जाता है। वही जब बड़े हो जाते हैं, समझ बढ़ जाती है तो उनका ढंग बदल जाता है। फिर वे समय पर कक्षा में पहुँचने के लिए बिना खाये भी भागने लगते हैं। मित्रों और मनोरंजन- आकर्षण छोड़कर भी पढ़ाई में पर्याप्त समय लगाते हैं।

आध्यात्मिक शिक्षण के क्रम में भी ऐसी प्रौढ़ता साधकों में आनी चाहिए। गुरु के पास सुविधा- सहायता के आकर्षण में नहीं, उनके सान्निध्य के प्रभाव को लक्ष्य करके असुविधा- कठिनाइयाँ सहते हुए भी जाने का विवेकपूर्ण साहस जुटाना चाहिए।

पूज्य गुरुदेव जहाँ स्वभाववश कठिनाइयाँ हल करने की सेवा- सहायता प्रसन्नतापूर्वक देते ही रहते थे, वहीं अपने अन्तरंग प्रभाव के लाभ उठाने के लिए भी प्रेरित करते रहते थे। एक प्रेरक प्रसंग इस संदर्भ में प्रस्तुत किया जा रहा है।

शक्तिपीठों की प्राणप्रतिष्ठा के दौरे का प्रसंग है। व्यस्तता के बीच जगह- जगह भावनाशीलों का मन रखते चलने के कारण चित्रकूट पहुँचने में काफी विलंब हो गया था, फिर भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुगण एवं प्रबुद्धजन एकत्रित थे। पूज्य गुरुदेव ने इस प्रकार कठिनाइयाँ सहकर भी दूर- दूर से पहुँचने तथा देर तक रुके रहने की उनकी भावना की सराहना की। फिर अचानक स्वर बदल कर बोले :-

"कोई तुम लोगों से पूछे कि इतनी परेशानियाँ उठाकर कहाँ गए थे? तो तुम्हारा उत्तर होगा च्आचार्य जी के पासज्। पुन: प्रश्न उठे कि कौन से आचार्य जी? तो तुम लोग यही कहोगे न कि उनने हमारे असाध्य रोग ठीक कर दिए, हमारे कष्ट टाल दिए, हमें आशीर्वाद देकर बच्चा दे दिया। यही न?" फिर एकाएक तमककर बोले
"जैसे घटिया तुम, वैसे तुम्हारे आचार्य जी। तुमने मेरा रूप यही समझा कि मैं तुम सबकी अनगढ़ कामनाएँ पूरी करता रहूँ? गुरु कहलाकर तुम्हें बहलाता भर रहूँ? मुझे समझना है तो एक क्रान्तिकारी के रूप में समझो। परिचय देना है तो एक ऐसे ऋषि के रूप में दो जिसके पेट में क्रान्ति की ज्वालाएँ जलती रहती हैं और आँखों से क्रान्ति की चिनगारियाँ फूटती रहती हैं। जो मनुष्य में देवत्व जगाने और धरती पर स्वर्ग लाने के लिए भूमण्डल पर आया है। इससे कम में उसका कोई समाधान नहीं होता।"

उनका ऐसा स्वरूप समझने और उनके उद्देश्य के लिए हर कीमत चुकाकर तैयार होने की प्रौढ़ता हमारे अन्दर आनी ही चाहिए।

प्राप्त सौभाग्य का पूरा लाभ लेंगुरु नाम से कानफूँक कर दीक्षा देने वाले, लौकिक सम्पदा और लौकिक यश की भूख जगाकर अपने अनुयायी बनाने वाले कथित गुरु तो बहुत मिल जाते हैं, लेकिन जीवन का यथार्थ समझाकर, अपने अनुभव के आधार पर मंजिल तक पहुँचा देने का वायदा करने वाला गुरु बड़े सौभाग्य से विरलों को मिलता है। हमारे गुरुदेव ने मैं क्या हूँ? पुस्तिका में स्पष्ट घोषणा की है- "यह रास्ता मेरा देखा- समझा हुआ है, तुम्हें बीच में नहीं छोडूँगा।" अपनी जीवनी हमारी वसीयत- विरासत में वे लिखते हैं- "जो इसे ध्यान से समझकर पढ़ेगा, वह अध्यात्म के मार्ग में कहीं भटकेगा नहीं।"

आदि शंकराचार्य ने गुरुवंदना में लिखा है- "मैं उस गुरु को नमन श्रद्धा से करता हूँ जो सदा गायत्रीरूप है, जिसके अमृत वचनों से संसार रूपी विष का नाश होता है।"

नमोस्तु गुरवे तस्मै, गायत्री रूपिणे सदा।
यस्य वाग्मृतं हन्ति विषं संसार संज्ञकम्।।

हमें जीवनभर गायत्री साधना में निरत रहनेवाला, अपने प्रभाव से विश्वभर में गायत्री का प्रचार- प्रसार करने वाला और अंत में गायत्री जयंती के दिन काया छोड़कर सूक्ष्म एवं कारण सत्ता में प्रवेश कर जाने वाला गुरु प्राप्त हुआ है।

संत कवि तुलसीदास ने गुरुवंदना में लिखा है- "मैं बोधमय नित्य- शंकररूपी गुरु को नमन करता हूँ।"
वन्दे बोधमयं नित्यं, गुरुं शंकर रूपिणं।

हमें कालचक्र को पलटकर, मनुष्यमात्र के लिए परम कल्याणकारी प्रज्ञायुग लाने के लिए महाकाल की भूमिका निभाने वाले गुरु प्राप्त हुए हैं।

गुरुगीता में गुरु को परमानन्द और परम सुख देने वाले विशुद्ध ज्ञानमूर्ति कहा है।

परमानन्दं, परम सुखदं, केवलं ज्ञानमूर्तिं।

हमारे गुरुदेव वेदमूर्ति हैं, बार- बार यही कहते हैं कि मेरा सही स्वरूप मेरे विचारों में सन्निहित है। शरीर रहे- न रहे, उनका मंगलमय अस्तित्व श्रेष्ठ विचारों और उत्कृष्ट भावप्रवाहों के रूप में, सूक्ष्म एवं कारण स्तर पर निरंतर बना हुआ है। हमें अपने इस दुर्लभ सौभाग्य का सही मूल्यांकन करते हुए इस सौभाग्य का भरपूर उपयोग करने के लिए प्रतिबद्ध होना ही चाहिए।

योग साधें
भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद् भगवद्गीता में कहा है :-
अनन्य चिंतन के द्वारा जो मेरी उपासना करता है, इस प्रकार जो मेरे साथ नित्य- निरन्तर जुड़ा है, उसके योग एवं क्षेम की जिम्मेदारी मैं स्वयं ही वहन करता हूँ :-
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते।

तेषां नित्याभियुक्तानां, योगक्षेमं वहाम्यहम्।।
प्रज्ञावतार पूज्य गुरुदेव के साथ भी इसी प्रकार अनन्य भाव से जुड़ने की आवश्यकता है। फिर आत्मकल्याण और लोककल्याण के लिए हमारे लिए संयोग जुटाने (योग) और सुयोगों को टिकाऊ- दीर्घकालीन बनाने (क्षेम) की जिम्मेदारी का निर्वाह वे करेंगे। उन्होंने परिवर्तन के महान क्षण पुस्तिका में स्पष्ट लिखा भी है कि भावनापूर्वक हमें याद करने वाले व्यक्ति हमें अपने निकट खड़ा और समर्थ सहयोग देता हुआ अनुभव करेंगे।

आज इंटरनेट के माध्यम से तमाम पुस्तकों, पुस्तकालयों, शोधों की जानकारी अपने कम्प्यूटर पर प्राप्त की जा सकती है। यह कैसे संभव हुआ? उस ज्ञान के स्थूल पुस्तकाकार स्वरूप को सूक्ष्म संकेतों के रूप में विराट जगत में फैला दिया गया है। पूज्य गुरुदेव ने भी सूक्ष्मीकरण साधना के माध्यम से नवसृजन से सम्बन्धित तमाम सूत्रों- संकेतों, अनुशासनों को सूक्ष्म एवं कारण स्तर पर विराट प्रकृति में स्थापित कर दिया है। जैसे कम्प्यूटर पर वाञ्छित जानकारी पाने के लिए किसी सुनिश्चित सूत्र (कोड) को संप्रेशित करना पड़ता है, उसी प्रकार सूक्ष्म जगत से वाञ्छित सहयोग पाने के लिए अपने संकल्पों और उसके पीछे के उत्तम भावों को संप्रेषित करना पड़ता है। जब वे इष्ट अनुशासन के अनुरूप होते हैं तो वाञ्छित सहयोग उपलब्ध हो जाता है। अन्यथा केवल चाहने भर से बात बनती नहीं।

तीनों स्तरों पर साधें
युगऋषि ने कहा है, मैंने नवसृजन के लिए प्रत्यक्ष- स्थूल तंत्र तो खड़ा कर ही दिया है, उसे स्थायित्व और बल देते रहने के लिए सूक्ष्म (विचार) स्तर पर तथा कारण (भाव संवेदना) के स्तर पर भी व्यवस्था बना दी है। योग- सम्पर्क साधें और लाभ पायें।

स्थूल स्तर पर उपासना, साधना, आराधना एवं उसके निमित्त समयदान तथा अंशदान की प्रत्यक्ष रीतिनीति अपनायें। उसे थोड़े से प्रारंभ करें और नियमित रूप से निभाने और बढ़ाते रहने का क्रम बनायें।

स्थूल प्रक्रिया कर्मकाण्ड के रूप में अपना भी लें, लेकिन अगर उसके पीछे विचार लौकिक यश और लाभ भर कमाने के हों तो उनका प्रभाव भी सीमित होगा। उन कर्मों के पीछे निहित आदर्श विचारों को उनके साथ जोड़ना जरूरी है।

सूक्ष्म स्तर पर :- श्रेष्ठ विचारों से ही प्रेरित श्रेष्ठकर्म पूरा लाभ पहुँचाते हैं। अन्यथा चुनाव जीतने के लिए आदर्शों का हवाला तो जाने कितने व्यक्ति देते हैं। सूक्ष्म स्तर पर ऋषिसत्ता से जुड़ने के लिए विचार और वाणी की साधना करनी होती है। बोलें तो उद्वेगरहित वाक्य बोलें। न स्वयं को उद्वेग हो और न सुनने वालों को। अपने वचनों को सत्य, प्रिय और हितकारी बनाने का प्रयास करें। गलत विचार हमें प्रभावित न कर पायें, श्रेष्ठ विचारों की सीना अपने साथ रहे। इसके लिए स्वाध्याय करने और उसकी चर्चा करते रहने का क्रम बनायें।

कारण स्तर पर :- लोगों को न्याय मिले इसके लिए कढछ (इण्डियन पैनल कोड) बना हुआ है। किन्तु उस आधार पर न्याय कितनों को मिल पाता है? वकील उसके सूत्रों पर बौद्धिक बाजीगरी दिखाते रहते हैं और कुछ का कुछ सिद्ध करते रहते हैं। विचार सूत्रों के साथ न्याय देने की भाव संवेदना हो तो बात बने। इसी प्रकार पूज्य गुरुदेव की भाव संवेदना सबसे लिए सद्बुद्धि, सबके लिए उज्ज्वल भविष्य का निर्माण के अनुरूप भाव बनें, उस नाते जो जिस स्तर पर है उससे उसे थोड़ा उन्नत बनाने की अदम्य भावना जागे तो उनकी कारण सत्ता से सम्पर्क बनता रह सकता है।

सूक्ष्म, स्थूल एवं कारण स्तर पर सम्पर्क- सुयोग साधें तो साधना में प्राण आ जाये, जीवन धन्य हो जाये। गुरुपर्व ऐसे ही संकल्प के साथ मनायें।


Write Your Comments Here:


img

गृहे- गृहे गायत्री यज्ञ - उपासना अभियान

इन दिनों देशभर में नौ वर्षीय मातृशक्ति श्रद्धांजली महापुरश्चरण के अन्तर्गत गृहे-गृहे गायत्री यज्ञों का अभियान तेज गति से चलाया जा रहा है। इसी श्रृंखला के अंतर्गत इस वर्ष परम पूज्य गुरुदेव की पुण्य तिथि 02 जून 2019 को विश्वव्यापी ‘.....

img

भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा का रजत जयंती वर्ष

नई पीढ़ी को संस्कृतिनिष्ठ-व्यसनमुक्त बनाने हेतु ठोस प्रयास होंसोद्देश्य प्रारंभ और प्रगतिभारतीय संस्कृति को दुनियाँ भर के श्रेष्ठ विचारकों ने अति पुरातन और महान माना है। ऋषियों की दृष्टि हमेशा से विश्व बंधुत्व की रही है। इसी लिए इस संस्कृति.....

img

नवरात्र पर्व पर, नव दुर्गा शक्ति की नौ धाराओं का मर्म समझें, उन्हें साधें

साधना अनुष्ठान की लकीर भर न पीटें, शक्ति साधना के उच्चतर सोपान चढ़ेंपरंपरागत क्रमशारदीय नवरात्र पर्व इस वर्ष कैलेंडर के अनुसार दिनांक १० अक्टूबर से १८ अक्टूबर तक चलेगा। युग निर्माण परिवार से जुड़े अधिकांश परिजन इन दिनों गायत्री जप-तप.....